प्रसिद्ध चौपाइयाँ और दोहे
तुलसीदासजी की वे चौपाइयाँ और दोहे जो हर घर में गूँजते हैं, हर एक गीताप्रेस की हिंदी टीका और पाठ में उसके स्थान की कड़ी के साथ।
- मंगल · बालकाण्डमंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ २ ॥अर्थ पढ़ें →
- स्वीकार · बालकाण्डहोइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥अर्थ पढ़ें →
- धर्म · बालकाण्डजब जब होइ धरम कै हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी॥३॥अर्थ पढ़ें →
- वचन · अयोध्याकाण्डरघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥२॥अर्थ पढ़ें →
- विपत्ति · अरण्यकाण्डधीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥अर्थ पढ़ें →
- सत्संग · बालकाण्डबिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥अर्थ पढ़ें →
- साहस · किष्किन्धाकाण्डकवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥अर्थ पढ़ें →
- कार्यारम्भ · सुन्दरकाण्डप्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥अर्थ पढ़ें →
- सत्य परामर्श · सुन्दरकाण्डसचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।अर्थ पढ़ें →
- दृढ़ता · सुन्दरकाण्डबोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥५७॥अर्थ पढ़ें →
- राम नाम · बालकाण्डराम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।अर्थ पढ़ें →
- हनुमानजी · बालकाण्डप्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।अर्थ पढ़ें →
- रामराज्य · उत्तरकाण्डदैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥अर्थ पढ़ें →
- कर्म · अयोध्याकाण्डकरम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥२॥अर्थ पढ़ें →
- राम नाम · बालकाण्डसुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥३॥अर्थ पढ़ें →
- गुरु · बालकाण्डबंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।अर्थ पढ़ें →
- जगत स्वप्न · अरण्यकाण्डउमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥अर्थ पढ़ें →
- सच्चा स्नेह · बालकाण्डजेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥३॥अर्थ पढ़ें →
- मित्रता · किष्किन्धाकाण्डबिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥३॥अर्थ पढ़ें →
- व्यर्थ आशा · अरण्यकाण्डसेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी॥अर्थ पढ़ें →