भए प्रगट कृपाला
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड · गोस्वामी तुलसीदास
भए प्रगट कृपाला में Shri Ram के जन्म का वह प्रसंग है, जब वे माता कौशल्या के सामने अपने दिव्य चतुर्भुज रूप में प्रकट होते हैं। गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में दोहा १९२ से पहले के चार छन्दों में यह वर्णन आता है। माता कौशल्या हाथ जोड़कर प्रभु की स्तुति करती हैं। गोस्वामी तुलसीदास उनके विस्मय और प्रभु की लीला का वर्णन करते हैं। अनन्त भगवान के प्रति आदर धीरे-धीरे उन्हें अपना पुत्र मानकर दुलारने की इच्छा में बदल जाता है।
सम्पूर्ण पाठ
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥१॥
Bhaye pragat kripala deen dayala Kausalya hitkariHarshit mahtari muni man hari adbhut roop bichariLochan abhirama tanu ghanshyama nij aayudh bhuj chariBhushan banmala nayan bisala sobha sindhu kharari
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥ करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता। सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥२॥
Kah dui kar jori astuti tori kehi bidhi karaun anantaMaya gun gyanateet amana bed puran bhanantaKaruna sukh sagar sab gun aagar jehi gavahin shruti santaSo mam hit lagi jan anuragi bhayau pragat Shrikanta
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै। मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥ उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै। कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥३॥
Brahmand nikaya nirmit maya rom rom prati bed kahaiMam ur so basi yah uphasi sunat dheer mati thir na rahaiUpja jab gyana prabhu musukana charit bahut bidhi keenh chahaiKahi katha suhai matu bujhai jehi prakar sut prem lahai
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥ सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा। यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥४॥
Mata puni boli so mati doli tajahu taat yah roopaKeejai sisuleela ati priyaseela yah sukh param anoopaSuni bachan sujana rodan thana hoi balak surbhoopaYah charit je gavahin haripad pavahin te na parahin bhavkoopa
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥१९२॥
Bipra dhenu sur sant hit leenh manuj avatarNij ichchha nirmit tanu maya gun go paar
हर पद का अर्थ
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥१॥
दीनोंपर दया करनेवाले, कौसल्याजीके हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियोंके मनको हरनेवाले उनके अद्भुत रूपका विचार करके माता हर्षसे भर गयी। नेत्रोंको आनन्द देनेवाला मेघके समान श्यामशरीर था; चारों भुजाओंमें अपने ( खास ) आयुध [ धारण किये हुए ] थे; [ दिव्य ] आभूषण और वनमाला पहने थे; बड़े-बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभाके समुद्र तथा खर राक्षसको मारनेवाले भगवान् प्रकट हुए॥ १ ॥
दोहा 192 →कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥ करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता। सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥२॥
दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी—हे अनन्त! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ। वेद और पुराण तुमको माया, गुण और ज्ञानसे परे और परिमाणरहित बतलाते हैं। श्रुतियाँ और संतजन दया और सुखका समुद्र, सब गुणोंका धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तोंपर प्रेम करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान् मेरे कल्याणके लिये प्रकट हुए हैं॥ २ ॥
दोहा 192 →ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै। मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥ उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै। कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥३॥
वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोममें मायाके रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डोंके समूह [ भरे ] हैं। वे तुम मेरे गर्भमें रहे—इस हँसीकी बातके सुननेपर धीर ( विवेकी ) पुरुषोंकी बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती ( विचलित हो जाती है )। जब माताको ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुसकराये। वे बहुत प्रकारके चरित्र करना चाहते हैं। अतः उन्होंने [ पूर्वजन्मकी ] सुन्दर कथा कहकर माताको समझाया, जिससे उन्हें पुत्रका ( वात्सल्य ) प्रेम प्राप्त हो ( भगवान्के प्रति पुत्रभाव हो जाय )॥ ३ ॥
दोहा 192 →माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥ सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा। यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥४॥
माताकी वह बुद्धि बदल गयी, तब वह फिर बोली—हे तात! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला करो, [ मेरे लिये ] यह सुख परम अनुपम होगा। [ माताका ] यह वचन सुनकर देवताओंके स्वामी सुजान भगवान्ने बालक [ रूप ] होकर रोना शुरू कर दिया। [ तुलसीदासजी कहते हैं— ] जो इस चरित्रका गान करते हैं, वे श्रीहरिका पद पाते हैं और [ फिर ] संसाररूपी कूपमें नहीं गिरते॥ ४ ॥
दोहा 192 →बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥१९२॥
ब्राह्मण, गौ, देवता और संतोंके लिये भगवान्ने मनुष्यका अवतार लिया। वे [ अज्ञानमयी, मलिना ] माया और उसके गुण ( सत्, रज, तम ) और [ बाहरी तथा भीतरी ] इन्द्रियोंसे परे हैं। उनका [ दिव्य ] शरीर अपनी इच्छासे ही बना है [ किसी कर्मबन्धनसे परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थोंके द्वारा नहीं ]॥ १९२ ॥
दोहा 192 →प्रसंग
श्री राम माता कौशल्या के सामने प्रकट होते हैं। उनका शरीर मेघ के समान श्याम है, नेत्र विशाल हैं और चारों भुजाओं में अपने आयुध हैं। दिव्य आभूषण और वनमाला उनकी शोभा बढ़ाते हैं। माता आनन्द से भरकर हाथ जोड़ती हैं और अनन्त प्रभु की स्तुति करती हैं। वे विस्मित हैं कि जिनके प्रत्येक रोम में अनेक ब्रह्माण्ड हैं, वे उनके गर्भ में रहे। प्रभु मुसकराते हैं। माता को पुत्र का प्रेम मिले, इसलिए वे उन्हें पूर्वजन्म की सुन्दर कथा सुनाकर समझाते हैं। अब माता उनसे चतुर्भुज रूप छोड़कर बाललीला करने की प्रार्थना करती हैं। उनकी इच्छा सुनकर श्री राम शिशु बन जाते हैं और रोने लगते हैं। भगवान की महिमा का विस्मय माता के हृदय में वात्सल्य का रूप ले लेता है।
इस स्तुति की सीख
अनगिनत ब्रह्माण्डों के स्वामी माता के प्रेम को स्वीकार करते हैं। इस प्रसंग में भगवान की महिमा और उनकी करुणा साथ प्रकट होती हैं। माता कौशल्या जानती हैं कि श्री राम माया, गुणों और समस्त सीमाओं से परे हैं। फिर भी वे उनके हित के लिए प्रकट होकर उनकी प्रार्थना सुनते हैं।
‘जन अनुरागी’ का अर्थ है भक्तों से प्रेम करनेवाले। यही प्रेम उनके प्राकट्य में दिखाई देता है। दोहे में गोस्वामी तुलसीदास स्पष्ट करते हैं कि प्रभु का दिव्य शरीर उनकी अपनी इच्छा से बना है। उनका अवतार कर्मबन्धन की विवशता से नहीं होता।
जैसे माता अपने छोटे बच्चे के साथ बैठकर उसका सरल खेल खेलती है। उसका ज्ञान बना रहता है, किन्तु प्रेम के कारण वह बच्चे के अनुरूप व्यवहार करती है। इसी प्रकार श्री राम माता कौशल्या को पुत्रप्रेम का सुख देने के लिए शिशु बन जाते हैं।
इस चरित्र का गान करते समय प्रभु की करुणा पर मन टिकाएँ। अर्थ समझकर गाएँ और प्रत्येक पंक्ति के साथ उनके चरणों में अपना स्नेह अर्पित करें।
पाठ कैसे करें
भक्त श्री राम के जन्म का स्मरण करते हुए भए प्रगट कृपाला का गान या पाठ करते हैं। रामनवमी पर इसका गान विशेष रूप से प्रचलित है। इसे अपने नियमित पाठ में भी शामिल कर सकते हैं। पहले अर्थ समझ लें, फिर इतनी सहज गति से पढ़ें कि प्रत्येक पंक्ति पर ध्यान बना रहे। माता कौशल्या के जुड़े हुए हाथों, उनके विस्मय और बाललीला की प्रार्थना का स्मरण करें। गाते समय श्री राम की करुणा और भक्तों के प्रति उनके प्रेम में मन लगाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भए प्रगट कृपाला का अर्थ क्या है?
भए प्रगट कृपाला का अर्थ है कि कृपालु प्रभु प्रकट हुए। पहली पंक्ति श्री राम को दीनों पर दया करनेवाले और माता कौशल्या के हितकारी बताती है। आगे उनके दिव्य रूप को देखकर माता के आनन्द और स्तुति का वर्णन है।
भए प्रगट कृपाला किसने लिखा और इसमें स्तुति कौन करता है?
गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में इस प्रसंग की रचना की है। इसमें माता कौशल्या प्रभु की स्तुति करती हैं। गोस्वामी तुलसीदास श्री राम के प्राकट्य, माता की प्रार्थना पर उनकी बाललीला और इस चरित्र के गान का फल भी बताते हैं।
श्रीरामचरितमानस में भए प्रगट कृपाला कहाँ है?
यह श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में दोहा १९२ से ठीक पहले के चार छन्दों में है। इसके बाद का दोहा बताता है कि श्री राम ब्राह्मणों, गायों, देवताओं और संतों के हित के लिए अपनी इच्छा से मनुष्य रूप धारण करते हैं।
भए प्रगट कृपाला के पाठ का क्या फल है?
इस स्तुति से भक्त का ध्यान श्री राम की करुणा और भक्तों के प्रति उनके प्रेम की ओर जाता है। गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि इस चरित्र का गान करनेवाले श्रीहरि का पद पाते हैं और संसाररूपी कुएँ में नहीं गिरते। इस फलवचन की भावना से प्रेमपूर्वक प्रभु का स्मरण करें।
भए प्रगट कृपाला का पाठ कब करना चाहिए?
श्री राम के जन्मोत्सव रामनवमी पर भक्त विशेष रूप से इसका गान करते हैं। नियमित पूजा या पाठ के समय भी इसे पढ़ सकते हैं। ऐसा समय चुनें जब अर्थ पर ध्यान देते हुए प्रेम से श्री राम का स्मरण कर सकें।
इसे ऐसे भी लिखा जाता है: Bhaye Pragat Kripala · Bhaye Prakat Kripala · Bhay Pragat Kripala · Bhaye Pragat Kripala Deen Dayala · Bhaye Pragat Kripala Kaushalya Hitkari · भए प्रगट कृपाला · भये प्रगट कृपाला · भए प्रकट कृपाला
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