जय जय गिरिबरराज किसोरी
श्रीरामचरितमानस · बालकाण्ड · गोस्वामी तुलसीदास
जय जय गिरिबरराज किसोरी जनकपुर में माता सीता द्वारा की गई माता भवानी की स्तुति है। भवानी को गौरी भी कहा गया है। यह प्रार्थना गोस्वामी तुलसीदास के श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में दोहा २३५ और २३६ के प्रसंग में आती है। माता सीता देवी के स्वरूप और महिमा का गुणगान करके अपनी अनकही अभिलाषा उनके चरणों में रखती हैं। माता गौरी उन्हें श्रीराम के पति रूप में मिलने का आशीर्वाद देती हैं।
सम्पूर्ण पाठ
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥३॥
Jai jai Giribar Raj Kishori, jai Mahesh mukh chand chakoriJai Gajbadan Shadanan Mata, jagat janani damini duti gata
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥ भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥४॥
Nahin tav aadi madhya avasana, amit prabhau bedu nahin janaBhav bhav bibhav parabhav karini, biswa bimohani swabas biharini
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥२३५॥
Patidevata suteey mahun Matu pratham tav rekhMahima amit na sakahin kahi sahas Sarada Sesh
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥ देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥१॥
Sevat tohi sulabh phal chari, baradayani Purari piariDebi pooji pad kamal tumhare, sur nar muni sab hohin sukhare
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥ कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥२॥
Mor manorathu janahu neeken, basahu sada ur pur sabahi kenKinheun pragat na karan tehin, as kahi charan gahe Baidehin
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥ सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥३॥
Binay prem bas bhai Bhavani, khasi maal moorati musukaniSadar Siyan prasadu sir dhareu, boli Gauri harashu hiyan bhareu
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥ नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥४॥
Sunu Siya satya asees hamari, poojihi man kamana tumhariNarad bachan sada suchi sacha, so baru milihi jahin manu racha
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥ एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
Manu jahin racheu milihi so baru sahaj sundar sanwaroKaruna nidhan sujan seelu sanehu janat ravaroEhi bhanti Gauri asees suni Siya sahit hiyan harasheen aliTulsi Bhavanihi pooji puni puni mudit man mandir chali
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥२३६॥
Jani Gauri anukool Siya hiya harashu na jai kahiManjul mangal mool bam ang pharakan lage
हर पद का अर्थ
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥३॥
हे श्रेष्ठ पर्वतोंके राजा हिमाचलकी पुत्री पार्वती! आपकी जय हो, जय हो; हे महादेवजीके मुखरूपी चन्द्रमाकी [ ओर टकटकी लगाकर देखनेवाली ] चकोरी! आपकी जय हो; हे हाथीके मुखवाले गणेशजी और छः मुखवाले स्वामिकार्तिकजीकी माता! हे जगज्जननी! हे बिजलीकी-सी कान्तियुक्त शरीरवाली! आपकी जय हो!॥३॥
दोहा 235 →नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥ भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥४॥
आपका न आदि है, न मध्य है और न अन्त है। आपके असीम प्रभावको वेद भी नहीं जानते। आप संसारको उत्पन्न, पालन और नाश करनेवाली हैं। विश्वको मोहित करनेवाली और स्वतन्त्ररूपसे विहार करनेवाली हैं॥४॥
दोहा 235 →पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥२३५॥
पतिको इष्टदेव माननेवाली श्रेष्ठ नारियोंमें हे माता! आपकी प्रथम गणना है। आपकी अपार महिमाको हजारों सरस्वती और शेषजी भी नहीं कह सकते॥२३५॥
दोहा 235 →सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥ देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥१॥
हे [ भक्तोंको मुँहमाँगा ] वर देनेवाली! हे त्रिपुरके शत्रु शिवजीकी प्रिय पत्नी! आपकी सेवा करनेसे चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवि! आपके चरणकमलोंकी पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं॥१॥
दोहा 236 →मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें॥ कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥२॥
मेरे मनोरथको आप भलीभाँति जानती हैं; क्योंकि आप सदा सबके हृदयरूपी नगरीमें निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर जानकीजीने उनके चरण पकड़ लिये॥२॥
दोहा 236 →बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥ सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥३॥
गिरिजाजी सीताजीके विनय और प्रेमके वशमें हो गयीं। उन ( के गले ) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुसकरायी। सीताजीने आदरपूर्वक उस प्रसाद ( माला ) को सिरपर धारण किया। गौरीजीका हृदय हर्षसे भर गया और वे बोलीं—॥३॥
दोहा 236 →सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥ नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥४॥
हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मनःकामना पूरी होगी। नारदजीका वचन सदा पवित्र ( संशय, भ्रम आदि दोषोंसे रहित ) और सत्य है। जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा॥४॥
दोहा 236 →मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥ एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभावसे ही सुन्दर साँवला वर ( श्रीरामचन्द्रजी ) तुमको मिलेगा। वह दयाका खजाना और सुजान ( सर्वज्ञ ) है, तुम्हारे शील और स्नेहको जानता है। इस प्रकार श्रीगौरीजीका आशीर्वाद सुनकर जानकीजीसमेत सब सखियाँ हृदयमें हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं—भवानीजीको बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मनसे राजमहलको लौट चलीं।
दोहा 236 →जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥२३६॥
गौरीजीको अनुकूल जानकर सीताजीके हृदयको जो हर्ष हुआ वह कहा नहीं जा सकता। सुन्दर मङ्गलोंके मूल उनके बायें अंग फड़कने लगे॥२३६॥
दोहा 236 →प्रसंग
माता सीता के हृदय में श्रीराम का साँवला रूप बसा है, पर शिवजी के कठोर धनुष का विचार उन्हें चिंतित करता है। वे फिर भवानी के मंदिर में जाती हैं और चरणों में प्रणाम करके हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं। देवी की महिमा गाने के बाद वे कहती हैं कि आप सबके हृदय में रहती हैं, इसलिए मेरी अभिलाषा जानती हैं। इतना कहकर वे माता के चरण पकड़ लेती हैं। उनके विनय और प्रेम से भवानी प्रसन्न होती हैं। मूर्ति मुसकराती है और माला खिसक पड़ती है। माता सीता उसे आदर से सिर पर रखती हैं। गौरी मनचाहा वर मिलने का आशीर्वाद देती हैं। माता सीता और सखियाँ हर्षित होती हैं। बारंबार पूजन करके माता सीता प्रसन्न मन से राजमहल लौटती हैं।
इस स्तुति की सीख
माता सीता की प्रार्थना सिखाती है कि अपनी अभिलाषा विनय और विश्वास के साथ जगज्जननी के चरणों में रखनी चाहिए। वे पहले गौरी की महिमा गाती हैं। माता का न आदि है, न अंत। वे सबके हृदय में निवास करती हैं। इसलिए माता सीता को अपनी इच्छा विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं होती। उनका मौन माता के ज्ञान पर विश्वास प्रकट करता है।
यहाँ ‘बिनय’ शब्द पर ध्यान देना चाहिए। इसका अर्थ है नम्रता। गोस्वामी तुलसीदास भवानी के प्रसन्न होने का कारण विनय और प्रेम बताते हैं। माता सीता चरण पकड़ती हैं और माला को प्रसाद मानकर आदर से सिर पर धारण करती हैं।
जैसे बच्चा अपनी चिंता कहने से पहले माँ के पास बैठ जाता है। माँ का स्नेह उसे भरोसा देता है। उसी प्रकार माता सीता अपनी अभिलाषा गौरी को सौंप देती हैं।
गौरी का आशीर्वाद श्रीराम की करुणा और माता सीता के शील तथा स्नेह को जानने की उनकी क्षमता भी बताता है। पाठ से पहले अर्थ समझें, फिर नम्र भाव से प्रार्थना करके कृतज्ञतापूर्वक प्रणाम करें।
पाठ कैसे करें
इस स्तुति का अर्थ समझकर माता गौरी के प्रति श्रद्धा से पाठ करें। पहले माता सीता की वंदना, फिर उनका विश्वास और उसके बाद गौरी का आशीर्वाद समझते हुए आगे बढ़ें। अपनी पूजा में इसे शांत स्वर में पढ़ सकते हैं या सहज गति से गा सकते हैं। आशीर्वाद वाले पद पढ़ते समय ध्यान रखें कि वहाँ गौरी माता सीता से बोल रही हैं। पाठ के साथ विनय, प्रेम और कृतज्ञता का भाव रखें। इसे हर इच्छा पूरी होने की निश्चित शर्त न मानें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
जय जय गिरिबरराज किसोरी का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है पर्वतराज हिमाचल की पुत्री की जय हो। माता सीता यहाँ पार्वतीजी को संबोधित करती हैं, जिन्हें गौरी और भवानी भी कहा गया है। आरंभ में वे देवी को शिवजी की प्रिया, गणेशजी और कार्तिकेयजी की माता तथा जगज्जननी कहकर प्रणाम करती हैं।
जय जय गिरिबरराज किसोरी किसने लिखी और इसे कौन कहता है?
गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में इन पदों की रचना की है। कथा में माता सीता भवानी से यह प्रार्थना करती हैं। इसके बाद के पदों में देवी की प्रसन्नता का वर्णन और माता सीता को दिया गया गौरी का आशीर्वाद है।
सीता गौरी स्तुति रामचरितमानस में कहाँ आती है?
यह बालकाण्ड में दोहा २३५ और २३६ के प्रसंग में आती है, जब माता सीता जनकपुर में भवानी के मंदिर जाती हैं। जय जय गिरिबरराज किसोरी से आरंभ होने वाली प्रार्थना के बाद गौरी उन्हें आशीर्वाद देती हैं कि जिन श्रीराम में उनका मन अनुरक्त है, वही उन्हें पति रूप में मिलेंगे।
इस स्तुति के पाठ का भक्तिभाव से क्या लाभ समझना चाहिए?
स्तुति में गौरी की सेवा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों फल सुलभ होने की महिमा कही गई है। अर्थ समझकर पाठ करना श्रद्धा व्यक्त करने और माता सीता के विनय, प्रेम तथा विश्वास को अपनाने का अवसर है। माता सीता को मिला विशेष आशीर्वाद प्रत्येक पाठ करने वाले के मनचाहे विवाह या अन्य फल की निश्चित गारंटी नहीं है।
जय जय गिरिबरराज किसोरी का पाठ कब कर सकते हैं?
इसे अपनी प्रार्थना या माता गौरी की पूजा के समय पढ़ सकते हैं। ऐसा समय चुनें जब अर्थ पर ध्यान दे सकें। इस प्रसंग में किसी विशेष वार, निश्चित पाठ संख्या या अनिवार्य विधि का निर्देश नहीं है। माता सीता के समान आदर, विनय और प्रसाद के प्रति कृतज्ञता का भाव रखें।
इसे ऐसे भी लिखा जाता है: Jai Jai Giriraj Kishori · Jai Jai Giribar Raj Kishori · Jai Jai Girivar Raj Kishori · Jai Jai Giribaraj Kisori · Sita Gauri Stuti · जय जय गिरिबरराज किसोरी · जय जय गिरिराज किशोरी · सीता गौरी स्तुति
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