
साहस
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥१॥
हनुमान्जीने उसे हाथसे छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा—भाई! श्रीरामचन्द्रजीका काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ?॥१॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 1ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकूल। तव प्रभावँ बड़वानलहि जारि सकइ खलु तूल॥३३॥
हे प्रभु! जिसपर आप प्रसन्न हों, उसके लिये कुछ भी कठिन नहीं है। आपके प्रभावसे रूई [ जो स्वयं बहुत जल्दी जल जानेवाली वस्तु है ] बड़वानलको निश्चय ही जला सकती है ( अर्थात् असम्भव भी सम्भव हो सकता है )॥ ३३ ॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 33धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरि पद सुमिरु। जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति॥१८४॥
ब्रह्माजीने कहा—हे धरती! मनमें धीरज धारण करके श्रीहरिके चरणोंका स्मरण करो। प्रभु अपने दासोंकी पीड़ाको जानते हैं, ये तुम्हारी कठिन विपत्तिका नाश करेंगे॥१८४॥
बालकाण्ड, दोहा 184सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६॥
हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है ( अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है )॥ १६॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 16निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु। जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥१५॥
राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण अग्निके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और राक्षसोंको जला ही समझो॥ १५॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 15प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥१७॥
मैं पवनकुमार श्रीहनुमान्जीको प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टरूपी वनको भस्म करनेके लिये अग्निरूप हैं, जो ज्ञानकी घनमूर्ति हैं और जिनके हृदयरूपी भवनमें धनुष-बाण धारण किये श्रीरामजी निवास करते हैं॥१७॥
बालकाण्ड, दोहा 17राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥२॥
तुम श्रीरामचन्द्रजीका सब कार्य करोगे, क्योंकि तुम बल-बुद्धिके भण्डार हो। यह आशीर्वाद देकर वह चली गयी, तब हनुमान्जी हर्षित होकर चले॥२॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 2जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ॥१९॥
जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडमें सिंह [ निःशङ्क होकर ] चला जाता है, वैसे ही श्रीरामजीके प्रतापका हृदयमें स्मरण करके वे [ निर्भय ] सभामें सिर नवाकर बैठ गये॥ १९ ॥
लंकाकाण्ड, दोहा 19सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥२७४॥
शूरवीर तो युद्धमें करनी ( शूरवीरताका कार्य ) करते हैं, कहकर अपनेको नहीं जनाते। शत्रुको युद्धमें उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रतापकी डींग मारा करते हैं॥ २७४ ॥
बालकाण्ड, दोहा 274जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा। संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥ एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं। एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥
व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो। क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं—पाटल ( गुलाब ), आम और कटहलके समान। एक ( पाटल ) फूल देते हैं, एक ( आम ) फूल और फल दोनों देते हैं और एक ( कटहल ) में केवल फल ही लगते हैं। इसी प्रकार [ पुरुषोंमें ] एक कहते हैं [ करते नहीं ], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक ( तीसरे ) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं।
लंकाकाण्ड, दोहा 90मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥२५६॥
जिसके वशमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवता हैं, वह मन्त्र अत्यन्त छोटा होता है। महान् मतवाले गजराजको छोटा-सा अंकुश वशमें कर लेता है॥ २५६ ॥
बालकाण्ड, दोहा 256सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहुँ जीति सकहिं संग्राम॥५५॥
सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर हैं फिर उनके सिरपर प्रभु ( सर्वेश्वर ) श्रीरामजी हैं। हे रावण! वे संग्राममें करोड़ों कालोंको जीत सकते हैं॥५५॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 55