
धर्म
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥३७॥
मन्त्री, वैद्य और गुरु, ये तीन यदि [ अप्रसन्नताके ] भय या [ लाभकी ] आशासे [ हितकी बात न कहकर ] प्रिय बोलते हैं ( ठकुरसुहाती कहने लगते हैं ); तो [ क्रमशः ] राज्य, शरीर और धर्म—इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है॥३७॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 37काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ। सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥३८॥
हे नाथ! काम, क्रोध, मद और लोभ—ये सब नरकके रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीको भजिये, जिन्हें संत ( सत्पुरुष ) भजते हैं॥३८॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 38मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥३१५॥
तुलसीदासजी कहते हैं—[ श्रीरामजीने कहा— ] मुखिया मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेको तो एक ( अकेला ) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगोंका पालन-पोषण करता है॥३१५॥
अयोध्याकाण्ड, दोहा 315सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम। ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम॥४८॥
जो सगुण ( साकार ) भगवान्के उपासक हैं, दूसरेके हितमें लगे रहते हैं, नीति और नियमोंमें दृढ़ हैं और जिन्हें ब्राह्मणोंके चरणोंमें प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणोंके समान हैं॥४८॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 48मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ॥७०॥
जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेनेका लाभ पाया है; नहीं तो जगत्में जन्म व्यर्थ ही है॥ ७०॥
अयोध्याकाण्ड, दोहा 70सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि। सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥६३॥
स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है॥६३॥
अयोध्याकाण्ड, दोहा 63सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥१७२॥
उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्गका त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है॥१७२॥
अयोध्याकाण्ड, दोहा 172अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥१७४॥
जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [ यहाँ ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी ( स्वर्ग )-में निवास करते हैं॥१७४॥
अयोध्याकाण्ड, दोहा 174असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु। जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥१२१॥
वे असुरोंको मारकर देवताओंको स्थापित करते हैं, अपने [ श्वासरूप ] वेदोंकी मर्यादाकी रक्षा करते हैं और जगत्में अपना निर्मल यश फैलाते हैं। श्रीरामचन्द्रजीके अवतारका यह कारण है॥ १२१ ॥
बालकाण्ड, दोहा 121सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥४१॥
हे तात! सुनो, मायासे रचे हुए ही अनेक ( सब ) गुण और दोष हैं ( इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है )। गुण ( विवेक ) इसीमें है कि दोनों ही न देखे जायँ, इन्हें देखना ही अविवेक है॥ ४१ ॥
उत्तरकाण्ड, दोहा 41फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ। पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ॥४०॥
फलोंके बोझसे झुककर सारे वृक्ष पृथ्वीके पास आ लगे हैं, जैसे परोपकारी पुरुष बड़ी सम्पत्ति पाकर [ विनयसे ] झुक जाते हैं॥४०॥
अरण्यकाण्ड, दोहा 40जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥६॥
विधाताने इस जड-चेतन विश्वको गुण-दोषमय रचा है; किन्तु संतरूपी हंस दोषरूपी जलको छोड़कर गुणरूपी दूधको ही ग्रहण करते हैं॥ ६ ॥
बालकाण्ड, दोहा 6