
शांति
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम॥४६॥
तबतक जीवकी कुशल नहीं और न स्वप्नमें भी उसके मनको शान्ति है, जबतक वह शोकके घर काम ( विषय-कामना ) को छोड़कर श्रीरामजीको नहीं भजता॥४६॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 46तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥४॥
हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [ दूसरे पलड़ेपर रखे हुए ] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव ( क्षण )-मात्रके सत्सङ्गसे होता है॥४॥
सुन्दरकाण्ड, दोहा 4राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥२१॥
तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुखरूपी द्वारकी जीभरूपी देहलीपर रामनामरूपी मणि-दीपकको रख॥२१॥
बालकाण्ड, दोहा 21नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥२६॥
कलियुगमें रामका नाम कल्पतरु ( मनचाहा पदार्थ देनेवाला ) और कल्याणका निवास ( मुक्तिका घर ) है, जिसको स्मरण करनेसे भाँग-सा ( निकृष्ट ) तुलसीदास तुलसीके समान [ पवित्र ] हो गया॥२६॥
बालकाण्ड, दोहा 26बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥६१॥
सत्संगके बिना हरिकी कथा सुननेको नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोहके गये बिना श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें दृढ़ ( अचल ) प्रेम नहीं होता॥६१॥
उत्तरकाण्ड, दोहा 61संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ॥३३॥
संतका संग मोक्ष ( भव-बन्धनसे छूटने ) का और कामीका संग जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़नेका मार्ग है। संत, कवि और पण्डित तथा वेद, पुराण [ आदि ] सभी सद्ग्रन्थ ऐसा कहते हैं॥३३॥
उत्तरकाण्ड, दोहा 33प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान। पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥७१॥
हे प्रिये! सब सोच छोड़कर श्रीभगवान्का स्मरण करो। जिन्होंने पार्वतीको रचा है, वे ही कल्याण करेंगे॥ ७१ ॥
बालकाण्ड, दोहा 71करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार॥१०७॥
जबतक कर्म, वचन और मनसे छल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता, तबतक करोड़ों उपाय करनेसे भी, स्वप्नमें भी वह सुख नहीं पाता॥ १०७ ॥
अयोध्याकाण्ड, दोहा 107निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज। ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुखपुंज॥३८॥
जिन्हें निन्दा और स्तुति ( बड़ाई ) दोनों समान हैं और मेरे चरणकमलोंमें जिनकी ममता है, वे गुणोंके धाम और सुखकी राशि संतजन मुझे प्राणोंके समान प्रिय हैं॥३८॥
उत्तरकाण्ड, दोहा 38मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह। ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह॥४६॥
जो मेरे गुणसमूहोंके और मेरे नामके परायण है, एवं ममता, मद और मोहसे रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो [ परमात्मारूप ] परमानन्दराशिको प्राप्त है॥ ४६ ॥
उत्तरकाण्ड, दोहा 46सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष ह्रद तिन्हहुँ किए मन मीन॥२२॥
जो सब प्रकारकी ( भोग और मोक्षकी भी ) कामनाओंसे रहित और श्रीरामभक्तिके रसमें लीन हैं, उन्होंने भी नामके सुन्दर प्रेमरूपी अमृतके सरोवरमें अपने मनको मछली बना रखा है ( अर्थात् वे नामरूपी सुधाका निरन्तर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते )॥ २२ ॥
बालकाण्ड, दोहा 22राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥२७॥
रामनाम श्रीनृसिंह भगवान् है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करनेवाले जन प्रह्लादके समान हैं; यह रामनाम देवताओंके शत्रु ( कलियुगरूपी दैत्य )को मारकर जप करनेवालोंकी रक्षा करेगा॥ २७॥
बालकाण्ड, दोहा 27