दोहा 26
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥ सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥१॥
भावार्थ
नामहीके प्रसादसे शिवजी अविनाशी हैं और अमङ्गल वेषवाले होनेपर भी मङ्गलकी राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, मुनि, योगीगण नामके ही प्रसादसे ब्रह्मानन्दको भोगते हैं॥१॥
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥ नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥२॥
भावार्थ
नारदजीने नामके प्रतापको जाना है। हरि सारे संसारको प्यारे हैं, [ हरिको हर प्यारे हैं ] और आप ( श्रीनारदजी ) हरि और हर दोनोंको प्रिय हैं। नामके जपनेसे प्रभुने कृपा की, जिससे प्रह्लाद भक्तशिरोमणि हो गये॥२॥
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥ सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥३॥
भावार्थ
ध्रुवजीने ग्लानिसे ( विमाताके वचनोंसे दुखी होकर सकामभावसे ) हरिनामको जपा और उसके प्रतापसे अचल अनुपम स्थान ( ध्रुवलोक ) प्राप्त किया। हनुमान्जीने पवित्र नामका स्मरण करके श्रीरामजीको अपने वशमें कर रखा है॥३॥
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥ कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥४॥
भावार्थ
नीच अजामिल, गज और गणिका ( वेश्या ) भी श्रीहरिके नामके प्रभावसे मुक्त हो गये। मैं नामकी बड़ाई कहाँतक कहूँ, राम भी नामके गुणोंको नहीं गा सकते॥४॥
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥२६॥
भावार्थ
कलियुगमें रामका नाम कल्पतरु ( मनचाहा पदार्थ देनेवाला ) और कल्याणका निवास ( मुक्तिका घर ) है, जिसको स्मरण करनेसे भाँग-सा ( निकृष्ट ) तुलसीदास तुलसीके समान [ पवित्र ] हो गया॥२६॥
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