दोहा 41
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥ निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥१॥
भावार्थ
हे भाई! दूसरोंकी भलाईके समान कोई धर्म नहीं है और दूसरोंको दुःख पहुँचानेके समान कोई नीचता ( पाप ) नहीं है। हे तात! समस्त पुराणों और वेदोंका यह निर्णय ( निश्चित सिद्धान्त ) मैंने तुमसे कहा है, इस बातको पण्डितलोग जानते हैं॥ १ ॥
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा॥ करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना॥२॥
भावार्थ
मनुष्यका शरीर धारण करके जो लोग दूसरोंको दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्युके महान् संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसीसे उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है॥ २ ॥
कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता॥ अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने॥३॥
भावार्थ
हे भाई! मैं उनके लिये कालरूप ( भयंकर ) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मोंका [ यथायोग्य ] फल देनेवाला हूँ! ऐसा विचारकर जो लोग परम चतुर हैं वे संसार [ के प्रवाह ] को दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं॥ ३ ॥
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक॥ संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे॥४॥
भावार्थ
इसीसे वे शुभ और अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्याग कर देवता, मनुष्य और मुनियोंके नायक मुझको भजते हैं। [ इस प्रकार ] मैंने संतों और असंतोंके गुण कहे। जिन लोगोंने इन गुणोंको समझ रखा है, वे जन्म-मरणके चक्करमें नहीं पड़ते॥ ४॥
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥४१॥
भावार्थ
हे तात! सुनो, मायासे रचे हुए ही अनेक ( सब ) गुण और दोष हैं ( इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है )। गुण ( विवेक ) इसीमें है कि दोनों ही न देखे जायँ, इन्हें देखना ही अविवेक है॥ ४१ ॥
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