दोहा 19
तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा॥ सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा॥१॥
भावार्थ
तुरंत ही उन्होंने एक राक्षसको भेजा और रावणको अपने आनेका समाचार सूचित किया। सुनते ही रावण हँसकर बोला—बुला लाओ, [ देखें ] कहाँका बंदर है॥१॥
आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए॥ अंगद दीख दसानन बैसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें॥२॥
भावार्थ
आज्ञा पाकर बहुत-से दूत दौड़े और वानरोंमें हाथीके समान अंगदको बुला लाये। अंगदने रावणको ऐसे बैठे हुए देखा जैसे कोई प्राणयुक्त ( सजीव ) काजलका पहाड़ हो!॥२॥
भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना॥ मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना॥३॥
भावार्थ
भुजाएँ वृक्षोंके और सिर पर्वतोंके शिखरोंके समान हैं। रोमावली मानो बहुत-सी लताएँ हैं। मुँह, नाक, नेत्र और कान पर्वतकी कन्दराओं और खोहोंके बराबर हैं॥३॥
गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा॥ उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रोध बिसेषी॥४॥
भावार्थ
अत्यन्त बलवान् बाँके वीर बालिपुत्र अंगद सभामें गये, वे मनमें जरा भी नहीं झिझके। अंगदको देखते ही सब सभासद् उठ खड़े हुए। यह देखकर रावणके हृदयमें बड़ा क्रोध हुआ॥४॥
जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ॥१९॥
भावार्थ
जैसे मतवाले हाथियोंके झुंडमें सिंह [ निःशङ्क होकर ] चला जाता है, वैसे ही श्रीरामजीके प्रतापका हृदयमें स्मरण करके वे [ निर्भय ] सभामें सिर नवाकर बैठ गये॥ १९ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें