दोहा 18
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई॥ प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका॥१॥
भावार्थ
चरणोंकी वन्दना करके और भगवान्की प्रभुता हृदयमें धरकर अंगद सबको सिर नवाकर चले। प्रभुके प्रतापको हृदयमें धारण किये हुए रणबाँकुरे वीर बालिपुत्र स्वाभाविक ही निर्भय हैं॥१॥
पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भेटा॥ बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई॥२॥
भावार्थ
लङ्कामें प्रवेश करते ही रावणके पुत्रसे भेंट हो गयी, जो वहाँ खेल रहा था। बातों-ही-बातोंमें दोनोंमें झगड़ा बढ़ गया। [ क्योंकि ] दोनों ही अतुलनीय बलवान् थे और फिर दोनोंकी युवावस्था थी॥२॥
तेहिं अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई॥ निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी॥ ३॥
भावार्थ
उसने अंगदपर लात उठायी। अंगदने [ वही ] पैर पकड़कर उसे घुमाकर जमीनपर दे पटका ( मार गिराया )। राक्षसके समूह भारी योद्धा देखकर जहाँ-तहाँ [ भाग ] चले, वे डरके मारे पुकार भी न मचा सके॥३॥
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं॥ भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहिं जारी॥४॥
भावार्थ
एक-दूसरेको मर्म ( असली बात ) नहीं बतलाते, उस ( रावणके पुत्र ) का वध समझकर सब चुप मारकर रह जाते हैं। [ रावण-पुत्रकी मृत्यु जानकर और राक्षसोंको भयके मारे भागते देखकर ] नगरभरमें कोलाहल मच गया कि जिसने लङ्का जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है॥४॥
अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा॥ बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई॥५॥
भावार्थ
सब अत्यन्त भयभीत होकर विचार करने लगे कि विधाता अब न जाने क्या करेगा। वे बिना पूछे ही अंगदको [ रावणके दरबारकी ] राह बता देते हैं। जिसे ही वे देखते हैं वही डरके मारे सूख जाता है॥५॥
गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज। सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज॥१८॥
भावार्थ
श्रीरामजीके चरणकमलोंका स्मरण करके अंगद रावणकी सभाके द्वारपर गये। और वे धीर, वीर और बलकी राशि अंगद सिंहकी-सी ऐंड़ ( शान ) से इधर-उधर देखने लगे॥१८॥
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