दोहा 17b
अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद
इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई॥ कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई॥१॥
भावार्थ
यहाँ ( सुबेल पर्वतपर ) प्रातःकाल श्रीरघुनाथजी जागे और उन्होंने सब मन्त्रियोंको बुलाकर सलाह पूछी कि शीघ्र बताइये, अब क्या उपाय करना चाहिये ? जाम्बवान्ने श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाकर कहा— ॥१॥
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी॥ मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा॥२॥
भावार्थ
हे सर्वज्ञ ( सब कुछ जाननेवाले )! हे सबके हृदयमें बसनेवाले ( अन्तर्यामी )! हे बुद्धि, बल, तेज, धर्म और गुणोंकी राशि! सुनिये! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार सलाह देता हूँ कि बालिकुमार अंगदको दूत बनाकर भेजा जाय!॥२॥
नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना॥ बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा॥३॥
भावार्थ
यह अच्छी सलाह सबके मनमें जँच गयी। कृपाके निधान श्रीरामजीने अंगदसे कहा—हे बल, बुद्धि और गुणोंके धाम बालिपुत्र! हे तात! तुम मेरे कामके लिये लङ्का जाओ॥३॥
बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ॥ काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई॥४॥
भावार्थ
तुमको बहुत समझाकर क्या कहूँ! मैं जानता हूँ, तुम परम चतुर हो। शत्रुसे वही बातचीत करना जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो॥४॥
प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ। सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु॥१७(क)॥
भावार्थ
प्रभुकी आज्ञा सिर चढ़ाकर और उनके चरणोंकी वन्दना करके अंगदजी उठे [ और बोले— ] हे भगवान् श्रीरामजी! आप जिसपर कृपा करें, वही गुणोंका समुद्र हो जाता है॥१७ (क)॥
स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ। अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ॥१७(ख)॥
भावार्थ
स्वामीके सब कार्य अपने-आप सिद्ध हैं; यह तो प्रभुने मुझको आदर दिया है [ जो मुझे अपने कार्यपर भेज रहे हैं ]। ऐसा विचारकर युवराज अंगदका हृदय हर्षित और शरीर पुलकित हो गया॥१७ (ख)॥
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