दोहा 16
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई॥ राम बान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की॥ १॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है ?॥ १॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥ कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा॥२॥
भावार्थ
हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु ( उन ) की आज्ञा नहीं है। [ अतः ] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी वानरोंसहित यहाँ आवेंगे॥ २॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं॥ हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना॥३॥
भावार्थ
और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि [ ऋषि-मुनि ] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [ सीताजीने कहा— ] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान ( नन्हें-नन्हें-से ) होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं॥ ३॥
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥४॥
भावार्थ
अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [ कि तुम-जैसे बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे! ] यह सुनकर हनुमान्जीने अपना शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत ( सुमेरु ) के आकारका ( अत्यन्त विशाल ) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था॥ ४॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥५॥
भावार्थ
तब ( उसे देखकर ) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जीने फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥१६॥
भावार्थ
हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है ( अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है )॥ १६॥
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