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दोहा 274

चौ०

कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु॥ भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू॥१॥

भावार्थ

हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, कालके वश होकर यह अपने कुलका घातक बन रहा है। यह सूर्यवंशरूपी पूर्णचन्द्रका कलङ्क है। यह बिलकुल उद्दण्ड, मूर्ख और निडर है॥ १ ॥

चौ०

काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं॥ तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा॥२॥

भावार्थ

अभी क्षणभरमें यह कालका ग्रास हो जायगा। मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो॥ २ ॥

चौ०

लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा॥ अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी॥३॥

भावार्थ

लक्ष्मणजीने कहा—हे मुनि! आपका सुयश आपके रहते दूसरा कौन वर्णन कर सकता है ? आपने अपने ही मुँहसे अपनी करनी अनेकों बार बहुत प्रकारसे वर्णन की है॥ ३ ॥

चौ०

नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू॥ बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा॥४॥

भावार्थ

इतनेपर भी सन्तोष न हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिये। क्रोध रोककर असह्य दुःख मत सहिये। आप वीरताका व्रत धारण करनेवाले, धैर्यवान्‌ और क्षोभरहित हैं। गाली देते शोभा नहीं पाते॥ ४ ॥

दो०

सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥२७४॥

भावार्थ

शूरवीर तो युद्धमें करनी ( शूरवीरताका कार्य ) करते हैं, कहकर अपनेको नहीं जनाते। शत्रुको युद्धमें उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रतापकी डींग मारा करते हैं॥ २७४ ॥

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