दोहा 275
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा॥ सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा॥१॥
भावार्थ
आप तो मानो कालको हाँक लगाकर बार-बार उसे मेरे लिये बुलाते हैं। लक्ष्मणजीके कठोर वचन सुनते ही परशुरामजीने अपने भयानक फरसेको सुधारकर हाथमें ले लिया॥ १ ॥
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू॥ बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा॥२॥
भावार्थ
[ और बोले— ] अब लोग मुझे दोष न दें। यह कड़ुआ बोलनेवाला बालक मारे जानेके ही योग्य है। इसे बालक देखकर मैंने बहुत बचाया, पर अब यह सचमुच मरनेको ही आ गया है॥ २ ॥
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥ खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही॥३॥
भावार्थ
विश्वामित्रजीने कहा—अपराध क्षमा कीजिये। बालकोंके दोष और गुणको साधुलोग नहीं गिनते। [ परशुरामजी बोले— ] तीखी धारका कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने— ॥ ३ ॥
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें॥ न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥४॥
भावार्थ
उत्तर दे रहा है। इतनेपर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, सो हे विश्वामित्र! केवल तुम्हारे शील ( प्रेम ) से। नहीं तो इसे इस कठोर कुठारसे काटकर थोड़े ही परिश्रमसे गुरुसे उऋण हो जाता॥ ४ ॥
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ। अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥२७५॥
भावार्थ
विश्वामित्रजीने हृदयमें हँसकर कहा—मुनिको हरा-ही-हरा सूझ रहा है ( अर्थात् सर्वत्र विजयी होनेके कारण ये श्रीराम-लक्ष्मणको भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं )। किन्तु यह लोहमयी ( केवल फौलादकी बनी हुई ) खाँड़ ( खाँड़ा—खड्ग ) है, ऊखकी ( रसकी ) खाँड़ नहीं है [ जो मुँहमें लेते ही गल जाय। खेद है, ] मुनि अब भी बेसमझ बने हुए हैं; इनके प्रभावको नहीं समझ रहे हैं॥ २७५ ॥
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