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दोहा 90

चौ०

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा॥ तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा॥१॥

भावार्थ

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने ब्राह्मणोंके चरणकमलोंमें सिर नवाया और फिर रथ चलाया। तब रावणके हृदयमें क्रोध छा गया और वह गरजता तथा ललकारता हुआ सामने दौड़ा॥१॥

चौ०

जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं॥ रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना॥२॥

भावार्थ

[ उसने कहा— ] अरे तपस्वी! सुनो, तुमने युद्धमें जिन योद्धाओंको जीता है, मैं उनके समान नहीं हूँ। मेरा नाम रावण है, मेरा यश सारा जगत्‌ जानता है, लोकपालतक जिसके कैदखानेमें पड़े हैं॥२॥

चौ०

खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा॥ निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु॥३॥

भावार्थ

तुमने खर, दूषण और विराधको मारा। बेचारे बालिका व्याधकी तरह वध किया। बड़े-बड़े राक्षस योद्धाओंके समूहका संहार किया और कुम्भकर्ण तथा मेघनादको भी मारा॥३॥

चौ०

आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाही॥ आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले॥४॥

भावार्थ

अरे राजा! यदि तुम रणसे भाग न गये तो आज मैं [ वह ] सारा वैर निकाल लूँगा। आज मैं तुम्हें निश्चय ही कालके हवाले कर दूँगा। तुम कठिन रावणके पाले पड़े हो॥४॥

चौ०

सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना॥ सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई॥५॥

भावार्थ

रावणके दुर्वचन सुनकर और उसे कालवश जान कृपानिधान श्रीरामजीने हँसकर यह वचन कहा—तुम्हारी सारी प्रभुता, जैसा तुम कहते हो, बिल्कुल सच है। पर अब व्यर्थ बकवाद न करो, अपना पुरुषार्थ दिखलाओ॥५॥

छं०

जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा। संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा॥ एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं। एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं॥

भावार्थ

व्यर्थ बकवाद करके अपने सुन्दर यशका नाश न करो। क्षमा करना, तुम्हें नीति सुनाता हूँ, सुनो! संसारमें तीन प्रकारके पुरुष होते हैं—पाटल ( गुलाब ), आम और कटहलके समान। एक ( पाटल ) फूल देते हैं, एक ( आम ) फूल और फल दोनों देते हैं और एक ( कटहल ) में केवल फल ही लगते हैं। इसी प्रकार [ पुरुषोंमें ] एक कहते हैं [ करते नहीं ], दूसरे कहते और करते भी हैं और एक ( तीसरे ) केवल करते हैं, पर वाणीसे कहते नहीं।

दो०

राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान। बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान॥९०॥

भावार्थ

श्रीरामजीके वचन सुनकर वह खूब हँसा ( और बोला— ) मुझे ज्ञान सिखाते हो? उस समय वैर करते तो नहीं डरे, अब प्राण प्यारे लग रहे हैं॥९०॥

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