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युद्धकाण्ड, सर्ग 95

आर्तानां राक्षसीनां तु लङ्कायां वै कुले कुले । रावणः करुणं शब्दं शुश्राव परिदेवितम् ॥ १ ॥

भावार्थ

रावणने लङ्काके घर-घरमें शोकमग्न राक्षसियोंका करुणाजनक विलाप सुना ॥ १ ॥

स तु दीर्घं विनिःश्वस्य मुहूर्तं ध्यानमास्थितः । बभूव परमक्रुद्धो रावणो भीमदर्शनः ॥ २ ॥

भावार्थ

वह लंबी साँस खींचकर दो घड़ीतक ध्यानमग्न हो कुछ सोचता रहा; तत्पश्चात् रावण अत्यन्त कुपित हो बड़ा भयानक दिखायी देने लगा ॥ २ ॥

संदश्य दशनैरोष्ठं क्रोधसंरक्तलोचनः । राक्षसैरपि दुर्दर्शः कालाग्निरिव मूर्तिमान् ॥ ३ ॥

भावार्थ

उसने दाँतोंसे ओठ दबा लिया । उसकी आँखें रोषसे लाल हो गयीं । वह मूर्तिमान् प्रलयाग्निके समान दिखायी देने लगा । राक्षसोंके लिये भी उसकी ओर देखना कठिन हो गया ॥ ३ ॥

उवाच च समीपस्थान् राक्षसान् राक्षसेश्वरः । क्रोधाव्यक्तकथस्तत्र निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ ४ ॥ महोदरं महापार्श्वं विरूपाक्षं च राक्षसम् । शीघ्रं वदत सैन्यानि निर्यांतेति ममाज्ञया ॥ ५ ॥

भावार्थ

उस राक्षसराजने अपने पास खड़े हुए राक्षसोंसे अस्पष्ट शब्दोंमें वार्तालाप आरम्भ किया । उस समय वहाँ वह इस तरह देख रहा था, मानो अपने नेत्रोंसे दग्ध कर डालेगा ॥ उसने कहा—‘निशाचरो ! महोदर, महापार्श्व तथा राक्षस विरूपाक्षसे शीघ्र जाकर कहो—‘तुमलोग मेरी आज्ञासे शीघ्र ही सेनाओंको कूच करनेका आदेश दो’ ॥ ५ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसास्ते भयार्दिताः । चोदयामासुरव्यग्रान् राक्षसांस्तान् नृपाज्ञया ॥ ६ ॥

भावार्थ

रावणकी यह बात सुनकर भयसे पीड़ित हुए उन राक्षसोंने राजाकी आज्ञाके अनुसार उन निर्भीक निशाचरोंको पूर्वोक्त कार्य करनेके लिये प्रेरित किया ॥ ६ ॥

ते तु सर्वे तथेत्युक्त्वा राक्षसा भीमदर्शनाः । कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे ते रणाभिमुखा ययुः ॥ ७ ॥

भावार्थ

तब ‘तथास्तु’ कहकर भयानक दीखनेवाले उन सभी राक्षसोंने अपने लिये स्वस्तिवाचन करवाया और युद्धके लिये प्रस्थान किया ॥ ७ ॥

प्रतिपूज्य यथान्यायं रावणं ते महारथाः । तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे भर्तुर्विजयकाङ्क्षिणः ॥ ८ ॥

भावार्थ

स्वामीकी विजय चाहनेवाले वे सभी महारथी वीर यथोचित रीतिसे रावणका आदर-सम्मान करके उसके सामने हाथ जोड़े खड़े हो गये ॥ ८ ॥

ततोवाच प्रहस्यैतान् रावणः क्रोधमूर्च्छितः । महोदरमहापार्श्वौ विरूपाक्षं च राक्षसम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् रावण क्रोधसे मूर्च्छित-सा होकर बड़े जोरसे हँस पड़ा और महोदर, महापार्श्व तथा राक्षस विरूपाक्षसे कहा—॥ ९ ॥

अद्य बाणैर्धनुर्मुक्तैर्युगान्तादित्यसंनिभैः । राघवं लक्ष्मणं चैव नेष्यामि यमसादनम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘आज अपने धनुषसे छूटे हुए तीखे बाणोंद्वारा, जो प्रलयकालके सूर्य-सदृश तेजस्वी हैं; मैं राम और लक्ष्मणको भी यमलोक पहुँचा दूँगा ॥ १० ॥

खरस्य कुम्भकर्णस्य प्रहस्तेन्द्रजितोस्तथा । करिष्यामि प्रतीकारमद्य शत्रुवधादहम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘आज शत्रुका वध करके खर, कुम्भकर्ण, प्रहस्त तथा इन्द्रजित्के मारे जानेका भरपूर बदला चुकाऊँगा ॥ ११ ॥

नैवान्तरिक्षं न दिशो न च द्यौर्नापि सागराः । प्रकाशत्वं गमिष्यन्ति मद्बाणजलदावृताः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘मेरे बाण मेघोंकी घटाके समान सब ओर छा जायँगे; अतः अन्तरिक्ष, दिशाएँ, आकाश तथा समुद्र—कुछ भी दिखायी न देगा ॥ १२ ॥

अद्य वानरमुख्यानां तानि यूथानि भागशः । धनुषा शरजालेन वधिष्यामि पतत्रिणा ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘आज अपने धनुषसे पङ्खवाले बाणोंका जाल-सा बिछा दूँगा और वानरोंके मुख्य-मुख्य यूथोंका पृथक्-पृथक् वध करूँगा ॥ १३ ॥

अद्य वानरसैन्यानि रथेन पवनौजसा । धनुःसमुद्रादुद्भूतैर्मथिष्यामि शरोर्मिभिः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘आज वायुके समान वेगशाली रथपर आरूढ़ हो मैं अपने धनुषरूपी समुद्रसे उठी हुई बाणमयी तरङ्गोंसे वानर-सेनाओंको मथ डालूँगा ॥ १४ ॥

व्याकोशपद्मवक्त्राणि पद्मकेसरवर्चसाम् । अद्य यूथतटाकानि गजवत् प्रमथाम्यहम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘कमल-केसरकी-सी कान्तिवाले वानरोंके यूथ सरोवरोंके समान हैं । उनके मुख ही उन सरोवरोंके भीतर प्रफुल्ल कमलके समान सुशोभित होते हैं । आज मैं हाथीके समान उनमें प्रवेश करके उन वानर-यूथरूपी सरोवरोंको मथ डालूँगा ॥ १५ ॥

सशरैरद्य वदनैः संख्ये वानरयूथपाः । मण्डयिष्यन्ति वसुधां सनालैरिव पङ्कजैः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘आज युद्धस्थलमें गिरे हुए वानर-यूथपति अपने बाण-विद्ध मुखोंद्वारा नालयुक्त कमलोंका भ्रम उत्पन्न करते हुए रणभूमिकी शोभा बढ़ायेंगे ॥ १६ ॥

अद्य यूथप्रचण्डानां हरीणां द्रुमयोधिनाम् । मुक्तेनैकेषुणा युद्धे भेत्स्यामि च शतं शतम् ॥ १७ ॥ हतो भ्राता च येषां वै येषां च तनयो हतः । वधेनाद्य रिपोस्तेषां करोम्यश्रुप्रमार्जनम् ॥ १८ ॥ अद्य मद्बाणनिर्भिन्नैः प्रस्तीर्णैर्गतचेतनैः । करोमि वानरैर्युद्धे यत्नावेक्ष्यतलां महीम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘आज युद्धभूमिमें धनुषसे छूटे हुए एक-एक बाणसे मैं वृक्ष लेकर जूझनेवाले सौ-सौ प्रचण्ड वानरोंको विदीर्ण करूँगा ॥ ‘आज शत्रुका वध करके मैं उन सब निशाचरोंके आँसू पोछूँगा, जिनके भाई और पुत्र इस युद्धमें मारे गये हैं ॥ ॥ आज युद्धमें मेरे बाणोंसे विदीर्ण तथा निर्जीव हुए वानर इस तरह बिछ जायँगे कि वहाँकी भूमि बड़े यत्नसे दीख सकेगी ॥ १९ ॥

अद्य काकाश्च गृध्राश्च ये च मांसाशिनोऽपरे । सर्वांस्तांस्तर्पयिष्यामि शत्रुमांसैः शराहतैः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘आज अपने बाणोंद्वारा मारे गये शत्रुओंके मांसोंसे मैं कौओं, गीधों तथा जो दूसरे मांसभक्षी जन्तु हैं, उन सबको भी तृप्त करूँगा ॥ २० ॥

कल्प्यतां मे रथः शीघ्रं क्षिप्रमानीयतां धनुः । अनुप्रयान्तु मां युद्धे येऽत्र शिष्ठा निशाचराः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘जल्दी मेरा रथ तैयार किया जाय, शीघ्र धनुष लाया जाय तथा मरनेसे बचे हुए निशाचर युद्धमें मेरे पीछे-पीछे चलें’ ॥ २१ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा महापार्श्वोऽब्रवीद् वचः । बलाध्यक्षान् स्थितांस्तत्र बलं संत्वर्यतामिति ॥ २२ ॥

भावार्थ

रावणका वह वचन सुनकर महापार्श्वने वहाँ खड़े हुए सेनापतियोंसे कहा—‘सेनाको शीघ्र ही कूच करनेकी आज्ञा दो’ ॥ २२ ॥

बलाध्यक्षास्तु संयुक्ता राक्षसांस्तान् गृहे गृहे । चोदयन्तः परिययुर्लङ्कां लघुपराक्रमाः ॥ २३ ॥

भावार्थ

यह आज्ञा पाकर वे शीघ्रपराक्रमी सेनाध्यक्ष घर-घर जाकर उन राक्षसोंको तैयार होनेका आदेश देते हुए सारी लङ्कामें घूमते फिरे ॥ २३ ॥

ततो मुहूर्तान्निष्पेतू राक्षसा भीमदर्शनाः । नदन्तो भीमवदना नानाप्रहरणैर्भुजैः ॥ २४ ॥

भावार्थ

थोड़ी ही देरमें भयंकर मुख एवं आकारवाले राक्षस गर्जना करते हुए वहाँ आ पहुँचे । उनके हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे ॥ २४ ॥

असिभिः पट्टिशैः शूलैर्गदाभिर्मुसलैर्हलैः । शक्तिभिस्तीक्ष्णधाराभिर्महद्भिः कूटमुद्गरैः ॥ २५ ॥ यष्टिभिर्विविधैश्चक्रैर्निशितैश्च परश्वधैः । भिन्दिपालैः शतघ्नीभिरन्यैश्चापि वरायुधैः ॥ २६ ॥

भावार्थ

तलवार, पट्टिश, शूल, गदा, मूसल, हल, तीखी धारवाली शक्ति, बड़े-बड़े कूटमुद्गर, डंडे, भाँति-भाँतिके चक्र, तीखे फरसे, भिन्दिपाल, शतघ्नी तथा अन्य प्रकारके उत्तमोत्तम अस्त्र-शस्त्रोंसे वे सम्पन्न थे ॥ २५-२६ ॥

अथानयन् बलाध्यक्षाश्चत्वारो रावणाज्ञया । रथानां नियुतं साग्रं नागानां नियुतत्रयम् ॥ २७ ॥ अश्वानां षष्टिकोट्यस्तु खरोष्ट्राणां तथैव च । पदातयस्त्वसंख्याता जग्मुस्ते राजशासनात् ॥ २८ ॥

भावार्थ

रावणकी आज्ञासे चार सेनापति एक लाखसे कुछ अधिक रथ, तीन लाख हाथी, साठ करोड़ घोड़े, उतने ही गदहे तथा ऊँट और असंख्य पैदल योद्धा लेकर आ पहुँचे । वे सब सैनिक राजाके आदेशसे वहाँ गये ॥ २७-२८ ॥

बलाध्यक्षाश्च संस्थाप्य राज्ञः सेनां पुरःस्थिताम् । एतस्मिन्नन्तरे सूतः स्थापयामास तं रथम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

इस प्रकार विशाल सेना लाकर सेनाध्यक्षोंने राक्षसराज रावणके सामने खड़ी कर दी । इसी बीचमें सारथिने एक रथ लाकर उपस्थित कर दिया ॥ २९ ॥

दिव्यास्त्रवरसम्पन्नं नानालंकारभूषितम् । नानायुधसमाकीर्णं किङ्किणीजालसंयुतम् ॥ ३० ॥

भावार्थ

उसमें उत्तम दिव्यास्त्र रखे थे, अनेक प्रकारके अलंकारोंसे उस रथको सजाया गया था । उसमें भाँति-भाँतिके हथियार थे और वह रथ घुँघुरूदार झालरोंसे सुशोभित था ॥ ३० ॥

नानारत्नपरिक्षिप्तं रत्नस्तम्भैर्विराजितम् । जाम्बूनदमयैश्चैव सहस्रकलशैर्वृतम् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

उसमें नाना प्रकारके रत्न जड़े हुए थे । रत्नमय खंभे उसकी शोभा बढ़ाते थे और सोनेके बने हुए सहस्रों कलशोंसे वह अलंकृत था ॥ ३१ ॥

तं दृष्ट्वा राक्षसाः सर्वे विस्मयं परमं गताः । तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय रावणो राक्षसेश्वरः ॥ ३२ ॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं ज्वलन्तमिव पावकम् । द्रुतं सूतसमायुक्तं युक्ताष्टतुरगं रथम् । आरुरोह तदा भीमं दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ३३ ॥

भावार्थ

उस रथको देखकर सब राक्षस अत्यन्त आश्चर्यसे चकित हो उठे । उसपर दृष्टि पड़ते ही राक्षसराज रावण सहसा उठकर खड़ा हो गया । वह रथ करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा प्रज्वलित अग्निके सदृश दीप्तिमान् था । उसमें आठ घोड़े जुते हुए थे । उसपर सारथि बैठा था । वह रथ अपने तेजसे प्रकाशित होता था । रावण तुरंत उस भयंकर रथपर आरूढ़ हो गया ॥ ३२-३३ ॥

ततः प्रयातः सहसा राक्षसैर्बहुभिर्वृतः । रावणः सत्त्वगाम्भीर्याद् दारयन्निव मेदिनीम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

तदनन्तर बहुत-से राक्षसोंसे घिरा हुआ रावण सहसा युद्धके लिये प्रस्थित हुआ । वह अपने बलकी अधिकतासे पृथ्वीको विदीर्ण-सा करता हुआ जा रहा था ॥ ३४ ॥

ततश्चासीन्महानादस्तूर्याणां च ततस्ततः । मृदङ्गैः पटहैः शङ्खैः कलहैः सह रक्षसाम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

फिर तो जहाँ-तहाँ सब ओर वाद्योंका महानाद गूँज उठा । मृदङ्ग, पटह, शङ्ख तथा राक्षसोंके कलहकी ध्वनि भी उसमें मिली हुई थी ॥ ३५ ॥

आगतो रक्षसां राजा छत्रचामरसंयुतः । सीतापहारी दुर्वृत्तो ब्रह्मघ्नो देवकण्टकः । योद्धुं रघुवरेणेति शुश्रुवे कलहध्वनिः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘सीताको चुरानेवाला, दुराचारी, ब्रह्महत्यारा तथा देवताओंके लिये कण्टकरूप राक्षसराज रावण छत्र एवं चँवर लगाये श्रीरघुनाथजीके साथ युद्ध करनेके लिये आ रहा है; इस प्रकारकी कलह-ध्वनि कानोंमें पड़ रही थी ॥ ३६ ॥

तेन नादेन महता पृथिवी समकम्पत । तं शब्दं सहसा श्रुत्वा वानरा दुद्रुवुर्भयात् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

उस महानादसे पृथ्वी काँप उठी । उस भयानक शब्दको सुनकर सब वानर सहसा भयसे भाग चले ॥ ३७ ॥

रावणस्तु महाबाहुः सचिवैः परिवारितः । आजगाम महातेजा जयाय विजयं प्रति ॥ ३८ ॥

भावार्थ

मन्त्रियोंसे घिरा हुआ महातेजस्वी महाबाहु रावण युद्धमें विजयकी प्राप्तिका उद्देश्य लेकर वहाँ आया ॥ ३८ ॥

रावणेनाभ्यनुज्ञातौ महापार्श्वमहोदरौ । विरूपाक्षश्च दुर्धर्षो रथानारुरुहुस्तदा ॥ ३९ ॥

भावार्थ

रावणकी आज्ञा पाकर उस समय महापार्श्व, महोदर तथा दुर्जय वीर विरूपाक्ष——तीनों ही रथोंपर आरूढ़ हुए ॥ ३९ ॥

ते तु हृष्टाभिनर्दन्तो भिन्दन्त इव मेदिनीम् । नादं घोरं विमुञ्चन्तो निर्ययुर्जयकाङ्क्षिणः ॥ ४० ॥

भावार्थ

वे हर्षपूर्वक जोर-जोरसे इस तरह दहाड़ रहे थे, मानो पृथिवीको विदीर्ण कर डालेंगे । वे विजयकी इच्छा मनमें लिये घोर सिंहनाद करते हुए पुरीसे बाहर निकले ॥ ४० ॥

ततो युद्धाय तेजस्वी रक्षोगणबलैर्वृतः । निर्ययावुद्यतधनुः कालान्तकयमोपमः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

तदनन्तर काल, मृत्यु और यमराजके समान भयंकर तेजस्वी रावण धनुष हाथमें ले राक्षसोंकी सेनासे घिरकर युद्धके लिये आगे बढ़ा ॥ ४१ ॥

ततः प्रजविताश्वेन रथेन स महारथः । द्वारेण निर्ययौ तेन यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४२ ॥

भावार्थ

उसके रथके घोड़े बहुत तेज चलनेवाले थे । उसके द्वारा वह महारथी वीर लङ्काके उसी द्वारसे बाहर निकला, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण मौजूद थे ॥ ४२ ॥

ततो नष्टप्रभः सूर्यो दिशश्च तिमिरावृताः । द्विजाश्च नेदुर्घोराश्च संचचाल च मेदिनी ॥ ४३ ॥

भावार्थ

उस समय सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी । समस्त दिशाओंमें अन्धकार छा गया, भयंकर पक्षी अशुभ बोली बोलने लगे और धरती डोलने लगी ॥ ४३ ॥

ववर्ष रुधिरं देवश्चस्खलुश्च तुरंगमाः । ध्वजाग्रे न्यपतद् गृध्रो विनेदुश्चाशिवं शिवाः ॥ ४४ ॥

भावार्थ

बादल रक्तकी वर्षा करने लगे । घोड़े लड़खड़ाकर गिर पड़े । ध्वजके अग्रभागपर गीध आकर बैठ गया और गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं ॥ ४४ ॥

नयनं चास्फुरद् वामं वामो बाहुरकम्पत । विवर्णवदनश्चासीत् किंचिदभ्रश्यत स्वनः ॥ ४५ ॥

भावार्थ

बाँयीं आँख फड़कने लगी । बाँयीं भुजा सहसा काँप उठी । उसके चेहरेका रंग फीका पड़ गया और आवाज कुछ बदल गयी ॥ ४५ ॥

ततो निष्पततो युद्धे दशग्रीवस्य रक्षसः । रणे निधनशंसीनि रूपाण्येतानि जज्ञिरे ॥ ४६ ॥

भावार्थ

राक्षस दशाग्रीव ज्यों ही युद्धके लिये निकला, त्यों ही रणभूमिमें उसकी मृत्युके सूचक लक्षण प्रकट होने लगे ॥ ४६ ॥

अन्तरिक्षात् पपातोल्का निर्घातसमनिःस्वना । विनेदुरशिवा गृध्रा वायसैरभिमिश्रिताः ॥ ४७ ॥

भावार्थ

आकाशसे उल्कापात हुआ । उससे वज्रपातके समान गड़गड़ाहट पैदा हुई । अमङ्गलसूचक पक्षी गीध कौओंसे मिलकर अशुभ बोली बोलने लगे ॥ ४७ ॥

एतानचिन्तयन् घोरानुत्पातान् समवस्थितान् । निर्ययौ रावणो मोहाद् वधार्थं कालचोदितः ॥ ४८ ॥

भावार्थ

इन भयंकर उत्पातोंको सामने उपस्थित देखकर भी रावणने उनकी कोई परवा नहीं की । वह कालसे प्रेरित हो मोहवश अपने ही वधके लिये निकल पड़ा ॥ ४८ ॥

तेषां तु रथघोषेण राक्षसानां महात्मनाम् । वानराणामपि चमूर्युद्धायैवाभ्यवर्तत ॥ ४९ ॥

भावार्थ

उन महाकाय राक्षसोंके रथका गम्भीर घोष सुनकर वानरोंकी सेना भी युद्धके लिये ही उनके सामने आकर डट गयी ॥ ४९ ॥

तेषां तु तुमुलं युद्धं बभूव कपिरक्षसाम् । अन्योन्यमाह्वयानानां क्रुद्धानां जयमिच्छताम् ॥ ५० ॥

भावार्थ

फिर तो अपनी-अपनी जीत चाहते हुए रोषपूर्वक एक-दूसरेको ललकारनेवाले वानरों और राक्षसोंमें तुमुल युद्ध छिड़ गया ॥ ५० ॥

ततः क्रुद्धो दशग्रीवः शरैः काञ्चनभूषणैः । वानराणामनीकेषु चकार कदनं महत् ॥ ५१ ॥

भावार्थ

उस समय दशमुख रावण अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा वानरोंकी सेनाओंमें रोषपूर्वक बड़ी भारी मार-काट मचाने लगा ॥ ५१ ॥

निकृत्तशिरसः केचिद् रावणेन वलीमुखाः । केचिद् विच्छिन्नहृदयाः केचिच्छ्रोत्रविवर्जिताः ॥ ५२ ॥

भावार्थ

रावणने कितने ही वानरोंके सिर काट लिये, कितनोंकी छाती छेद डाली और बहुतोंके कान उड़ा दिये ॥ ५२ ॥

निरुच्छ्वासा हताः केचित् केचित् पार्श्वेषु दारिताः । केचिद् विभिन्नशिरसः केचिचक्षुर्विनाकृताः ॥ ५३ ॥

भावार्थ

कितनोंने घायल होकर प्राण त्याग दिये । रावणने कितने ही वानरोंकी पसलियाँ फाड़ डालीं, कितनोंके मस्तक कुचल डाले और कितनोंकी आँखें चौपट कर दीं ॥ ५३ ॥

दशाननः क्रोधविवृत्तनेत्रो यतो यतोऽभ्येति रथेन संख्ये । ततस्तत्तस्य शरप्रवेगं सोढुं न शेकुर्हरियूथपास्ते ॥ ५४ ॥

भावार्थ

दशमुख रावणके नेत्र क्रोधसे घूम रहे थे । वह अपने रथके द्वारा युद्धस्थलमें जहाँ-जहाँ गया, वहाँ-वहाँ वे वानरयूथपति उसके बाणोंका वेग न सह सके ॥ ५४ ॥

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