युद्धकाण्ड, सर्ग 96
तथा तैः कृत्तगात्रैस्तु दशग्रीवेण मार्गणैः । बभूव वसुधा तत्र प्रकीर्णा हरिभिस्तदा ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार जब रावणने अपने बाणोंसे वानरोंके अङ्ग-भङ्ग कर डाले, तब वहाँ धराशायी हुए वानरोंसे वह सारी रणभूमि पट गयी ॥ १ ॥
रावणस्याप्रसह्यं तं शरसम्पातमेकतः । न शेकुः सहितुं दीप्तं पतङ्गा ज्वलनं यथा ॥ २ ॥
भावार्थ
रावणके उस असह्य बाणप्रहारको वे वानर एक क्षण भी नहीं सह सके; ठीक वैसे ही, जैसे पतंग जलती आगका स्पर्श क्षणभर भी नहीं सह सकते हैं ॥ २ ॥
तेऽर्दिता निशितैर्बाणैः क्रोशन्तो विप्रदुद्रुवुः । पावकार्चिःसमाविष्टा दह्यमाना यथा गजाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
राक्षसराजके तीखे बाणोंकी मारसे पीड़ित हो वे वानर उसी तरह चीखते-चिल्लाते हुए भागे, जैसे दावानलकी ज्वालाओंसे घिरकर जलते हुए हाथी चीत्कार करते हुए भागते हैं ॥ ३ ॥
प्लवंगानामनीकानि महाभ्राणीव मारुतः । संचयौ समरे तस्मिन् विधमन् रावणः शरैः ॥ ४ ॥
भावार्थ
जैसे हवा बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार रावण अपने बाणोंसे वानरसेनाओंका संहार करता हुआ समराङ्गणमें विचरने लगा ॥ ४ ॥
कदनं तरसा कृत्वा राक्षसेन्द्रो वनौकसाम् । आससाद ततो युद्धे त्वरितं राघवं रणे ॥ ५ ॥
भावार्थ
बड़े वेगसे वानरोंका संहार करके वह राक्षसराज समराङ्गणमें जूझनेके लिये तुरंत ही श्रीरामचन्द्रजीके पास जा पहुँचा ॥ ५ ॥
सुग्रीवस्तान् कपीन् दृष्ट्वा भग्नान् विद्रावितान् रणे । गुल्मे सुषेणं निक्षिप्य चक्रे युद्धे द्रुतं मनः ॥ ६ ॥
भावार्थ
उधर सुग्रीवने देखा, वानरसैनिक रावणसे खदेड़े जाकर समरभूमिसे भाग रहे हैं, तब उन्होंने सेनाको स्थिर रखनेका भार सुषेणको सौंपकर स्वयं शीघ्र ही युद्ध करनेका विचार किया ॥ ६ ॥
आत्मनः सदृशं वीरं स तं निक्षिप्य वानरम् । सुग्रीवोऽभिमुखं शत्रुं प्रतस्थे पादपायुधः ॥ ७ ॥
भावार्थ
सुषेणको अपने ही समान पराक्रमी वीर समझकर उन्होंने सेनाकी रक्षाका कार्य सौंपा और स्वयं वृक्ष लेकर शत्रुके सामने प्रस्थान किया ॥ ७ ॥
पार्श्वतः पृष्ठतश्चास्य सर्वे वानरयूथपाः । अनुजग्मुर्महाशैलान् विविधांश्च वनस्पतीन् ॥ ८ ॥
भावार्थ
उनके अगल-बगलमें और पीछे समस्त वानरयूथपति बड़े-बड़े पत्थर और नाना प्रकारके वृक्ष लेकर चले ॥ ८ ॥
ननर्द युधि सुग्रीवः स्वरेण महता महान् । पोथयन् विविधांश्चान्यान् ममन्थोत्तमराक्षसान् ॥ ९ ॥ ममर्द च महाकायो राक्षसान् वानरेश्वरः । युगान्तसमये वायुः प्रवृद्धानगमानिव ॥ १० ॥
भावार्थ
उस समय सुग्रीवने युद्धमें उच्चस्वरसे गर्जना की और प्रलयकालमें बड़े-बड़े वृक्षोंको उखाड़ फेंकनेवाले वायुदेवकी भाँति उन विशालकाय वानरराजने विभिन्न प्रकारकी आकृतिवाले बड़े-बड़े राक्षसोंको गिरा-गिराकर मथ एवं कुचल डाला ॥ ९-१० ॥
राक्षसानामनीकेषु शैलवर्षं ववर्ष ह । अश्मवर्षं यथा मेघः पक्षिसङ्घेषु कानने ॥ ११ ॥
भावार्थ
जैसे बादल वनमें पक्षियोंके समुदायपर ओले बरसाता है, उसी प्रकार सुग्रीव राक्षसोंकी सेनाओंपर बड़े-बड़े पत्थरोंकी वर्षा करने लगे ॥ ११ ॥
कपिराजविमुक्तैस्तैः शैलवर्षैस्तु राक्षसाः । विकीर्णशिरसः पेतुर्विकीर्णा इव पर्वताः ॥ १२ ॥
भावार्थ
वानरराजके चलाये हुए शैलखण्डोंकी वर्षासे राक्षसोंके मस्तक कुचल जाते और वे ढहे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हो जाते थे ॥ १२ ॥
अथ संक्षीयमाणेषु राक्षसेषु समन्ततः । सुग्रीवेण प्रभग्नेषु नदत्सु च पतत्सु च ॥ १३ ॥ विरूपाक्षः स्वकं नाम धन्वी विश्राव्य राक्षसः । रथादाप्लुत्य दुर्धर्षो गजस्कन्धमुपारुहत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार सुग्रीवकी मारसे जब सब ओर राक्षसोंका विनाश होने लगा तथा वे भागने और आर्तनाद करते हुए पृथ्वीपर गिरने लगे, तब विरूपाक्ष नामक दुर्जय राक्षस हाथमें धनुष ले अपना नाम घोषित करता हुआ रथसे कूद पड़ा और हाथीकी पीठपर जा चढ़ा ॥ १३-१४ ॥
स तं द्विपमथारुह्य विरूपाक्षो महाबलः । ननर्द भीमनिर्ह्रादं वानरानभ्यधावत ॥ १५ ॥ सुग्रीवे स शरान् घोरान् विससर्ज चमूमुखे । स्थापयामास चोद्विग्नान् राक्षसान् सम्प्रहर्षयन् ॥ १६ ॥
भावार्थ
उस हाथीपर चढ़कर महाबली विरूपाक्षने बड़ी भयानक आवाजमें गर्जना की और वानरोंपर वेगपूर्वक धावा किया ॥ उसने सेनाके मुहानेपर सुग्रीवको लक्ष्य करके बड़े भयंकर बाण छोड़े और डटे हुए राक्षसोंका हर्ष बढ़ाकर उन्हें स्थिरतापूर्वक स्थापित किया ॥ १६ ॥
सोऽतिविद्धः शितैर्बाणैः कपीन्द्रस्तेन रक्षसा । चुक्रोश च महाक्रोधो वधे चास्य मनो दधे ॥ १७ ॥
भावार्थ
उस राक्षसके पैने बाणोंसे अत्यन्त घायल हुए वानरराज सुग्रीवने महान् क्रोधसे भरकर भीषण गर्जना की और विरूपाक्षको मार डालनेका विचार किया ॥ १७ ॥
ततः पादपमुद्धृत्य शूरः सम्प्रधनो हरिः । अभिपत्य जघानास्य प्रमुखे तं महागजम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
शूरवीर तो वे थे ही, सुन्दर ढंगसे युद्ध करना भी जानते थे; अतः एक वृक्ष उखाड़कर आगे बढ़े और अपने सामने खड़े हुए उसके विशाल हाथीपर उन्होंने उस वृक्षको दे मारा ॥ १८ ॥
स तु प्रहाराभिहतः सुग्रीवेण महागजः । अपासर्पद् धनुर्मात्रं निषसाद ननाद च ॥ १९ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके प्रहारसे घायल हो बह महान् गजराज एक धनुष पीछे हटकर बैठ गया और पीड़ासे आर्तनाद करने लगा ॥१९॥
गजात् तु मथितात् तूर्णमपक्रम्य स वीर्यवान् । राक्षसोऽभिमुखः शत्रुं प्रत्युद्गम्य ततः कपिम् ॥ २० ॥ आर्षभं चर्म खड्गं च प्रगृह्य लघुविक्रमः । भर्त्सयन्निव सुग्रीवमाससाद व्यवस्थितम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
पराक्रमी राक्षस विरूपाक्ष उस घायल हाथीकी पीठसे तुरंत कूद पड़ा और ढाल-तलवार ले शीघ्रतापूर्वक अपने शत्रु सुग्रीवकी ओर बढ़ा । सुग्रीव एक स्थानपर स्थिरतापूर्वक खड़े थे । वह उन्हें फटकारता हुआ-सा उनके पास जा पहुँचा ॥ २०-२१ ॥
स हि तस्याभिसंक्रुद्धः प्रगृह्य विपुलां शिलाम् । विरूपाक्षस्य चिक्षेप सुग्रीवो जलदोपमाम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
यह देख सुग्रीवने एक बहुत बड़ी शिला हाथमें ली, जो मेघके समान काली थी । उसे उन्होंने विरूपाक्षके शरीरपर क्रोधपूर्वक दे मारा ॥ २२ ॥
स तां शिलामापतन्तीं दृष्ट्वा राक्षसपुंगवः । अपक्रम्य सुविक्रान्तः खड्गेन प्राहरत् तदा ॥ २३ ॥
भावार्थ
उस शिलाको अपने ऊपर आती देख उस परम पराक्रमी राक्षसशिरोमणि विरूपाक्षने पीछे हटकर आत्मरक्षा की और सुग्रीवपर तलवार चलायी ॥ २३ ॥
तेन खड्गप्रहारेण रक्षसा बलिना हतः । मुहूर्तमभवद् भूमौ विसंज्ञ इव वानरः ॥ २४ ॥
भावार्थ
उस बलबान् निशाचरकी तलवारसे घायल होकर वानरराज सुग्रीव मूर्च्छित होकर थोड़ी देर धरतीपर पड़े रहे ॥२४॥
सहसा स तदोत्पत्य राक्षसस्य महाहवे । मुष्टिं संवर्त्य वेगेन पातयामास वक्षसि ॥ २५ ॥
भावार्थ
फिर सहसा उछलकर उन्होंने उस महासमरमें मुट्ठी बाँधकर विरूपाक्षकी छातीपर वेगपूर्वक एक मुक्का मारा ॥ २५ ॥
मुष्टिप्रहाराभिहतो विरूपाक्षो निशाचरः । तेन खड्गेन संक्रुद्धः सुग्रीवस्य चमूमुखे ॥ २६ ॥ कवचं पातयामास पद्भ्यामभिहतोऽपतत् ।
भावार्थ
उनके मुक्केकी चोट खाकर निशाचर विरूपाक्षका क्रोध और बढ़ गया और उसने सेनाके मुहानेपर उसी तलवारसे सुग्रीवके कवचको काट गिराया; साथ ही उसके पैरोंका आघात पाकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २६½ ॥
स समुत्थाय पतितः कपिस्तस्य व्यसर्जयत् ॥ २७ ॥ तलप्रहारमशनेः समानं भीमनिःस्वनम् ।
भावार्थ
गिरे हुए सुग्रीव पुनः उठकर खड़े हो गये और उन्होंने उस राक्षसको वज्रके समान भीषण शब्द करनेवाले थप्पड़से मारा ॥ २७½ ॥
तलप्रहारं तद् रक्षः सुग्रीवेण समुद्यतम् ॥ २८ ॥ नैपुण्यान्मोचयित्वैनं मुष्टिनोरसि ताडयत् ।
भावार्थ
सुग्रीवके चलाये हुए उस थप्पड़का वार वह राक्षस अपने युद्धकौशलसे बचा गया और उसने सुग्रीवकी छातीपर एक घूँसा मारा ॥ २८½ ॥
ततस्तु संक्रुद्धतरः सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ २९ ॥ मोक्षितं चात्मनो दृष्ट्वा प्रहारं तेन रक्षसा । स ददर्शान्तरं तस्य विरूपाक्षस्य वानरः ॥ ३० ॥
भावार्थ
अब तो वानरराज सुग्रीवके क्रोधकी सीमा न रही । उन्होंने देखा कि राक्षसने मेरे प्रहारको व्यर्थ कर दिया और अपने ऊपर उसका स्पर्श नहीं होने दिया । तब वे विरूपाक्षपर प्रहार करनेका अवसर देखने लगे ॥ २९-३० ॥
ततोऽन्यं पातयत् क्रोधाच्छङ्खदेशे महातलम् । महेन्द्राशनिकल्पेन तलेनाभिहतः क्षितौ ॥ ३१ ॥ पपात रुधिरक्लिन्नः शोणितं हि समुद्गिरन् । स्रोतोभ्यस्तु विरूपाक्षो जलं प्रस्रवणादिव ॥ ३२ ॥
भावार्थ
तदनन्तर सुग्रीवने विरूपाक्षके ललाटपर क्रोधपूर्वक दूसरा महान् थप्पड़ मारा, जिसका स्पर्श इन्द्रके वज्रके समान दुःसह था । उससे आहत होकर विरूपाक्ष पृथ्वीपर गिर पड़ा । उसका सारा शरीर खूनसे भीग गया और वह समस्त इन्द्रिय-गोलकोंसे उसी प्रकार रक्त वमन करने लगा, जैसे झरनेसे जल गिर रहा हो ॥ ३१-३२ ॥
विवृत्तनयनं क्रोधात् सफेनं रुधिराप्लुतम् । ददृशुस्ते विरूपाक्षं विरूपाक्षतरं कृतम् ॥ ३३ ॥ स्फुरन्तं परिवर्तन्तं पार्श्वेन रुधिरोक्षितम् । करुणं च विनर्दन्तं ददृशुः कपयो रिपुम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
उस राक्षसकी आँखें क्रोधसे घूम रही थीं । वह फेनयुक्त रुधिरमें डूबा हुआ था । वानरोंने देखा, विरूपाक्ष अत्यन्त विरूपाक्ष ( कुरूप नेत्रवाला और भयंकर ) हो गया है । खूनसे लथपथ हो छटपटाता करवटें बदलता तथा करुणाजनक आर्तनाद करता है ॥ ३३-३४ ॥
तथा तु तौ संयति सम्प्रयुक्तौ तरस्विनौ वानरराक्षसानाम् । बलार्णवौ सखनतुश्च भीमौ महार्णवौ द्राविव भिन्नसेतू ॥ ३५ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वे दोनों वेगशाली वानरों और राक्षसोंके सैन्य-समुद्र मर्यादा तोड़कर बहनेवाले दो भयानक महासागरोंके समान परस्पर संयुक्त हो युद्धभूमिमें महान् कोलाहल करने लगे ॥ ३५ ॥
विनाशितं प्रेक्ष्य विरूपनेत्रं महाबलं तं हरिपार्थिवेन । बलं समेतं कपिराक्षसाना- मुद्वृत्तगङ्गाप्रतिमं बभूव ॥ ३६ ॥
भावार्थ
वानरराज सुग्रीवके द्वारा महाबली विरूपाक्षका वध हुआ देख वानरों और राक्षसोंकी सेनाएँ एकत्र हो बढ़ी हुई गङ्गाके समान उद्वेलित हो गयीं ( एक ओर आनन्दजनित कोलाहल था तो दूसरी ओर शोकके कारण आर्तनाद हो रहा था )॥३६॥
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