युद्धकाण्ड, सर्ग 97
हन्यमाने बले तूर्णमन्योन्यं ते महामृधे । सरसीव महाघर्मे सूपक्षीणे बभूवतुः ॥ १ ॥
भावार्थ
उस महासमरमें वे दोनों ओरकी सेनाएँ परस्परकी मार-काटसे प्रचण्ड ग्रीष्मऋतुमें सूखते हुए दो तालाबोंकी तरह शीघ्र ही क्षीण हो चलीं ॥ १ ॥
स्वबलस्य तु घातेन विरूपाक्षवधेन च । बभूव द्विगुणं क्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः ॥ २ ॥
भावार्थ
अपनी सेनाके विनाश और विरूपाक्षके वधसे राक्षसराज रावणका क्रोध दूना बढ़ गया ॥ २ ॥
प्रक्षीणं स्वबलं दृष्ट्वा वध्यमानं वलीमुखैः । बभूवास्य व्यथा युद्धे दृष्ट्वा दैवविपर्ययम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
वानरोंकी मारसे अपनी सेनाको क्षीण हुई देख दैवके उलट-फेरपर दृष्टिपात करके युद्धस्थलमें उसे बड़ी व्यथा हुई ॥ ३ ॥
उवाच च समीपस्थं महोदरमनन्तरम् । अस्मिन् काले महाबाहो जयाशा त्वयि मे स्थिता ॥ ४ ॥
भावार्थ
उसने पास ही खड़े हुए महोदरसे कहा—‘महाबाहो ! इस समय मेरी विजयकी आशा तुम्हारे ऊपर ही अवलम्बित है ॥ ४ ॥
जहि शत्रुचमूं वीर दर्शयाद्य पराक्रमम् । भर्तृपिण्डस्य कालोऽयं निर्वेष्टुं साधु युध्यताम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘वीर ! आज अपना पराक्रम दिखाओ और शत्रुसेनाका वध करो । यही स्वामीके अन्नका बदला चुकानेका समय है । अतः अच्छी तरह युद्ध करो’ ॥ ५ ॥
एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा राक्षसेन्द्रो महोदरः । प्रविवेशारिसेनां स पतङ्ग इव पावकम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
रावणके ऐसा कहनेपर राक्षसराज महोदरने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसकी आज्ञा शिरोधार्य की और जैसे पतङ्ग आगमें कूदता है, उसी प्रकार उसने शत्रुसेनामें प्रवेश किया ॥ ६ ॥
ततः स कदनं चक्रे वानराणां महाबलः । भर्तृवाक्येन तेजस्वी स्वेन वीर्येण चोदितः ॥ ७ ॥
भावार्थ
सेनामें प्रवेश करके तेजस्वी और महाबली महोदरने स्वामीकी आज्ञासे प्रेरित हो अपने पराक्रमद्वारा वानरोंका संहार आरम्भ किया ॥ ७ ॥
वानराश्च महासत्त्वाः प्रगृह्य विपुलाः शिलाः । प्रविश्यारिबलं भीमं जघ्नुस्ते सर्वराक्षसान् ॥ ८ ॥
भावार्थ
वानर भी बड़े शक्तिशाली थे । वे बड़ी-बड़ी शिलाएँ लेकर शत्रुकी भयंकर सेनामें घुस गये और समस्त राक्षसोंका संहार करने लगे ॥ ८ ॥
महोदरः सुसंक्रुद्धः शरैः काञ्चनभूषणैः । चिच्छेद पाणिपादोरु वानराणां महाहवे ॥ ९ ॥
भावार्थ
महोदरने अत्यन्त कुपित होकर अपने सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा उस महायुद्धमें वानरोंके हाथ-पैर और जाँघें काट डालीं ॥ ९ ॥
ततस्ते वानराः सर्वे राक्षसैरर्दिता भृशम् । दिशो दश द्रुताः केचित् केचित् सुग्रीवमाश्रिताः ॥ १० ॥
भावार्थ
राक्षसोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित हुए वे सब वानर दसों दिशाओंमें भागने लगे । कितने ही सुग्रीवकी शरणमें गये ॥ १० ॥
प्रभग्नं समरे दृष्ट्वा वानराणां महाबलम् । अभिदुद्राव सुग्रीवो महोदरमनन्तरम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
वानरोंकी विशाल सेनाको समरभूमिसे भागती देख सुग्रीवने पास ही खड़े हुए महोदरपर आक्रमण किया ॥ ११ ॥
प्रगृह्य विपुलां घोरां महीधरसमां शिलाम् । चिक्षेप च महातेजास्तद्वधाय हरीश्वरः ॥ १२ ॥
भावार्थ
वानरराज बड़े तेजस्वी थे । उन्होंने पर्वतके समान विशाल एवं भयंकर शिला उठाकर महोदरके वधके लिये उसपर चलायी ॥ १२ ॥
तामापतन्तीं सहसा शिलां दृष्ट्वा महोदरः । असम्भ्रान्तस्ततो बाणैर्निर्बिभेद दुरासदाम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
उस दुर्जय शिलाको सहसा अपने ऊपर आती देखकर भी महोदरके मनमें घबराहट नहीं हुई । उसने बाणोंद्वारा उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १३ ॥
रक्षसा तेन बाणौघैर्निकृत्ता सा सहस्रधा । निपपात तदा भूमौ गृध्रचक्रमिवाकुलम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
उस राक्षसके बाणसमूहोंसे कटकर सहस्रों टुकड़ोंमें विभक्त हुई वह शिला उस समय आकुल हुए गृध्रसमुदायकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १४ ॥
तां तु भिन्नां शिलां दृष्ट्वा सुग्रीवः क्रोधमूर्च्छितः । सालमुत्पाट्य चिक्षेप तं स चिच्छेद नैकधा ॥ १५ ॥
भावार्थ
उस शिलाको विदीर्ण हुई देख सुग्रीवका क्रोध बहुत बढ़ गया । उन्होंने एक शालका वृक्ष उखाड़कर उस राक्षसके ऊपर फेंका, किंतु राक्षसने उसके भी कई टुकड़े कर डाले ॥ १५ ॥
शरैश्च विददारैनं शूरः परबलार्दनः । स ददर्श ततः क्रुद्धः परिघं पतितं भुवि ॥ १६ ॥
भावार्थ
साथ ही शत्रुसेनाका दमन करनेवाले उस शूरवीरने इन्हें अपने बाणोंसे घायल कर दिया । इसी समय क्रोधसे भरे हुए सुग्रीवको वहाँ पृथ्वीपर पड़ा हुआ एक परिघ दिखायी दिया ॥ १६ ॥
आविध्य तु स तं दीप्तं परिघं तस्य दर्शयन् । परिघेणोग्रवेगेन जघानास्य हयोत्तमान् ॥ १७ ॥
भावार्थ
उस तेजस्वी परिघको घुमाकर सुग्रीवने महोदरको अपनी फुर्ती दिखाते हुए उस भयानक वेगशाली परिघके द्वारा उस राक्षसके उत्तम घोड़ोंको मार डाला ॥ १७ ॥
तस्माद्धतहयाद् वीरः सोऽवप्लुत्य महारथात् । गदां जग्राह संक्रुद्धो राक्षसोऽथ महोदरः ॥ १८ ॥
भावार्थ
घोड़ोंके मारे जानेपर वीर राक्षस महोदर अपने विशाल रथसे कूद पड़ा और अत्यन्त रोषसे भरकर उसने गदा उठा ली ॥ १८ ॥
गदापरिघहस्तौ तौ युधि वीरौ समीयतुः । नर्दन्तौ गोवृषप्रख्यौ घनाविव सविद्युतौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
एकके हाथमें गदा थी और दूसरेके हाथमें परिघ । वे दोनों वीर युद्धस्थलमें दो साँड़ों और बिजलीसहित दो मेघोंके समान गर्जना करते हुए एक दूसरेसे भिड़ गये ॥ १९ ॥
ततः क्रुद्धो गदां तस्मै चिक्षेप रजनीचरः । ज्वलन्तीं भास्कराभासां सुग्रीवाय महोदरः ॥ २० ॥
भावार्थ
तदनन्तर कुपित हुए राक्षस महोदरने सुग्रीवपर सूर्यतुल्य तेजसे दमकती हुई एक गदा चलायी ॥ २० ॥
गदां तां सुमहाघोरामापतन्तीं महाबलः । सुग्रीवो रोषताम्राक्षः समुद्यम्य महाहवे ॥ २१ ॥ आजघान गदां तस्य परिघेण हरीश्वरः । पपात तरसा भिन्नः परिघस्तस्य भूतले ॥ २२ ॥
भावार्थ
उस महाभयंकर गदाको अपनी ओर आती देख महासमरमें महाबली वानरराज सुग्रीवके नेत्र रोषसे लाल हो गये और उन्होंने परिघ उठाकर उसके द्वारा राक्षसकी गदापर आघात किया । वह गदा गिर पड़ी; किंतु उसके वेगसे टकराकर सुग्रीवका परिघ भी टूटकर पृथ्वीपर जा गिरा ॥ २१-२२ ॥
ततो जग्राह तेजस्वी सुग्रीवो वसुधातलात् । आयसं मुसलं घोरं सर्वतो हेमभूषितम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
तब तेजस्वी सुग्रीवने भूमिपरसे एक लोहेका भयंकर मूसल उठाया, जिसमें सब ओरसे सोना जड़ा हुआ था ॥ २३ ॥
स तमुद्यम्य चिक्षेप सोऽप्यस्य प्राक्षिपद् गदाम् । भिन्नावन्योन्यमासाद्य पेततुस्तौ महीतले ॥ २४ ॥
भावार्थ
उसे उठाकर उन्होंने राक्षसपर दे मारा । साथ ही उस राक्षसने भी इनके ऊपर गदा फेंकी । गदा और मूसल दोनों आपसमें टकराकर टूट गये और जमीनपर जा गिरे ॥ २४ ॥
ततो भिन्नप्रहरणौ मुष्टिभ्यां तौ समीयतुः। तेजोबलसमाविष्टौ दीप्ताग्निव हुताशनौ ॥ २५ ॥
भावार्थ
वे दोनों वीर तेज और बलसे सम्पन्न थे और जलती हुई अग्नियोंके समान उद्दीप्त हो रहे थे। अपने-अपने आयुधोंके टूट जानेपर वे घूसोंसे एक दूसरेको मारने लगे ॥ २५ ॥
जघ्नतुस्तौ तदान्योन्यं नदन्तौ च पुनः पुनः। तलैश्चान्योन्यमासाद्य पेततुश्च महीतले ॥ २६ ॥
भावार्थ
उस समय बारंबार गर्जते हुए वे दोनों योद्धा परस्पर मुक्कोंसे प्रहार करने लगे । फिर थप्पड़ोंसे एक दूसरेको मारकर दोनों ही पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥
उत्पेततुस्तदा तूर्णं जघ्नतुश्च परस्परम् । भुजैश्चिक्षिपतुर्वीरावन्योन्यमपराजितौ ॥ २७ ॥
भावार्थ
फिर तत्काल ही दोनों उछले और शीघ्र ही एक दूसरेपर चोट करने लगे । वे दोनों वीर हार नहीं मानते थे । दोनों ही दोनोंपर भुजाओंद्वारा प्रहार करते रहे ॥ २७ ॥
जग्मतुस्तौ श्रमं वीरौ बाहुयुद्धे परंतपौ । आजहार तदा खड्गमदूरपरिवर्तिनम् ॥ २८ ॥ राक्षसश्चर्मणा सार्धं महावेगो महोदरः । तथैव च महाखड्गं चर्मणा पतितं सह । जग्राह वानरश्रेष्ठः सुग्रीवो वेगवत्तरः ॥ २९ ॥
भावार्थ
शत्रुओंको तपानेवाले वे दोनों वीर बाहुयुद्ध करते-करते थक गये । तब महान् वेगशाली राक्षस महोदरने थोड़ी ही दूरपर पड़ी हुई ढालसहित तलवार उठा ली । उसी तरह अत्यन्त वेगशाली कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने भी वहाँ गिरे हुए विशाल खड्गको ढालसहित उठा लिया ॥ २८-२९ ॥
ततो रोषपरीताङ्गौ नदन्तावभ्यधावताम् । उद्यतासी रणे हृष्टौ युधि शस्त्रविशारदौ ॥ ३० ॥
भावार्थ
महोदर और सुग्रीव दोनों युद्धके मैदानमें शस्त्र चलानेकी कलामें चतुर थे तथा दोनोंके शरीर रोपसे प्रभावित थे; अतः रणभूमिमें हर्ष और उत्साहसे युक्त हो वे तलवार उठाये गर्जने हुए एक दूसरेपर टूट पड़े ॥ ३० ॥
दक्षिणं मण्डलं चोभौ सुतूर्णं सम्परीयतुः। अन्योन्यमभिसंक्रुद्धौ जये प्रणिहितावुभौ ॥ ३१ ॥
भावार्थ
वे दोनों बड़ी तेजीसे दायें-बायें पैंतरे बदल रहे थे, दोनोंका दोनोंपर क्रोध बढ़ा हुआ था तथा दोनों ही अपनी-अपनी विजयकी आशा लगाये हुए थे ॥ ३१ ॥
स तु शूरो महावेगो वीर्यश्लाघी महोदरः। महार्चर्मणि तं खड्गं पातयामास दुर्मतिः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
अपने बलपर घमंड करनेवाले महान् वेगशाली तथा शौर्यसम्पन्न दुर्बुद्धि महोदरने अपनी वह तलवार सुग्रीवके विशाल कवचपर दे मारी ॥ ३२ ॥
लग्नमुत्कर्षतः खड्गं खड्गेन कपिकुञ्जरः। जहार सशिरस्त्राणं कुण्डलोपगतं शिरः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके कवचमें लगी हुई तलवारको जब वह राक्षस खींचने लगा, उसी समय कपिकुञ्जर सुग्रीवने महोदरके शिरस्त्राणसहित कुण्डलमण्डित मस्तकको अपने खड्गसे काट लिया ॥ ३३ ॥
निकृत्तशिरसस्तस्य पतितस्य महीतले । तद् बलं राक्षसेन्द्रस्य दृष्ट्वा तत्र न दृश्यते ॥ ३४ ॥
भावार्थ
मस्तक कट जानेपर राक्षसराज महोदर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देखकर उसकी सेना फिर वहाँ नहीं दिखायी दी ॥ ३४ ॥
हत्वा तं वानरैः सार्धं ननाद मुदितो हरिः । चुक्रोध च दशग्रीवो बभौ हृष्टश्च राघवः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
महोदरको मारकर प्रसन्न हुए वानरराज सुग्रीव अन्य वानरोंके साथ गर्जना करने लगे । उस समय दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ और श्रीरघुनाथजी हर्षसे खिल उठे ॥ ३५ ॥
विषण्णवदनाः सर्वे राक्षसा दीनचेतसः । विद्रवन्ति ततः सर्वे भयवित्रस्तचेतसः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उस समय समस्त राक्षसोंका मन दुखी हो गया । उन सबके मुखपर विषाद छा गया और वे सभी भयभीतचित्त होकर वहाँसे भाग चले ॥ ३६ ॥
महोदरं तं विनिपात्य भूमौ महागिरेः कीर्णमिवैकदेशम् । सूर्यात्मजस्तत्र रराज लक्ष्म्या सूर्यः स्वतेजोभिरिवाप्रधृष्यः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
महोदरका शरीर किसी महान् पर्वतके एक टूटे हुए शिखर-सा जान पड़ता था । उसे पृथ्वीपर गिराकर सूर्यपुत्र सुग्रीव वहाँ विजय-लक्ष्मीसे सुशोभित होने लगे, मानो अधर्षणीय सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे हों ॥ ३७ ॥
अथ विजयमवाप्य वानरेन्द्रः समरमुखे सुरसिद्धयक्षसङ्घैः । अवनितलगतैश्च भूतसङ्घै- र्हृष्टरसमाकुलितैर्निरीक्ष्यमाणः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वानरराज सुग्रीव युद्धके मुहानेपर विजय पाकर बड़ी शोभा पाने लगे । उस समय देवता, सिद्ध और यक्षोंके समुदाय तथा भूतलनिवासी प्राणियोंके समूह भी बड़े हर्षसे उनकी ओर देखने लगे ॥ ३८ ॥
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