युद्धकाण्ड, सर्ग 94
तानि नागसहस्राणि सारोहाणि च वाजिनाम् । रथानां त्वग्निवर्णानां सध्वजानां सहस्रशः ॥ १ ॥ राक्षसानां सहस्राणि गदापरिघयोधिनाम् । काञ्चनध्वजचित्राणां शूराणां कामरूपिणाम् ॥ २ ॥ निहतानि शरैर्दीप्तैस्तप्तकाञ्चनभूषणैः । रावणेन प्रयुक्तानि रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ ३ ॥ दृष्ट्वा श्रुत्वा च सम्भ्रान्ता हतशेषा निशाचराः । राक्षस्यश्च समागम्य दीनाश्चिन्तापरिप्लुताः ॥ ४ ॥
भावार्थ
अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले भगवान् श्रीरामके द्वारा उनके तपाये हुए सुवर्णसे विभूषित चमकीले बाणोंसे रावणके भेजे हुए हजारों हाथी, सवारोंसहित सहस्रों घोड़े, अग्निके समान देदीप्यमान एवं ध्वजोंसे सुशोभित सहस्रों रथ तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, सुवर्णमय ध्वजसे विचित्र शोभा पानेवाले और गदा-परिघोंसे युद्ध करनेवाले हजारों शूरवीर राक्षस मारे गये—यह देख-सुनकर मरनेसे बचे हुए निशाचर घबरा उठे और लङ्कामें जा राक्षसियोंसे मिलकर बहुत ही दुखी एवं चिन्तामग्न हो गये ॥ १—४ ॥
विधवा हतपुत्राश्च क्रोशन्त्यो हतबान्धवाः । राक्षस्यः सह संगम्य दुःखार्ताः पर्यदेवयन् ॥ ५ ॥
भावार्थ
जिनके पति, पुत्र और भाई-बन्धु मारे गये थे, वे अनाथ राक्षसियाँ झुंड-की-झुंड एकत्र होकर दुःखसे पीड़ित हो विलाप करने लगीं—॥ ५ ॥
कथं शूर्पणखा वृद्धा कराला निर्णतोदरी । आससाद वने रामं कंदर्पसमरूपिणम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘हाय ! जिसका पेट धँसा हुआ और आकार विकराल है, वह बुढ़िया शूर्पणखा वनमें कामदेवके समान रूपवाले श्रीरामके पास कामभाव लेकर कैसे गयी—किस तरह जानेका साहस कर सकी ? ॥ ६ ॥
सुकुमारं महासत्त्वं सर्वभूतहिते रतम् । तं दृष्ट्वा लोकवध्या सा हीनरूपा प्रकामिता ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जो भगवान् राम सुकुमार और महान् बलशाली हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते हैं, उन्हें देखकर वह कुरूपा राक्षसी उनके प्रति कामभावसे युक्त हो गयी—यह कैसा दुःसाहस है ? यह दुष्टा तो सबके द्वारा मार डालनेके योग्य है ॥ ७ ॥
कथं सर्वगुणैर्हीना गुणवन्तं महौजसम् । सुमुखं दुर्मुखी रामं कामयामास राक्षसी ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘कहाँ सर्वगुणसम्पन्न, महान् बलशाली तथा सुन्दर मुखवाले श्रीराम और कहाँ वह सभी गुणोंसे हीन, दुर्मुखी राक्षसी ! उसने कैसे उनकी कामना की ? ॥ ८ ॥
जनस्यास्याल्पभाग्यत्वाद् वलिनी श्वेतमूर्धजा । अकार्यमपहास्यं च सर्वलोकविगर्हितम् ॥ ९ ॥ राक्षसानां विनाशाय दूषणस्य खरस्य च । चकाराप्रतिरूपा सा राघवस्य प्रधर्षणम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘जिसके सारे अङ्गोंमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, सिरके बाल सफेद हो गये हैं तथा जो किसी भी दृष्टिसे श्रीरामके योग्य नहीं है, उस दुष्टाने हम लङ्कावासियोंके दुर्भाग्यसे ही खर, दूषण तथा अन्य राक्षसोंके विनाशके लिये श्रीरामका धर्षण ( उन्हें अपने स्पर्शसे दूषित करनेका प्रयास ) किया था॥९-१०॥
तन्निमित्तमिदं वैरं रावणेन कृतं महत् । वधाय सीता साऽऽनीता दशग्रीवेण रक्षसा ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उसके कारण ही दशमुख राक्षस रावणने यह महान् वैर बाँध लिया और अपने तथा राक्षसकुलके वधके लिये वह सीताजीको हर लाया ॥ ११ ॥
न च सीतां दशग्रीवः प्राप्नोति जनकात्मजाम् । बद्धं बलवता वैरमक्षयं राघवेण च ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘दशमुख रावण जनकनन्दिनी सीताको कभी नहीं पा सकेगा; परंतु उसने बलवान् रघुनाथजीसे अमिट वैर बाँध लिया है ॥ १२ ॥
वैदेहीं प्रार्थयानं तं विराधं प्रेक्ष्य राक्षसम् । हतमेकेन रामेण पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘राक्षस विराध विदेहकुमारी सीताको प्राप्त करना चाहता है, यह देख श्रीरामने एक ही बाणसे उसका काम तमाम कर दिया । वह एक ही दृष्टान्त उनकी अजेय शक्तिको समझनेके लिये काफी था ॥ १३ ॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां भीमकर्मणाम् । निहतानि जनस्थाने शरैरग्निशिखोपमैः ॥ १४ ॥ खरश्च निहतः संख्ये दूषणस्त्रिशिरास्तथा । शरैरादित्यसंकाशैः पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘जनस्थानमें भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंको श्रीरामने अग्निशिखाके समान तेजस्वी बाणोंद्वारा कालके गालमें डाल दिया था और सूर्यके सदृश प्रकाशमान सायकोंसे समराङ्गणमें खर, दूषण तथा त्रिशिराका भी संहार कर डाला था; यह उनकी अजेयताको समझ लेनेके लिये पर्याप्त दृष्टान्त था ॥ १४-१५ ॥
हतो योजनबाहुश्च कबन्धो रुधिराशनः । क्रोधान्नादं नदन् सोऽथ पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘रक्तभोजी राक्षस कबन्धकी बाँहें एक-एक योजन लंबी थीं और वह क्रोधवश बड़े जोर-जोरसे सिंहनाद करता था तो भी वह श्रीरामके हाथसे मारा गया । वह दृष्टान्त ही श्रीरामचन्द्रजीके दुर्जय पराक्रमका ज्ञान करानेके लिये पर्याप्त था ॥ १६ ॥
जघान बलिनं रामः सहस्रनयनात्मजम् । वालिनं मेरुसंकाशं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘मेरुपर्वतके समान महाकाय बलवान् इन्द्रकुमार वालीको श्रीरामचन्द्रजीने एक ही बाणसे मार गिराया । उनकी शक्तिका अनुमान लगानेके लिये वह एक ही उदाहरण काफी है॥१७॥
ऋष्यमूके वसंश्चैव दीनो भग्नमनोरथः । सुग्रीवः प्रापितो राज्यं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव बहुत ही दुखी और निराश होकर ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करते थे; परंतु श्रीरामने उन्हें किष्किन्धाके राजसिंहासनपर बिठा दिया । उनके प्रभावको समझनेके लिये वह एक ही दृष्टान्त पर्याप्त है ॥ १८ ॥
धर्मार्थसहितं वाक्यं सर्वेषां रक्षसां हितम् । युक्तं विभीषणेनोक्तं मोहात् तस्य न रोचते ॥ १९ ॥ विभीषणवचः कुर्याद् यदि स धनदानुजः । श्मशानभूता दुःखार्ता नेयं लङ्का भविष्यति ॥ २० ॥
भावार्थ
‘विभीषणने जो धर्म और अर्थसे युक्त बात कही थी, वह सभी राक्षसोंके लिये हितकर तथा युक्तियुक्त थी; परंतु मोहवश रावणको वह अच्छी न लगी । यदि कुबेरका छोटा भाई रावण विभीषणकी बात मान लेता तो यह लङ्कापुरी इस तरह दुःखसे पीड़ित हो श्मशानभूमि नहीं बन जाती ॥१९-२०॥
कुम्भकर्णं हतं श्रुत्वा राघवेण महाबलम् । अतिकायं च दुर्धर्षं लक्ष्मणेन हतं तदा । प्रियं चेन्द्रजितं पुत्रं रावणो नावबुध्यते ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘महाबली कुम्भकर्ण श्रीरामके हाथसे मारा गया । दुःसह वीर अतिकायको लक्ष्मणने मार गिराया तथा रावणका प्यारा पुत्र इन्द्रजित् भी उन्हींके हाथसे मारा गया तथापि रावण भगवान् श्रीरामके प्रभावको नहीं समझ रहा है ॥ २१ ॥
मम पुत्रो मम भ्राता मम भर्ता रणे हतः । इत्येष श्रूयते शब्दो राक्षसीनां कुले कुले ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘हाय, मेरा बेटा मारा गया !’ ‘मेरे भाईको प्राणोंसे हाथ धोना पड़ा।’ ‘रणभूमिमें मेरे पतिदेव मार डाले गये ।’ लङ्काके घर-घरमें राक्षसियोंके ये शब्द सुनायी देते हैं ॥ २२ ॥
रथाश्वनागाश्च हतास्तत्र तत्र सहस्रशः । रणे रामेण शूरेण हताश्चापि पदातयः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘समराङ्गणमें शूरवीर श्रीरामने जहाँ-तहाँ सहस्रों रथों, घोड़ों और हाथियोंका संहार कर डाला है । पैदल सैनिकोंको भी मौतके घाट उतार दिया है ॥ २३ ॥
रुद्रो वा यदि वा विष्णुर्महेन्द्रो वा शतक्रतुः । हन्ति नो रामरूपेण यदि वा स्वयमन्तकः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘जान पड़ता है, श्रीरामका रूप धारण करके हमें साक्षात् भगवान् रुद्रदेव, भगवान् विष्णु, शतक्रतु इन्द्र अथवा स्वयं यमराज ही मार रहे हैं ॥ २४ ॥
हतप्रवीरा रामेण निराशा जीविते वयम् । अपश्यन्त्यो भयस्यान्तमनाथा विलपामहे ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘हमारे प्रमुख वीर श्रीरामके हाथसे मारे गये । अब हमलोग अपने जीवनसे निराश हो चली हैं । हमें इस भयका अन्त नहीं दिखायी देता, अतएव हम अनाथकी भाँति विलाप कर रही हैं ॥ २५ ॥
रामहस्ताद् दशग्रीवः शूरो दत्तमहावरः । इदं भयं महाघोरं समुत्पन्नं न बुध्यते ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘दशमुख रावण शूरवीर है । इसे ब्रह्माजीने महान् वर दिया है । इसी घमंडके कारण यह श्रीरामके हाथसे प्राप्त हुए इस महाघोर भयको नहीं समझ पाता है ॥ २६ ॥
तं न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । उपस्रष्टुं परित्रातुं शक्ता रामेण संयुगे ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘युद्धस्थलमें श्रीराम जिसे मारनेको तुल जायँ, उसे न तो देवता, न गन्धर्व, न पिशाच और न राक्षस ही बचा सकते हैं ॥ २७ ॥
उत्पाताश्चापि दृश्यन्ते रावणस्य रणे रणे । कथयन्ति हि रामेण रावणस्य निबर्हणम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘रावणके प्रत्येक युद्धमें जो उत्पात दिखायी देते हैं, वे रामके द्वारा रावणके विनाशकी ही सूचना देते हैं ॥ २८ ॥
पितामहेन प्रीतेन देवदानवराक्षसैः । रावणस्याभयं दत्तं मनुष्येभ्यो न याचितम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर रावणको देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंकी ओरसे अभयदान दे दिया था । मनुष्योंकी ओरसे अभय प्राप्त होनेके लिये इसने याचना ही नहीं की थी ॥२९॥
तदिदं मानुषं मन्ये प्राप्तं निःसंशयं भयम् । जीवितान्तकरं घोरं रक्षसां रावणस्य च ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘अतः मुझे ऐसा जान पड़ता है कि यह निःसंदेह मनुष्योंकी ओरसे ही घोर भय प्राप्त हुआ है, जो राक्षसों तथा रावणके जीवनका अन्त कर देनेवाला है ॥ ३० ॥
पीड्यमानास्तु बलिना वरदानेन रक्षसा । दीप्तैस्तपोभिर्विबुधाः पितामहमपूजयन् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘बलवान् राक्षस रावणने अपनी उद्दीप्त तपस्या तथा वरदानके प्रभावसे जब देवताओंको पीड़ा दी, तब उन्होंने पितामह ब्रह्माजीकी आराधना की ॥ ३१ ॥
देवतानां हितार्थाय महात्मा वै पितामहः । उवाच देवतास्तुष्ट इदं सर्वा महद्वचः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘इससे महात्मा ब्रह्माजी संतुष्ट हुए और उन्होंने देवताओंके हितके लिये उन सबसे यह महत्त्वपूर्ण बात कही ॥ ३२ ॥
अद्यप्रभृति लोकांस्त्रीन् सर्वे दानवराक्षसाः । भयेन प्रभृता नित्यं विचरिष्यन्ति शाश्वतम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘आजसे समस्त दानव तथा राक्षस भयसे युक्त होकर ही नित्य-निरन्तर तीनों लोकोंमें विचरण करेंगे’ ॥ ३३ ॥
दैवतैस्तु समागम्य सर्वैश्चेन्द्रपुरोगमैः । वृषध्वजस्त्रिपुरहा महादेवः प्रतोषितः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर त्रिपुरनाशक वृषभध्वज महादेवजीको संतुष्ट किया ॥ ३४ ॥
प्रसन्नस्तु महादेवो देवानेतद् वचोऽब्रवीत् । उत्पत्स्यति हितार्थे वो नारी रक्षःक्षयावहा ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘संतुष्ट होनेपर महादेवजीने देवताओंसे कहा——‘तुम लोगोंके हितके लिये एक दिव्य नारीका आविर्भाव होगा, जो समस्त राक्षसोंके विनाशमें कारण होगी ॥ ३५ ॥
एषा देवैः प्रयुक्ता तु क्षुद् यथा दानवान् पुरा । भक्षयिष्यति नः सर्वान् राक्षसघ्नी सरावणान्॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘जैसे पूर्वकल्पमें देवताओंद्वारा प्रयुक्त हुई क्षुधाने दानवोंका भक्षण किया था, उसी प्रकार यह निशाचरनाशिनी सीता रावणसहित हम सब लोगोंको खा जायगी ॥ ३६ ॥
रावणस्यापनीतेन दुर्विनीतस्य दुर्मतेः । अयं निष्ठानको घोरः शोकेन समभिप्लुतः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘उद्दण्ड और दुर्बुद्धि रावणके अन्यायसे यह शोकसंयुक्त घोर विनाश हम सबको प्राप्त हुआ है ॥ ३७ ॥
तं न पश्यामहे लोके यो नः शरणदो भवेत् । राघवेणोपसृष्टानां कालेनेव युगक्षये ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘जगत्में हम किसी ऐसे पुरुषको नहीं देखती हैं, जो महाप्रलयके समय कालकी भाँति इस समय श्रीरघुनाथजीसे संकटमें पड़ी हुई हम राक्षसियोंको शरण दे सके ॥ ३८ ॥
नास्ति नः शरणं किंचिद् भये महति तिष्ठताम् । दावाग्निवेष्टितानां हि करेणूनां यथा वने ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘हम बड़े भारी भयकी अवस्थामें स्थित हैं । जैसे वनमें दावानलसे घिरी हुई हथिनियोंको कहीं प्राण बचानेके लिये जगह नहीं मिलती, उसी तरह हमारे लिये भी कोई शरण नहीं है ॥ ३९ ॥
प्राप्तकालं कृतं तेन पौलस्त्येन महात्मना । यत एव भयं दृष्टं तमेव शरणं गतः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘महात्मा पुलस्त्यनन्दन विभीषणने समयोचित कार्य किया है । उन्हें जिनसे भय दिखायी दिया, उन्हींकी शरणमें वे चले गये’ ॥ ४० ॥
इतीव सर्वा रजनीचरस्त्रियः परस्परं सम्परिरभ्य बाहुभिः । विषेदुरार्तातिभयाभिपीडिता विनेदुरुच्चैश्च तदा सुदारुणम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार निशाचरोंकी सारी स्त्रियाँ एक दूसरीको भुजाओंमें भरकर आर्तभाव एवं विषादग्रस्त हो गयीं और अत्यन्त भयसे पीड़ित हो अति भयंकर क्रन्दन करने लगीं ॥४१॥
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