युद्धकाण्ड, सर्ग 9
ततो निकुम्भो रभसः सूर्यशत्रुर्महाबलः । सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च महापार्श्वमहोदरौ ॥ १ ॥ अग्निकेतुश्च दुर्धर्षो रश्मिकेतुश्च राक्षसः । इन्द्रजिच्च महातेजा बलवान् रावणात्मजः ॥ २ ॥ प्रहस्तोऽथ विरूपाक्षो वज्रदंष्ट्रो महाबलः । धूम्राक्षश्चातिकायश्च दुर्मुखश्चैव राक्षसः ॥ ३ ॥ परिघान्पट्टिशाञ्शूलान्प्रासाञ्शक्तिपरश्वधान् । चापानि च सुबाणानि खङ्गांश्च विपुलाम्बुभान्॥ ४ ॥ प्रगृह्य परमक्रुद्धाः समुत्पत्य च राक्षसाः । अब्रुवन् रावणं सर्वे प्रदीप्ता इव तेजसा ॥ ५ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् निकुम्भ, रभस, महाबली सूर्यशत्रु, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, महापार्श्व, महोदर, दुर्जय अग्निकेतु, राक्षस रश्मिकेतु, महातेजस्वी बलवान् रावणकुमार इन्द्रजित्, प्रहस्त, विरूपाक्ष, महावली वज्रदंष्ट्र, धूम्राक्ष, अतिकाय और निशाचर दुर्मुख—ये सब राक्षस अत्यन्त कुपित हो हाथोंमें परिघ, पट्टिश, शूल, प्रास, शक्ति, फरसे, धनुष, बाण तथा पैनी धारवाले बड़े-बड़े खड्ग लिये उछलकर रावणके सामने आये और अपने तेजसे उद्दीप्त-से होकर वे सब-के-सब उससे बोले—॥ १–५ ॥
अद्य रामं वधिष्यामः सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् । कृपणं च हनूमन्तं लङ्का येन प्रधर्षिता ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘हमलोग आज ही राम, सुग्रीव, लक्ष्मण और उस कायर हनुमान्को भी मार डालेंगे, जिसने लङ्कापुरी जलायी है’ ॥ ६ ॥
तान् गृहीतायुधान् सर्वान् वारयित्वा विभीषणः । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं पुनः प्रत्युपवेश्य तान् ॥ ७ ॥
भावार्थ
हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये खड़े हुए उन सब राक्षसोंको जानेके लिये उद्यत देख विभीषणने रोका और पुनः उन्हें बिठाकर दोनों हाथ जोड़ रावणसे कहा—॥ ७ ॥
अप्युपायैस्त्रिभिस्तात योऽर्थः प्राप्तुं न शक्यते । तस्य विक्रमकालांस्तान् युक्तानाहुर्मनीषिणः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘तात ! जो मनोरथ साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे प्राप्त न हो सके, उसीकी प्राप्तिके लिये नीतिशास्त्रके ज्ञाता मनीषी विद्वानोंने पराक्रम करनेके योग्य अवसर बताये हैं ॥ ८ ॥
प्रमत्तेष्वभियुक्तेषु दैवेन प्रहतेषु च । विक्रमास्तात सिद्ध्यन्ति परीक्ष्य विधिना कृताः॥ ९ ॥
भावार्थ
‘तात ! जो शत्रु असावधान हों, जिनपर दूसरे-दूसरे शत्रुओंने आक्रमण किया हो तथा जो महारोग आदिसे ग्रस्त होनेके कारण दैवसे मारे गये हों, उन्हींपर भलीभाँति परीक्षा करके विधिपूर्वक किये गये पराक्रम सफल होते हैं ॥ ९ ॥
अप्रमत्तं कथं तं तु विजिगीषुं बले स्थितम् । जितरोषं दुराधर्षं तं धर्षयितुमिच्छथ ॥ १० ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजी बेखबर नहीं हैं । वे विजयकी इच्छासे आ रहे हैं और उनके साथ सेना भी है । उन्होंने क्रोधको सर्वथा जीत लिया है । अतः वे सर्वथा दुर्जय हैं । ऐसे अजेय वीरको तुमलोग परास्त करना चाहते हो ॥ १० ॥
समुद्रं लङ्घयित्वा तु घोरं नदनदीपतिम् । गतिं हनूमतो लोके को विद्यात् तर्कयेत वा ॥ ११ ॥ बलान्यपरिमेयानि वीर्याणि च निशाचराः । परेषां सहसावज्ञा न कर्तव्या कथंचन ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘निशाचरो ! नदों और नदियोंके स्वामी भयंकर महासागरको जो एक ही छलाँगमें लाँघकर यहाँतक आ पहुँचे थे, उन हनुमान्जीकी गतिको इस संसारमें कौन जान सकता है अथवा कौन उसका अनुमान लगा सकता है ? शत्रुओंके पास असंख्य सेनाएँ हैं, उनमें असीम बल और पराक्रम है; इस बातको तुमलोग अच्छी तरह जान लो । दूसरोंकी शक्तिको भुलाकर किसी तरह भी सहसा उनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये ॥ ११-१२ ॥
किं च राक्षसराजस्य रामेणापकृतं पुरा । आजहार जनस्थानाद् यस्य भार्यां यशस्विनः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीने पहले राक्षसराज रावणका कौन-सा अपराध किया था, जिससे उन यशस्वी महात्माकी पत्नीको ये जनस्थानसे हर लाये ? ॥ १३ ॥
खरो यद्यतिवृत्तस्तु स रामेण हतो रणे। अवश्यं प्राणिनां प्राणा रक्षितव्या यथाबलम् ॥ १४ ॥ एतन्निमित्तं वैदेही भयं नः सुमहद् भवेत् । आहृता सा परित्याज्या कलहार्थे कृते नु किम्॥ १५ ॥
भावार्थ
‘यदि कहें कि उन्होंने खरको मारा था तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि खर अत्याचारी था । उसने स्वयं ही उन्हें मार डालनेके लिये उनपर आक्रमण किया था । इसलिये श्रीरामने रणभूमिमें उसका वध किया; क्योंकि प्रत्येक प्राणीको यथाशक्ति अपने प्राणोंकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये ॥ ‘यदि इसी कारणसे सीताको हरकर लाया गया हो तो उन्हें जल्दी ही लौटा देना चाहिये; अन्यथा हमलोगोंपर महान् भय आ सकता है । जिस कर्मका फल केवल कलह है, उसे करनेसे क्या लाभ ? ॥ १५ ॥
न तु क्षमं वीर्यवता तेन धर्मानुवर्तिना । वैरं निरर्थकं कर्तुं दीयतामस्य मैथिली ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम बड़े धर्मात्मा और पराक्रमी हैं । उनके साथ व्यर्थ वैर करना उचित नहीं है । मिथिलेशकुमारी सीताको उनके पास लौटा देना चाहिये ॥ १६ ॥
यावन्न सगजां साश्वां बहुरत्नसमाकुलाम् । पुरीं दारयते बाणैर्दीयतामस्य मैथिली ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जबतक हाथी, घोड़े और अनेकों रत्नोंसे भरी हुई लङ्का पुरीका श्रीराम अपने बाणोंद्वारा विध्वंस नहीं कर डालते, तबतक ही मैथिलीको उन्हें लौटा दिया जाय ॥ १७ ॥
यावत् सुघोरा महती दुर्धर्षा हरिवाहिनी । नावस्कन्दति नो लङ्कां तावत् सीता प्रदीयताम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘जबतक अत्यन्त भयंकर, विशाल और दुर्जय वानर-वाहिनी हमारी लङ्काको पददलित नहीं कर देती, तभीतक सीताको वापस कर दिया जाय ॥ १८ ॥
विनश्येद्धि पुरी लङ्का शूराः सर्वे च राक्षसाः । रामस्य दयिता पत्नी न स्वयं यदि दीयते ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘यदि श्रीरामकी प्राणवल्लभा सीताको हमलोग स्वयं ही नहीं लौटा देते हैं तो यह लङ्कापुरी नष्ट हो जायगी और समस्त शूरवीर राक्षस मार डाले जायँगे ॥ १९ ॥
प्रसादये त्वां बन्धुत्वात् कुरुष्व वचनं मम । हितं तथ्यं त्वहं ब्रमि दीयतामस्य मैथिली ॥ २० ॥
भावार्थ
‘आप मेरे बड़े भाई हैं । अतः मैं आपको विनयपूर्वक प्रसन्न करना चाहता हूँ । आप मेरी बात मान लें । मैं आपके हितके लिये सच्ची बात कहता हूँ—आप श्रीरामचन्द्रजीको उनकी सीता वापस कर दें ॥ २० ॥
पुरा शरत्सूर्यमरीचिसंनिभान् नवाग्रपुङ्खान् सुदृढान् नृपात्मजः । सृजत्यमोघान् विशिखान् वधाय ते प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार श्रीराम जबतक आपके वधके लिये शरत्कालके सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी, उज्ज्वल अग्रभाग एवं पंखोंसे सुशोभित, सुदृढ़ तथा अमोघ बाणोंकी वर्षा करें, उसके पहले ही आप उन दशरथनन्दनकी सेवामें मिथिलेशकुमारी सीताको सौंप दें ॥ २१ ॥
त्यजाशु कोपं सुखधर्मनाशनं भजस्व धर्मं रतिकीर्तिवर्धनम् । प्रसीद जीवेम सपुत्रबान्धवाः प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘भैया ! आप क्रोधको त्याग दें; क्योंकि वह सुख और धर्मका नाश करनेवाला है । धर्मका सेवन कीजिये; क्योंकि वह सुख और सुयशको बढ़ानेवाला है । हमपर प्रसन्न होइये, जिससे हम पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित जीवित रह सकें । इसी दृष्टिसे मेरी प्रार्थना है कि आप दशरथनन्दन श्रीरामके हाथमें मिथिलेशकुमारी सीताको लौटा दें’ ॥ २२ ॥
विभीषणवचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः । विसर्जयित्वा तान् सर्वान् प्रविवेश स्वकं गृहम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
विभीषणकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावण उन सब सभासदोंको विदा करके अपने महलमें चला गया ॥ २३ ॥
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