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युद्धकाण्ड, सर्ग 8

ततो नीलाम्बुदप्रख्यः प्रहस्तो नाम राक्षसः । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं शूरः सेनापतिस्तदा ॥ १ ॥

भावार्थ

इसके बाद नील मेघके समान श्यामवर्णवाले शूर सेनापति प्रहस्त नामक राक्षसने हाथ जोड़कर कहा—॥ १ ॥

देवदानवगन्धर्वाः पिशाचपतगोरगाः । सर्वे धर्षयितुं शक्याः किं पुनर्मानवौ रणे ॥ २ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! हमलोग देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और सर्प सभीको पराजित कर सकते हैं; फिर उन दो मनुष्योंको रणभूमिमें हराना कौन बड़ी बात है ॥ २ ॥

सर्वे प्रमत्ता विश्वस्ता वञ्चिताः स हनूमता । नहि मे जीवतो गच्छेज्जीवन् स वनगोचरः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘पहले हमलोग असावधान थे । हमारे मनमें शत्रुओंकी ओरसे कोई खटका नहीं था । इसीलिये हम निश्चिन्त बैठे थे । यही कारण है कि हनुमान् हमें धोखा दे गया । नहीं तो मेरे जीते-जी वह वानर यहाँसे जीता-जागता नहीं जा सकता था ॥ ३ ॥

सर्वां सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् । करोम्यवानरां भूमिमाज्ञापयतु मां भवान् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘यदि आपकी आज्ञा हो तो पर्वत, वन और काननोंसहित समुद्रतककी सारी भूमिको मैं वानरोंसे सूनी कर दूँ ॥ ४ ॥

रक्षां चैव विधास्यामि वानराद् रजनीचर । नागमिष्यति ते दुःखं किंचिदात्मापराधजम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘राक्षसराज ! मैं वानरमात्रसे आपकी रक्षा करूँगा, अतः अपनेद्वारा किये गये सीता-हरणरूपी अपराधके कारण कोई दुःख आपपर नहीं आने पायेगा’ ॥ ५ ॥

अब्रवीत् तु सुसंक्रुद्धो दुर्मुखो नाम राक्षसः । इदं न क्षमणीयं हि सर्वेषां नः प्रधर्षणम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् दुर्मुख नामक राक्षसने अत्यन्त कुपित होकर कहा—‘यह क्षमा करनेयोग्य अपराध नहीं है, क्योंकि इसके द्वारा हम सब लोगोंका तिरस्कार हुआ है ॥ ६ ॥

अयं परिभवो भूयः पुरस्यान्तःपुरस्य च। श्रीमतो राक्षसेन्द्रस्य वानरेण प्रधर्षणम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘वानरके द्वारा हमलोगोंपर जो आक्रमण हुआ है, यह समस्त लङ्कापुरीका, महाराजके अन्तःपुरका और श्रीमान् राक्षसराज रावणका भी भारी पराभव है ॥ ७ ॥

अस्मिन् मुहूर्ते गत्वैको निवर्तिष्यामि वानरान् । प्रविष्यान् सागरं भीममम्बरं वा रसातलम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘मैं अभी इसी मुहूर्तमें अकेला ही जाकर सारे वानरोंको मार भगाऊँगा । भले ही वे भयंकर समुद्रमें, आकाशमें अथवा रसातलमें ही क्यों न घुस गये हों’ ॥ ८ ॥

ततोऽब्रवीत् सुसंक्रुद्धो वज्रदंष्ट्रो महाबलः । प्रगृह्य परिघं घोरं मांसशोणितरूषितम् ॥ ९ ॥ किं नो हनूमता कार्यं कृपणेन तपस्विना । रामे तिष्ठति दुर्धर्षे सुग्रीवेऽपि सलक्ष्मणे ॥ १० ॥

भावार्थ

इतनेहीमें महाबली वज्रदंष्ट्र अत्यन्त क्रोधसे भरकर रक्त, मांससे सने हुए भयानक परिघको हाथमें लिये हुए बोला—॥ ‘दुर्जय वीर राम, सुग्रीव और लक्ष्मणके रहते हुए हमें उस बेचारे तपस्वी हनुमान्से क्या काम है ? ॥ १० ॥

अद्य रामं ससुग्रीवं परिघेण सलक्ष्मणम् । आगमिष्यामि हत्वैको विक्षोभ्य हरिवाहिनीम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘आज मैं अकेला ही वानर-सेनामें तहलका मचा दूँगा और इस परिघसे सुग्रीव तथा लक्ष्मणसहित रामका भी काम तमाम करके लौट आऊँगा ॥ ११ ॥

इदं ममापरं वाक्यं शृणु राजन् यदिच्छसि । उपायकुशलो ह्येव जयेच्छत्रूनतन्द्रितः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! यदि आपकी इच्छा हो तो आप यह मेरी दूसरी बात सुनें । उपायकुशल पुरुष ही यदि आलस्य छोड़कर प्रयत्न करे तो वह शत्रुओंपर विजय पा सकता है ॥१२॥

कामरूपधराः शूराः सुभीमा भीमदर्शनाः । राक्षसा वा सहस्राणि राक्षसाधिप निश्चिताः ॥ १३ ॥ काकुत्स्थमुपसंगम्य विभ्रतो मानुषं वपुः । सर्वे ह्यसम्भ्रमा भूत्वा ब्रुवन्तु रघुसत्तमम् ॥ १४ ॥ प्रेषिता भरतेनैव भ्रात्रा तव यवीयसा । स हि सेनां समुत्थाप्य क्षिप्रमेवोपयास्यति ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘अतः राक्षसराज ! मेरी दूसरी राय यह है कि इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, अत्यन्त भयानक तथा भयंकर दृष्टिवाले सहस्रों शूरवीर राक्षस एक निश्चित विचार करके मनुष्यका रूप धारण कर श्रीरामके पास जायँ और सब लोग बिना किसी घबराहटके उन रघुवंशशिरोमणिसे कहें कि हम आपके सैनिक हैं। हमें आपके छोटे भाई भरतने भेजा है। इतना सुनते ही वे वानर-सेनाको उठाकर तुरंत लङ्कापर आक्रमण करनेके लिये वहाँसे चल देंगे ॥ १३–१५ ॥

ततो वयमितस्तूर्णं शूलशक्तिगदाधराः । चापवाणासिहस्ताश्च त्वरितास्तत्र यामहे ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘तत्पश्चात् हमलोग यहाँसे शूल, शक्ति, गदा, धनुष, बाण और खड्ग धारण किये शीघ्र ही मार्गमें उनके पास जा पहुँचें ॥ १६ ॥

आकाशे गणशः स्थित्वा हत्वा तां हरिवाहिनीम् । अश्मशस्त्रमहावृष्ट्या प्रापयाम यमक्षयम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘फिर आकाशमें अनेक यूथ बनाकर खड़े हो जायँ और पत्थरों तथा शस्त्र-समूहोंकी बड़ी भारी वर्षा करके उस वानर-सेनाको यमलोक पहुँचा दें ॥ १७ ॥

एवं चेदुपसर्पेतामनयं रामलक्ष्मणौ । अवश्यमपनीतेन जहतामेव जीवितम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘यदि इस प्रकार हमारी बातें सुनकर वे दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दे देंगे और वहाँसे चल देंगे तो उन्हें हमारी अनीतिका शिकार होना पड़ेगा; उन्हें हमारे छलपूर्ण प्रहारसे पीड़ित होकर अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा ॥ १८ ॥

कौम्भकर्णिस्ततो वीरो निकुम्भो नाम वीर्यवान् । अब्रवीत् परमक्रुद्धो रावणं लोकरावणम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

तदनन्तर पराक्रमी वीर कुम्भकर्णकुमार निकुम्भने अत्यन्त कुपित होकर समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणसे कहा—॥ १९ ॥

सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु महाराजेन संगताः । अहमेको हनिष्यामि राघवं सहलक्ष्मणम् ॥ २० ॥ सुग्रीवं सहनूमन्तं सर्वांश्चैवात्र वानरान् ।

भावार्थ

‘आप सब लोग यहाँ महाराजके साथ चुपचाप बैठे रहें । मैं अकेला ही राम, लक्ष्मण, सुग्रीव, हनुमान् तथा अन्य सब वानरोंको भी यहाँ मौतके घाट उतार दूँगा’ ॥ २०½ ॥

ततो वज्रहनुर्नाम राक्षसः पर्वतोपमः ॥ २१ ॥ क्रुद्धः परिलिहन् सृक्कां जिह्वया वाक्यमब्रवीत् । स्वैरं कुर्वन्तु कार्याणि भवन्तो विगतज्वराः ॥ २२ ॥ एकोऽहं भक्षयिष्यामि तां सर्वां हरिवाहिनीम् । स्वस्थाः क्रीडन्तु निश्चिन्ताः पिबन्तु मधु वारुणीम्॥ २३ ॥ अहमेको वधिष्यामि सुग्रीवं सहलक्ष्मणम् । साङ्गदं च हनूमन्तं सर्वांश्चैवात्र वानरान् ॥ २४ ॥

भावार्थ

तब पर्वतके समान विशालकाय वज्रहनु नामक राक्षस कुपित हो जीभसे अपने जबड़ेको चाटता हुआ बोला—॥ ‘आप सब लोग निश्चिन्त होकर इच्छानुसार अपना-अपना काम करें । मैं अकेला ही सारी वानर-सेनाको खा जाऊँगा ॥ ‘आपलोग स्वस्थ रहकर क्रीड़ा करें और निश्चिन्त हो वारुणी मदिराको पियें । मैं अकेला ही सुग्रीव, लक्ष्मण, अंगद, हनुमान् और अन्य सब वानरोंका भी यहाँ वध कर डालूँगा’॥

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