युद्धकाण्ड, सर्ग 7
इत्युक्ता राक्षसेन्द्रेण राक्षसास्ते महाबलाः । ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे रावणं राक्षसेश्वरम् ॥ १ ॥ द्विषत्पक्षमविज्ञाय नीतिबाह्यास्त्वबुद्धयः ।
भावार्थ
राक्षसोंको न तो नीतिका ज्ञान था और न वे शत्रुपक्षके बलाबलको ही समझते थे । वे बलवान् तो बहुत थे; किंतु नीतिकी दृष्टिसे महामूर्ख थे । इसलिये जब राक्षसराज रावणने उनसे पूर्वोक्त बातें कहीं, तब वे सब-के-सब हाथ जोड़कर उससे बोले—॥ १½ ॥
राजन् परिघशाक्त्यृष्टिशूलपट्टिशकुन्तलम् ॥ २ ॥ सुमहन्नो बलं कस्माद् विषादं भजते भवान् ।
भावार्थ
‘राजन् ! हमारे पास परिघ, शक्ति, ऋष्टि, शूल, पट्टिश और भालोंसे लैस बहुत बड़ी सेना मौजूद है; फिर आप विषाद क्यों करते हैं ॥ २½ ॥
त्वया भोगवतीं गत्वा निर्जिताः पन्नगा युधि ॥ ३ ॥ कैलासशिखरावासी यक्षैर्बहुभिरावृतः । सुमहत्कदनं कृत्वा वश्यस्ते धनदः कृतः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘आपने तो भोगवती पुरीमें जाकर नागोंको भी युद्धमें परास्त कर दिया था । बहुसंख्यक यक्षोंसे घिरे हुए कैलास-शिखरके निवासी कुबेरको भी युद्धमें भारी मार-काट मचाकर वशमें कर लिया था ॥ ३-४ ॥
स महेश्वरसख्येन श्लाघमानस्त्वया विभो । निर्जितः समरे रोषाल्लोकपालो महाबलः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! महाबली लोकपाल कुबेर महादेवजीके साथ मित्रता होनेके कारण आपके साथ बड़ी स्पर्धा रखते थे; परंतु आपने समराङ्गणमें रोषपूर्वक उन्हें हरा दिया ॥ ५ ॥
विनिपात्य च यक्षौघान् विक्षोभ्य विनिगृह्य च । त्वया कैलासशिखराद् विमानमिदमाहृतम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘यक्षोंकी सेनाको विचलित करके बंदी बना लिया और कितनोंको धराशायी करके कैलासशिखरसे आप उनका यह विमान छीन लाये थे ॥ ६ ॥
मयेन दानवेन्द्रेण त्वद्भयात् सख्यमिच्छता । दुहिता तव भार्यार्थे दत्ता राक्षसपुङ्गव ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘राक्षसशिरोमणे ! दानवराज मयने आपसे भयभीत होकर ही आपको अपना मित्र बना लेनेकी इच्छा की और इसी उद्देश्यसे आपको धर्मपत्नीके रूपमें अपनी पुत्री समर्पित कर दी ॥ ७ ॥
दानवेन्द्रो महाबाहो वीर्योत्सिक्तो दुरासदः । विगृह्य वशमानीतः कुम्भीनस्याः सुखावहः ॥ ८ ॥ निर्जितास्ते महाबाहो नागा गत्वा रसातलम् । वासुकिस्तक्षकः शङ्खो जटी च वशमाहृताः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! अपने पराक्रमका घमंड रखनेवाले दुर्जय दानवराज मधुको भी, जो आपकी बहिन कुम्भीनसीको सुख देनेवाला उसका पति है, आपने युद्ध छेड़कर वशमें कर लिया॥ ‘विशालबाहु वीर ! आपने रसातलपर चढ़ाई करके वासुकि, तक्षक, शङ्ख और जटी आदि नागोंको युद्धमें जीता और अपने अधीन कर लिया ॥ ९ ॥
अक्षया बलवन्तश्च शूरा लब्धवराः पुनः । त्वया संवत्सरं युद्ध्वा समरे दानवा विभो ॥ १० ॥ खबलं समुपाश्रित्य नीता वशमरिंदम । मायाश्चाधिगतास्तत्र बह्वयो वै राक्षसाधिप ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! शत्रुदमन राक्षसराज ! दानवलोग बड़े ही बलवान्, किसीसे नष्ट न होनेवाले, शूरवीर तथा वर पाकर अद्भुत शक्तिसे सम्पन्न हो गये थे; परंतु आपने समराङ्गणमें एक वर्षतक युद्ध करके अपने ही बलके भरोसे उन सबको अपने अधीन कर लिया और वहाँ उनसे बहुत-सी मायाएँ भी प्राप्त कीं ॥ १०-११ ॥
शूराश्च बलवन्तश्च वरुणस्य सुता रणे । निर्जितास्ते महाभाग चतुर्विधबलानुगाः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘महाभाग ! आपने वरुणके शूरवीर और बलवान् पुत्रोंको भी उनकी चतुरंगिणी सेनासहित युद्धमें परास्त कर दिया था ॥ १२ ॥
मृत्युदण्डमहाग्राहं शाल्मलीद्रुममण्डितम् । कालपाशमहावीचि यमकिंकरपन्नगम् ॥ १३ ॥ महाज्वरेण दुर्धर्षं यमलोकमहार्णवम् । अवगाह्य त्वया राजन् यमस्य बलसागरम् ॥ १४ ॥ जयश्च विपुलः प्राप्तो मृत्युश्च प्रतिषेधितः । सुयुद्धेन च ते सर्वे लोकस्तत्र सुतोषिताः ॥ १५ ॥ क्षत्रियैर्बहुभिर्वीरैः शक्रतुल्यपराक्रमैः । आसीद् वसुमती पूर्णा महद्भिरिव पादपैः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! मृत्युका दण्ड ही जिसमें महान् ग्राहके समान है, जो यम-यातना-सम्बन्धी शाल्मलि आदि वृक्षोंसे मण्डित है, कालपाशरूपी उत्ताल तरङ्गें जिसकी शोभा बढ़ाती हैं, यमदूत-रूपी सर्प जिसमें निवास करते हैं तथा जो महान् ज्वरके कारण दुर्जय है, उस यमलोकरूपी महासागरमें प्रवेश करके आपने यमराजकी सागर-जैसी सेनाको मथ डाला, मृत्युको रोक दिया और महान् विजय प्राप्त की । यही नहीं, युद्धकी उत्तम कलासे आपने वहाँके सब लोगोंको पूर्ण संतुष्ट कर दिया था ॥ ‘पहले यह पृथ्वी विशाल वृक्षोंकी भाँति इन्द्रतुल्य पराक्रमी बहुसंख्यक क्षत्रिय वीरोंसे भरी हुई थी ॥ १६ ॥
तेषां वीर्यगुणोत्साहैर्न समो राघवो रणे । प्रसह्य ते त्वया राजन् हताः समरदुर्जयाः ॥ १७ ॥ तिष्ठ वा किं महाराज श्रमेण तव वानरान् । अयमेको महाबाहुरिन्द्रजित् क्षपयिष्यति ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘उन वीरोंमें जो पराक्रम, गुण और उत्साह थे, उनकी दृष्टिसे राम रणभूमिमें उनके समान कदापि नहीं है; राजन् ! जब आपने उन समरदुर्जय वीरोंको भी बलपूर्वक मार डाला, तब रामपर विजय पाना आपके लिये कौन बड़ी बात है ? ॥ ‘अथवा महाराज ! आप चुपचाप यहीं बैठे रहें । आपको परिश्रम करनेकी क्या आवश्यकता है । अकेले ये महाबाहु इन्द्रजित् ही सब वानरोंका संहार कर डालेंगे ॥ १८ ॥
अनेन च महाराज माहेश्वरमनुत्तमम् । इष्ट्वा यज्ञं वरो लब्धो लोके परमदुर्लभः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! इन्होंने परम उत्तम माहेश्वर यज्ञका अनुष्ठान करके वह वर प्राप्त किया है, जो संसारमें दूसरेके लिये अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १९ ॥
शक्तितोमरमीनं च विनिकीर्णान्त्रशैवलम् । गजकच्छपसम्बाधमश्वमण्डूकसंकुलम् ॥ २० ॥ रुद्रादित्यमहाग्राहं मरुद्वसुमहोरगम् । रथाश्वगजतोयौघं पदातिपुलिनं महत् ॥ २१ ॥ अनेन हि समासाद्य देवानां बलसागरम् । गृहीतो दैवतपतिर्लङ्कां चापि प्रवेशितः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘देवताओंकी सेना समुद्रके समान थी । शक्ति और तोमर ही उसमें मत्स्य थे । निकालकर फेंकी हुई आँतें सेवारका काम देती थीं । हाथी ही उस सैन्य-सागरमें कछुओंके समान भरे थे । घोड़े मेढकोंके समान उसमें सब ओर व्याप्त थे । रुद्रगण और आदित्यगण उस सेनारूपी समुद्रके बड़े-बड़े ग्राह थे । मरुद्गण और वसुगण वहाँके विशाल नाग थे । रथ, हाथी और घोड़े जलराशिके समान थे और पैदल सैनिक उसके विशाल तट थे; परंतु इस इन्द्रजित्ने देवताओंके उस सैन्य-समुद्रमें घुसकर देवराज इन्द्रको कैद कर लिया और उन्हें लङ्कापुरीमें लाकर बंद कर दिया ॥ २०-२२ ॥
पितामहनियोगाच्च मुक्तः शम्बरवृत्रहा । गतस्त्रिविष्टपं राजन् सर्वदेवनमस्कृतः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! फिर ब्रह्माजीके कहनेसे इन्होंने शम्बर और वृत्रासुरको मारनेवाले सर्वदेववन्दित इन्द्रको मुक्त किया । तब वे स्वर्गलोकमें गये ॥ २३ ॥
तमेव त्वं महाराज विसृजेन्द्रजितं सुतम् । यावद् वानर सेनां तां सरामां नयति क्षयम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘अतः महाराज ! इस कामके लिये आप राजकुमार इन्द्रजित्को ही भेजिये, जिससे ये रामसहित वानर-सेनाका यहाँ आनेसे पहले ही संहार कर डालें ॥ २४ ॥
राजन्नापदयुक्तेयमागता प्राकृताज्जनात् । हृदि नैव त्वया कार्या त्वं वधिष्यसि राघवम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! साधारण नर और वानरोंसे प्राप्त हुई इस आपत्तिके विषयमें चिन्ता करना आपके लिये उचित नहीं है । आपको तो अपने हृदयमें इसे स्थान ही नहीं देना चाहिये । आप अवश्य ही रामका वध कर डालेंगे’ ॥ २५ ॥
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