युद्धकाण्ड, सर्ग 10
ततः प्रत्युषसि प्राप्ते प्राप्तधर्मार्थनिश्चयः । राक्षसाधिपतेर्वेश्म भीमकर्मा विभीषणः ॥ १ ॥ शैलाग्रचयसंकाशं सुविभक्तमहाकक्षं शैलशृङ्गमिवोन्नतम् । महाजनपरिग्रहम् ॥ २ ॥ मतिमद्भिर्महामात्रैरनुरक्तैरधिष्ठितम् । राक्षसैरात्तपर्याप्तैः सर्वतः परिरक्षितम् ॥ ३ ॥ मत्तमातङ्गनिःश्वासैर्व्याकुलीकृतमारुतम् । शङ्खघोषमहाघोषं तूर्यसम्बाधनादितम् ॥ ४ ॥ प्रमदाजनसम्बाधं प्रजल्पितमहापथम् । तप्तकाञ्चननिर्यूहं भूषणोत्तमभूषितम् ॥ ५ ॥ गन्धर्वाणामिवावासमालयं मरुतामिव । रत्नसंचयसम्बाधं भवनं भोगिनामिव ॥ ६ ॥ तं महाभ्रमिवादित्यस्तेजोविस्तृतरश्मिवान् । अग्रजस्यालयं वीरः प्रविवेश महाद्युतिः ॥ ७ ॥
भावार्थ
दूसरे दिन सबेरा होते ही धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले भीमकर्मा महातेजस्वी वीर विभीषण अपने बड़े भाई राक्षसराज रावणके घर गये । वह घर अनेक प्रासादोंके कारण पर्वतशिखरोंके समूहकी भाँति शोभा पाता था । उसकी ऊँचाई भी पहाड़की चोटीको लज्जित करती थी । उसमें अलग-अलग बड़ी-बड़ी कक्षाएँ ( ड्योढ़ियाँ ) सुन्दर ढंगसे बनी हुई थीं । बहुतेरे श्रेष्ठ पुरुषोंका वहाँ आना-जाना लगा रहता था । अनेकानेक बुद्धिमान् महामन्त्री, जो राजाके प्रति अनुराग रखनेवाले थे, उसमें बैठे थे । विश्वसनीय, हितैषी तथा कार्यसाधनमें कुशल बहुसंख्यक राक्षस सब ओरसे उस भवनकी रक्षा करते थे । वहाँकी वायु मतवाले हाथियोंके निःश्वाससे मिश्रित हो बवंडर-सी जान पड़ती थी । शंख-ध्वनिके समान राक्षसोंका गम्भीर घोष वहाँ गूँजता रहता था । नाना प्रकारके वाद्योंके मनोरम शब्द उस भवनको निनादित करते थे । रूप और यौवनके मदसे मतवाली युवतियोंकी वहाँ भीड़-सी लगी रहती थी । वहाँके बड़े-बड़े मार्ग लोगोंके वार्तालापसे मुखरित जान पड़ते थे । उसके फाटक तपाये हुए सुवर्णके बने हुए थे । उत्तम सजावटकी वस्तुओंसे वह महल अच्छी तरह सजा हुआ था, अतएव वह गन्धर्वोंके आवास और देवताओंके निवासस्थान-सा मनोरम प्रतीत होता था । रत्नराशिसे परिपूर्ण होनेके कारण वह नागभवनके समान उद्भासित होता था । जैसे तेजसे विस्तृत किरणोंवाले सूर्य महान् मेघोंकी घटामें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार तेजस्वी विभीषणने रावणके उस भवनमें पदार्पण किया ॥ १–७ ॥
पुण्यान् पुण्याहघोषांश्च वेदविद्भिरुदाहृतान् । शुश्राव सुमहातेजा भ्रातुर्विजयसंश्रितान् ॥ ८ ॥
भावार्थ
वहाँ पहुँचकर उन महातेजस्वी विभीषणने अपने भाईकी विजयके उद्देश्यसे वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा किये गये पुण्याह-वाचनके पवित्र घोष सुने ॥ ८ ॥
पूजितान् दधिपात्रैश्च सर्पिर्भिः सुमनोक्षतैः । मन्त्रवेदविदो विप्रान् ददर्श स महाबलः ॥ ९ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उन महाबली विभीषणने वेदमन्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मणोंका दर्शन किया, जिनके हाथोंमें दही और घीके पात्र थे । फूलों और अक्षतोंसे उन सबकी पूजा की गयी थी ॥ ९ ॥
स पूज्यमानो रक्षोभिर्दीप्यमानं स्वतेजसा । आसनस्थं महाबाहुर्ववन्दे धनदानुजम् ॥ १० ॥
भावार्थ
वहाँ जानेपर राक्षसोंने उनका स्वागत-सत्कार किया । फिर उन महाबाहु विभीषणने अपने तेजसे देदीप्यमान और सिंहासनपर विराजमान कुबेरके छोटे भाई रावणको प्रणाम किया ॥ १० ॥
स राजदृष्टिसम्पन्नमासनं हेमभूषितम् । जगाम समुदाचारं प्रयुज्याचारकोविदः ॥ ११ ॥
भावार्थ
तदनन्तर शिष्टाचारके ज्ञाता विभीषण ‘विजयतां महाराजः ( महाराजकी जय हो )’ इत्यादि रूपसे राजाके प्रति परम्पराप्राप्त शुभाशंसासूचक वचनका प्रयोग करके राजाके द्वारा दृष्टिके संकेतसे बताये गये सुवर्णभूषित सिंहासनपर बैठ गये ॥ ११ ॥
स रावणं महात्मानं विजने मन्त्रिसंनिधौ । उवाच हितमत्यर्थं वचनं हेतुनिश्चितम् ॥ १२ ॥ प्रसाद्य भ्रातरं ज्येष्ठं सान्त्वेनोपस्थितक्रमः । देशकालार्थसंवादि दृष्टलोकपरावरः ॥ १३ ॥
भावार्थ
विभीषण जगत्की भली-बुरी बातोंको अच्छी तरह जानते थे । उन्होंने प्रणाम आदि व्यवहारका यथार्थरूपसे निर्वाह करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा अपने बड़े भाई महामना रावणको प्रसन्न किया और उससे एकान्तमें मन्त्रियोंके निकट देश, काल और प्रयोजनके अनुरूप, युक्तियोंद्वारा निश्चित तथा अत्यन्त हितकारक बात कही—॥ १२-१३ ॥
यदाप्रभृति वैदेही सम्प्राप्तेह परंतप । तदाप्रभृति दृश्यन्ते निमित्तान्यशुभानि नः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज ! जबसे विदेहकुमारी सीता यहाँ आयी हैं, तभीसे हमलोगोंको अनेक प्रकारके अमङ्गलसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं ॥ १४ ॥
सस्फुलिङ्गः सधूमार्चिः सधूमकलुषोदयः । मन्त्रसंधुक्षितोऽप्यग्निर्न सम्यगभिवर्धते ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘मन्त्रोंद्वारा विधिपूर्वक धधकानेपर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं हो रही है । उससे चिनगारियाँ निकलने लगती हैं । उसकी लपटके साथ धुआँ उठने लगता है और मन्थनकालमें जब अग्नि प्रकट होती है, उस समय भी वह धूएँसे मलिन ही रहती है ॥ १५ ॥
अग्निष्टेष्वग्निशालासु तथा ब्रह्मस्थलीषु च । सरीसृपाणि दृश्यन्ते हव्येषु च पिपीलिकाः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘रसोई-घरोंमें, अग्निशालाओंमें तथा वेदाध्ययनके स्थानोंमें भी साँप देखे जाते हैं और हवन-सामग्रियोंमें चींटियाँ पड़ी दिखायी देती हैं ॥ १६ ॥
गवां पयांसि स्कन्नानि विमदा वरकुञ्जराः । दीनमश्वाः प्रहेषन्ते नवग्रासाभिनन्दिनः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘गायोंका दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गये हैं, घोड़े नये ग्राससे आनन्दित ( भोजनसे संतुष्ट ) होनेपर भी दीनतापूर्ण स्वरमें हिनहिनाते हैं ॥ १७ ॥
खरोष्ट्राश्वतरा राजन् भिन्नरोमाः स्रवन्ति च । न स्वभावेऽवतिष्ठन्ते विधानैरपि चिन्तिताः ॥ १८ ॥ वायसाः संघशः क्रूरा व्याहरन्ति समन्ततः । समवेताश्च दृश्यन्ते विमानाग्रेषु संघशः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! गधों, ऊँटों और खच्चरोंके रोंगटे खड़े हो जाते हैं । उनके नेत्रोंसे आँसू गिरने लगते हैं । विधिपूर्वक चिकित्सा की जानेपर भी वे पूर्णतः स्वस्थ हो नहीं पाते हैं ॥ ‘क्रूर कौए झुंड-के-झुंड एकत्र होकर कर्कश स्वरमें काँव-काँव करने लगते हैं तथा वे सतमहले मकानोंपर समूह-के-समूह इकट्ठे हुए देखे जाते हैं ॥ १९ ॥
गृध्राश्च परिलीयन्ते पुरीमुपरि पिण्डिताः । उपपन्नाश्च संध्ये द्वे व्याहरन्त्यशिवं शिवाः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘लङ्कापुरीके ऊपर झुंड-के-झुंड गीध उसका स्पर्श करते हुए-से मड़राते रहते हैं । दोनों संध्याओंके समय सियारिनें नगरके समीप आकर अमङ्गलसूचक शब्द करती हैं ॥ २०॥
क्रव्यादानां मृगाणां च पुरीद्वारेषु संघशः । श्रूयन्ते विपुला घोषाः सविस्फूर्जितनिःस्वनाः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘नगरके सभी फाटकोंपर समूह-के-समूह एकत्र हुए मांसभक्षी पशुओंके जोर-जोरसे किये जानेवाले चीत्कार बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान सुनायी पड़ते हैं ॥ २१ ॥
तदेवं प्रस्तुते कार्ये प्रायश्चित्तमिदं क्षमम् । रोचये वीर वैदेही राघवाय प्रदीयताम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘वीरवर ! ऐसी परिस्थितिमें मुझे तो यही प्रायश्चित्त अच्छा जान पड़ता है कि विदेहकुमारी सीता श्रीरामचन्द्रजीको लौटा दी जायँ ॥ २२ ॥
इदं च यदि वा मोहाल्लोभाद् वा व्याहृतं मया । तत्रापि च महाराज न दोषं कर्तुमर्हसि ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! यदि यह बात मैंने मोह या लोभसे कही हो तो भी आपको मुझमें दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये ॥ २३ ॥
अयं हि दोषः सर्वस्य जनस्यास्योपलक्ष्यते । रक्षसां राक्षसीनां च पुरस्यान्तःपुरस्य च ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘सीताका अपहरण तथा इससे होनेवाला अपशकुनरूपी दोष यहाँकी सारी जनता, राक्षस-राक्षसी तथा नगर और अन्तःपुर—सभीके लिये उपलक्षित होता है ॥ २४ ॥
प्रापणे चास्य मन्त्रस्य निवृत्ताः सर्वमन्त्रिणः । अवश्यं च मया वाच्यं यद् दृष्टमथवा श्रुतम् । सम्प्रधार्य यथान्यायं तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘यह बात आपके कानोंतक पहुँचानेमें प्रायः सभी मन्त्री संकोच करते हैं; परंतु जो बात मैंने देखी या सुनी है, वह मुझे तो आपके आगे अवश्य निवेदन कर देनी चाहिये; अतः उसपर यथोचित विचार करके आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’ ॥ २५ ॥
इति स्वमन्त्रिणां मध्ये भ्राता भ्रातरमूचिवान् । रावणं रक्षसां श्रेष्ठं पथ्यमेतद् विभीषणः ॥ २६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार भाई विभीषणने अपने मन्त्रियोंके बीचमें बड़े भाई राक्षसराज रावणसे ये हितकारी वचन कहे ॥ २६ ॥
हितं महार्थं मृदु हेतुसंहितं व्यतीतकालायतिसम्प्रतिक्षमम् । निशम्य तद्वाक्यमुपस्थितज्वरः प्रसङ्गवानुत्तरमेतदब्रवीत् ॥ २७ ॥ भयं न पश्यामि कुतश्चिदप्यहं न राघवः प्राप्स्यति जातु मैथिलीम् । सुरैः सहेन्द्रैरपि संगरे कथं ममाग्रतः स्थास्यति लक्ष्मणाग्रजः ॥ २८ ॥
भावार्थ
विभीषणकी ये हितकर, महान् अर्थकी साधक, कोमल, युक्तिसंगत तथा भूत, भविष्य और वर्तमान-कालमें भी कार्य-साधनमें समर्थ बातें सुनकर रावणको बुखार चढ़ आया । श्रीरामके साथ वैर बढ़ानेमें उसकी आसक्ति हो गयी थी । इसलिये उसने इस प्रकार उत्तर दिया—‘विभीषण ! मैं तो कहींसे भी कोई भय नहीं देखता । राम मिथिलेशकुमारी सीताको कभी नहीं पा सकते । इन्द्रसहित देवताओंकी सहायता प्राप्त कर लेनेपर भी लक्ष्मणके बड़े भाई राम मेरे सामने संग्राममें कैसे टिक सकेंगे ?’ ॥ २७-२८ ॥
इत्येवमुक्त्वा सुरसैन्यनाशनो महाबलः संयति चण्डविक्रमः । दशानणो भ्रातरमाप्तवादिनं विसर्जयामास तदा विभीषणम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर देवसेनाके नाशक और समराङ्गणमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भाई विभीषणको तत्काल विदा कर दिया ॥ २९ ॥
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