युद्धकाण्ड, सर्ग 79
निर्गतं मकराक्षं ते दृष्ट्वा वानरपुंगवाः । आप्लुत्य सहसा सर्वे योद्धुकामा व्यवस्थिताः ॥ १ ॥
भावार्थ
प्रधान-प्रधान वानरोंने जब देखा कि मकराक्ष नगरसे निकला आ रहा है, तब वे सब-के-सब सहसा उछलकर युद्धके लिये खड़े हो गये ॥ १ ॥
ततः प्रवृत्तं सुमहत् तद् युद्धं लोमहर्षणम् । निशाचरैः प्लवंगानां देवानां दानवैरिव ॥ २ ॥
भावार्थ
फिर तो वानरोंका निशाचरोंके साथ बड़ा भारी युद्ध छिड़ गया, जो देव-दानव-संग्रामके समान रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ २ ॥
वृक्षशूलनिपातैश्च गदापरिघपातनैः । अन्योन्यं मर्दयन्ति स्म तदा कपिनिशाचराः ॥ ३ ॥
भावार्थ
वानर और निशाचर वृक्ष, शूल, गदा और परिघोंकी मारसे उस समय एक दूसरेको कुचलने लगे ॥ ३ ॥
शक्तिखड्गगदाकुन्तैस्तोमरैश्च निशाचराः । पट्टिशैर्भिन्दिपालैश्च बाणपातैः समन्ततः ॥ ४ ॥ पाशमुद्गरदण्डैश्च निर्घातैश्चापरैस्तथा । कदनं कपिसिंहानां चक्रुस्ते रजनीचराः ॥ ५ ॥
भावार्थ
निशाचरगण शक्ति, खड्ग, गदा, भाला, तोमर, पट्टिश, भिन्दिपाल, बाणप्रहार, पाश, मुद्गर, दण्ड तथा अन्य प्रकारके शस्त्रोंके आघातसे सब ओर वानरवीरोंका संहार करने लगे ॥ ४-५ ॥
बाणौघैरर्दिताश्चापि खरपुत्रेण वानराः । सम्भ्रान्तमनसः सर्वे दुद्रुवुर्भयपीडिताः ॥ ६ ॥
भावार्थ
खरपुत्र मकराक्षने अपने बाणसमूहोंसे वानरोंको अत्यन्त घायल कर दिया । उनके मनमें बड़ी घबराहट हुई और वे सब-के-सब भयसे पीड़ित हो इधर-उधर भागने लगे ॥ ६ ॥
तान् दृष्ट्वा राक्षसाः सर्वे द्रवमाणान् वनौकसः । नेदुस्ते सिंहवद् दृप्ता राक्षसा जितकाशिनः ॥ ७ ॥
भावार्थ
उन सब वानरोंको भागते देख विजयोल्लाससे सुशोभित होनेवाले वे समस्त राक्षस दर्पसे भरकर सिंहके समान गर्जना करने लगे ॥ ७ ॥
विद्रवत्सु तदा तेषु वानरेषु समन्ततः । रामस्तान् वारयामास शरवर्षेण राक्षसान् ॥ ८ ॥
भावार्थ
वे वानर जब सब ओर भागने-पराने लगे, तब श्रीरामचन्द्रजीने बाणोंकी वर्षा करके राक्षसोंको आगे बढ़नेसे रोका ॥ ८ ॥
वारितान् राक्षसान् दृष्ट्वा मकराक्षो निशाचरः । कोपानलसमाविष्टो वचनं चेदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
भावार्थ
राक्षसोंको रोका गया देख निशाचर मकराक्ष क्रोधकी आगसे जल उठा और इस प्रकार बोला—॥ ९ ॥
तिष्ठ राम मया सार्धं द्वन्द्वयुद्धं भविष्यति । त्याजयिष्यामि ते प्राणान् धनुर्मुक्तैः शितैः शरैः॥१०॥
भावार्थ
‘राम ! ठहरो, मेरे साथ तुम्हारा द्वन्द्वयुद्ध होगा । आज अपने धनुषसे छूटे हुए पैने बाणोंद्वारा तुम्हारे प्राण हर लूँगा ॥ १० ॥
यत् तदा दण्डकारण्ये पितरं हतवान् मम । तदग्रतः स्वकर्मस्थं स्मृत्वा रोषोऽभिवर्धते ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘उन दिनों दण्डकारण्यके भीतर जो तुमने मेरे पिताका वध किया था, तभीसे लेकर अबतक तुम राक्षस-वधके ही कर्ममें लगे हुए थे । इस रूपमें तुम्हारा स्मरण करके मेरा रोष बढ़ता जा रहा है ॥ ११ ॥
दह्यन्ते भृशमङ्गानि दुरात्मन् मम राघव । यन्मयासि न दृष्टस्त्वं तस्मिन् काले महावने ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘दुरात्मा राघव ! उस समय विशाल दण्डकारण्यमें जो तुम मुझे दिखायी नहीं दिये, इससे मेरे अङ्ग अत्यन्त रोषसे जलते रहते थे ॥ १२ ॥
दिष्ट्यासि दर्शनं राम मम त्वं प्राप्तवानिह । काङ्क्षितोऽसि क्षुधार्तस्य सिंहस्येवेतरो मृगः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘किंतु राम ! सौभाग्यकी बात है, जो तुम आज यहाँ मेरी आँखोंके सामने पड़ गये । जैसे भूखसे पीड़ित हुए सिंहको दूसरे वन-जन्तुओंकी अभिलाषा होती है, उसी तरह मैं भी तुम्हें पानेकी इच्छा करता था ॥ १३ ॥
अद्य मद्भाणवेगेन प्रेतराड्विषयं गतः । ये त्वया निहताः शूराः सह तैश्च वसिष्यसि ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘आज मेरे बाणोंके वेगसे यमराजके राज्यमें पहुँचकर तुम्हें उन्हीं वीर निशाचरोंके साथ निवास करना पड़ेगा, जो तुम्हारे हाथसे मारे गये हैं ॥ १४ ॥
बहुनात्र किमुक्तेन शृणु राम वचो मम । पश्यन्तु सकला लोकास्त्वां मां चैव रणाजिरे ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘राम ! यहाँ बहुत कहनेसे क्या लाभ ? मेरी बात सुनो । सब लोग इस समराङ्गणमें खड़े होकर केवल तुमको और मुझको देखें–तुम्हारे और मेरे युद्धका अवलोकन करें ॥ १५ ॥
अस्त्रैर्वा गदया वापि बाहुभ्यां वा रणाजिरे । अभ्यस्तं येन वा राम वर्ततां तेन वा मृधम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘राम ! तुम्हें रणभूमिमें अस्त्रोंसे, गदासे अथवा दोनों भुजाओंसे––जिससे भी अभ्यास हो, उसीके द्वारा आज तुम्हारे साथ मेरा युद्ध हो’ ॥ १६ ॥
मकराक्षवचः श्रुत्वा रामो दशरथात्मजः । अब्रवीत् प्रहसन् वाक्यमुत्तरोत्तरवादिनम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
मकराक्षकी यह बात सुनकर दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम जोर-जोरसे हँसने लगे और उत्तरोत्तर बातें बनानेवाले उस राक्षससे बोले—॥ १७ ॥
कत्थसे किं वृथा रक्षो बहून्यसदृशानि ते । न रणे शक्यते जेतुं विना युद्धेन वाग्बलात् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘निशाचर ! क्यों व्यर्थ डींग हाँकता है । तेरे मुँहसे बहुत-सी ऐसी बातें निकल रही हैं, जो वीर पुरुषोंके योग्य नहीं है । संग्राममें युद्ध किये बिना कोरी बकवासके बलसे विजय नहीं प्राप्त हो सकती ॥ १८ ॥
चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां त्वत्पिता च यः । त्रिशिरा दूषणश्चापि दण्डके निहतो मया ॥ १९ ॥ स्वाशिताश्चापि मांसेन गृध्रगोमायुवायसाः । भविष्यन्त्यद्य वै पाप तीक्ष्णतुण्डनखाङ्कुशाः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘पापी राक्षस ! यह ठीक है कि दण्डकारण्यमें चौदह हजार राक्षसोंके साथ तेरे पिता खरका, त्रिशिराका और दूषणका भी मैंने वध किया था । उस समय तीखी चोंच और अङ्कुशके समान पंजेवाले बहुत-से गीधों, गीदड़ों तथा कौओंको भी उनके मांससे अच्छी तरह तृप्त किया था और अब आज वे तेरे मांससे भरपेट भोजन पायेंगे’ ॥ १९-२० ॥
राघवेणैवमुक्तस्तु मकराक्षो महाबलः । बाणौघानमुचत् तस्मै राघवाय रणाजिरे ॥ २१ ॥ ताञ्छराञ्छरवर्षेण रामश्चिच्छेद नैकधा । निपेतुर्भुवि विच्छिन्ना रुक्मपुङ्खाः सहस्रशः ॥ २२ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर महाबली मकराक्षने रणभूमिमें उनके ऊपर बाण-समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ परंतु श्रीरामने स्वयं भी बाणोंकी बौछार करके उस राक्षसके बाण टुकड़े-टुकड़े कर डाले । वे कटे हुए सुनहरी पाँखवाले सहस्रों बाण पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २२ ॥
तद् युद्धमभवत् तत्र समेत्यान्योन्यमोजसा । खरराक्षसपुत्रस्य सूनोर्दशरथस्य च ॥ २३ ॥
भावार्थ
दशरथनन्दन भगवान् श्रीराम और राक्षस खरके पुत्र मकराक्ष—इन दोनोंमें एक दूसरेके निकट आकर बलपूर्वक युद्ध होने लगा ॥ २३ ॥
जीमूतयोरिवाकाशे शब्दो ज्यातलयोरिव । धनुर्मुक्तः खनोऽन्योन्यं श्रूयते च रणाजिरे ॥ २४ ॥
भावार्थ
उन दोनोंकी प्रत्यञ्चा और हथेलीकी रगड़से धनुषके द्वारा जो टंकार-शब्द प्रकट होता था, वह उस समराङ्गणमें परस्पर मिलकर उसी तरह सुनायी देता था, जैसे आकाशमें दो मेघोंके गर्जनेकी आवाज हो रही हो ॥ २४ ॥
देवदानवगन्धर्वाः किंनराश्च महोरगाः । अन्तरिक्षगताः सर्वे द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
देवता, दानव, गन्धर्व, किन्नर और बड़े-बड़े नाग— ये सब-के-सब उस अद्भुत युद्धको देखनेके लिये अन्तरिक्षमें आकर खड़े हो गये ॥ २५ ॥
विद्धमन्योन्यगात्रेषु द्विगुणं वर्धते बलम् । कृतप्रतिकृतान्योन्यं कुरुतां तौ रणाजिरे ॥ २६ ॥
भावार्थ
दोनोंके शरीर बाणोंसे बिंध गये वे; फिर भी उनका बल दुगुना बढ़ता जाता था । वे दोनों संग्रामभूमिमें एक-दूसरेके अस्त्रोंको काटते हुए लड़ रहे थे ॥ २६ ॥
राममुक्तांस्तु बाणौघान् राक्षसस्त्वच्छिनद् रणे । रक्षोमुक्तांस्तु रामो वै नैकधा प्राच्छिनच्छरैः ॥ २७ ॥ बाणौघवितताः सर्वा दिशश्च प्रदिशस्तथा । संछन्ना वसुधा चैव समन्तान्न प्रकाशते ॥ २८ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके छोड़े हुए बाण-समूहोंको वह राक्षस रणभूमिमें काट डालता था और राक्षसके चलाये हुए सायकोंको श्रीरामचन्द्रजी अपने बाणोंद्वारा टूक-टूक कर डालते थे ॥ सम्पूर्ण दिशा और विदिशाएँ बाण-समूहोंसे आच्छादित हो गयी थीं तथा सारी पृथ्वी ढक गयी थी । चारों ओर कुछ भी दिखायी नहीं देता था ॥ २८ ॥
ततः क्रुद्धो महाबाहुर्धनुश्चिच्छेद संयुगे । अष्टाभिरथ नाराचैः सूतं विव्याध राघवः ॥ २९ ॥
भावार्थ
तदनन्तर महाबाहु श्रीरामचन्द्रजीने क्रोधमें भरकर उस राक्षसके धनुषको युद्धभूमिमें काट दिया और आठ नाराचोंद्वारा उसके सारथिको भी पीट दिया ॥ २९ ॥
भित्त्वा रथं शरै रामो हत्वा अश्वानपातयत् । विरथो वसुधास्थः स मकराक्षो निशाचरः ॥ ३० ॥
भावार्थ
फिर अनेक बाणोंसे रथको छिन्न-भिन्न करके श्रीरामने घोड़ोंको भी मार गिराया । रथहीन हो जानेपर निशाचर मकराक्ष भूमिपर खड़ा हो गया ॥ ३० ॥
तत्तिष्ठद् वसुधां रक्षः शूलं जग्राह पाणिना । त्रासनं सर्वभूतानां युगान्ताग्निसमप्रभम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
पृथ्वीपर खड़े हुए उस राक्षसने शूल हाथमें लिया, जो प्रलयकालकी अग्निके समान दीप्तिमान् तथा समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला था ॥ ३१ ॥
दुरवापं महच्छूलं रुद्रदत्तं भयंकरम् । जाज्वल्यमानमाकाशे संहारास्त्रमिवापरम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वह परम दुर्लभ और महान् शूल भगवान् शंकरका दिया हुआ था, जो बहुत ही भयंकर था । वह दूसरे संहारास्त्रकी भाँति आकाशमें प्रज्वलित हो उठा ॥ ३२ ॥
यं दृष्ट्वा देवताः सर्वा भयार्ता विद्रुता दिशः । विभ्राम्य च महच्छूलं प्रज्वलन्तं निशाचरः ॥ ३३ ॥ स क्रोधात् प्राहिणोत् तस्मै राघवाय महाहवे ।
भावार्थ
उसे देखकर सम्पूर्ण देवता भयसे पीड़ित हो सब दिशाओंमें भाग गये । उस निशाचरने प्रज्वलित होते हुए उस महान् शूलको घुमाकर महात्मा श्रीरघुनाथजीके ऊपर क्रोधपूर्वक चलाया ॥ ३३½ ॥
तमापतन्तं ज्वलितं खरपुत्रकराच्च्युतम् ॥ ३४ ॥ बाणैश्चतुर्भिराकाशे शूलं चिच्छेद राघवः ।
भावार्थ
खरपुत्र मकराक्षके हाथसे छूटे हुए उस प्रज्वलित शूलको अपनी ओर आते देख श्रीरामचन्द्रजीने चार बाण मारकर आकाशमें ही उसको काट डाला ॥ ३४½ ॥
स भिन्नो नैकधा शूलो दिव्यहाटकमण्डितः । व्यशीर्यत महोल्केव रामबाणार्दितो भुवि ॥ ३५ ॥
भावार्थ
दिव्य सुवर्णसे विभूषित वह शूल श्रीरामके बाणोंसे खण्डित हो अनेक टुकड़ोंमें बँट गया और बड़ी भारी उल्काके समान भूतलपर बिखर गया ॥ ३५ ॥
तच्छूलं निहतं दृष्ट्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा । साधु साध्विति भूतानि व्याहरन्ति नभोगताः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा उस शूलको खण्डित हुआ देख आकाशमें स्थित हुए सभी प्राणी उन्हें साधुवाद देने लगे ॥ ३६ ॥
तं दृष्ट्वा निहतं शूलं मकराक्षो निशाचरः । मुष्टिमुद्यम्य काकुत्स्थं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उस शूलके टुकड़े-टुकड़े हुए देख निशाचर मकराक्षने घूसा तानकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘अरे ! खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ ३७ ॥
स तं दृष्ट्वा पतन्तं तु प्रहस्य रघुनन्दनः । पावकास्त्रं ततो रामः संदधे तु शरासने ॥ ३८ ॥
भावार्थ
उसे आक्रमण करते देख श्रीरामचन्द्रजीने हँसकर अपने धनुषपर आग्नेयास्त्रका संधान किया ॥ ३८ ॥
तेनास्त्रेण हतं रक्षः काकुत्स्थेन तदा रणे । संछिन्नहृदयं तत्र पपात च ममार च ॥ ३९ ॥
भावार्थ
और उस अस्त्रके द्वारा उन्होंने रणभूमिमें तत्काल उस राक्षसपर प्रहार किया । बाणके आघातसे राक्षसका हृदय विदीर्ण हो गया; अतः वह गिरा और मर गया ॥ ३९ ॥
दृष्ट्वा ते राक्षसाः सर्वे मकराक्षस्य पातनम् । लङ्कामेव प्रधावन्त रामबाणभयार्दिताः ॥ ४० ॥ दशरथनृपसूनुबाणवेगै रजनिचरं निहतं खरात्मजं तम् । प्रदद्दशुरथ देवताः प्रहृष्टा गिरिमिव वज्रहतं यथाविकीर्णम्॥ ४१ ॥
भावार्थ
मकराक्षका धराशायी होना देख वे सब राक्षस श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंके भयसे व्याकुल हो लङ्कामें ही भाग गये ॥ देवताओंने देखा, जैसे वज्रका मारा हुआ पर्वत बिखर जाता है, उसी प्रकार खरका पुत्र निशाचर मकराक्ष दशरथकुमार श्रीरामचन्द्रजीके बाणोंके वेगसे मार डाला गया । इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४१ ॥
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