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युद्धकाण्ड, सर्ग 80

मकराक्षं हतं श्रुत्वा रावणः समितिंजयः । रोषेण महताविष्टो दन्तान् कटकटाय्य च ॥ १ ॥

भावार्थ

मकराक्षको मारा गया सुनकर समरविजयी रावण महान् रोषसे भरकर दाँत पीसने लगा ॥ १ ॥

कुपितश्च तदा तत्र किं कार्यमिति चिन्तयन् । आदिदेशाथ संक्रुद्धो रणायेन्द्रजितं सुतम् ॥ २ ॥ जहि वीर महाबीर्यौं भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । अदृश्यो दृश्यमानो वा सर्वथा त्वं बलाधिकः ॥ ३ ॥

भावार्थ

कुपित हुआ वह निशाचर उस समय वहाँ इस चिन्तामें पड़ गया कि अब क्या करना चाहिये । उसने अत्यन्त क्रोधसे भरकर अपने पुत्र इन्द्रजित्को युद्धके लिये जानेकी आज्ञा दी॥ वह बोला—‘वीर ! तुम महापराक्रमी राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको छिपकर या प्रत्यक्षरूपसे मार डालो; क्योंकि तुम बलमें सर्वथा बढ़े-चढ़े हो ॥ ३ ॥

त्वमप्रतिमकर्माणमिन्द्रं जयसि संयुगे । किं पुनर्मानुषौ दृष्ट्वा न वधिष्यसि संयुगे ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘जिसके पराक्रमकी कहीं तुलना नहीं है, उस इन्द्रको भी तुम युद्धमें परास्त कर देते हो; फिर उन दो मनुष्योंको रणभूमिमें अपने सामने पाकर क्यों नहीं मार सकोगे ?’ ॥ ४ ॥

तथोक्तो राक्षसेन्द्रेण प्रतिगृह्य पितुर्वचः । यज्ञभूमौ स विधिवत् पावकं जुहुवेन्द्रजित् ॥ ५ ॥

भावार्थ

राक्षसराज रावणके ऐसा कहनेपर इन्द्रजित्ने पिताकी आज्ञा शिरोधार्य की और यज्ञभूमिमें जाकर अग्निकी स्थापना करके उसमें विधिपूर्वक हवन किया ॥ ५ ॥

जुह्वतश्चापि तत्राग्निं रक्तोष्णीषधराः स्त्रियः । आजग्मुस्तत्र सम्भ्रान्ता राक्षस्यो यत्र रावणिः ॥ ६ ॥

भावार्थ

उसके अग्निमें हवन करते समय लाल वस्त्र धारण किये बहुत-सी स्त्रियाँ घबरायी हुई उस स्थानपर आयीं, जहाँ वह रावणपुत्र हवन कर रहा था ॥ ६ ॥

शस्त्राणि शरपत्राणि समिधोऽथ विभीतकाः । लोहितानि च वासांसि स्रुवं कार्ष्णायसं तथा ॥ ७ ॥

भावार्थ

उसके तलवार आदि शस्त्र ही सरपत—कुशास्तरणका काम दे रहे थे, बहेड़ेकी लकड़ी समिधा थी, लाल वस्त्र और लोहेका स्रुवा—ये सब वस्तुएँ उपयोगमें लायी गयी थीं ॥७॥

सर्वतोऽग्निं समास्तीर्य शरपत्रैः सतोमरैः । छागस्य सर्वकृष्णस्य गलं जग्राह जीवतः ॥ ८ ॥

भावार्थ

उसने तोमरसहित शस्त्ररूपी सरपत अग्निके चारों ओर बिछा दिये । उसके बाद काले रंगके जीवित बकरेका गला पकड़कर उसे अग्निमें होम दिया ॥ ८ ॥

सकृद्धोमसमिद्धस्य विधूमस्य महार्चिषः । बभूवुस्तानि लिङ्गानि विजयं दर्शयन्ति च ॥ ९ ॥ प्रदक्षिणावर्तशिखस्तप्तहाटकसंनिभः । हविस्तत् प्रतिजग्राह पावकः स्वयमुत्थितः ॥ १० ॥

भावार्थ

एक ही बार किये गये उस होमसे अग्नि प्रज्वलित हो उठी, उसमें धुआँ नहीं था और बड़ी-बड़ी लपटें उठ रही थीं। उस अग्निमें वे सभी चिह्न प्रकट हुए, जो विजयकी सूचना देते थे॥ उस समय तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् अग्निदेवने स्वयं प्रकट होकर हविष्य ग्रहण किया । उनकी ज्वाला दक्षिणावर्त होकर निकल रही थी ॥ १० ॥

हुत्वाग्निं तर्पयित्वाथ देवदानवराक्षसान् । आरुरोह रथश्रेष्ठमन्तर्धानगतं शुभम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

अग्निमें आहुति दे आभिचारिक यज्ञ-सम्बन्धी देवता, दानव तथा राक्षसोंको तृप्त करनेके पश्चात् इन्द्रजित् अन्तर्धान होनेकी शक्तिसे सम्पन्न सुन्दर रथपर आरूढ़ हुआ ॥ ११ ॥

स वाजिभिश्चतुर्भिस्तु बाणैस्तु निशितैर्युतः । आरोपितमहाचापः शुशुभे स्यन्दनोत्तमः ॥ १२ ॥ जाज्वल्यमानो वपुषा तपनीयपरिच्छदः । मृगैश्चन्द्रार्धचन्द्रैश्च स रथः समलंकृतः ॥ १३ ॥

भावार्थ

चार घोड़ों, पैने बाणों तथा अपने भीतर रखे हुए विशाल धनुषसे युक्त वह उत्तम रथ बड़ी शोभा पा रहा था ॥ उसके सब सामान सोनेके बने हुए थे, अतः वह रथ अपने स्वरूपसे प्रज्वलित-सा जान पड़ता था । उसमें मृग, अर्धचन्द्र और पूर्णचन्द्र अङ्कित किये गये थे, जिनसे उसकी सजावट आकर्षक दिखायी देती थी ॥ १३ ॥

जाम्बूनदमहाकम्बुर्दीप्तपावकसंनिभः । बभूवेन्द्रजितः केतुर्वै दूर्यसमलंकृतः ॥ १४ ॥

भावार्थ

इन्द्रजित्का ध्वज प्रज्वलित अग्निके समान दीप्तिमान् था । उसमें सोनेके बड़े-बड़े कड़े पहनाये गये थे और उसे नीलमसे अलंकृत किया गया था ॥ १४ ॥

तेन चादित्यकल्पेन ब्रह्मास्त्रेण च पालितः । स बभूव दुराधर्षो रावणिः सुमहाबलः ॥ १५ ॥

भावार्थ

उस सूर्यतुल्य तेजस्वी रथ और ब्रह्मास्त्रसे सुरक्षित हुआ वह महाबली रावणकुमार इन्द्रजित् दूसरोंके लिये दुर्जय हो गया था ॥ १५ ॥

सोऽभिनिर्याय नगरादिन्द्रजित् समितिंजयः । हुत्वाग्निं राक्षसैर्मन्त्रैरन्तर्धानगतोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥

भावार्थ

समरविजयी इन्द्रजित् नगरसे निकलकर निरृति-देवता-सम्बन्धी मन्त्रोंसे अग्निमें आहुति दे अन्तर्धानकी शक्तिसे सम्पन्न हो इस प्रकार बोला—॥ १६ ॥

अद्य हत्वा रणे यौ तौ मिथ्या प्रव्रजितौ वने । जयं पित्रे प्रदास्यामि रावणाय रणेऽधिकम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘जो व्यर्थ ही वनमें आये हैं ( अथवा झूठे ही तपस्वीका बाना धारण किये हुए हैं ), उन दोनों भाई राम और लक्ष्मणको आज रणभूमिमें मारकर मैं अपने पिता रावणको उत्कृष्ट जय प्रदान करूँगा ॥ १७ ॥

अद्य निर्वानरामुर्वीं हत्वा रामं च लक्ष्मणम् । करिष्ये परमां प्रीतिमित्युक्त्वान्तरधीयत ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘आज राम और लक्ष्मणको मारकर पृथ्वीको वानरोंसे सूनी करके मैं पिताको परम संतोष दूँगा ।’ ऐसा कहकर वह अदृश्य हो गया ॥ १८ ॥

आपपाताथ संक्रुद्धो दशग्रीवेण चोदितः । तीक्ष्णकार्मुकनाराचैस्तीक्ष्णस्त्विन्द्ररिपू रणे ॥ १९ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् दशमुख रावणसे प्रेरित हो इन्द्रशत्रु इन्द्रजित् कुपित होकर रणभूमिमें आया । उसके हाथमें धनुष और तीखे नाराच थे ॥ १९ ॥

स ददर्श महावीर्यौं नागौ त्रिशिरसाविव । सृजन्ताविषुजालानि वीरौ वानरमध्यगौ ॥ २० ॥

भावार्थ

युद्धस्थलमें आकर उस निशाचरने वानरोंके बीचमें खड़े हो बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए महापराक्रमी वीर श्रीराम और लक्ष्मणको वहाँ ( ऊँचे और मोटे कंधोंसे युक्त, होनेके कारण ) तीन सिरवाले नागोंके समान देखा ॥ २० ॥

इमौ तावीति संचिन्त्य सज्यं कृत्वा च कार्मुकम् । संततानेषुधाराभिः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ २१ ॥ स तु वैहायसरथो युधि तौ रामलक्ष्मणौ । अचक्षुर्विषये तिष्ठन् विव्याध निशितैः शरैः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘ये ही वे दोनों हैं’ ऐसा सोचकर इन्द्रजित्ने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी और जलकी वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति अपनी बाण-धाराओंसे सम्पूर्ण दिशाओंको भर दिया ॥ उसका रथ आकाशमें खड़ा था और श्रीराम तथा लक्ष्मण युद्धभूमिमें विराजमान थे । उन दोनोंकी दृष्टिसे ओझल होकर वह राक्षस उन्हें पैने बाणोंसे बींधने लगा ॥ २२ ॥

तौ तस्य शरवेगेन परीतौ रामलक्ष्मणौ । धनुषी सशरे कृत्वा दिव्यमस्त्रं प्रचक्रतुः ॥ २३ ॥

भावार्थ

उसके बाणोंके वेगसे व्याप्त हुए श्रीराम और लक्ष्मणने भी अपने-अपने धनुषपर बाणोंका संधान करके दिव्य अस्त्र प्रकट किये ॥ २३ ॥

प्रच्छादयन्तौ गगनं शरजालैर्महाबलौ । तमस्त्रैः सूर्यसंकाशैर्नैव पस्पर्शतुः शरैः ॥ २४ ॥

भावार्थ

उन महाबली बन्धुओंने सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणसमूहोंसे आकाशको आच्छादित करके भी इन्द्रजित्का अपने बाणोंसे स्पर्श नहीं किया ॥ २४ ॥

स हि धूमान्धकारं च चक्रे प्रच्छादयन्नभः । दिशश्चान्तर्दधे श्रीमान् नीहारतमसा वृताः ॥ २५ ॥

भावार्थ

उस तेजस्वी राक्षसने मायासे धूमजनित अन्धकारकी सृष्टि की और आकाशको ढक दिया । साथ ही कुहरेका अन्धकार फैलाकर दिशाओंको भी ढक दिया ॥ २५ ॥

नैव ज्यातलनिर्घोषो न च नेमिखुरस्वनः । शुश्रुवे चरतस्तस्य न च रूपं प्रकाशते ॥ २६ ॥

भावार्थ

उसकी प्रत्यञ्चाकी टंकार नहीं सुनायी देती थी । पहियोंकी घर्घराहट तथा घोड़ोंकी टापकी आवाज भी कानोंमें नहीं पड़ती थी और सब ओर विचरते हुए उस राक्षसका रूप भी दृष्टिगोचर नहीं होता था ॥ २६ ॥

घनान्धकारे तिमिरे शिलावर्षमिवाद्भुतम् । स ववर्ष महाबाहुर्नाराचशरवृष्टिभिः ॥ २७ ॥

भावार्थ

महाबाहु इन्द्रजित् उस घने अन्धकारमें जहाँ दृष्टि काम नहीं करती थी, पत्थरोंकी अद्भुत वृष्टिके समान नाराच नामक बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ २७ ॥

स रामं सूर्यसंकाशैः शरैर्दत्तवरैर्भृशम् । विव्याध समरे क्रुद्धः सर्वगात्रेषु रावणिः ॥ २८ ॥

भावार्थ

समराङ्गणमें कुपित हुए उस रावणकुमारने वरदानमें प्राप्त हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंद्वारा श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण अङ्गोंमें घाव कर दिया ॥ २८ ॥

तौ हन्यमानौ नाराचैर्धाराभिरिव पर्वतौ । हेमपुङ्खान् नरव्याघ्रौ तिग्मान् मुमुचतुः शरान् ॥ २९ ॥

भावार्थ

जैसे दो पर्वतोंपर जलकी धाराएँ बरस रही हों, उसी प्रकार उन दोनों नरश्रेष्ठ वीरोंपर नाराचोंकी मार पड़ने लगी । उसी अवस्थामें वे दोनों वीर भी सोनेके पंखोंसे सुशोभित तीखे बाण छोड़ने लगे ॥ २९ ॥

अन्तरिक्षे समासाद्य रावणिं कङ्कपत्रिणः । निकृत्य पतगा भूमौ पेतुस्ते शोणिताप्लुताः ॥ ३० ॥

भावार्थ

वे कङ्कपत्रयुक्त बाण आकाशमें पहुँचकर रावणकुमार इन्द्रजित्को क्षत-विक्षत करके रक्तमें डूबे हुए पृथ्वीपर गिर पड़ते थे ॥ ३० ॥

अतिमात्रं शरौघेण दीप्यमानौ नरोत्तमौ । तानिषून् पततो भल्लैरनेकैर्विचकर्ततुः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

बाणसमूहोंसे अत्यन्त देदीप्यमान वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर अपने ऊपर गिरते हुए सायकोंको अनेक भल्ल मारकर काट गिराते थे ॥ ३१ ॥

यतो हि दद्दशाते तौ शरान् निपतिताञ्छितान् । ततस्तु तौ दाशरथी ससृजातेऽस्त्रमुत्तमम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

जिस ओरसे तीखे बाण आते दिखायी देते, उसी ओर वे दोनों भाई दशरथकुमार श्रीराम और लक्ष्मण अपने उत्तम अस्त्रोंको चलाया करते थे ॥ ३२ ॥

रावणिस्तु दिशः सर्वा रथेनातिरथोऽपतत् । विव्याध तौ दाशरथी लघ्वस्त्रो निशितैः शरैः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

अतिरथी वीर रावणपुत्र इन्द्रजित् अपने रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ लगाता और बड़ी फुर्तीसे अस्त्र चलाता था । उसने अपने पैने बाणोंद्वारा उन दोनों दशरथकुमारोंको घायल कर दिया ॥ ३३ ॥

तेनातिविद्धौ तौ वीरौ रुक्मपुङ्खैः सुसंहतैः । बभूवतुर्दाशरथी पुष्पिताविव किंशुकौ ॥ ३४ ॥

भावार्थ

उसके सोनेके पंखवाले सुदृढ़ सायकोंद्वारा अत्यन्त घायल हुए वे दोनों वीर दशरथकुमार रक्तरञ्जित हो खिले हुए पलाशवृक्षोंके समान प्रतीत होते थे ॥ ३४ ॥

नास्य वेगगतिं कश्चिन्न च रूपं धनुः शरान् । न चास्य विदितं किंचित् सूर्यस्येवाभ्रसम्प्लवे ॥ ३५ ॥

भावार्थ

इन्द्रजित्की वेगपूर्ण गति, रूप, धनुष और बाणोंको कोई देख नहीं पाता था । मेघोंकी घटामें छिपे हुए सूर्यकी भाँति उसकी कोई भी बात किसीको ज्ञात नहीं हो पाती थी ॥ ३५ ॥

तेन विद्धाश्च हरयो निहताश्च गतासवः । बभूवुः शतशस्तत्र पतिता धरणीतले ॥ ३६ ॥

भावार्थ

उसके द्वारा घायल और आहत होकर कितने ही वानर अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे तथा सैकड़ों योद्धा मरकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३६ ॥

लक्ष्मणस्तु ततः क्रुद्धो भ्रातरं वाक्यमब्रवीत् । ब्राह्ममस्त्रं प्रयोक्ष्यामि वधार्थं सर्वरक्षसाम् ॥ ३७ ॥

भावार्थ

तब लक्ष्मणको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने अपने भाईसे कहा—‘आर्य ! अब मैं समस्त राक्षसोंके संहारके लिये ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करूँगा’ ॥ ३७ ॥

तमुवाच ततो रामो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् । नैकस्य हेतो रक्षांसि पृथिव्यां हन्तुमर्हसि ॥ ३८ ॥

भावार्थ

उनकी यह बात सुनकर श्रीरामने शुभलक्षणसम्पन्न लक्ष्मणसे कहा—‘भाई ! एकके कारण भूमण्डलके समस्त राक्षसोंका वध करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है ॥ ३८ ॥

अयुध्यमानं प्रच्छन्नं प्राञ्जलिं शरणागतम् । पलायमानं मत्तं वा न हन्तुं त्वमिहार्हसि ॥ ३९ ॥ तस्यैव तु वधे यत्नं करिष्यामि महाभुज । आदेक्ष्यावो महावेगानस्त्रानाशीविषोपमान् ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! जो युद्ध न करता हो, छिपा हो, हाथ जोड़कर शरणमें आया हो, युद्धसे भाग रहा हो अथवा पागल हो गया हो, ऐसे व्यक्तिको तुम्हें नहीं मारना चाहिये । अब मैं उस इन्द्रजित्के ही वधका प्रयत्न करता हूँ । आओ, हमलोग विषैले सर्पोंकी भाँति भयंकर तथा अत्यन्त वेगशाली अस्त्रोंका प्रयोग करें ॥ ३९-४० ॥

तमेनं मायिनं क्षुद्रमन्तर्हितरथं बलात् । राक्षसं निहनिष्यन्ति दृष्ट्वा वानरयूथपाः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘यह मायावी राक्षस बड़ा नीच है । इसने अन्तर्धान-शक्तिसे अपने रथको छिपा लिया है । यदि यह दीख जाय तो वानरयूथपति इस राक्षसको अवश्य मार डालेंगे ॥ ४१ ॥

यद्येष भूमिं विशते दिवं वा रसातलं वापि नभस्तलं वा । एवं विगूढोऽपि ममास्त्रदग्धः पतिष्यते भूमितले गतासुः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘यदि यह पृथ्वीमें समा जाय, स्वर्गको चला जाय, रसातलमें प्रवेश करे अथवा आकाशमें ही स्थित रहे तथापि इस तरह छिपे होनेपर भी मेरे अस्त्रोंसे दग्ध होकर प्राणशून्य हो भूतलपर अवश्य गिरेगा’ ॥ ४२ ॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं रघुप्रवीरः प्लवगर्षभैर्वृतः । वधाय रौद्रस्य नृशंसकर्मण- स्तदा महात्मा त्वरितं निरीक्षते ॥ ४३ ॥

भावार्थ

इस प्रकार महान् अभिप्रायसे युक्त वचन कहकर वानर शिरोमणियोंसे घिरे हुए रघुकुलके प्रमुख वीर महात्मा श्रीरामचन्द्रजी उस क्रूरकर्मा भयानक राक्षसका वध करनेके लिये तत्काल ही इधर-उधर दृष्टिपात करने लगे ॥ ४३ ॥

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