युद्धकाण्ड, सर्ग 81
विज्ञाय तु मनस्तस्य राघवस्य महात्मनः । स निवृत्याहवात् तस्मात् प्रविवेश पुरं ततः ॥ १ ॥
भावार्थ
महात्मा रघुनाथजीके मनोभावको समझकर इन्द्रजित् युद्धसे निवृत्त हो लङ्कापुरीमें चला गया ॥ १ ॥
सोऽनुस्मृत्य वधं तेषां राक्षसानां तरस्विनाम् । क्रोधताम्रेक्षणः शूरो निर्जगामाथ रावणिः ॥ २ ॥
भावार्थ
वहाँ जानेपर बलवान् राक्षसोंके वधका स्मरण हो अनेसे शूरवीर रावणकुमारकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं । वह पुनः युद्धके लिये निकला ॥ २ ॥
स पश्चिमेन द्वारेण निर्ययौ राक्षसैर्वृतः । इन्द्रजित् सुमहावीर्यः पौलस्त्यो देवकण्टकः ॥ ३ ॥
भावार्थ
पुलस्त्यकुलमें उत्पन्न महापराक्रमी इन्द्रजित् देवताओंके लिये कण्टकरूप था । वह राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर नगरके पश्चिम द्वारसे पुनः बाहर आया ॥ ३ ॥
इन्द्रजित्तु ततो दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । रणायाभ्युद्यतौ वीरौ मायां प्रादुष्करोत् तदा ॥ ४ ॥
भावार्थ
दोनों भाई वीर श्रीराम और लक्ष्मणको युद्धके लिये उद्यत देख इन्द्रजित्ने उस समय माया प्रकट की ॥ ४ ॥
इन्द्रजित्तु रथे स्थाप्य सीतां मायामयीं तदा । बलेन महतावृत्य तस्या वधमरोचयत् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उसने मायामयी सीताका निर्माण करके उसे अपने रथपर बिठा लिया और विशाल सेनाके घेरेमें रखकर उसका वध करनेका विचार किया ॥ ५ ॥
मोहनार्थं तु सर्वेषां बुद्धिं कृत्वा सुदुर्मतिः । हन्तुं सीतां व्यवसितो वानराभिमुखो ययौ ॥ ६ ॥
भावार्थ
उसकी बुद्धि बहुत ही खोटी थी । उसने सबको मोहमें डालनेका विचार करके मायासे बनी हुई सीताको मारनेका निश्चय किया । इसी अभिप्रायसे वह वानरोंके सामने गया ॥ ६ ॥
तं दृष्ट्वा त्वभिनिर्यान्तं सर्वे ते काननौकसः । उत्पेतुरभिसंक्रुद्धाः शिलाहस्ता युयुत्सवः ॥ ७ ॥
भावार्थ
उसे युद्धके लिये निकलते देख सभी वानर क्रोधसे भर गये और हाथमें शिला उठाये युद्धकी इच्छासे उसके ऊपर टूट पड़े ॥ ७ ॥
हनूमान् पुरतस्तेषां जगाम कपिकुञ्जरः । प्रगृह्य सुमहच्छृङ्गं पर्वतस्य दुरासदम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
कपिकुञ्जर हनूमान्जी उन सबके आगे-आगे चले । उन्होंने पर्वतका एक बहुत बड़ा शिखर ले रक्खा था, जिसे उठाना दूसरेके लिये नितान्त कठिन था ॥ ८ ॥
स ददर्श हतानन्दां सीतामिन्द्रजितो रथे । एकवेणीधरां दीनामुपवासकृशाननाम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
उन्होंने इन्द्रजित्के रथपर सीताको देखा । उनकी खुशी मारी गयी थी । वे एक वेणी धारण किये बहुत दुखी दिखायी देती थीं और उपवास करनेके कारण उनका मुख दुबला-पतला हो गया था ॥ ९ ॥
परिक्लिष्टैकवसनाममृजां राघवप्रियाम् । रजोमलाभ्यामालिप्तैः सर्वगात्रैर्वरस्त्रियम् ॥ १० ॥
भावार्थ
उनके शरीरपर एक ही मलिन वस्त्र था । श्रीरघुनाथजीकी प्रिया सीताके अङ्गोंमें उबटन आदि नहीं लगे थे । उनके सारे शरीरमें धूल और मैल भरी थी तो भी वे श्रेष्ठ और सुन्दर दिखायी देती थीं ॥ १० ॥
तां निरीक्ष्य मुहूर्तं तु मैथिलीमध्यवस्य च । बभूवाचिरदृष्टा हि तेन सा जनकात्मजा ॥ ११ ॥
भावार्थ
हनुमान्जी कुछ देरतक उनकी ओर देखते रहे । अन्तमें यह निश्चय किया कि ये मिथिलेशकुमारी ही हैं । उन्होंने जनककिशोरीको थोड़े ही दिन पहले देखा था, इसलिये वे शीघ्र ही उन्हें पहचान सके थे ॥ ११ ॥
अब्रवीत् तां तु शोकार्तां निरानन्दां तपस्विनीम् । दृष्ट्वा रथस्थितां दीनां राक्षसेन्द्रसुतश्रिताम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
राक्षसराजके पुत्र इन्द्रजित्के पास रथपर बैठी हुई तपस्विनी सीता शोकसे पीड़ित, दीन एवं आनन्दशून्य हो रही थीं ॥ १२ ॥
किं समर्थितमस्येति चिन्तयन् स महाकपिः । सह तैर्वानरश्रेष्ठैरभ्यधावत रावणिम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
सीताको वहाँ देखकर महाकपि हनुमान्जी यह सोचने लगे कि आखिर इस राक्षसका अभिप्राय क्या है ? फिर वे मुख्य-मुख्य वानरोंको साथ लेकर रावणपुत्रकी ओर दौड़े ॥ १३ ॥
तद् वानरबलं दृष्ट्वा रावणिः क्रोधमूर्च्छितः । कृत्वा विकोशं निस्त्रिंशं मूर्ध्नि सीतामकर्षयत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
वानरोंकी उस सेनाको अपनी ओर आती देख रावणकुमारके क्रोधकी सीमा न रही । उसने तलवारको म्यानसे बाहर निकाला और सीताके सिरके केश पकड़कर उन्हें घसीटा ॥ १४ ॥
तां स्त्रियं पश्यतां तेषां ताडयामास राक्षसः । क्रोशन्तीं राम रामेति मायया योजितां रथे ॥ १५ ॥
भावार्थ
मायाद्वारा रथपर बैठायी हुई वह स्त्री ‘हा राम, हा राम’ कहकर चिल्ला रही थी और वह राक्षस उन सबके देखते-देखते उस स्त्रीको पीट रहा था ॥ १५ ॥
गृहीतमूर्धजां दृष्ट्वा हनूमान् दैन्यमागतः । दुःखजं वारि नेत्राभ्यामुत्सृजन् मारुतात्मजः ॥ १६ ॥
भावार्थ
सीताका केश पकड़ा गया देख हनुमान्जीको बड़ा दुःख हुआ । वे पवनकुमार हनुमान् अपने नेत्रोंसे दुःखजनित आँसू बहाने लगे ॥ १६ ॥
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं रामस्य महिषीं प्रियाम् । अब्रवीत् परुषं वाक्यं क्रोधाद् रक्षोऽधिपात्मजम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी सर्वाङ्गसुन्दरी प्यारी पटरानी सीताको उस अवस्थामें देख हनुमान्जी कुपित हो उठे और उस राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्से कठोर वाणीमें बोले–॥ १७ ॥
दुरात्मन्नात्मनाशाय केशपक्षे परामृशः । ब्रह्मर्षीणां कुले जातो राक्षसीं योनिमाश्रितः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘दुरात्मन् ! तू अपने विनाशके लिये ही तुला हुआ है, तभी सीताके केशोंका स्पर्श कर रहा है । तेरा जन्म ब्रह्मर्षियोंके कुलमें हुआ है तथापि तूने राक्षस-जातिके स्वभावका ही आश्रय लिया है ॥ १८ ॥
धिक् त्वां पापसमाचारं यस्य ते मतिरीदृशी । नृशंसानार्य दुर्वृत्त क्षुद्र पापपराक्रम । अनार्यस्येदृशं कर्म घृणा ते नास्ति निर्घृण ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘अरे ! तेरी बुद्धि ऐसी बिगड़ी हुई है ? धिक्कार है तुझ-जैसे पापाचारीको । नृशंस ! अनार्य ! दुराचारी तथा पापपूर्ण पराक्रम करनेवाले नीच ! तेरी यह करतूत नीच पुरुषोंके ही योग्य है। निर्दयी ! तेरे हृदयमें तनिक भी दया नहीं है ॥१९॥
च्युता गृहाच्च राज्याच्च रामहस्ताच्च मैथिली । किं तवैषापराद्धा हि यदेनां हंसि निर्दय ॥ २० ॥
भावार्थ
‘बेचारी मिथिलेशकुमारी घरसे, राज्यसे और श्रीरामचन्द्रजीके करकमलोंके आश्रयसे भी बिछुड़ गयी हैं। निष्ठुर ! इन्होंने तेरा क्या अपराध किया है, जो तू इन्हें इतनी निर्दयता-से मार रहा है ? ॥ २० ॥
सीतां हत्वा तु न चिरं जीविष्यसि कथंचन । वधार्हं कर्मणा तेन मम हस्तगतो ह्यसि ॥ २१ ॥ ये च स्त्रीघातिनां लोका लोकवध्यैश्च कुत्सिताः । इह जीवितमुत्सृज्य प्रेत्य तान् प्रति लप्स्यसे ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘सीताको मारकर तू अधिक कालतक किसी तरह जीवित नहीं रह सकेगा । वधके योग्य नीच ! तू अपने पापकर्मके कारण मेरे हाथमें पड़ गया है ( अब तेरा जीना कठिन है )।। ‘लोकमें अपने पापके कारण वधके योग्य माने गये जो चोर आदि हैं, वे भी जिन लोकोंकी निन्दा करते हैं तथा जो स्त्री-हत्यारोंको ही मिलते हैं, तू यहाँ अपने प्राणोंका परित्याग करके उन्हीं नरक-लोकोंमें जायगा’ ॥ २२ ॥
इति ब्रुवाणो हनुमान् सायुधैर्हरिभिर्वृतः । अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो राक्षसेन्द्रसुतं प्रति ॥ २३ ॥
भावार्थ
ऐसी बातें कहते हुए हनुमान्जी अत्यन्त कुपित हो शिला आदि आयुध धारण करनेवाले वानरवीरोंके साथ राक्षसराज-कुमारपर टूट पड़े ॥ २३ ॥
आपतन्तं महावीर्यं तदनीकं वनौकसाम् । रक्षसां भीमकोपानामनीकेन न्यवारयत् ॥ २४ ॥
भावार्थ
वानरोंके उस महापराक्रमी सैन्य-समुदायको आक्रमण करते देख इन्द्रजित्ने भयानक क्रोधवाले राक्षसोंकी सेनाके द्वारा उसे आगे बढ़नेसे रोका ॥ २४ ॥
स तां बाणसहस्रेण विक्षोभ्य हरिवाहिनीम् । हनूमन्तं हरिश्रेष्ठमिन्द्रजित् प्रत्युवाच ह ॥ २५ ॥
भावार्थ
फिर सहस्रों बाणोंद्वारा उस वानरवाहिनीमें हलचल मचाकर इन्द्रजित्ने कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीसे कहा—॥ २५ ॥
सुग्रीवस्त्वं च रामश्च यन्निमित्तमिहागताः । तां वधिष्यामि वैदेहीमद्यैव तव पश्यतः ॥ २६ ॥ इमां हत्वा ततो रामं लक्ष्मणं त्वां च वानर । सुग्रीवं च वधिष्यामि तं चानार्यं विभीषणम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘वानर ! सुग्रीव, राम और तुम सब लोग जिसके लिये यहाँ तक आये हो, उस विदेहकुमारी सीताको मैं अभी तुम्हारे देखते-देखते मार डालूँगा । इसे मारकर मैं क्रमशः राम-लक्ष्मणका, तुम्हारा, सुग्रीवका तथा उस अनार्य विभीषणका भी वध कर डालूँगा ॥ २६-२७ ॥
न हन्तव्याः स्त्रियश्चेति यद् ब्रवीषि प्लवंगम । पीडाकरममित्राणां यच्च कर्तव्यमेव तत् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘बंदर ! तुम जो यह कह रहे थे कि स्त्रियोंको मारना नहीं चाहिये, उसके उत्तरमें मुझे यह कहना है कि जिस कार्यके करनेसे शत्रुओंको अधिक कष्ट पहुँचे, वह कर्तव्य ही माना गया है ॥ २८ ॥
तमेवमुक्त्वा रुदतीं सीतां मायामयीं च ताम् । शितधारेण खड्गेन निजघानेन्द्रजित् स्वयम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीसे ऐसा कहकर इन्द्रजित्ने स्वयं ही तेज धारवाली तलवारसे उस रोती हुई मायामयी सीतापर घातक प्रहार किया ॥ २९ ॥
यज्ञोपवीतमार्गेण छिन्ना तेन तपस्विनी । सा पृथिव्यां पृथुश्रोणी पपात प्रियदर्शना ॥ ३० ॥
भावार्थ
शरीरमें यज्ञोपवीत धारण करनेका जो स्थान है, उसी जगहसे उस मायामयी सीताके दो टुकड़े हो गये और वह स्थूल कटिप्रदेशवाली प्रियदर्शना तपस्विनी पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥३०॥
तामिन्द्रजित् स्त्रियं हत्वा हनूमन्तमुवाच ह । मया रामस्य पश्येमां प्रियां शस्त्रनिषूदिताम् । एषा विशस्ता वैदेही निष्फलो वः परिश्रमः ॥३१॥
भावार्थ
उस स्त्रीका वध करके इन्द्रजित्ने हनुमान्से कहा— ‘देख लो, मैंने रामकी इस प्यारी पत्नीको तलवारसे काट डाला। यह रही कटी हुई विदेह-राजकुमारी सीता । अब तुमलोगोंका युद्धके लिये परिश्रम व्यर्थ है’ ॥ ३१ ॥
ततः खड्गेन महता हत्वा तामिन्द्रजित्स्वयम् । हृष्टः स रथमास्थाय ननाद च महास्वनम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
इस प्रकार स्वयं इन्द्रजित् विशाल खड्गसे उस मायामयी स्त्रीका वध करके रथपर बैठा-बैठा बड़े हर्षके साथ जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा ॥ ३२ ॥
वानराः शुश्रुवुः शब्दमदूरे प्रत्यवस्थिताः । व्यादितास्यस्य नदतस्तद्दुर्गं संश्रितस्य तु ॥ ३३ ॥
भावार्थ
पास ही खड़े हुए वानरोंने उसकी उस गर्जनाको सुना । वह उस दुर्गम रथपर बैठकर मुँह बाये विकट सिंहनाद करता था ॥ ३३ ॥
तथा तु सीतां विनिहत्य दुर्मतिः प्रहृष्टचेताः स बभूव रावणिः । तं हृष्टरूपं समुदीक्ष्य वानरा विषण्णरूपाः समभिप्रदुद्रुवुः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
रावणके उस पुत्रकी बुद्धि बड़ी खोटी थी । उसने इस प्रकार मायामयी सीताका वध करके अपने मनमें बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया । उसे हर्षसे उत्फुल्ल देख वानर विषादग्रस्त हो भाग खड़े हुए ॥ ३४ ॥
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