युद्धकाण्ड, सर्ग 82
श्रुत्वा तु भीमनिर्ह्रादं शक्राशनिसमस्वनम् । वीक्ष्यमाणा दिशः सर्वा दुद्रुवुर्वानरा भृशम् ॥ १ ॥
भावार्थ
इन्द्रके वज्रकी गड़गड़ाहटके समान उस भयंकर सिंहनादको सुनकर वानर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए जोर-जोरसे भागने लगे ॥ १ ॥
तानुवाच ततः सर्वान् हनुमान् मारुतात्मजः । विषण्णवदनान् दीनांस्त्रस्तान् विद्रवतः पृथक् ॥ २ ॥
भावार्थ
उन सबको विषादग्रस्त, दीन एवं भयभीत होकर भागते देख पवनकुमार हनुमान्जीने कहा—॥ २ ॥
कस्माद् विषण्णवदना विद्रवध्वं प्लवंगमाः । त्यक्तयुद्धसमुत्साहाः शूरत्वं क्व नु वो गतम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘वानरो ! तुम क्यों मुखपर विषाद लिये युद्ध-विषयक उत्साह छोड़कर भागे जा रहे हो ? तुम्हारा वह शौर्य कहाँ चला गया ? ॥ ३ ॥
पृष्ठतोऽनुव्रजध्वं मामग्रतो यान्तमाहवे । शूरैरभिजनोपेतैरयुक्तं हि निवर्तितुम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘मैं युद्धमें आगे-आगे चलता हूँ । तुम सब लोग मेरे पीछे आ जाओ । उत्तम कुलमें उत्पन्न शूरवीरोंके लिये युद्धमें पीठ दिखाना सर्वथा अनुचित है’ ॥ ४ ॥
एवमुक्ताः सुसंक्रुद्धा वायुपुत्रेण धीमता । शैलशृङ्गान् द्रुमांश्चैव जगृहुर्हृष्टमानसाः ॥ ५ ॥
भावार्थ
बुद्धिमान् वायुपुत्रके ऐसा कहनेपर वानरोंका चित्त प्रसन्न हो गया और राक्षसोंके प्रति अत्यन्त कुपित हो उन्होंने हाथोंमें पर्वतशिखर और वृक्ष उठा लिये ॥ ५ ॥
अभिपेतुश्च गर्जन्तो राक्षसान् वानरर्षभाः । परिवार्य हनूमन्तमन्वयुश्च महाहवे ॥ ६ ॥
भावार्थ
वे श्रेष्ठ वानरवीर उस महासमरमें हनुमान्जीको चारों ओरसे घेरकर उनके पीछे-पीछे चले और जोर-जोरसे गर्जना करते हुए वहाँ राक्षसोंपर टूट पड़े ॥ ६ ॥
स तैर्वानरमुख्यैस्तु हनुमान् सर्वतो वृतः । हुताशन इवार्चिष्मानदहच्छत्रुवाहिनीम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
उन श्रेष्ठ वानरोंद्वारा सब ओरसे घिरे हुए हनुमान्जी ज्वालामालाओंसे युक्त प्रज्वलित अग्निकी भाँति शत्रु-सेनाको दग्ध करने लगे ॥ ७ ॥
स राक्षसानां कदनं चकार सुमहाकपिः । वृतो वानरसैन्येन कालान्तकयमोपमः ॥ ८ ॥
भावार्थ
वानर-सैनिकोंसे घिरे हुए उन महाकपि हनुमान्जीने प्रलयकालके संहारकारी यमराजके समान राक्षसोंका संहार आरम्भ किया ॥ ८ ॥
स तु शोकेन चाविष्टः कोपेन महता कपिः । हनुमान् रावणिरथे महतीं पातयच्छिलाम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
सीताके वधसे उनके मनमें बड़ा शोक हो रहा था और इन्द्रजित्का अत्याचार देखकर उनका क्रोध भी बहुत बढ़ गया था; इसलिये हनुमान्जीने रावणकुमारके रथपर एक बहुत बड़ी शिला फेंकी ॥ ९ ॥
तामापतन्तीं दृष्ट्वैव रथः सारथिना तदा । विधेयाश्वसमायुक्तः विदूरमपवाहितः ॥ १० ॥
भावार्थ
उसे अपने ऊपर आती देख सारथिने तत्काल ही अपने अधीन रहनेवाले घोड़ोंसे जुते हुए उस रथको बहुत दूर हटा दिया ॥ १० ॥
तमिन्द्रजितमप्राप्य रथस्थं सहसारथिम् । विवेश धरणीं भित्त्वा सा शिला व्यर्थमुद्यता ॥ ११ ॥
भावार्थ
अतः सारथिसहित रथपर बैठे हुए इन्द्रजित्के पासतक न पहुँचकर वह शिला धरती फोड़कर उसके भीतर समा गयी । उसके चलनेका सारा उद्योग व्यर्थ हो गया ॥ ११ ॥
पतितायां शिलायां तु व्यथिता रक्षसां चमूः । निपतन्त्या च शिलया राक्षसा मथिता भृशम् ॥ १२ ॥ तमभ्यधावन्शतशो नदन्तः काननौकसः । ते द्रुमांश्च महाकाया गिरिशृङ्गाणि चोद्यताः ॥ १३ ॥ क्षिपन्तीन्द्रजितं संख्ये वानरा भीमविक्रमाः । वृक्षशैलमहावर्षं विसृजन्तः प्लवंगमाः ॥ १४ ॥ शत्रूणां कदनं चक्रुनेंदुश्च विविधैः स्वनैः ।
भावार्थ
उस शिलाके गिरनेपर उस राक्षस-सेनाको बड़ी पीड़ा हुई । गिरती हुई उस शिलाने बहुतेरे राक्षसोंको कुचल डाला॥ तत्पश्चात् सैकड़ों विशालकाय वानर हाथोंमें वृक्ष एवं पर्वतशिखर उठाये गर्जना करते हुए इन्द्रजित्की ओर दौड़े ॥ वे भयानक पराक्रमी वानर वीर युद्धस्थलमें इन्द्रजित्पर उन वृक्षों और पर्वत-शिखरोंको फेंकने लगे । वृक्षों और शैलशिखरोंकी बड़ी भारी वृष्टि करते हुए वे वानर शत्रुओंका संहार करने और भाँति-भाँतिकी आवाजमें गर्जने लगे ॥१४½॥
वानरैस्तैर्महाभीमैर्घोररूपा निशाचराः ॥ १५ ॥ वीर्यादभिहता वृक्षैर्व्यचेष्टन्त रणक्षितौ । स सैन्यमभिवीक्ष्याथ वानरार्दितमिन्द्रजित् ॥ १६ ॥ प्रगृहीतायुधः क्रुद्धः परानभिमुखो ययौ ।
भावार्थ
उन महाभयंकर वानरोंने वृक्षोंद्वारा घोररूपधारी निशाचरोंको बलपूर्वक मार गिराया । वे रणभूमिमें गिरकर छटपटाने लगे ॥ अपनी सेनाको वानरोंद्वारा पीड़ित हुई देख इन्द्रजित् क्रोधपूर्वक अस्त्र-शस्त्र लिये शत्रुओंके सामने गया ॥ १६½ ॥
स शरौघानवसृजन् स्वसैन्येनाभिसंवृतः ॥ १७ ॥ जघान कपिशार्दूलान् सुबहून् दृढविक्रमः । शूलैरशनिभिः खड्गैः पट्टिशैः शूलमुद्गरैः ॥ १८ ॥ ते चाप्यनुचरांस्तस्य वानरा जघ्नुराहवे । सुस्कन्धविटपैः शैलैः शिलाभिश्च महाबलः ॥ १९ ॥ हनूमान् कदनं चक्रे रक्षसां भीमकर्मणाम् । संनिवार्य परानीकमब्रवीत् तान् वनौकसः ॥ २० ॥ हनूमान् संनिवर्तध्वं न नः साध्यमिदं बलम् ।
भावार्थ
अपनी सेनासे घिरे हुए उस सुदृढ़ पराक्रमी वीर निशाचरने बाण-समूहोंकी वर्षा करते हुए शूल, वज्र, तलवार, पट्टिश तथा मुद्गरोंकी मारसे बहुत-से वानरवीरोंको हताहत कर दिया ॥ वानरोंने भी युद्धस्थलमें इन्द्रजित्के अनुचरोंको मारा । महाबली हनुमान्जी सुन्दर शाखाओं और डालियोंवाले शाल-वृक्षों तथा शिलाओंद्वारा भीमकर्मा राक्षसोंका संहार करने लगे॥ इस तरह शत्रुसेनाका वेग रोककर हनुमान्जीने वानरोंसे कहा--‘बन्धुओ ! अब लौट चलो, अब हमें इस सेनाके संहार करनेकी आवश्यकता नहीं रह गयी है ॥ २०½ ॥
त्यक्त्वा प्राणान् विचेष्टन्तो रामप्रियचिकीर्षवः ॥२१॥ यन्निमित्तं हि युध्यामो हता सा जनकात्मजा ।
भावार्थ
‘हमलोग जिनके लिये श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर प्राणोंका मोह छोड़ पूरी चेष्टाके साथ युद्ध करते थे, वे जनककिशोरी सीता मारी गयीं ॥ २१½ ॥
इममर्थं हि विज्ञाप्य रामं सुग्रीवमेव च ॥ २२ ॥ तौ यत् प्रतिविधास्येते तत् करिष्यामहे वयम् ।
भावार्थ
‘अब इस बातकी सूचना भगवान् श्रीराम और सुग्रीवको दे देनी चाहिये । फिर वे दोनों इसके लिये जैसा प्रतीकार सोचेंगे, वैसा ही हम भी करेंगे’ ॥ २२½ ॥
इत्युक्त्वा वानरश्रेष्ठो वारयन् सर्ववानरान् ॥ २३ ॥ शनैः शनैरसंत्रस्तः सबलः संन्यवर्तत ।
भावार्थ
ऐसा कहकर वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीने सब वानरोंको युद्धसे मना कर दिया और धीरे-धीरे सारी सेनाके साथ निर्भय होकर लौट आये ॥ २३½ ॥
ततः प्रेक्ष्य हनूमन्तं व्रजन्तं यत्र राघवः ॥ २४ ॥ स होतुकामो दुरात्मा गतश्चैत्यं निकुम्भिलाम् । निकुम्भिलामधिष्ठाय पावकं जुहवेन्द्रजित् ॥ २५ ॥ यज्ञभूम्यां ततो गत्वा पावकस्तेन रक्षसा । हूयमानः प्रजज्वाल होमशोणितभुक् तदा ॥ २६ ॥ सार्चिःपिनद्धो दद्दशे होमशोणिततर्पितः । संध्यागत इवादित्यः सुतीव्रोऽग्निः समुत्थितः ॥ २७ ॥
भावार्थ
हनुमान्जीको श्रीरामचन्द्रजीके पास जाते देख दुरात्मा इन्द्रजित् होम करनेकी इच्छासे निकुम्भिलादेवीके मन्दिरमें गया॥ निकुम्भिला-मन्दिरमें जाकर उस निशाचर इन्द्रजित्ने अग्निमें आहुति दी । तदनन्तर यज्ञभूमिमें भी जाकर उस राक्षसने अग्निदेवको होमके द्वारा तृप्त किया । वे होमशोणित-भोजी आभिचारिक अग्निदेवता आहुति पाते ही होम और शोणितसे तृप्त हो प्रज्वलित हो उठे और ज्वालाओंसे आवृत दिखायी देने लगे । वे तीव्र तेजवाले अग्निदेवता संध्याकालके सूर्यकी भाँति प्रकट हुए थे ॥ २५-२७ ॥
अथेन्द्रजिद् राक्षसभूतये तु जुहाव हव्यं विधिना विधानवित् । दृष्ट्वा व्यतिष्ठन्त च राक्षसास्ते महासमूहेषु नयानयज्ञाः ॥ २८ ॥
भावार्थ
इन्द्रजित् यज्ञके विधानका ज्ञाता था । उसने समस्त राक्षसोंके अभ्युदयके लिये विधिपूर्वक हवन करना आरम्भ किया। उस होमको देखकर महायुद्धके अवसरोंपर नीति-अनीति-कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञाता राक्षस खड़े हो गये ॥ २८ ॥
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