युद्धकाण्ड, सर्ग 78
निकुम्भं निहतं श्रुत्वा कुम्भं च विनिपातितम् । रावणः परमामर्षी प्रजज्वालानलो यथा ॥ १ ॥
भावार्थ
निकुम्भ और कुम्भको मारा गया सुनकर रावणको बड़ा क्रोध हुआ । वह आगके समान जल उठा ॥ १ ॥
नैर्ऋतः क्रोधशोकाभ्यां द्वाभ्यां तु परिमूर्च्छितः । खरपुत्रं विशालाक्षं मकराक्षमचोदयत् ॥ २ ॥
भावार्थ
रावणने क्रोध और शोक दोनोंसे व्याकुल हो विशाल नेत्रोंवाले खरपुत्र मकराक्षसे कहा—॥ २ ॥
गच्छ पुत्र मयाऽऽज्ञप्तो बलेनाभिसमन्वितः । राघवं लक्ष्मणं चैव जहि तौ सवनौकसौ ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! मेरी आज्ञासे विशाल सेनाके साथ जाओ और बंदरोंसहित उन दोनों भाई राम तथा लक्ष्मणको मार डालो’ ॥ ३ ॥
रावणस्य वचः श्रुत्वा शूरमानी खरात्मजः । बाढमित्यब्रवीद्धृष्टो मकराक्षो निशाचरम् ॥ ४ ॥ सोऽभिवाद्य दशग्रीवं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । निर्जगाम गृहाच्छुभ्राद् रावणस्याज्ञया बली ॥ ५ ॥
भावार्थ
रावणकी यह बात सुनकर अपनेको शूरवीर माननेवाले खरपुत्र मकराक्षने हर्षपूर्वक कहा—‘बहुत अच्छा’ । फिर उस बली वीरने निशाचरराज रावणको प्रणाम करके उसकी परिक्रमा की और उसकी आज्ञा लेकर वह उज्ज्वल राजभवनसे बाहर निकला ॥ ४-५ ॥
समीपस्थं बलाध्यक्षं खरपुत्रोऽब्रवीद् वचः । रथमानीयतां तूर्णं सैन्यं त्वानीयतां त्वरात् ॥ ६ ॥
भावार्थ
पास ही सेनाध्यक्ष खड़ा था । खरके पुत्रने उससे कहा— ‘सेनापते ! शीघ्र रथ ले आओ और तुरंत ही सेनाको भी बुलवाओ’ ॥ ६ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा बलाध्यक्षो निशाचरः । स्यन्दनं च बलं चैव समीपं प्रत्यपादयत् ॥ ७ ॥
भावार्थ
मकराक्षकी यह बात सुनकर निशाचर सेनापतिने रथ और सेना उसके पास लाकर खड़ी कर दी ॥ ७ ॥
प्रदक्षिणं रथं कृत्वा समारुह्य निशाचरः । सूतं संचोदयामास शीघ्रं वै रथमावह ॥ ८ ॥
भावार्थ
तब मकराक्षने रथकी प्रदक्षिणा की और उसपर आरूढ़ होकर सारथिको आदेश दिया—‘रथको शीघ्रतापूर्वक ले चलो’ ॥ ८ ॥
अथ तान् राक्षसान् सर्वान् मकराक्षोऽब्रवीदिदम् । यूयं सर्वे प्रयुध्यध्वं पुरस्तान्मम राक्षसाः ॥ ९ ॥
भावार्थ
इसके बाद मकराक्षने समस्त राक्षसोंसे कहा—‘निशाचरो ! तुमलोग मेरे आगे रहकर युद्ध करो ॥ ९ ॥
अहं राक्षसराजेन रावणेन महात्मना । आज्ञप्तः समरे हन्तुं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मुझे महामना राक्षसराज रावणने समरभूमिमें राम और लक्ष्मण दोनों भाइयोंको मारनेकी आज्ञा दी है ॥ १० ॥
अद्य रामं वधिष्यामि लक्ष्मणं च निशाचराः । शाखामृगं च सुग्रीवं वानरांश्च शरोत्तमैः ॥ ११ ॥ अद्य शूलनिपातैश्च वानराणां महाचमूम् । प्रदहिष्यामि सम्प्राप्तां शुष्केन्धनमिवानलः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘राक्षसो ! आज मैं राम, लक्ष्मण, वानरराज सुग्रीव तथा दूसरे-दूसरे वानरोंका अपने उत्तम बाणोंद्वारा वध करूँगा ॥ ‘जैसे आग सूखी लकड़ीको जला देती है, उसी प्रकार आज मैं शूलोंकी मारसे सामने आयी हुई वानरोंकी विशाल वाहिनीको दग्ध कर डालूँगा’ ॥ १२ ॥
मकराक्षस्य तच्छ्रुत्वा वचनं ते निशाचराः । सर्वे नानायुधोपेता बलवन्तः समाहिताः ॥ १३ ॥
भावार्थ
मकराक्षका यह वचन सुनकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न वे समस्त बलवान् निशाचर युद्धके लिये सावधान हो गये ॥ १३ ॥
ते कामरूपिणः क्रूरा दंष्ट्रिणः पिङ्गलेक्षणाः । मातंगा इव नर्दन्तो ध्वस्तकेशा भयावहाः ॥ १४ ॥ परिवार्य महाकाया महाकायं खरात्मजम् । अभिजग्मुस्ततो हृष्टाश्चालयन्तो वसुन्धराम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
वे सब-के-सब इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और क्रूर स्वभावके थे । उनकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और आँखें भूरी थीं । उनके केश सब ओर बिखरे हुए थे; इसलिये वे बड़े भयानक जान पड़ते थे । हाथीके समान चिग्घाड़ते हुए वे विशालकाय निशाचर खरके पुत्र महाकाय मकराक्षको चारों ओरसे घेरकर पृथ्वीको कँपाते हुए बड़े हर्षके साथ युद्धभूमिकी ओर चले ॥ १४-१५ ॥
शङ्खभेरीसहस्राणामाहतानां समन्ततः । क्ष्वेलितास्फोटितानां च तत्र शब्दो महानभूत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
उस समय चारों ओर सहस्रों शङ्खोंकी ध्वनि हो रही थी । हजारों डंके पीटे जाते थे । योद्धाओंके गर्जने और ताल ठोंकनेकी आवाज भी उनके साथ मिली हुई थी । इस प्रकार वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया था ॥ १६ ॥
प्रभ्रष्टोऽथ करात् तस्य प्रतोदः सारथेस्तदा । पपात सहसा दैवाद् ध्वजस्तस्य तु रक्षसः ॥ १७ ॥
भावार्थ
उस समय मकराक्षके सारथिके हाथसे चाबुक छूटकर नीचे गिर पड़ा और दैववश उस राक्षसका ध्वज भी सहसा धराशायी हो गया ॥ १७ ॥
तस्य ते रथसंयुक्ता हया विक्रमवर्जिताः । चरणैराकुलैर्गत्वा दीनाः साम्रमुखा ययुः ॥ १८ ॥
भावार्थ
उसके रथमें जुते हुए घोड़े विक्रमरहित हो गये—वे अपनी नाना प्रकारकी विचित्र चालें भूल गये । पहले तो कुछ दूरतक आकुल—लड़खड़ाते हुए पैरोंसे गये; फिर ठीकसे चलने लगे । परंतु भीतरसे वे बहुत दुखी थे । उनके मुखपर आँसूकी धारा बह रही थी ॥ १८ ॥
प्रवाति पवनस्तस्मिन् सपांसुः खरदारुणः । निर्याणे तस्य रौद्रस्य मकराक्षस्य दुर्मतेः ॥ १९ ॥
भावार्थ
दुष्ट बुद्धिवाले उस भयंकर राक्षस मकराक्षकी यात्राके समय धूलसे भरी हुई दारुण एवं प्रचण्ड वायु चलने लगी थी ॥ १९ ॥
तानि दृष्ट्वा निमित्तानि राक्षसा वीर्यवत्तमाः । अचिन्त्य निर्गताः सर्वे यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥ २० ॥
भावार्थ
उन सब अपशकुनोंको देखकर भी वे महाबलशाली राक्षस उनकी कोई परवा न करके सब-के-सब उस स्थानपर गये, जहाँ श्रीराम और लक्ष्मण विद्यमान थे ॥ २० ॥
घनगजमहिषाङ्गतुल्यवर्णाः समरमुखेष्वसकृद्दृदासिभिन्नाः । अहमहमिति युद्धकौशलास्ते रजनिचराः परिबभ्रमुर्मुहुस्ते ॥ २१ ॥
भावार्थ
उन राक्षसोंकी अङ्गकान्ति मेघ, हाथी और भैंसोंके समान काली थी । वे युद्धके मुहानेपर अनेक बार गदाओं और तलवारोंकी चोटसे घायल हो चुके थे । उनमें युद्धविषयक कौशल विद्यमान था । वे निशाचर ‘पहले मैं युद्ध करूँगा, पहले मैं युद्ध करूँगा’ ऐसा बारंबार कहते हुए वहाँ सब ओर चक्कर लगाने लगे ॥ २१ ॥
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