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युद्धकाण्ड, सर्ग 77

निकुम्भो भ्रातरं दृष्ट्वा सुग्रीवेण निपातितम् । प्रदहन्निव कोपेन वानरेन्द्रमुदैक्षत ॥ १ ॥

भावार्थ

सुग्रीवके द्वारा अपने भाई कुम्भको मारा गया देख निकुम्भने वानरराजकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें अपने क्रोधसे दग्ध कर देगा ॥ १ ॥

ततः स्रग्दामसंनद्धं दत्तपञ्चाङ्गुलं शुभम् । आददे परिघं धीरो महेन्द्रशिखरोपमम् ॥ २ ॥

भावार्थ

उस धीर-वीरने महेन्द्र पर्वतके शिखर-जैसा एक सुन्दर एवं विशाल परिघ हाथमें लिया, जो फूलोंकी लड़ियोंसे अलंकृत था और जिसमें पाँच-पाँच अंगुलके चौड़े लोहेके पत्र जड़े गये थे ॥ २ ॥

हेमपट्टपरिक्षिप्तं वज्रविद्रुमभूषितम् । यमदण्डोपमं भीमं रक्षसां भयनाशनम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

उस परिघमें सोनेके पत्र भी जड़े थे और उसे हीरे तथा मूँगोंसे भी विभूषित किया गया था। वह परिघ यमदण्डके समान भयंकर तथा राक्षसोंके भयका नाश करनेवाला था ॥ ३ ॥

तमाविध्य महातेजाः शक्रध्वजसमौजसम् । निननाद विवृत्तास्यो निकुम्भो भीमविक्रमः ॥ ४ ॥

भावार्थ

उस इन्द्रध्वजके समान तेजस्वी परिघको घुमाता हुआ वह महातेजस्वी भयानक पराक्रमी राक्षस निकुम्भ मुँह फैलाकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ४ ॥

उरोगतेन निष्केण भुजस्थैरङ्गदैरपि । कुण्डलाभ्यां च चित्राभ्यां मालया च सचित्रया ॥ ५ ॥ निकुम्भो भूषणैर्भाति तेन स्म परिघेण च । यथेन्द्रधनुषा मेघः सविद्युत्स्तनयित्नुमान् ॥ ६ ॥

भावार्थ

उसके वक्षःस्थलमें सोनेका पदक था । भुजाओंमें बाजूबंद शोभा देते थे । कानोंमें विचित्र कुण्डल झलमला रहे थे और गलेमें विचित्र माला जगमगा रही थी । इन सब आभूषणोंसे और उस परिघसे भी निकुम्भकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे विद्युत् और गर्जनासे युक्त मेघ इन्द्र-धनुषसे सुशोभित होता है ॥ ५-६ ॥

परिघाग्रेण पुस्फोट वातग्रन्थिर्महात्मनः । प्रजज्वाल सघोषश्च विधूम इव पावकः ॥ ७ ॥

भावार्थ

उस महाकाय राक्षसके परिघके अग्रभागसे टकराकर प्रवह-आवह आदि सात महावायुओंकी संधि टूट-फूट गयी तथा वह भारी गड़गड़ाहटके साथ धूमरहित अग्निकी भाँति प्रज्वलित हो उठा ॥ ७ ॥

नगर्या विटपावत्या गन्धर्वभवनोत्तमैः । सतारागणनक्षत्रं सचन्द्रसमहाग्रहम् । निकुम्भपरिघाघूर्णं भ्रमतीव नभस्थलम् ॥ ८ ॥ दुरासदश्च संजज्ञे परिघाभरणप्रभः । क्रोधेन्धनो निकुम्भाग्निर्युगान्ताग्निरिवोत्थितः ॥ ९ ॥

भावार्थ

निकुम्भके परिघ घुमानेसे विटपावती नगरी (अलकापुरी), गन्धर्वोंके उत्तम भवन, तारे, नक्षत्र, चन्द्रमा तथा बड़े-बड़े ग्रहोंके साथ समस्त आकाशमण्डल घूमता-सा प्रतीत होता था ॥ परिघ और आभूषण ही जिसकी प्रभा थे, क्रोध ही जिसके लिये ईंधनका काम कर रहा था, वह निकुम्भ नामक अग्नि प्रलयकालकी आगके समान उठी और अत्यन्त दुर्जय हो गयी ॥ ९ ॥

राक्षसा वानराश्चापि न शेकुः स्पन्दितुं भयात् । हनुमांस्तु विवृत्योरस्तस्थौ प्रमुखतो बली ॥ १० ॥

भावार्थ

उस समय राक्षस और वानर भयके मारे हिल-डुल भी न सके । केवल महाबली हनुमान् अपनी छाती खोलकर उस राक्षसके सामने खड़े हो गये ॥ १० ॥

परिघोपमबाहुस्तु परिघं भास्करप्रभम् । बली बलवतस्तस्य पातयामास वक्षसि ॥ ११ ॥

भावार्थ

निकुम्भकी भुजाएँ परिघके समान थीं । उस महाबली राक्षसने उस सूर्यतुल्य तेजस्वी परिघको बलवान् वीर हनुमान्जीकी छातीपर दे मारा ॥ ११ ॥

स्थिरे तस्योरसि व्यूढे परिघः शतधा कृतः । विकीर्यमाणः सहसा उल्काशतमिवाम्बरे ॥ १२ ॥

भावार्थ

हनुमान्जीकी छाती बड़ी सुदृढ़ और विशाल थी । उससे टकराते ही उस परिघके सहसा सैकड़ों टुकड़े होकर बिखर गये, मानो आकाशमें सौ-सौ उल्काएँ एक साथ गिरी हों ॥ १२ ॥

स तु तेन प्रहारेण न चचाल महाकपिः । परिघेण समाधूतो यथा भूमिचलेऽचलः ॥ १३ ॥

भावार्थ

महाकपि हनुमान्जी परिघसे आहत होनेपर भी उस प्रहारसे विचलित नहीं हुए, जैसे भूकम्प होनेपर भी पर्वत नहीं गिरता है ॥ १३ ॥

स तथाभिहतस्तेन हनूमान् प्लवगोत्तमः । मुष्टिं संवर्तयामास बलेनातिमहाबलः ॥ १४ ॥

भावार्थ

अत्यन्त महान् बलशाली वानरशिरोमणि हनुमान्जीने इस प्रकार परिघकी मार खाकर बलपूर्वक अपनी मुट्ठी बाँधी ॥१४॥

तमुद्यम्य महातेजा निकुम्भोरसि वीर्यवान् । अभिचिक्षेप वेगेन वेगवान् वायुविक्रमः ॥ १५ ॥

भावार्थ

वे महान् तेजस्वी, पराक्रमी, वेगवान् और वायुके समान बल-विक्रमसे सम्पन्न थे । उन्होंने मुक्का तानकर बड़े वेगसे निकुम्भकी छातीपर मारा ॥ १५ ॥

तत्र पुस्फोट वर्मास्य प्रसुस्राव च शोणितम् । मुष्टिना तेन संजज्ञे मेघे विद्युदिवोत्थिता ॥ १६ ॥

भावार्थ

उस मुक्केकी चोटसे वहाँ उसका कवच फट गया और छातीसे रक्त बहने लगा; मानो मेघमें बिजली चमक उठी हो ॥ १६ ॥

स तु तेन प्रहारेण निकुम्भो विचचाल च । स्वस्थश्चापि निजग्राह हनूमन्तं महाबलम् ॥ १७ ॥ चुकुशुश्च तदा संख्ये भीमं लङ्कानिवासिनः । निकुम्भेनोद्यतं दृष्ट्वा हनूमन्तं महाबलम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

उस प्रहारसे निकुम्भ विचलित हो उठा; फिर थोड़ी ही देरमें सँभलकर उसने महाबली हनुमान्जीको पकड़ लिया ॥ उस समय युद्धस्थलमें निकुम्भके द्वारा महाबली हनुमान्जीका अपहरण होता देख लङ्कानिवासी राक्षस भयानक स्वरमें विजयसूचक गर्जना करने लगे ॥ १८ ॥

स तथा ह्रियमाणोऽपि हनूमांस्तेन रक्षसा । आजघानानिलसुतो वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ १९ ॥

भावार्थ

उस राक्षसके द्वारा इस प्रकार अपहृत होनेपर भी पवनपुत्र हनुमान्जीने अपने वज्रतुल्य मुक्केसे उसपर प्रहार किया ॥१९॥

आत्मानं मोक्षयित्वाथ क्षितावभ्यवपद्यत । हनूमानुन्ममाथाशु निकुम्भं मारुतात्मजः ॥ २० ॥

भावार्थ

फिर वे अपनेको उसके चंगुलसे छुड़ाकर पृथ्वीपर खड़े हो गये । तदनन्तर वायुपुत्र हनुमान्ने तत्काल ही निकुम्भको पृथ्वीपर दे मारा ॥ २० ॥

निक्षिप्य परमायत्तो निकुम्भं निष्पिपेष च । उत्पत्य चास्य वेगेन पपातोरसि वेगवान् ॥ २१ ॥ परिगृह्य च बाहुभ्यां परिवृत्य शिरोधराम् । उत्पाटयामास शिरो भैरवं नदतो महत् ॥ २२ ॥

भावार्थ

इसके बाद उन वेगशाली वीरने बड़े प्रयाससे निकुम्भको पृथ्वीपर गिराया और खूब रगड़ा । फिर वेगसे उछलकर वे उसकी छातीपर चढ़ बैठे और दोनों हाथोंसे गला मरोड़कर उन्होंने उसके मस्तकको उखाड़ लिया । गला मरोड़ते समय वह राक्षस भयंकर आर्तनाद कर रहा था ॥ २१-२२ ॥

अथ निनदति सादिते निकुम्भे पवनसुतेन रणे बभूव युद्धम् । दशरथसुतराक्षसेन्द्रसूनो- र्भृशतरमागतरोषयोः सुभीमम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

रणभूमिमें वायुपुत्र हनुमान्जीके द्वारा गर्जना करनेवाले निकुम्भके मारे जानेपर एक दूसरेपर अत्यन्त कुपित हुए श्रीराम और मकराक्षमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ ॥ २३ ॥

व्यपेते तु जीवे निकुम्भस्य हृष्टा विनेदुः प्लवंगा दिशः सस्वनुश्च । चचालेव चोर्वी पपातेव सा द्यौ- र्बलं राक्षसानां भयं चाविवेश ॥ २४ ॥

भावार्थ

निकुम्भके प्राणत्याग करनेपर सभी वानर बड़े हर्षके साथ गर्जने लगे । सम्पूर्ण दिशाएँ कोलाहलसे भर गयीं । पृथ्वी चलती-सी जान पड़ी, आकाश मानो फट पड़ा हो, ऐसा प्रतीत होने लगा तथा राक्षसोंकी सेनामें भय समा गया ॥ २४ ॥

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