युद्धकाण्ड, सर्ग 76
प्रवृत्ते संकुले तस्मिन् घोरे वीरजनक्षये । अङ्गदः कम्पनं वीरमाससाद रणोत्सुकः ॥ १ ॥
भावार्थ
जब वीरजनोंका विनाश करनेवाला वह घोर घमासान युद्ध चल रहा था, उस समय अङ्गद संग्रामके लिये उत्सुक होकर वीर कम्पनका सामना करनेके लिये आये ॥ १ ॥
आहूय सोऽङ्गदं कोपात् ताडयामास वेगितः । गदया कम्पनः पूर्वं स चचाल भृशाहतः ॥ २ ॥
भावार्थ
कम्पनने अङ्गदको क्रोधपूर्वक ललकारकर बड़े वेगसे उनके ऊपर पहले गदाका प्रहार किया । इससे उनको बड़ी चोट पहुँची और वे काँपकर बेहोश हो गये ॥ २ ॥
स संज्ञां प्राप्य तेजस्वी चिक्षेप शिखरं गिरेः । अर्दितश्च प्रहारेण कम्पनः पतितो भुवि ॥ ३ ॥ ततस्तु कम्पनं दृष्ट्वा शोणिताक्षो हतं रणे । रथेनाभ्यपतत् क्षिप्रं तत्राङ्गदमभीतवत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
फिर चेत होनेपर तेजस्वी वीर अंगदने एक पर्वतका शिखर उठाकर उस राक्षसपर दे मारा । उस प्रहारसे पीड़ित हो कम्पन पृथ्वीपर गिर पड़ा—उसके प्राण-पखेरू उड़ गये ॥ कम्पनको युद्धमें मारा गया देख शोणिताक्षने रथपर बैठकर तुरंत ही निर्भय हो अङ्गदपर धावा किया ॥ ४ ॥
सोऽङ्गदं निशितैर्बाणैस्तदा विव्याध वेगितः । शरीरदारणैस्तीक्ष्णैः कालाग्निसमविग्रहैः ॥ ५ ॥
भावार्थ
उसने शरीरको विदीर्ण करनेमें समर्थ और कालाग्निके समान आकारवाले तीखे तथा पैने बाणोंद्वारा बड़े वेगसे उस समय अङ्गदको चोट पहुँचायी ॥ ५ ॥
क्षुरक्षुरप्रनाराचैर्वत्सदन्तैः शिलीमुखैः । कर्णिशल्यविपाठैश्च बहुभिर्निशितैः शरैः ॥ ६ ॥ अङ्गदः प्रतिविद्धाङ्गो वालिपुत्रः प्रतापवान् । धनुरुग्रं रथं बाणान् ममर्द तरसा बली ॥ ७ ॥
भावार्थ
उसके चलाये हुए क्षुर१, क्षुरप्र२, नाराच३, वत्सदन्त४, शिलीमुख५, कर्णी६, शल्य७ और विपाठ८ नामक बहुसंख्यक तीखे बाणोंसे जब प्रतापी वालिपुत्र अङ्गदके सारे अङ्ग बिंध गये, तब उन बलवान् वीरने बड़े वेगसे उस राक्षसके भयंकर धनुष, रथ और बाणोंको कुचल डाला ॥ ६-७ ॥
शोणिताक्षस्ततः क्षिप्रमसिचर्म समाददे । उत्पपात तदा क्रुद्धो वेगवानविचारयन् ॥ ८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वेगवान् निशाचर शोणिताक्षने कुपित हो तत्काल ही ढाल और तलवार हाथमें ले ली तथा वह बिना सोचे-विचारे रथसे कूद पड़ा ॥ ८ ॥
तं क्षिप्रतरमाप्लुत्य परामृश्याङ्गदो बली । करेण तस्य तं खड्गं समाच्छिद्य ननाद च ॥ ९ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें बलवान् अङ्गदने शीघ्रतापूर्वक उछलकर उसे पकड़ लिया और अपने हाथसे उसकी उस तलवारको छीनकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ९ ॥
तस्यांसफलके खड्गं निजघान ततोऽङ्गदः । यज्ञोपवीतवच्चैनं चिच्छेद कपिकुञ्जरः ॥ १० ॥
भावार्थ
फिर कपिकुञ्जर अङ्गदने उसके कंधेपर तलवारका वार किया और उसके शरीरको इस तरह चीर दिया मानो उसने यज्ञोपवीत पहन रखा हो ॥ १० ॥
तं प्रगृह्य महाखड्गं विनद्य च पुनः पुनः । वालिपुत्रोऽभिदुद्राव रणशीर्षे परानरीन् ॥ ११ ॥
भावार्थ
इसके बाद वालिपुत्रने उस विशाल खड्गको लेकर बारंबार गर्जना करते हुए युद्धके मुहानेपर दूसरे शत्रुओंपर धावा किया ॥ ११ ॥
प्रजङ्घसहितो वीरो यूपाक्षस्तु ततो बली । रथेनाभिययौ क्रुद्धो वालिपुत्रं महाबलम् ॥ १२ ॥ आयसीं तु गदां गृह्य स वीरः कनकाङ्गदः । शोणिताक्षः समाश्वस्य तमेवानुपपात ह ॥ १३ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें प्रजङ्घको साथ लिये बलवान् वीर यूपाक्षने कुपित हो रथके द्वारा महाबली वालिपुत्रपर आक्रमण किया ॥ इसी बीचमें सोनेके बाजूबंद पहने वीर शोणिताक्षने अपनेको सँभालकर लोहेकी गदा उठायी और अङ्गदका ही पीछा किया ॥ १३ ॥
प्रजङ्घस्तु महावीरो यूपाक्षसहितो बली । गदयाभियर्यौ क्रुद्धो वालिपुत्रं महाबलम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
फिर यूपाक्षसहित बलवान् महावीर प्रजङ्घ कुपित हो महाबली वालिपुत्रपर गदा लेकर चढ़ आया ॥ १४ ॥
तयोर्मध्ये कपिश्रेष्ठः शोणिताक्षप्रजङ्घयोः । विशाखयोर्मध्यगतः पूर्णचन्द्र इवाबभौ ॥ १५ ॥
भावार्थ
शोणिताक्ष और प्रजङ्घ दोनों राक्षसोंके बीचमें कपिश्रेष्ठ अङ्गद वैसी ही शोभा पा रहे थे, जैसे दोनों विशाखा नक्षत्रोंके बीचमें पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होते हैं ॥ १५ ॥
अङ्गदं परिरक्षन्तौ मैन्दो द्विविद एव च । तस्य तस्थतुरभ्याशे परस्परदिदृक्षया ॥ १६ ॥
भावार्थ
उस समय मैन्द और द्विविद अङ्गदकी रक्षा करनेके लिये उनके निकट आकर खड़े हो गये । वे दोनों अपने-अपने योग्य विपक्षी योद्धाकी तलाश भी कर रहे थे ॥ १६ ॥
अभिपेतुर्महाकायाः प्रतियत्ता महाबलाः । राक्षसा वानरान् रोषादसिबाणगदाधराः ॥ १७ ॥ त्रयाणां वानरेन्द्राणां त्रिभी राक्षसपुंगवैः । संसक्तानां महद् युद्धमभवद् रोमहर्षणम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें तलवार, बाण और गदा धारण किये बहुत-से महाबली विशालकाय राक्षस रोषपूर्वक वानरोंपर टूट पड़े ॥ ये तीन वान-रसेनापति उन तीन प्रमुख राक्षसोंके साथ उलझे हुए थे । उस समय उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला महान् युद्ध छिड़ गया ॥ १८ ॥
ते तु वृक्षान् समादाय सम्प्रचिक्षिपुराहवे । खड्गेन प्रतिचिक्षेप तान् प्रजङ्घो महाबलः ॥ १९ ॥
भावार्थ
उन तीनों वानरोंने रणभूमिमें वृक्ष ले-लेकर युद्धमें निशाचरोंपर चलाये, परंतु महाबली प्रजङ्घने अपनी तलवारसे उन सब वृक्षोंको काट गिराया ॥ १९ ॥
रथानश्वान् द्रुमाञ्छैलान् प्रतिचिक्षिपुराहवे । शरौघैः प्रतिचिच्छेद तान् यूपाक्षो महाबलः ॥ २० ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उन्होंने रणभूमिमें उन राक्षसोंके रथों और घोड़ोंपर वृक्ष तथा पर्वतशिखर चलाये; परंतु महाबली यूपाक्षने अपने बाणसमूहोंसे उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ २० ॥
सृद्यान् द्विविदमैन्दाभ्यां द्रुमानुत्पाट्य वीर्यवान् । बभञ्ज गदया मध्ये शोणिताक्षः प्रतापवान् ॥ २१ ॥
भावार्थ
मैन्द और द्विविदने जिन-जिन वृक्षोंको उखाड़-उखाड़कर उन राक्षसोंपर चलाया था, उन सबको बल-विक्रमशाली और प्रतापी शोणिताक्षने गदा मारकर बीचमें ही तोड़ डाला ॥२१॥
उद्यम्य विपुलं खड्गं परमर्मविदारणम् । प्रजङ्घो वालिपुत्राय अभिदुद्राव वेगितः ॥ २२ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् प्रजङ्घने शत्रुओंके मर्मको विदीर्ण करनेवाली एक बहुत बड़ी तलवार उठाकर वालिपुत्र अङ्गदपर वेगपूर्वक आक्रमण किया ॥ २२ ॥
तमभ्याशगतं दृष्ट्वा वानरेन्द्रो महाबलः । आजघानाश्वकर्णेन द्रुमेणातिबलस्तदा ॥ २३ ॥ बाहुं चास्य सनिस्त्रिंशमाजघान स मुष्टिना । वालिपुत्रस्य घातेन स पपात क्षितावसिः ॥ २४ ॥
भावार्थ
उसे निकट आया देख अतिशय शक्तिशाली महाबली वानरराज अङ्गदने अश्वकर्ण नामक वृक्षसे मारा । साथ ही उसकी बाँहपर, जिसमें तलवार थी, उन्होंने एक घूँसा मारा । वालिपुत्रके उस आघातसे वह तलवार छूटकर पृथ्वीपर जा गिरी ॥ २३-२४ ॥
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ खड्गं मुसलसंनिभम् । मुष्टिं संवर्तयामास वज्रकल्पं महाबलः ॥ २५ ॥
भावार्थ
मूसल-जैसी उस तलवारको पृथ्वीपर पड़ी देख महाबली प्रजङ्घने अपना वज्रके समान भयंकर मुक्का घुमाना आरम्भ किया ॥ २५ ॥
स ललाटे महावीर्यमङ्गदं वानरर्षभम् । आजघान महातेजाः स मुहूर्तं चचाल ह ॥ २६ ॥
भावार्थ
उस महातेजस्वी निशाचरने महापराक्रमी वानरशिरोमणि अङ्गदके ललाटमें बड़े जोरसे मुक्का मारा, जिससे अङ्गदको दो घड़ीतक चक्कर आता रहा ॥ २६ ॥
स संज्ञां प्राप्य तेजस्वी वालिपुत्रः प्रतापवान् । प्रजङ्घस्य शिरः कायात् पातयामास मुष्टिना ॥ २७ ॥
भावार्थ
इसके बाद होशमें आनेपर तेजस्वी और प्रतापी वालिकुमारने प्रजङ्घको ऐसा घूसा मारा कि उसका सिर धड़से अलग हो गया ॥ २७ ॥
स यूपाक्षोऽश्रुपूर्णाक्षः पितृव्ये निहते रणे । अवरुह्य रथात् क्षिप्रं क्षीणेषुः खड्गमाददे ॥ २८ ॥
भावार्थ
रणभूमिमें अपने चाचा प्रजङ्घके मारे जानेपर यूपाक्षकी आँखोंमें आँसू भर आये । उसके बाण नष्ट हो चुके थे । इसलिये तुरंत ही रथसे उतरकर उसने तलवार हाथमें ले ली ॥ २८ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य यूपाक्षं द्विविदस्त्वरन् । आजघानोरसि क्रुद्धो जग्राह च बलाद् बली ॥ २९ ॥
भावार्थ
यूपाक्षको आक्रमण करते देख बलवान् वीर द्विविदने कुपित हो बड़ी फुर्तीके साथ उसकी छातीमें चोट की और उसे बलपूर्वक पकड़ लिया ॥ २९ ॥
गृहीतं भ्रातरं दृष्ट्वा शोणिताक्षो महाबलः । आजघान महातेजा वक्षसि द्विविदं ततः ॥ ३० ॥
भावार्थ
भाईको पकड़ा गया देख महातेजस्वी एवं महाबली शोणिताक्षने द्विविदकी छातीमें गदा मारी ॥ ३० ॥
स ततोऽभिहतस्तेन चचाल च महाबलः । उद्यतां च पुनस्तस्य जहार द्विविदो गदाम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
शोणिताक्षकी मार खाकर महाबली द्विविद विचलित हो उठे । तत्पश्चात् जब उसने पुनः गदा उठायी, तब द्विविदने झपटकर उसे छीन लिया ॥ ३१ ॥
एतस्मिन्नन्तरे मैन्दो द्विविदाभ्याशमागमत् । यूपाक्षं ताडयामास तलेनोरसि वीर्यवान् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
इसी बीचमें पराक्रमी मैन्द भी द्विविदके पास आ गये और उन्होंने यूपाक्षकी छातीमें एक थप्पड़ मारा ॥ ३२ ॥
तौ शोणिताक्षयूपाक्षौ प्लवंगाभ्यां तरस्विनौ । चक्रतुः समरे तीव्रमाकर्षोत्पाटनं भृशम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
वे दोनों वेगशाली वीर शोणिताक्ष और यूपाक्ष उन दोनों वानर मैन्द और द्विविदके साथ समराङ्गणमें बड़ी तेजीसे छीना-झपटी और पटकापटकी करने लगे ॥ ३३ ॥
द्विविदः शोणिताक्षं तु विददार नखैर्मुखे । निष्पिपेष स वीर्येण क्षितावाविध्य वीर्यवान् ॥ ३४ ॥ यूपाक्षमभिसंक्रुद्धो मैन्दो वानरपुंगवः । पीडयामास बाहुभ्यां पपात स हतः क्षितौ ॥ ३५ ॥
भावार्थ
पराक्रमी द्विविदने अपने नखोंसे शोणिताक्षका मुँह नोच लिया और उसे बलपूर्वक पृथ्वीपर पटककर पीस डाला ॥ तत्पश्चात् अत्यन्त क्रोधसे भरे हुए वानरपुङ्गव मैन्दने यूपाक्षको अपनी दोनों बाँहोंसे इस तरह दबाया कि वह निष्प्राण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३५ ॥
हतप्रवीरा व्यथिता राक्षसेन्द्रचमूस्तथा । जगामाभिमुखी सा तु कुम्भकर्णात्मजो यतः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
इन प्रमुख वीरोंके मारे जानेपर राक्षसराजकी सेना व्यथित हो उठी और भागकर उस ओर चली गयी, जहाँ कुम्भकर्णका पुत्र युद्ध कर रहा था ॥ ३६ ॥
आपतन्तीं च वेगेन कुम्भस्तां सान्त्वयच्चमूम् । अथोत्कृष्टं महावीर्यैर्लब्धलक्षैः प्लवंगमैः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
वेगसे भागकर आती हुई उस सेनाको कुम्भने सान्त्वना दी । दूसरी ओर महापराक्रमी वानर युद्धमें सफल होनेके कारण जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ३७ ॥
निपातितमहावीरां दृष्ट्वा राक्षसश्चमूं तदा । कुम्भः प्रचक्रे तेजस्वी रणे कर्म सुदुष्करम् ॥ ३८ ॥ स धनुर्धन्विनां श्रेष्ठः प्रगृह्य सुसमाहितः । मुमोचाशीविषप्रख्याञ्छरान् देहविदारणान् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
राक्षससेनाके बड़े-बड़े वीरोंको मारा गया देख तेजस्वी कुम्भने रणभूमिमें अत्यन्त दुष्कर कर्म करना आरम्भ किया ॥ वह धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ था और युद्धमें चित्तको अत्यन्त एकाग्र रखता था । उसने धनुष उठाया और शरीरको विदीर्ण करनेमें समर्थ एवं सर्पके समान विषैले बाणोंको बरसाना आरम्भ किया ॥ ३९ ॥
तस्य तच्छुशुभे भूयः सशरं धनुरुत्तमम् । विद्युदैरावतार्चिष्मद्द्वितीयेन्द्रधनुर्यथा ॥ ४० ॥
भावार्थ
उसका वह बाणसहित उत्तम धनुष विद्युत् और ऐरावतकी प्रभासे युक्त द्वितीय इन्द्रधनुषके समान अधिक शोभा पा रहा था ॥ ४० ॥
आकर्णकृष्टमुक्तेन जघान द्विविदं तदा । तेन हाटकपुङ्खेन पत्रिणा पत्रवाससा ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उसने सोनेके पङ्ख लगे हुए पत्रयुक्त बाणद्वारा, जो धनुषको कानतक खींचकर छोड़ गया था, द्विविदको घायल कर दिया ॥ ४१ ॥
सहसाभिहतस्तेन विप्रमुक्तपदः स्फुरन् । निपपात त्रिकूटाभो विह्वलन् प्लवगोत्तमः ॥ ४२ ॥
भावार्थ
उसके बाणसे सहसा आहत होकर त्रिकूट पर्वतके समान विशालकाय वानरश्रेष्ठ द्विविद व्याकुल हो गये और छटपटाते हुए पाँव फैलाकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४२ ॥
मैन्दस्तु भ्रातरं तत्र भग्नं दृष्ट्वा महाहवे । अभिदुद्राव वेगेन प्रगृह्य विपुलां शिलाम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
उस महासमरमें अपने भाईको घायल होकर गिरा देख मैन्द बहुत बड़ी शिला उठाकर वेगपूर्वक दौड़े ॥ ४३ ॥
तां शिलां तु प्रचिक्षेप राक्षसाय महाबलः । बिभेद तां शिलां कुम्भः प्रसन्नैः पञ्चभिः शरैः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
उन महाबली वीरने वह शिला उस राक्षसपर चला दी; परंतु कुम्भने पाँच चमकीले बाणोंद्वारा उस शिलाको टूक-टूक कर दिया ॥ ४४ ॥
संधाय चान्यं सुमुखं शरमाशीविषोपमम् । आजघान महातेजा वक्षसि द्विविदाग्रजम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ
फिर विषधर सर्पके समान भयंकर और सुन्दर अग्रभाग-वाला दूसरा बाण धनुषपर रक्खा और उसके द्वारा उस महातेजस्वी वीरने द्विविदके बड़े भाईकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ४५ ॥
स तु तेन प्रहारेण मैन्दो वानरयूथपः । मर्मण्यभिहतस्तेन पपात भुवि मूर्च्छितः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
उसके उस प्रहारसे वानरयूथपति मैन्दके मर्मस्थानमें भारी आघात पहुँचा और वे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४६ ॥
अङ्गदो मातुलौ दृष्ट्वा मथितौ तु महाबलौ । अभिदुद्राव वेगेन कुम्भमुद्यतकार्मुकम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
मैन्द और द्विविद अङ्गदके मामा थे । उन दोनों महाबली वीरोंको घायल हुआ देख अङ्गद धनुष लेकर खड़े हुए कुम्भके ऊपर बड़े वेगसे टूटे ॥ ४७ ॥
तमापतन्तं विव्याध कुम्भः पञ्चभिरायसैः । त्रिभिश्चान्यैः शितैर्बाणैर्मातंगमिव तोमरैः । सोऽङ्गदं बहुभिर्बाणैः कुम्भो विव्याध वीर्यवान् ॥ ४८ ॥ अकुण्ठधारैर्निशितैस्तीक्ष्णैः कनकभूषणैः । अङ्गदः प्रतिविद्धाङ्गो वालिपुत्रो न कम्पते ॥ ४९ ॥
भावार्थ
उन्हें आते देख कुम्भने लोहेके बने हुए पाँच बाणोंसे घायल कर दिया । फिर तीन तीखे बाण और मारे । जैसे महावत अङ्कुशसे मतवाले हाथीको मारता है, उसी प्रकार पराक्रमी कुम्भने बहुत-से बाणोंद्वारा अङ्गदको बींध डाला ॥ जिनकी धारें कुण्ठित नहीं हुई थीं तथा जो सुवर्णसे विभूषित थे, ऐसे तेज और तीखे बाणोंसे वालिपुत्र अङ्गदका सारा शरीर छिद गया था तो भी वे कम्पित नहीं हुए ॥४९॥
शिलापादपवर्षाणि तस्य मूर्ध्नि ववर्ष ह । स प्रचिच्छेद तान् सर्वान् विभेद च पुनः शिलाः ॥ ५० ॥ कुम्भकर्णात्मजः श्रीमान् वालिपुत्रसमीरितान् ।
भावार्थ
उन्होंने उस राक्षसके मस्तकपर शिलाओं और वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ कर दी; किंतु कुम्भकर्णकुमार श्रीमान् कुम्भने वालिपुत्रके चलाये हुए उन समस्त वृक्षोंको काट दिया और शिलाओंको भी तोड़-फोड़ डाला ॥ ५०½ ॥
आपतन्तं च सम्प्रेक्ष्य कुम्भो वानरयूथपम् ॥ ५१ ॥ भ्रुवौ विव्याध बाणाभ्यामुल्काभ्यामिव कुञ्जरम् ।
भावार्थ
तत्पश्चात् वानरयूथपति अङ्गदको अपनी ओर आते देख कुम्भने दो बाणोंसे उनकी भौंहोंमें प्रहार किया, मानो दो उल्काओंद्वारा किसी हाथीको मारा गया हो ॥ ५१½ ॥
तस्य सुस्राव रुधिरं पिहिते चास्य लोचने ॥ ५२ ॥ अङ्गदः पाणिना नेत्रे पिधाय रुधिरोक्षिते । सालमासन्नमेकेन परिजग्राह पाणिना ॥ ५३ ॥ सम्पीड्योरसि सस्कन्धं करेणाभिनिवेश्य च । किंचिदभ्यवनम्यैनमुन्ममाथ महारणे ॥ ५४ ॥
भावार्थ
अङ्गदकी भौंहोंसे रक्त बहने लगा और उनकी आँखें बंद हो गयीं । तब उन्होंने एक हाथसे खूनसे भीगी हुई अपनी दोनों आँखोंको ढक लिया और दूसरे हाथसे पास ही खड़े हुए एक सालके वृक्षको पकड़ा । फिर छातीसे दबाकर तनेसहित उस वृक्षको कुछ झुका दिया और उस महासमरमें एक ही हाथसे उसे उखाड़ लिया ॥ ५२-५४ ॥
तमिन्द्रकेतुप्रतिमं वृक्षं मन्दरसंनिभम् । समुत्सृजत वेगेन मिषतां सर्वरक्षसाम् ॥ ५५ ॥
भावार्थ
वह वृक्ष इन्द्रध्वज तथा मन्दराचलके समान ऊँचा था । उसे अङ्गदने सब राक्षसोंके देखते-देखते बड़े वेगसे कुम्भपर दे मारा ॥ ५५ ॥
स चिच्छेद शितैर्बाणैः सप्तभिः कायभेदनैः । अङ्गदो विव्यथेऽभीक्ष्णं स पपात मुमोह च ॥ ५६ ॥
भावार्थ
किंतु शरीरको विदीर्ण कर देनेवाले सात तीखे बाण मारकर कुम्भने उस साल-वृक्षके टुकड़े-टुकड़े कर डाले, इससे अङ्गदको बड़ी व्यथा हुई । वे घायल तो थे ही, गिरे और मूर्च्छित हो गये ॥ ५६ ॥
अङ्गदं पतितं दृष्ट्वा सीदन्तमिव सागरे । दुरासदं हरिश्रेष्ठा राघवाय न्यवेदयन् ॥ ५७ ॥ रामस्तु व्यथितं श्रुत्वा वालिपुत्रं महाहवे । व्यादिदेश हरिश्रेष्ठाञ्जाम्बवत्प्रमुखांस्ततः ॥ ५८ ॥
भावार्थ
दुर्जय वीर अङ्गदको समुद्रमें डूबते हुएके समान पृथ्वीपर पड़ा देख श्रेष्ठ वानरोंने श्रीरघुनाथजीको इसकी सूचना दी॥ श्रीरामने जब सुना कि वालिपुत्र अङ्गद महासमरमें मूर्छित होकर गिरे हैं, तब उन्होंने जाम्बवान् आदि प्रमुख वानरवीरोंको युद्धके लिये जानेकी आज्ञा दी ॥ ५८ ॥
ते तु वानरशार्दूलाः श्रुत्वा रामस्य शासनम् । अभिपेतुः सुसंक्रुद्धाः कुम्भमुद्यतकार्मुकम् ॥ ५९ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका आदेश सुनकर श्रेष्ठ वानर वीर अत्यन्त कुपित हो धनुष उठाये खड़े हुए कुम्भपर सब ओरसे टूट पड़े ॥ ५९ ॥
ततो द्रुमशिलाहस्ताः कोपसंरक्तलोचनाः । रिरक्षिषन्तोऽभ्यपतन्नङ्गदं वानरर्षभाः ॥ ६० ॥
भावार्थ
वे सभी प्रमुख वानर अङ्गदकी रक्षा करना चाहते थे; अतः क्रोधसे लाल आँखें किये हाथोंमें वृक्ष और शिलाएँ लेकर उस राक्षसकी ओर दौड़े ॥ ६० ॥
जाम्बवांश्च सुषेणश्च वेगदर्शी च वानरः । कुम्भकर्णात्मजं वीरं क्रुद्धाः समभिदुद्रुवुः ॥ ६१ ॥
भावार्थ
जाम्बवान्, सुषेण और वेगदर्शीने कुपित हो वीर कुम्भकर्णकुमारपर धावा किया ॥ ६१ ॥
समीक्ष्यापततस्तांस्तु वानरेन्द्रान् महाबलान् । आववार शरौघेण नगेनेव जलाशयम् ॥ ६२ ॥
भावार्थ
उन महाबली वानर-यूथपतियोंको आक्रमण करते देख कुम्भने अपने बाणसमूहोंद्वारा उन सबको उसी तरह रोक दिया, जैसे आगे बढ़ते हुए जल-प्रवाहको मार्गमें खड़ा हुआ पर्वत रोक देता है ॥ ६२ ॥
तस्य बाणपथं प्राप्य न शेकुरपि वीक्षितुम् । वानरेन्द्रा महात्मानो वेलामिव महोदधिः ॥ ६३ ॥
भावार्थ
उसके बाणोंके मार्गमें आनेपर वे महामनस्वी वानरयूथपति आगे बढ़ना तो दूर रहा उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं पाते थे । ठीक उसी तरह, जैसे महासागर अपनी तटभूमिको लाँघकर आगे नहीं जा सकता था ॥ ६३ ॥
तांस्तु दृष्ट्वा हरिगणाञ्शरवृष्टिभिरर्दितान् । अङ्गदं पृष्ठतः कृत्वा भ्रातृजं प्लवगेश्वरः ॥ ६४ ॥ अभिदुद्राव सुग्रीवः कुम्भकर्णात्मजं रणे । शैलसानुचरं नागं वेगवानिव केसरी ॥ ६५ ॥
भावार्थ
उन सब वानरसमूहोंको कुम्भकी बाणवर्षासे पीड़ित देख वानरराज सुग्रीवने अपने भतीजे अङ्गदको पीछे करके स्वयं ही रणभूमिमें कुम्भकर्णकुमारपर उसी तरह धावा किया, जैसे पर्वतके शिखरपर विचरनेवाले हाथीके ऊपर वेगवान् सिंह आक्रमण करता है ॥ ६४-६५ ॥
उत्पाट्य च महावृक्षानश्वकर्णादिकान् बहून् । अन्यांश्च विविधान् वृक्षांश्चिक्षेप स महाकपिः ॥ ६६ ॥ तां छादयन्तीमाकाशं वृक्षवृष्टिं दुरासदाम् । कुम्भकर्णात्मजः श्रीमांश्चिच्छेद शरैः शितैः ॥ ६७ ॥ अभिलक्ष्येण तीव्रेण कुम्भेन निशितैः शरैः । आचितास्ते द्रुमा रेजुर्यथा घोराः शतघ्नयः ।
भावार्थ
महाकपि सुग्रीव अश्वकर्ण आदि बड़े-बड़े वृक्ष तथा दूसरे भी नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर उस राक्षसपर फेंकने लगे ॥ वृक्षोंकी वह वर्षा आकाशको आच्छादित किये देती थी । उसे टालना अत्यन्त कठिन हो रहा था; किंतु श्रीमान् कुम्भकर्णने अपने तीखे बाणोंसे उन सब वृक्षोंको काट डाला ॥ लक्ष्य बेधनेमें सफल, तीव्र वेगशाली कुम्भके पैने बाणोंसे व्याप्त हुए वे वृक्ष भयानक शतघ्नियोंके समान सुशोभित होते थे ॥ ६७½ ॥
द्रुमवर्षं तु तद् भिन्नं दृष्ट्वा कुम्भेन वीर्यवान् ॥ ६८ ॥ वानराधिपतिः श्रीमान् महासत्त्वो न विव्यथे ।
भावार्थ
उस वृक्ष-वृष्टिको कुम्भके द्वारा खण्डित हुई देख महान् शक्तिशाली पराक्रमी वानरराज सुग्रीव व्यथित नहीं हुए ॥ ६८½ ॥
स विध्यमानः सहसा सहमानस्तु ताञ्छरान् ॥ ६९ ॥ कुम्भस्य धनुराक्षिप्य बभञ्जेन्द्रधनुःप्रभम् । अवप्लुत्य ततः शीघ्रं कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ७० ॥ अब्रवीत् कुपितः कुम्भं भग्नशृङ्गमिव द्विपम् ।
भावार्थ
वे उसके बाणोंकी चोट खाते और सहते हुए सहसा उछलकर उसके रथपर चढ़ गये और कुम्भके इन्द्र-धनुषके समान तेजस्वी धनुषको छीनकर उन्होंने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले । तत्पश्चात् वे शीघ्र ही वहाँसे नीचे कूद पड़े । यह दुष्कर कर्म करनेके पश्चात् उन्होंने टूटे दाँतवाले हाथीके समान कुम्भसे कुपित होकर कहा—॥ ६९-७०½ ॥
निकुम्भाग्रज वीर्यं ते बाणवेगं तदद्भुतम् ॥ ७१ ॥ संनतिश्च प्रभावश्च तव वा रावणस्य वा । प्रह्लादबलिवृत्रघ्नकुबेरवरुणोपम ॥ ७२ ॥
भावार्थ
‘निकुम्भके बड़े भाई कुम्भ ! तुम्हारा पराक्रम और तुम्हारे बाणोंका वेग अद्भुत है । राक्षसोंके प्रति विनय अथवा प्रवणता तथा प्रभाव या तो तुममें है या रावणमें । तुम प्रह्लाद, बलि, इन्द्र, कुबेर और वरुणके समान हो ॥ ७१-७२ ॥
एकस्त्वमनुजातोऽसि पितरं बलवत्तरम् । त्वामेवैकं महाबाहुं शूलहस्तमरिंदमम् ॥ ७३ ॥ त्रिदशा नातिवर्तन्ते जितेन्द्रियमिवाधयः । विक्रमस्व महाबुद्धे कर्माणि मम पश्य च ॥ ७४ ॥
भावार्थ
‘केवल तुमने ही अपने अत्यन्त बलशाली पिताका अनुसरण किया है । जैसे जितेन्द्रिय पुरुषको मानसिक व्यथाएँ अभिभूत नहीं करती हैं, उसी प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले एकमात्र शूलधारी तुझ महाबाहु वीरको ही देवतालोग युद्धमें परास्त नहीं कर पाते हैं । महामते ! पराक्रम प्रकट करो और अब मेरे बलको भी देखो ॥ ७३-७४ ॥
वरदानात् पितृव्यस्ते सहते देवदानवान् । कुम्भकर्णस्तु वीर्येण सहते च सुरासुरान् ॥ ७५ ॥ धनुषीन्द्रजितस्तुल्यः प्रतापे रावणस्य च । त्वमद्य रक्षसां लोके श्रेष्ठोऽसि बलवीर्यतः ॥ ७६ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारा पितृव्य रावण केवल वरदानके प्रभावसे देवताओं और दानवोंका वेग सहन करता है । तुम्हारा पिता कुम्भकर्ण अपने बल-पराक्रमसे देवताओं और असुरोंका सामना करता था ( परंतु तुम वरदान और पराक्रम दोनोंसे सम्पन्न हो ) ॥ ‘तुम धनुर्विद्यामें इन्द्रजित्के समान और प्रतापमें रावणके तुल्य हो । राक्षसोंके संसारमें अब बल और पराक्रमकी दृष्टिसे केवल तुम्हीं श्रेष्ठ हो ॥ ७६ ॥
महाविमर्दं समरे मया सह तवाद्भुतम् । अद्य भूतानि पश्यन्तु शक्रशम्बरयोरिव ॥ ७७ ॥
भावार्थ
‘आज सब प्राणी रणभूमिमें इन्द्र और शम्बरासुरकी भाँति मेरे साथ तुम्हारे अद्भुत महायुद्धको देखें ॥ ७७ ॥
कृतमप्रतिमं कर्म दर्शितं चास्त्रकौशलम् । पतिता हरिवीराश्च त्वयैते भीमविक्रमाः ॥ ७८ ॥ उपालम्भभयाच्चैव नासि वीर मया हतः । कृतकर्मपरिश्रान्तो विश्रान्तः पश्य मे बलम् ॥ ७९ ॥
भावार्थ
‘तुमने वह पराक्रम किया है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है । तुमने अपना अस्त्र-कौशल दिखा दिया । तुम्हारे साथ युद्ध करके ये भयंकर पराक्रमी वानर वीर धराशायी हो गये ॥ ‘वीर ! अबतक जो मैंने तुम्हारा वध नहीं किया है, उसमें कारण है लोगोंके उपालम्भका भय—लोग यह कहकर मेरी निन्दा करते कि कुम्भ बहुत-से वीरोंके साथ युद्ध करके थक गया था, उस दशामें सुग्रीवने उसे मारा है; अतः अब तुम कुछ विश्राम कर लो, फिर मेरा बल देखो’ ॥ ७९ ॥
तेन सुग्रीववाक्येन सावमानेन मानितः । अग्नेराज्यहुतस्येव तेजस्तस्याभ्यवर्धत ॥ ८० ॥
भावार्थ
सुग्रीवके इस अपमानयुक्त वचनद्वारा सम्मानित हो घीकी आहुति पाये हुए अग्निदेवके समान कुम्भका तेज बढ़ गया ॥ ८० ॥
ततः कुम्भस्तु सुग्रीवं बाहुभ्यां जगृहे तदा । गजाविव अतीतमदौ निःश्वसन्तौ मुहुर्मुहुः ॥ ८१ ॥ अन्योन्यगात्रग्रथितौ घर्षन्तावितरेतरम् । सधूमां मुखतो ज्वालां विसृजन्तौ परिश्रमात् ॥ ८२ ॥
भावार्थ
फिर तो कुम्भने सुग्रीवको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़ लिया । तत्पश्चात् वे दोनों वीर मदमत्त गजराजोंकी भाँति बारंबार लंबी साँस खींचते हुए एक-दूसरेसे गुँथ गये । दोनों दोनोंको रगड़ने लगे और दोनों ही अपने मुखसे परिश्रमके कारण धूमयुक्त आगकी ज्वाला-सी उगलने लगे ॥ ८१-८२ ॥
तयोः पादाभिघाताच्च निमग्ना चाभवन्मही । व्याघूर्णिततरङ्गश्च चुक्षुभे वरुणालयः ॥ ८३ ॥
भावार्थ
उन दोनोंके पैरोंके आघातसे धरती नीचेको धँसने लगी । झूमती हुई तरङ्गोंसे युक्त वरुणालय समुद्रमें ज्वार-सा आ गया ॥ ८३ ॥
ततः कुम्भं समुत्क्षिप्य सुग्रीवो लवणाम्भसि । पातयामास वेगेन दर्शयन्नुदधेस्तलम् ॥ ८४ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें सुग्रीवने कुम्भको उठाकर बड़े वेगसे समुद्रके जलमें फेंक दिया । उसमें गिरते ही कुम्भको समुद्रका निचला तल देखना पड़ा ॥ ८४ ॥
ततः कुम्भनिपातेन जलराशिः समुत्थितः । विन्ध्यमन्दरसंकाशो विससर्प समन्ततः ॥ ८५ ॥
भावार्थ
कुम्भके गिरनेसे बड़ी भारी जलराशि ऊपरको उठी, जो विन्ध्य और मन्दराचलके समान जान पड़ी और सब ओर फैल गयी ॥ ८५ ॥
ततः कुम्भः समुत्पत्य सुग्रीवमभिपात्य च । आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रकल्पेन मुष्टिना ॥ ८६ ॥
भावार्थ
इसके बाद कुम्भ पुनः उछलकर बाहर आया और क्रोधपूर्वक सुग्रीवको पटककर उनकी छातीपर उसने वज्रके समान मुक्केसे प्रहार किया ॥ ८६ ॥
तस्य वर्म च पुस्फोट संजज्ञे चापि शोणितम् । तस्य मुष्टिर्महावेगः प्रतिजघ्नेऽस्थिमण्डले ॥ ८७ ॥
भावार्थ
इससे वानरराजका कवच टूट गया और छातीसे खून बहने लगा । उसका महान् वेगशाली मुक्का सुग्रीवकी हड्डियों-पर बड़े वेगसे लगा था ॥ ८७ ॥
तस्य वेगेन तत्रासीत् तेजः प्रज्वलितं महत् । वज्रनिष्पेषसंजाता ज्वाला मेरोर्यथा गिरेः ॥ ८८ ॥
भावार्थ
उसके वेगसे वहाँ बड़ी भारी ज्वाला जल उठी थी, मानो मेरु पर्वतके शिखरपर वज्रके आघातसे आग प्रकट हो गयी हो ॥ ८८ ॥
स तत्राभिहतस्तेन सुग्रीवो वानरर्षभः । मुष्टिं संवर्तयामास वज्रकल्पं महाबलः ॥ ८९ ॥ अर्चिःसहस्रविकचरविमण्डलवर्चसम् स मुष्टिं पातयामास कुम्भस्योरसि वीर्यवान् ॥ ९० ॥
भावार्थ
कुम्भके द्वारा इस प्रकार आहत होनेपर वानरराज महाबली परम पराक्रमी सुग्रीवने भी अपना वज्रतुल्य मुक्का सँभाला और कुम्भकी छातीमें बलपूर्वक आघात किया । उस मुक्केका तेज सहस्रों किरणोंसे प्रकाशित सूर्यमण्डलके समान उद्दीप्त हो रहा था ॥ ८९-९० ॥
स तु तेन प्रहारेण विह्वलो भृशपीडितः । निपपात तदा कुम्भो गतार्चिरिव पावकः ॥ ९१ ॥
भावार्थ
उस प्रहारसे कुम्भको बड़ी पीड़ा हुई । वह व्याकुल हो बुझी हुई आगकी तरह गिर पड़ा ॥ ९१ ॥
मुष्टिनाभिहतस्तेन निपपाताशु राक्षसः । लोहिताङ्ग इवाकाशाद् दीप्तरश्मिर्यदृच्छया ॥ ९२ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके मुक्केकी चोट खाकर वह राक्षस आकाशसे अकस्मात् गिरनेवाले मंगलकी भाँति तत्काल धराशायी हो गया ॥ ९२ ॥
कुम्भस्य पततो रूपं भग्नस्योरसि मुष्टिना । बभौ रुद्राभिपन्नस्य यथा रूपं गवां पतेः ॥ ९३ ॥
भावार्थ
मुक्केकी मारसे जिसका वक्षःस्थल चूर-चूर हो गया था, वह कुम्भ जब नीचे गिरने लगा, तब उसका रूप रुद्रदेवसे अभिभूत हुए सूर्यदेवके समान जान पड़ा ॥ ९३ ॥
तस्मिन् हते भीमपराक्रमेण प्लवंगमानामृषभेण युद्धे । मही सशैला सवना चचाल भयं च रक्षांस्यधिकं विवेश ॥ ९४ ॥
भावार्थ
भयंकर पराक्रमी वानरराज सुग्रीवके द्वारा युद्धमें उस निशाचरके मारे जानेपर पर्वत और वनोंसहित सारी पृथ्वी काँपने लगी और राक्षसोंके हृदयमें अत्यन्त भय समा गया ॥ ९४ ॥
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