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युद्धकाण्ड, सर्ग 75

ततोऽब्रवीन्महातेजाः सुग्रीवो वानरेश्वरः। अर्थ्यं विज्ञापयंश्चापि हनूमन्तमिदं वचः ॥ १ ॥

भावार्थ

तदनन्तर महातेजस्वी वानरराज सुग्रीवने हनुमान्जीसे आगेका कर्तव्य सूचित करनेके लिये कहा—॥ १ ॥

यतो हतः कुम्भकर्णः कुमाराश्च निषूदिताः। नेदानीमुपनिर्हारं रावणो दातुमर्हति ॥ २ ॥

भावार्थ

‘कुम्भकर्ण मारा गया । राक्षसराजके पुत्रोंका भी संहार हो गया; अतः अब रावण लङ्कापुरीकी रक्षाका कोई प्रबन्ध नहीं कर सकता ॥ २ ॥

ये ये महाबलाः सन्ति लघवश्च प्लवंगमाः। लङ्कामभिपतन्त्वाशु गृह्योल्काः प्लवगर्षभाः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘इसलिये अपनी सेनामें जो-जो महाबली और शीघ्रगामी वानर हों, वे सब-के-सब मशाल ले-लेकर शीघ्र ही लङ्कापुरीपर धावा करें’ ॥ ३ ॥

ततोऽस्तं गत आदित्ये रौद्रे तस्मिन् निशामुखे। लङ्कामभिमुखाः सोल्का जग्मुस्ते प्लवगर्षभाः ॥ ४ ॥

भावार्थ

सुग्रीवकी इस आज्ञाके अनुसार सूर्यास्त होनेपर भयंकर प्रदोषकालमें वे सभी श्रेष्ठ वानर मशाल हाथमें ले-लेकर लङ्काकी ओर चले ॥ ४ ॥

उल्काहस्तैर्हरिगणैः सर्वतः समभिद्रुताः। आरक्षस्था विरूपाक्षाः सहसा विप्रदुद्रुवुः ॥ ५ ॥

भावार्थ

जब उल्काधारी वानरोंने सब ओरसे आक्रमण किया, तब द्वार-रक्षाके काममें नियुक्त हुए राक्षस सहसा भाग खड़े हुए ॥ ५ ॥

गोपुराट्टप्रतोलीषु चर्यासु विविधासु च। प्रासादेषु च संहृष्टाः ससृजुस्ते हुताशनम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

वे गोपुरों ( दरवाजों ), अट्टालिकाओं, सड़कों, नाना प्रकारकी गलियों और महलोंमें भी बड़े हर्षके साथ आग लगाने लगे ॥ ६ ॥

तेषां गृहसहस्राणि ददाह हुतभुक् तदा। प्रासादाः पर्वताकाराः पतन्ति धरणीतले ॥ ७ ॥

भावार्थ

वानरोंकी लगायी हुई वह आग उस समय सहस्रों घरोंको जलाने लगी । पर्वताकार प्रासाद धराशायी होने लगे ॥ ७ ॥

अगुरुर्दह्यते तत्र परं चैव सुचन्दनम्। मौक्तिका मणयः स्निग्धा वज्रं चापि प्रवालकम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

कहीं अगुरु जल रहा था तो कहीं परम उत्तम चन्दन । मोती, स्निग्धमणि, हीरे और मूँगे भी दग्ध हो रहे थे ॥८॥

क्षौमं च दह्यते तत्र कौशेयं चापि शोभनम्। आविकं विविधं चौर्णं काञ्चनं भाण्डमायुधम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

वहाँ क्षौम ( अलसी या सनके रेशोंसे बना हुआ वस्त्र ) भी जलता था और सुन्दर रेशमी वस्त्र भी । भेड़के रोएँका कम्बल, नाना प्रकारका ऊनी वस्त्र, सोनेके आभूषण और अस्त्र-शस्त्र भी जल रहे थे ॥ ९ ॥

नानाविकृतसंस्थानं वाजिभाण्डपरिच्छदम्। गजग्रैवेयकक्ष्याश्च रथभाण्डांश्च संस्कृतान् ॥ १० ॥

भावार्थ

घोड़ोंके गहने, जीन आदि उपकरण जो अनेक प्रकार और विचित्र आकारके थे, दग्ध हो रहे थे । हाथीके गलेका आभूषण, उसे कसनेके लिये रस्से तथा रथोंके उपकरण, जो सुन्दर बने हुए थे, सब-के-सब आगमें जलकर भस्म हो रहे थे ॥ १० ॥

तनुत्राणि च योधानां हस्त्यश्वानां च वर्म च। खड्गा धनूंषि ज्याबाणास्तोमराङ्कुशशक्तयः ॥ ११ ॥ रोमजं वालजं चर्म व्याघ्रजं चाण्डजं बहु। मुक्तामणिविचित्रांश्च प्रासादांश्च समन्ततः ॥ १२ ॥ विविधानस्त्रसंघातानग्निर्दहति तत्र वै।

भावार्थ

योद्धाओंके कवच, हाथी और घोड़ोंके बखतर, खड्ग, धनुष, प्रत्यञ्चा, बाण, तोमर, अंकुश, शक्ति, रोमज (कम्बल आदि ), वालज ( चँवर आदि ), आसनोपयोगी व्याघ्रचर्म, अण्डज ( कस्तूरीआदि ), मोती और मणियोंसे जटित विचित्र महल तथा नाना प्रकारके अस्त्रसमूह—इन सबको सब ओर फैली हुई आग जला रही थी ॥ ११-१२½ ॥

नानाविधान् गृहांश्चित्रान् ददाह हुतभुक् तदा ॥ १३ ॥

भावार्थ

आवासान् राक्षसानां च सर्वेषां गृहगृध्नुनाम् । हेमचित्रतनुत्राणां स्रग्भाण्डाम्बरधारिणाम् ॥ १४ ॥ उस समय अग्निदेवने नाना प्रकारके विचित्र गृहोंको दग्ध करना आरम्भ किया । जो घरोंमें आसक्त थे, सोनेके विचित्र कवच धारण किये हुए थे तथा हार, आभूषण और वस्त्रोंसे विभूषित थे, उन सभी राक्षसोंके आवासस्थान आगकी लपटोंमें आ गये ॥ १३-१४ ॥

सीधुपानचलाक्षाणां मदविह्वलगामिनाम् । कान्तालम्बितवस्त्राणां शत्रुसंजातमन्युनाम् ॥ १५ ॥ गदाशूलासिहस्तानां खादतां पिबतामपि । शयनेषु महार्हेषु प्रसुप्तानां प्रियैः सह ॥ १६ ॥ त्रस्तानां गच्छतां तूर्णं पुत्रानादाय सर्वतः । तेषां शतसहस्राणि तदा लङ्कानिवासिनाम् ॥ १७ ॥ अदहत् पावकस्तत्र जज्वाल च पुनः पुनः ।

भावार्थ

मदिरापानसे जिनके नेत्र चञ्चल हो रहे थे, जो नशेसे विह्वल हो लड़खड़ाते हुए चलते थे, जिनके वस्त्रोंको उनकी प्रेयसी स्त्रियोंने पकड़ रक्खा था, जो शत्रुओंपर कुपित थे, जिनके हाथोंमें गदा, खड्ग और शूल शोभा पा रहे थे, जो खाने-पीनेमें लगे थे, जो बहुमूल्य शय्याओंपर अपनी प्राण-वल्लभाओंके संग शयन कर रहे थे तथा जो आगसे भयभीत हो अपने पुत्रोंको गोदमें लेकर सब ओर तीव्रगतिसे भाग रहे थे, ऐसे लाखों लङ्कानिवासियोंको उस समय अग्निने जलाकर भस्म कर दिया । वह आग वहाँ रह-रहकर पुनः प्रज्वलित हो उठती थी ॥ १५–१७½ ॥

सारवन्ति महार्हाणि गम्भीरगुणवन्ति च ॥ १८ ॥ हेमचन्द्रार्धचन्द्राणि चन्द्रशालोन्नतानि च । तत्र चित्रगवाक्षाणि साधिष्ठानानि सर्वशः ॥ १९ ॥ मणिविद्रुमचित्राणि स्पृशन्तीव दिवाकरम् । क्रौञ्चबर्हिणवीणानां भूषणानां च निःस्वनैः ॥ २० ॥ नादितान्यचलाभानि वेश्मान्यग्निर्ददाह सः ।

भावार्थ

जो बहुत मजबूत और बहुमूल्य बने हुए थे, गाम्भीर्य गुणोंसे युक्त थे—अनेकानेक ड्योढ़ियों, परकोटों, आन्तरिक गृहों, द्वारों और उपद्वारोंके कारण दुर्गम प्रतीत होते थे, जो सुवर्णनिर्मित अर्धचन्द्र अथवा पूर्णचन्द्रके आकारमें बने हुए थे, अट्टालिकाओंके कारण बहुत ऊँचे दिखायी देते थे, विचित्र झरोखे जिनकी शोभा बढ़ाते थे, जिनमें सब ओर सोने-बैठनेके लिये शय्या-आसन आदि सुसज्जित थे, मणियों और मूँगोंसे जटित होनेके कारण जिनकी विचित्र शोभा हो रही थी, जो अपनी ऊँचाईसे सूर्यदेवका स्पर्श-सा कर रहे थे, जिनमें क्रौञ्च और मोरोंके कलरव, वीणाकी मधुर-ध्वनि तथा भूषणोंकी झनकारें गूँज रही थीं और जो पर्वताकार दिखायी देते थे, उन सभी गृहोंको प्रज्वलित आगने जला दिया ॥ १८-२०½ ॥

ज्वलनेन परीतानि तोरणानि चकाशिरे ॥ २१ ॥ विद्युद्भिरिव नद्धानि मेघजालानि घर्मगे । ज्वलनेन परीतानि गृहाणि प्रचकाशिरे ॥ २२ ॥ दावाग्निदीप्तानि यथा शिखराणि महागिरेः ।

भावार्थ

आगसे घिरे हुए लङ्काके बाहरी दरवाजे ग्रीष्मऋतुमें विद्युन्मालामण्डित मेघसमूहोंके समान प्रकाशित होते थे ।२१½। अग्निकी लगटोंमें लिपटे हुए लङ्कापुरीके मकान दावाग्निसे दग्ध होते हुए बड़े-बड़े पर्वतोंके शिखरोंके समान जान पड़ते थे ॥ २२½ ॥

विमानेषु प्रसुप्ताश्च दह्यमाना वराङ्गनाः ॥ २३ ॥ त्यक्ताभरणसंयोगा हाहेत्युच्चैर्विचुक्रुशुः ।

भावार्थ

सतमहले भवनोंमें सोयी हुई सुन्दरियाँ जब आगसे दग्ध होने लगीं, उस समय सारे आभूषणोंको फेंककर हाय-हाय करती हुई उच्चस्वरसे चीत्कार करने लगीं ॥ २३½ ॥

तत्र चाग्निपरीतानि निपेतुर्भवनान्यपि ॥ २४ ॥ वज्रिवज्रहतानीव शिखराणि महागिरेः ।

भावार्थ

वहाँ आगकी लपेटमें आये हुए कितने ही भवन इन्द्रके वज्रके मारे हुए महान् पर्वतोंके शिखरोंके समान धराशायी हो रहे थे ॥ २४½ ॥

तानि निर्दह्यमानानि दूरतः प्रचकाशिरे ॥ २५ ॥ हिमवच्छिखराणीव दह्यमानानि सर्वशः ।

भावार्थ

वे जलते हुए गगनचुम्बी भवन दूरसे ऐसे जान पड़ते थे, मानो हिमालयके शिखर सब ओरसे दग्ध हो रहे हों २५½

हर्म्याग्रैर्दह्यमानैश्च ज्वालाप्रज्वलितैरपि ॥ २६ ॥ रात्रौ सा दृश्यते लङ्का पुष्पितैरिव किंशुकैः ।

भावार्थ

अट्टालिकाओंके जलते हुए शिखर उठती हुई ज्वालाओंसे आवेष्टित हो रहे थे । रात्रिमें उनसे उपलक्षित हुई लङ्कापुरी खिले हुए पलाश-पुष्पोंसे युक्त-सी दिखायी देती थी ॥ २६३ ॥

हस्त्यध्यक्षैर्गजैर्मुक्तैर्मुक्तैश्च तुरगैरपि । बभूव लङ्का लोकान्ते भ्रान्तग्राह इवार्णवः ॥ २७ ॥

भावार्थ

हाथियोंके अध्यक्षोंने हाथियोंको और अश्वाध्यक्षोंने अश्वोंको भी खोल दिया था। वे वहाँ इधर-उधर भाग रहे थे, इससे लङ्कापुरी प्रलयकालमें भ्रान्त होकर घूमते हुए ग्राहोंसे युक्त महासागरके समान प्रतीत होती थी ॥ २७ ॥

अश्वं मुक्तं गजो दृष्ट्वा कश्चिद् भीतोऽपसर्पति । भीतो भीतं गजं दृष्ट्वा कश्चिदश्वो निवर्तते ॥ २८ ॥

भावार्थ

कहीं खुले हुए घोड़ेको देखकर हाथी भयभीत होकर भागता था और कहीं डरे हुए हाथीको देखकर भी घोड़ा भागने लगता था ॥ २८ ॥

लङ्कायां दह्यमानायां शुशुभे च महोदधिः । छायासंसक्तसलिलो लोहितोद इवार्णवः ॥ २९ ॥

भावार्थ

लङ्कापुरीके जलते समय समुद्रमें आगकी ज्वालाका प्रतिबिम्ब पड़ रहा था, जिससे वह महासागर लाल पानीसे युक्त लालसागरके समान शोभा पाता था ॥ २९ ॥

सा बभूव मुहूर्तेन हरिभिर्दीपिता पुरी । लोकस्यास्य क्षये घोरे प्रदीप्तेव वसुंधरा ॥ ३० ॥

भावार्थ

वानरोंद्वारा जिसमें आग लगायी गयी थी, वह लङ्कापुरी दो ही घड़ीमें संसारके घोर संहारके समय दग्ध हुई पृथ्वीके समान प्रतीत होने लगी ॥ ३० ॥

नारीजनस्य धूमेन व्याप्तस्योच्चैर्विनेदुषः । स्वनो ज्वलनतप्तस्य शुश्रुवे शतयोजनम् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

धूएँसे आच्छादित और आगसे संतप्त होकर उच्चस्वरसे आर्तनाद करती हुई लङ्काकी नारियोंका करुण-क्रन्दन सौ योजन दूरतक सुनायी देता था ॥ ३१ ॥

प्रदग्धकायानपरान् राक्षसान् निर्गतान् बहिः । सहसा ह्युत्पतन्ति स्म हरयोऽथ युयुत्सवः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

जिनके शरीर जल गये थे, ऐसे जो-जो राक्षस नगरसे बाहर निकलते, उनके ऊपर युद्धकी इच्छावाले वानर सहसा टूट पड़ते थे ॥ ३२ ॥

उद्घुष्टं वानराणां च राक्षसानां च निःस्वनम् । दिशो दश समुद्रं च पृथिवीं च व्यनादयत् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

वानरोंकी गर्जना और राक्षसोंके आर्तनादसे दसों दिशाएँ, समुद्र और पृथ्वी गूँज उठीं ॥ ३३ ॥

विशल्यौ च महात्मानौ तावुभौ रामलक्ष्मणौ । असम्भ्रान्तौ जगृहतुस्ते उभे धनुषी वरे ॥ ३४ ॥

भावार्थ

इधर बाण निकल जानेसे स्वस्थ हुए दोनों भाई महात्मा श्रीराम और लक्ष्मणने बिना किसी घबराहटके अपने श्रेष्ठ धनुष उठाये ॥ ३४ ॥

ततो विस्फारयामास रामश्च धनुरुत्तमम् । बभूव तुमुलः शब्दो राक्षसानां भयावहः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

उस समय श्रीरामने अपने उत्तम धनुषको खींचा, उससे भयंकर टंकार प्रकट हुई, जो राक्षसोंको भयभीत कर देनेवाली थी ॥ ३५ ॥

अशोभत तदा रामो धनुर्विस्फारयन् महत् । भगवानिव संक्रुद्धो भवो वेदमयं धनुः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजी अपने विशाल धनुषको खींचते हुए उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे त्रिपुरासुरपर कुपित हो भगवान् शंकर अपने वेदमय धनुषकी टंकार करते हुए सुशोभित हुए थे ॥ ३६ ॥

उद्घुष्टं वानराणां च राक्षसानां च निःस्वनम् । ज्याशब्दस्तावुभौ शब्दावति रामस्य शुश्रुवे ॥ ३७ ॥

भावार्थ

वानरोंकी गर्जना तथा राक्षसोंके कोलाहल—इन दोनों प्रकारके शब्दोंसे भी ऊपर उठकर श्रीरामके धनुषकी टंकार सुनायी पड़ती थी ॥ ३७ ॥

वानरोद्घुष्टघोषश्च राक्षसानां च निःस्वनः । ज्याशब्दश्चापि रामस्य त्रयं व्याप दिशो दश ॥ ३८ ॥

भावार्थ

वानरोंकी गर्जना, राक्षसोंका कोलाहल और श्रीरामके धनुषकी टंकार—ये तीनों प्रकारके शब्द दसों दिशाओंमें व्याप्त हो रहे थे ॥ ३८ ॥

तस्य कार्मुकनिर्मुक्तैः शरैस्तत्पुरगोपुरम् । कैलासशृङ्गप्रतिमं विकीर्णमभवद् भुवि ॥ ३९ ॥

भावार्थ

भगवान् श्रीरामके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा लङ्कापुरीका वह नगरद्वार, जो कैलास-शिखरके समान ऊँचा था, टूट-फूटकर भूतलपर बिखर गया ॥ ३९ ॥

ततो रामशरान् दृष्ट्वा विमानेषु गृहेषु च । संनाहो राक्षसेन्द्राणां तुमुलः समपद्यत ॥ ४० ॥

भावार्थ

सतमहले मकानों तथा अन्य गृहोंपर गिरते हुए श्रीरामके बाणोंको देखकर राक्षसपतियोंने युद्धके लिये बड़ी भयंकर तैयारी की ॥ ४० ॥

तेषां संनह्यमानानां सिंहनादं च कुर्वताम् । शर्वरी राक्षसेन्द्राणां रौद्रीव समपद्यत ॥ ४१ ॥

भावार्थ

कमर कसकर और कवच आदि बाँधकर युद्धके लिये तैयार होते तथा सिंहनाद करते हुए उन राक्षसपतियोंके लिये वह रात कालरात्रिके समान प्राप्त हुई थी ॥ ४१ ॥

आदिष्टा वानरेन्द्रास्ते सुग्रीवेण महात्मना । आसन्नं द्वारमासाद्य युध्यध्वं च प्लवंगमाः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

उस समय महात्मा सुग्रीवने प्रधान-प्रधान वानरोंको यह आज्ञा दी—‘वानरवीरो ! तुम सब लोग अपने-अपने निकटवर्ती द्वारपर जाकर युद्ध करो ॥ ४२ ॥

यश्च वो वितथं कुर्यात् तत्र तत्राप्युपस्थितः । स हन्तव्योऽभिसम्प्लुत्य राजशासनदूषकः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘तुमलोगोंमेंसे जो वहाँ-वहाँ युद्धभूमिमें उपस्थित होकर भी मेरे आदेशका पालन न करे—युद्धसे मुँह मोड़कर भाग जाय, उसे तुम सब लोग पकड़कर मार डालना; क्योंकि वह राजाज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाला होगा’ ॥ ४३ ॥

तेषु वानर्मुख्येषु दीप्तोल्कोज्ज्वलपाणिषु । स्थितेषु द्वारमाश्रित्य रावणं क्रोध आविशत् ॥ ४४ ॥

भावार्थ

सुग्रीवकी इस आज्ञाके अनुसार जब मुख्य-मुख्य वानर जलते मशाल हाथमें लिये नगरद्वारपर जाकर डट गये, तब रावणको बड़ा क्रोध हुआ ॥ ४४ ॥

तस्य जृम्भितविक्षेपाद् व्यामिश्रा वै दिशो दश । रूपवानिव रुद्रस्य मन्युर्गात्रेष्वदृश्यत ॥ ४५ ॥

भावार्थ

उसने अँगड़ाई लेकर जो अङ्गोंका संचालन किया, उससे दसों दिशाएँ व्याकुल हो उठीं । वह कालरुद्रके अङ्गोंमें प्रकट हुए मूर्तिमान् क्रोधकी भाँति दिखायी देने लगा ॥४५॥

स कुम्भं च निकुम्भं च कुम्भकर्णात्मजावुभौ । प्रेषयामास संक्रुद्धो राक्षसैर्बहुभिः सह ॥ ४६ ॥

भावार्थ

क्रोधसे भरे हुए रावणने कुम्भकर्णके दो पुत्र कुम्भ और निकुम्भको बहुत-से राक्षसोंके साथ भेजा ॥ ४६ ॥

यूपाक्षः शोणिताक्षश्च प्रजङ्घः कम्पनस्तथा । निर्ययुः कौम्भकर्णिभ्यां सह रावणशासनात् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

रावणकी आज्ञासे यूपाक्ष, शोणिताक्ष, प्रजङ्घ और कम्पन भी कुम्भकर्णके दोनों पुत्रोंके साथ-साथ युद्धके लिये निकले ॥ ४७ ॥

शशास चैव तान् सर्वान् राक्षसान् स महाबलान् । राक्षसा गच्छताद्यैव सिंहनादं च नादयन् ॥ ४८ ॥

भावार्थ

उस समय सिंहके समान दहाड़ते हुए रावणने उन समस्त महाबली राक्षसोंको आदेश दिया—‘वीर निशाचरो ! इसी रातमें तुमलोग युद्धके लिये जाओ’ ॥ ४८ ॥

ततस्तु चोदितास्तेन राक्षसा ज्वलितायुधाः । लङ्काया निर्ययुर्वीराः प्रणदन्तः पुनः पुनः ॥ ४९ ॥

भावार्थ

राक्षसराजकी आज्ञा पाकर वे वीर राक्षस हाथोंमें चमकीले अस्त्र-शस्त्र लिये बारंबार गर्जना करते हुए लङ्कापुरीसे बाहर निकले ॥ ४९ ॥

राक्षसां भूषणस्याभिर्भाभिः स्वाभिश्च सर्वशः । चक्रुस्ते सप्रभं व्योम हरयश्चाग्निभिः सह ॥ ५० ॥

भावार्थ

राक्षसोंने अपने आभूषणोंकी तथा अपनी प्रभासे और वानरोंने मशालकी आगसे वहाँके आकाशको प्रकाशसे परिपूर्ण कर दिया था ॥ ५० ॥

तत्र ताराधिपस्याभा ताराणां भा तथैव च । तयोराभरणाभा च ज्वलिता द्यामभासयत् ॥ ५१ ॥

भावार्थ

चन्द्रमाकी, नक्षत्रोंकी और उन दोनों सेनाओंके आभूषणोंकी प्रज्वलित प्रभाने आकाशको प्रकाशित कर दिया था ॥ ५१ ॥

चन्द्राभा भूषणाभा च ग्रहाणां ज्वलतां च भा । हरिराक्षससैन्यानि भ्राजयामास सर्वतः ॥ ५२ ॥

भावार्थ

चन्द्रमाकी चाँदनी, आभूषणोंकी प्रभा तथा प्रकाशमान ग्रहोंकी दीप्तिने सब ओरसे राक्षसों और वानरोंकी सेनाओंको उद्भासित कर रक्खा था ॥ ५२ ॥

तत्र चार्धप्रदीप्तानां गृहाणां सागरः पुनः । भाभिः संसक्तसलिलश्चलोर्मिः शुशुभेऽधिकम् ॥ ५३ ॥

भावार्थ

लङ्काके अधजले गृहोंकी प्रभाका जलमें प्रतिबिम्ब पड़नेसे चञ्चल लहरोंवाला समुद्र अधिक शोभा पा रहा था ॥ ५३ ॥

पताकाध्वजसंयुक्तमुत्तमासिपरश्वधम् । भीमाश्वरथमातङ्गं नानापत्तिसमाकुलम् ॥ ५४ ॥ दीप्तशूलगदाखड्गप्रासतोमरकार्मुकम् । तद् राक्षसबलं भीमं घोरविक्रमपौरुषम् ॥ ५५ ॥

भावार्थ

राक्षसोंकी वह भयंकर सेना ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित थी । सैनिकोंके हाथोंमें उत्तम खड्ग और फरसे चमक रहे थे । भयानक घोड़े, रथ और हाथियोंसे एवं नाना प्रकारके पैदल सैनिकोंसे वह लैस थी । चमकते हुए शूल, गदा, तलवार, भाले, तोमर और धनुष आदिसे युक्त हुई वह सेना भयानक विक्रम एवं पुरुषार्थ प्रकट करनेवाली थी ॥ ५४-५५ ॥

ददृशे ज्वलितप्रासं किङ्किणीशतनादितम् । हेमजालाचितभुजं व्यावेष्टितपरश्वधम् ॥ ५६ ॥ व्याघूर्णितमहाशस्त्रं बाणसंसक्तकार्मुकम् । गन्धमाल्यमधूत्सेकसम्मोदितमहानिलम् ॥ ५७ ॥ घोरं शूरजनाकीर्णं महाम्बुधरनिःस्वनम् ।

भावार्थ

उस सेनामें भाले चमक रहे थे। सैकड़ों घुँघुरुओंका झंकार सुनायी पड़ता था। सैनिकोंकी भुजाओंमें सोनेके आभूषण बँधे हुए थे। उनके द्वारा फरसे चलाये जा रहे थे, बड़े-बड़े शस्त्र घुमाये जाते थे। धनुषपर बाणोंका संधान किया जाता था। चन्दन, पुष्पमाला और मधुकी अधिकतासे वहाँके महान् वातावरणमें अनुपम गन्ध छा रही थी। वह सेना शूरवीरोंसे व्याप्त तथा महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सिंहनादसे निनादित होनेके कारण भयंकर दिखायी देती थी ॥५६-५७½॥

तद् दृष्ट्वा बलमायातं राक्षसानां दुरासदम् ॥ ५८ ॥ संचचाल प्लवंगानां बलमुच्चैर्ननाद च ।

भावार्थ

राक्षसोंकी उस दुर्जय सेनाको आती देख वानर-सेना आगे बढ़ी और उच्च स्वरसे गर्जना करने लगी ॥ ५८½ ॥

जवेनाप्लुत्य च पुनस्तद् बलं रक्षसां महत् ॥ ५९ ॥ अभ्ययात् प्रत्यरिबलं पतंगा इव पावकम् ।

भावार्थ

राक्षसोंकी विशाल सेना भी बड़े वेगसे उछलकर शत्रुसेनाकी ओर उसी तरह अग्रसर हुई, जैसे पतङ्ग आगपर टूटे पड़ते हैं ॥ ५९½ ॥

तेषां भुजपरामर्शव्यामृष्टपरिघाशनि ॥ ६० ॥ राक्षसानां बलं श्रेष्ठं भूयः परमशोभत । तत्रोन्मत्ता इवोत्पेतुर्हरयोऽथ युयुत्सवः ॥ ६१ ॥ तरुशैलैरभिघ्नन्तो मुष्टिभिश्च निशाचरान् ।

भावार्थ

सैनिकोंकी भुजाओंके व्यापारसे जहाँ परिघ और अशनि भ्रम रहे थे, राक्षसोंकी वह उत्तम सेना बड़ी शोभा पा रही थी॥ वहाँ युद्धकी इच्छावाले वानर उन्मत्त-से होकर वृक्षों, पत्थरों और मुक्कोंसे निशाचरोंको मारते हुए उनपर टूट पड़े ॥ ६१½ ॥

तथैवापततां तेषां हरीणां निशितैः शरैः ॥ ६२ ॥ शिरांसि सहसा जह्रू राक्षसा भीमविक्रमाः ।

भावार्थ

इसी प्रकार भयानक पराक्रमी निशाचर भी अपने तीखे बाणोंसे सामने आये हुए वानरोंके मस्तक सहसा काट-काटकर गिराने लगे ॥ ६२½ ॥

दशनैर्हतकर्णाश्च मुष्टिभिर्भिन्नमस्तकाः । शिलाप्रहारभग्नाङ्गा विचेरुस्तत्र राक्षसाः ॥ ६३ ॥

भावार्थ

वानरोंने भी दाँतोंसे निशाचरोंके कान काट लिये, मुक्कोंसे मार-मारकर उनके मस्तक विदीर्ण कर दिये और शिलाओंके प्रहारसे उनके अङ्ग-भङ्ग कर दिये। इस अवस्थामें वे राक्षस वहाँ विचर रहे थे ॥ ६३ ॥

तथैवाप्यपरे तेषां कपीनामसिभिः शितैः । प्रवरानभितो जघ्नुर्घोररूपा निशाचराः ॥ ६४ ॥ घ्नन्तमन्यं जघानान्यः पातयन्तमपातयत् । गर्हमाणं जगर्हान्यो दशन्तमपरोऽदशत् ॥ ६५ ॥

भावार्थ

इसी प्रकार घोर रूपधारी निशाचरोंने भी मुख्य-मुख्य वानरोंको अपनी तीखी तलवारोंसे सर्वथा घायल कर दिया था॥ एक वीर जब दूसरे विपक्षी योद्धाको मारने लगता था, तब दूसरा आकर उसे मारने लगता था। इसी प्रकार एकको गिराते हुए योद्धाको दूसरा आकर धराशायी कर देता था। एककी निन्दा करनेवालेकी दूसरा निन्दा करता और एकको दाँतसे काटनेवालेको दूसरा आकर काट लेता था ॥ ६५ ॥

देहीत्यन्यो ददात्यन्यो ददामीत्यपरः पुनः । किं क्लेशयसि तिष्ठेति तत्रान्योन्यं बभाषिरे ॥ ६६ ॥

भावार्थ

एक आकर कहता कि ‘मुझे युद्ध प्रदान करो’ तो दूसरा उसे युद्धका अवसर देता था; फिर तीसरा कहता था कि ‘तुम क्यों क्लेश उठाते हो ? मैं इसके साथ युद्ध करता हूँ ।’ इस तरह वे एक दूसरेसे बातें करते थे ॥ ६६ ॥

विप्रलम्भितशस्त्रं च विमुक्तकवचायुधम् । समुद्यतमहाप्रासं मुष्टिशूलासिकुन्तलम् ॥ ६७ ॥ प्रावर्तत महारौद्रं युद्धं वानररक्षसाम् । वानरान् दश सप्तेति राक्षसा जघ्नुराहवे ॥ ६८ ॥ राक्षसान् दश सप्तेति वानराश्चाभ्यपातयन् ।

भावार्थ

उस समय वानरों और राक्षसोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा। हथियार गिर जाते, कवच और अस्त्र-शस्त्र छूट जाते, बड़े-बड़े भाले ऊँचे उठे दिखायी देते तथा मुक्कों, शूलों, तलवारों और भालोंकी मार होती थी। उस युद्धस्थलमें राक्षस दस-दस या सात-सात वानरोंको एक साथ मार गिराते थे और वानर भी दस-दस या सात-सात राक्षसोंको एक साथ धराशायी कर देते थे ॥ ६७-६८½ ॥

विप्रलम्भितवस्त्रं च विमुक्तकवचध्वजम् । बलं राक्षसमालम्ब्य वानराः पर्यवारयन् ॥ ६९ ॥

भावार्थ

राक्षसोंके वस्त्र खुल गये, कवच और ध्वज टूट गये तथा उस राक्षसी सेनाको रोककर वानरोंने सब ओरसे घेर लिया ॥

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