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युद्धकाण्ड, सर्ग 21

ततः सागरवेलायां दर्भानास्तीर्य राघवः । अञ्जलिं प्राङ्मुखः कृत्वा प्रतिशिश्ये महोदधेः ॥ १ ॥ बाहुं भुजङ्गभोगाभमुपधायारिसूदनः । जातरूपमयैश्चैव भूषणैर्भूषितं पुरा ॥ २ ॥

भावार्थ

तदनन्तर श्रीरघुनाथजी समुद्रके तटपर कुशा बिछा महासागरके समक्ष हाथ जोड़ पूर्वाभिमुख हो वहाँ लेट गये ॥ उस समय शत्रुसूदन श्रीरामने सर्पके शरीरकी भाँति कोमल और वनवासके पहले सोनेके बने हुए सुन्दर आभूषणोंसे सदा विभूषित रहनेवाली अपनी एक ( दाहिनी ) बाँहको तकिया बना रक्खा था ॥ २ ॥

मणिकाञ्चनकेयूरमुक्ताप्रवरभूषणैः । भुजैः परमनारीणामभिमृष्टमनेकधा ॥ ३ ॥

भावार्थ

अयोध्यामें रहते समय मातृकोटिकी अनेक उत्तम नारियाँ ( धायें ) मणि और सुवर्णके बने हुए केयूरों तथा मोतीके श्रेष्ठ आभूषणोंसे विभूषित अपने कर-कमलोंद्वारा नहलाने-धुलाने आदिके समय अनेक बार श्रीरामके उस बाँहको सहलाती और दबाती थीं ॥ ३ ॥

चन्दनागुरुभिश्चैव पुरस्तादभिसेवितम् । बालसूर्यप्रकाशैश्च चन्दनैरुपशोभितम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

पहले चन्दन और अगुरुसे उस बाँहकी सेवा होती थी । प्रातःकालके सूर्यकी-सी कान्तिवाले लाल चन्दन उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ४ ॥

शयने चोत्तमाङ्गेन सीतायाः शोभितं पुरा । तक्षकस्येव सम्भोगं गङ्गाजलनिषेवितम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

सीताहरणसे पहले शयनकालमें सीताका सिर उस बाँहकी शोभा बढ़ाता था और श्वेत शय्यापर स्थित एवं लाल चन्दनसे चर्चित हुई वह बाँह गङ्गाजलमें निवास करनेवाले तक्षकके शरीरकी भाँति सुशोभित होती थी ॥ ५ ॥

संयुगे युगसंकाशं शत्रूणां शोकवर्धनम् । सुहृदां नन्दनं दीर्घे सागरान्तव्यपाश्रयम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

युद्धस्थलमें जूएके समान वह विशाल भुजा शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाली और सुहृदोंको दीर्घकालतक आनन्दित करनेवाली थी । समुद्रपर्यन्त अखण्ड भूमण्डलकी रक्षाका भार उनकी उसी भुजापर प्रतिष्ठित था ॥ ६ ॥

अस्यता च पुनः सव्यं ज्याघातविहतत्वचम् । दक्षिणो दक्षिणं बाहुं महापरिघसंनिभम् ॥ ७ ॥ गोसहस्रप्रदातारं ह्युपधाय भुजं महत् । अद्य मे तरणं वाथ मरणं सागरस्य वा ॥ ८ ॥ इति रामो धृतिं कृत्वा महाबाहुर्महोदधिम् । अधिशिश्ये च विधिवत् प्रयतो नियतो मुनिः ॥ ९ ॥

भावार्थ

बायीं ओरको बारंबार बाण चलानेके कारण प्रत्यञ्चाके आघातसे जिसकी त्वचापर रगड़ पड़ गयी थी, जो विशाल परिघके समान सुदृढ़ एवं बलिष्ठ थी तथा जिसके द्वारा उन्होंने सहस्रों गौओंका दान किया था, उस विशाल दाहिनी भुजाका तकिया लगाकर उदारता आदि गुणोंसे युक्त महाबाहु श्रीराम ‘आज या तो मैं समुद्रके पार जाऊँगा या मेरेद्वारा समुद्रका संहार होगा’ ऐसा निश्चय करके मौन हो मन, वाणी और शरीरको संयममें रखकर महासागरको अनुकूल करनेके उद्देश्यसे विधिपूर्वक धरना देते हुए उस कुशासनपर सो गये ॥ ७–९ ॥

तस्य रामस्य सुप्तस्य कुशास्तीर्णे महीतले । नियमादप्रमत्तस्य निशास्तिस्रोऽभिजग्मतुः ॥ १० ॥

भावार्थ

कुश बिछी हुई भूमिपर सोकर नियमसे असावधान न होते हुए श्रीरामकी वहाँ तीन रातें व्यतीत हो गयीं ॥ १० ॥

स त्रिरात्रोषितस्तत्र नयज्ञो धर्मवत्सलः । उपासत तदा रामः सागरं सरितां पतिम् ॥ ११ ॥ न च दर्शयते रूपं मन्दो रामस्य सागरः । प्रयतेनापि रामेण यथार्हमभिपूजितः ॥ १२ ॥

भावार्थ

इस प्रकार उस समय वहाँ तीन रात लेटे रहकर नीतिके ज्ञाता, धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी सरिताओंके स्वामी समुद्रकी उपासना करते रहे; परंतु नियमपूर्वक रहते हुए श्रीरामके द्वारा यथोचित पूजा और सत्कार पाकर भी उस मन्दमति महासागरने उन्हें अपने आधिदैविक रूपका दर्शन नहीं कराया—वह उनके समक्ष प्रकट नहीं हुआ ॥११-१२॥

समुद्रस्य ततः क्रुद्धो रामो रक्तान्तलोचनः । समीपस्थमुवाचेदं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

तब अरुणनेत्रप्रान्तवाले भगवान् श्रीराम समुद्रपर कुपित हो उठे और पास ही खड़े हुए शुभलक्षणयुक्त लक्ष्मणसे इस प्रकार बोले—॥ १३ ॥

अवलेपः समुद्रस्य न दर्शयति यः स्वयम् । प्रशमश्च क्षमा चैव आर्जवं प्रियवादिता ॥ १४ ॥ असामर्थ्यफला ह्येते निर्गुणेषु सतां गुणाः । आत्मप्रशंसिनं दुष्टं धृष्टं विपरिधावकम् ॥ १५ ॥ सर्वत्रोत्सृष्टदण्डं च लोकः सत्कुरुते नरम् ।

भावार्थ

‘समुद्रको अपने ऊपर बड़ा अहङ्कार है, जिससे वह स्वयं मेरे सामने प्रकट नहीं हो रहा है । शान्ति, क्षमा, सरलता और मधुर भाषण—ये जो सत्पुरुषोंके गुण हैं, इनका गुणहीनोंके प्रति प्रयोग करनेपर यही परिणाम होता है कि वे उस गुणवान् पुरुषको भी असमर्थ समझ लेते हैं ॥ ‘जो अपनी प्रशंसा करनेवाला, दुष्ट, धृष्ट, सर्वत्र धावा करनेवाला और अच्छे-बुरे सभी लोगोंपर कठोर दण्डका प्रयोग करनेवाला होता है, उस मनुष्यका सब लोग सत्कार करते हैं ॥ १५½ ॥

न साम्ना शक्यते कीर्तिर्न साम्ना शक्यते यशः ॥१६॥ प्राप्तुं लक्ष्मण लोकेऽस्मिञ्जयो वा रणमूर्धनि । अद्य मद्वाणनिर्भिन्नैर्मकरैर्मकरालयम् ॥ १७ ॥ निरुद्धतोयं सौमित्रे प्लवद्भिः पश्य सर्वतः ।

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! सामनीति ( शान्ति ) के द्वारा इस लोकमें न तो कीर्ति प्राप्त की जा सकती है, न यशका प्रसार हो सकता है और न संग्राममें विजय ही पायी जा सकती है ॥ ‘सुमित्रानन्दन ! आज मेरे बाणोंसे खण्ड-खण्ड हो मगर और मत्स्य सब ओर उतराकर बहने लगेंगे और उनकी लाशोंसे इस मकरालय ( समुद्र ) का जल आच्छादित हो जायगा । तुम यह दृश्य आज अपनी आँखों देख लो ॥ १७½॥

भोगिनां पश्य भोगानि मया भिन्नानि लक्ष्मण ॥ १८ ॥ महाभोगानि मत्स्यानां करिणां च करानिह । सशङ्खशुक्तिकाजालं समीनमकरं तथा ॥ १९ ॥ अद्य युद्धेन महता समुद्रं परिशोषये ।

भावार्थ

‘लक्ष्मण ! तुम देखो कि मैं यहाँ जलमें रहनेवाले सर्पोंके शरीर, मत्स्योंके विशाल कलेवर और जल-हस्तियोंके शुण्ड-दण्डोंको किस तरह टुकड़े-टुकड़े कर डालता हूँ ॥ ‘आज महान् युद्ध ठानकर शङ्खों और सीपियोंके समुदाय तथा मत्स्यों और मगरोंसहित समुद्रको मैं अभी सुखाये देता हूँ ॥ १९½ ॥

क्षमया हि समायुक्तं मामयं मकरालयः ॥ २० ॥ असमर्थं विजानाति धिक् क्षमामीदृशे जने ।

भावार्थ

‘मगरोंका निवासभूत यह समुद्र मुझे क्षमासे युक्त देख असमर्थ समझने लगा है । ऐसे मूर्खोंके प्रति की गयी क्षमाको धिक्कार है ॥ २०½ ॥

न दर्शयति साम्ना मे सागरो रूपमात्मनः ॥ २१ ॥ चापमानय सौमित्रे शरांश्चाशीविषोपमान् । समुद्रं शोषयिष्यामि पद्भ्यां यान्तु प्लवंगमाः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘सुमित्रानन्दन ! सामनीतिका आश्रय लेनेसे यह समुद्र मेरे सामने अपना रूप नहीं प्रकट कर रहा है, इसलिये धनुष तथा विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण ले आओ । मैं समुद्रको सुखा डालूँगा; फिर वानरलोग पैदल ही लङ्कापुरीको चलें ॥ २१-२२ ॥

अद्याक्षोभ्यमपि क्रुद्धः क्षोभयिष्यामि सागरम् । वेलासु कृतमर्यादं सहस्रोर्मिसमाकुलम् ॥ २३ ॥ निर्मर्यादं करिष्यामि सायकैर्वरुणालयम् । महार्णवं क्षोभयिष्ये महादानवसंकुलम् ॥ २४ ॥ एवमुक्त्वा धनुष्पाणिः क्रोधविस्फारितेक्षणः । बभूव रामो दुर्धर्षो युगान्ताग्निरिव ज्वलन् ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘यद्यपि समुद्रको अक्षोभ्य कहा गया है; फिर भी आज कुपित होकर मैं इसे विक्षुब्ध कर दूँगा । इसमें सहस्रों तरङ्गें उठती रहती हैं; फिर भी यह सदा अपने तटकी मर्यादा ( सीमा ) में ही रहता है । किंतु अपने बाणोंसे मारकर मैं इसकी मर्यादा नष्ट कर दूँगा । बड़े-बड़े दानवोंसे भरे हुए इस महासागरमें हलचल मचा दूँगा—तूफान ला दूँगा’ ॥ यों कहकर दुर्धर्ष वीर भगवान् श्रीरामने हाथमें धनुष ले लिया । वे क्रोधसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे और प्रलयाग्निके समान प्रज्वलित हो उठे ॥ २५ ॥

सम्पीड्य च धनुर्घोरं कम्पयित्वा शरैर्जगत् । मुमोच विशिखानुग्रान् वज्रानिव शतक्रतुः ॥ २६ ॥

भावार्थ

उन्होंने अपने भयंकर धनुषको धीरेसे दबाकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी और उसकी टङ्कारसे सारे जगत्को कम्पित करते हुए बड़े भयंकर बाण छोड़े, मानो इन्द्रने बहुत-से वज्रोंका प्रहार किया हो ॥ २६ ॥

ते ज्वलन्तो महावेगास्तेजसा सायकोत्तमाः । प्रविशन्ति समुद्रस्य जलं वित्रस्तपन्नगम् ॥ २७ ॥

भावार्थ

तेजसे प्रज्वलित होते हुए वे महान् वेगशाली श्रेष्ठ बाण समुद्रके जलमें घुस गये । वहाँ रहनेवाले सर्प भयसे थर्रा उठे ॥ २७ ॥

तोयवेगः समुद्रस्य समीनमकरो महान् । स बभूव महाघोरः समारुतरवस्तथा ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘मत्स्यों और मगरोंसहित महासागरके जलका महान् वेग सहसा अत्यन्त भयंकर हो गया । वहाँ तूफानका कोलाहल छा गया ॥ २८ ॥

महोर्मिमालाविततः शङ्खशुक्तिसमावृतः । सधूमः परिवृत्तोर्मिः सहसासीन्महोदधिः ॥ २९ ॥

भावार्थ

बड़ी-बड़ी तरङ्ग-मालाओंसे सारा समुद्र व्याप्त हो उठा । शङ्ख और सीपियाँ पानीके ऊपर छा गयीं । वहाँ धुआँ उठने लगा और सारे महासागरमें सहसा बड़ी-बड़ी लहरें चक्कर काटने लगीं ॥ २९ ॥

व्यथिताः पन्नगाश्चासन् दीप्तास्या दीप्तलोचनाः । दानवाश्च महावीर्याः पातालतलवासिनः ॥ ३० ॥

भावार्थ

चमकीले फन और दीप्तिशाली नेत्रोंवाले सर्प व्यथित हो उठे तथा पातालमें रहनेवाले महापराक्रमी दानव भी व्याकुल हो गये ॥ ३० ॥

ऊर्मयः सिन्धुराजस्य सनक्रमकरास्तथा । विन्ध्यमन्दरसंकाशाः समुत्पेतुः सहस्रशः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

सिन्धुराजकी सहस्रों लहरें जो विन्ध्याचल और मन्दराचलके समान विशाल एवं विस्तृत थीं, नाकों और मकरोंको साथ लिये ऊपरको उठने लगीं ॥ ३१ ॥

आघूर्णिततरङ्गौघः सम्भ्रान्तोरगराक्षसः । उद्वर्तितमहाग्राहः सघोषो वरुणालयः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

सागरकी उत्ताल तरङ्ग-मालाएँ झूमने और चक्कर काटने लगीं । वहाँ निवास करनेवाले नाग और राक्षस घबरा गये । बड़े-बड़े ग्राह ऊपरको उछलने लगे तथा वरुणके निवासभूत उस समुद्रमें सब ओर भारी कोलाहल मच गया ॥ ३२ ॥

ततस्तु तं राघवमुग्रवेगं प्रकर्षमाणं धनुरप्रमेयम् । सौमित्रिरुत्पत्य विनिःश्वसन्तं मामेति चोक्त्वा धनुरालालम्बे ॥ ३३ ॥

भावार्थ

तदनन्तर श्रीरघुनाथजी रोषसे लंबी साँस लेते हुए अपने भयंकर वेगशाली अनुपम धनुषको पुनः खींचने लगे । यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मण उछलकर उनके पास जा पहुँचे और ‘बस, बस, अब नहीं, अब नहीं’ ऐसा कहते हुए उन्होंने उनका धनुष पकड़ लिया ॥ ३३ ॥

एतद्धिनापि ह्युदधेस्तवाद्य सम्पत्स्यते वीरतमस्य कार्यम् । भवद्विधाः क्रोधवशं न यान्ति दीर्घं भवान् पश्यतु साधुवृत्तम् ॥ ३४ ॥ अन्तर्हितैश्चापि तथान्तरिक्षे ब्रह्मर्षिभिश्चैव सुरर्षिभिश्च । शब्दः कृतः कष्टमिति ब्रुवद्भि- र्मामेति चोक्त्वा महता स्वरेण ॥ ३५ ॥

भावार्थ

(फिर वे बोले—) ‘भैया ! आप वीर-शिरोमणि हैं । इस समुद्रको नष्ट किये बिना भी आपका कार्य सम्पन्न हो जायगा । आप-जैसे महापुरुष क्रोधके अधीन नहीं होते हैं । अब आप सुदीर्घकालतक उपयोगमें लाये जानेवाले किसी अच्छे उपायपर दृष्टि डालें—कोई दूसरी उत्तम युक्ति सोचें’ ॥ इसी समय अन्तरिक्षमें अव्यक्तरूपसे स्थित महर्षियों और देवर्षियोंने भी ‘हाय ! यह तो बड़े कष्टकी बात है’ ऐसा कहते हुए ‘अब नहीं, अब नहीं’ कहकर बड़े जोरसे कोलाहल किया ॥ ३५ ॥

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