युद्धकाण्ड, सर्ग 20
ततो विनिष्ठां ध्वजिनीं सुग्रीवेणाभिपालिताम् । ददर्श राक्षसोऽभ्येत्य शार्दूलो नाम वीर्यवान् ॥ १ ॥ चारो राक्षसराजस्य रावणस्य दुरात्मनः । तां दृष्ट्वा सर्वतोऽव्यग्रां प्रतिगम्य स राक्षसः ॥ २ ॥ आविश्य लङ्कां वेगेन राजानमिदमब्रवीत् ।
भावार्थ
इसी बीचमें दुरात्मा राक्षसराज रावणके गुप्तचर पराक्रमी राक्षस शार्दूलने वहाँ आकर सागर-तटपर छावनी डाले पड़ी हुई सुग्रीवद्वारा सुरक्षित वानरी सेनाको देखा । सब ओर शान्तभावसे स्थित हुई उस विशाल सेनाको देखकर वह राक्षस लौट गया और जल्दीसे लङ्कापुरीमें जाकर राजा रावणसे यों बोला—॥ १-२½ ॥
एष वै वानरर्क्षौघो लङ्कां समभिवर्तते ॥ ३ ॥ अगाधश्चाप्रमेयश्च द्वितीय इव सागरः ।
भावार्थ
‘महाराज ! लङ्काकी ओर वानरों और भालुओंका एक प्रवाह-सा बढ़ा चला आ रहा है । वह दूसरे समुद्रके समान अगाध और असीम है ॥ ३½ ॥
पुत्रौ दशरथस्येमौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ ४ ॥ उत्तमौ रूपसम्पन्नौ सीतायाः पदमागतौ ।
भावार्थ
‘राजा दशरथके ये पुत्र दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण बड़े ही रूपवान् और श्रेष्ठ वीर हैं । वे सीताका उद्धार करनेके लिये आ रहे हैं ॥ ४½ ॥
एतौ सागरमासाद्य संनिविष्टौ महाद्युते ॥ ५ ॥ बलं चाकाशमावृत्य सर्वतो दशयोजनम् । तत्त्वभूतं महाराज क्षिप्रं वेदितुमर्हसि ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘महातेजस्वी महाराज ! ये दोनों रघुवंशी बन्धु भी इस समय समुद्र-तटपर ही आकर ठहरे हुए हैं । वानरोंकी वह सेना सब ओरसे दस योजन तकके खाली स्थानको घेरकर वहाँ ठहरी हुई है । यह बिल्कुल ठीक बात है । आप शीघ्र ही इस विषयमें विशेष जानकारी प्राप्त करें ॥ ५-६ ॥
तव दूता महाराज क्षिप्रमर्हन्ति वेदितुम् । उपप्रदानं सान्त्वं वा भेदो वात्र प्रयुज्यताम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘राक्षससम्राट् ! आपके दूत शीघ्र सारी बातोंका पता लगा लेनेके योग्य हैं, अतः उन्हें भेजें । तत्पश्चात् जैसा उचित समझें, वैसा करें—चाहे उन्हें सीताको लौटा दें, चाहे सुग्रीवसे मीठी-मीठी बातें करके उन्हें अपने पक्षमें मिला लें अथवा सुग्रीव और श्रीराममें फूट डलवा दें’ ॥ ७ ॥
शार्दूलस्य वचः श्रुत्वा रावणो राक्षसेश्वरः । उवाच सहसा व्यग्रः सम्प्रधार्यार्थमात्मनः । शुकं साधु तदा रक्षो वाक्यमर्थविदां वरम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
शार्दूलकी बात सुनकर राक्षसराज रावण सहसा व्यग्र हो उठा और अपने कर्तव्यका निश्चय करके अर्थवेत्ताओंमें श्रेष्ठ शुक नामक राक्षससे यह उत्तम वचन बोला–॥ ८ ॥
सुग्रीवं ब्रूहि गत्वाऽऽशु राजानं वचनान्मम । यथासंदेशमक्लीबं श्लक्ष्णया परया गिरा ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘दूत ! तुम मेरे कहनेसे शीघ्र ही वानरराज सुग्रीवके पास जाओ और मधुर एवं उत्तम वाणीद्वारा निर्भीकतापूर्वक उनसे मेरा यह संदेश कहो–॥ ९ ॥
त्वं वै महाराजकुलप्रसूतो महाबलश्चर्क्षरजःसुतश्च । न कश्चनार्थस्तव नास्त्यनर्थ- स्तथापि मे भ्रातृसमो हरीश ॥ १० ॥
भावार्थ
“वानरराज ! आप वानरोंके महाराजके कुलमें उत्पन्न हुए हैं । आदरणीय ऋक्षरजाके पुत्र हैं और स्वयं भी बड़े बलवान् हैं । मैं आपको अपने भाईके समान समझता हूँ । यदि मुझसे आपका कोई लाभ नहीं हुआ है तो मेरे द्वारा आपकी कोई हानि भी नहीं हुई है ॥ १० ॥
अहं यद्यहरं भार्यां राजपुत्रस्य धीमतः । किं तत्र तव सुग्रीव किष्किन्धां प्रति गम्यताम्॥ ११ ॥
भावार्थ
“सुग्रीव ! यदि मैं बुद्धिमान् राजपुत्र रामकी स्त्रीको हर लाया हूँ तो इसमें आपकी क्या हानि है ? अतः आप किष्किन्धाको लौट जाइये ॥ ११ ॥
नहीयं हरिभिर्लङ्का प्राप्तुं शक्या कथंचन । देवैरपि सगन्धर्वैः किं पुनर्नरवानरैः ॥ १२ ॥
भावार्थ
“हमारी इस लङ्कामें वानरलोग किसी तरह भी नहीं पहुँच सकते । यहाँ देवताओं और गन्धर्वोंका भी प्रवेश होना असम्भव है; फिर मनुष्यों और वानरोंकी तो बात ही क्या है ?” ॥ १२ ॥
स तदा राक्षसेन्द्रेण संदिष्टो रजनीचरः । शुको विहंगमो भूत्वा तूर्णमाप्लुत्य चाम्बरम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
राक्षसराज रावणके इस प्रकार संदेश देनेपर उस समय निशाचर शुक तोता नामक पक्षीका रूप धारण करके तुरंत आकाशमें उड़ चला ॥ १३ ॥
स गत्वा दूरमध्वानमुपर्युपरि सागरम् । संस्थितो ह्यम्बरे वाक्यं सुग्रीवमिदमब्रवीत् ॥ १४ ॥ सर्वमुक्तं यथाऽऽदिष्टं रावणेन दुरात्मना ।
भावार्थ
समुद्रके ऊपर-ही-ऊपर बहुत दूरका रास्ता तै करके वह सुग्रीवके पास जा पहुँचा और आकाशमें ही ठहरकर उसने दुरात्मा रावणकी आज्ञाके अनुसार वे सारी बातें सुग्रीवसे कहीं ॥ १४½ ॥
तत् प्रापयन्तं वचनं तूर्णमाप्लुत्य वानराः ॥ १५ ॥ प्रापद्यन्त तदा क्षिप्रं लोप्तुं हन्तुं च मुष्टिभिः ।
भावार्थ
जिस समय वह संदेश सुना रहा था, उसी समय वानर उछलकर तुरंत उसके पास जा पहुँचे । वे चाहते थे कि हम शीघ्र ही इसकी पाँखें नोच लें और इसे घूसोंसे ही मार डालें ॥ १५½ ॥
सर्वैः प्लवंगैः प्रसभं निगृहीतो निशाचरः ॥ १६ ॥ गगनाद् भूतले चाशु प्रतिगृह्यावतारितः ।
भावार्थ
इस निश्चयके साथ सारे वानरोंने उस निशाचरको बलपूर्वक पकड़ लिया और उसे कैद करके तुरंत आकाशसे भूतलपर उतारा ॥ १६½ ॥
वानरैः पीड्यमानस्तु शुको वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥ न दूतान् घ्नन्ति काकुत्स्थ वार्यन्तां साधु वानराः । यस्तु हित्वा मतं भर्तुः स्वमतं सम्प्रधारयेत् । अनुक्तवादी दूतः सन् स दूतो वधमर्हति ॥ १८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार वानरोंके पीड़ा देनेपर शुक पुकार उठा— ‘रघुनन्दन ! राजालोग दूतोंका वध नहीं करते हैं, अतः आप इन वानरोंको भलीभाँति रोकिये । जो स्वामीके अभिप्रायको छोड़कर अपना मत प्रकट करने लगता है, वह दूत बिना कही हुई बात कहनेका अपराधी है; अतः वही वधके योग्य होता है’ ॥ १७-१८ ॥
शुकस्य वचनं रामः श्रुत्वा तु परिदेवितम् । उवाच मावधिष्येति घ्नतः शाखामृगर्षभान् ॥ १९ ॥
भावार्थ
शुकके वचन और विलापको सुनकर भगवान् श्रीरामने उसे पीटनेवाले प्रमुख वानरोंको पुकारकर कहा—‘इसे मत मारो’ ॥ १९ ॥
स च पत्रलघुर्भूत्वा हरिभिर्दर्शितेऽभये । अन्तरिक्षे स्थितो भूत्वा पुनर्वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥
भावार्थ
उस समयतक शुकके पंखोंका भार कुछ हल्का हो गया था; ( क्योंकि वानरोंने उन्हें नोच डाला था ) फिर उनके अभय देनेपर शुक आकाशमें खड़ा हो गया और पुनः बोला–॥ २० ॥
सुग्रीव सत्त्वसम्पन्न महाबलपराक्रम । किं मया खलु वक्तव्यो रावणो लोकरावणः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘महान् बल और पराक्रमसे युक्त शक्तिशाली सुग्रीव ! समस्त लोकोंको रुलानेवाले रावणको मुझे आपकी ओरसे क्या उत्तर देना चाहिये’ ॥ २१ ॥
स एवमुक्तः प्लवगाधिपस्तदा प्लवंगमानामृषभो महाबलः । उवाच वाक्यं रजनीचरस्य चारं शुकं शुद्धमदीनसत्त्वः ॥ २२ ॥
भावार्थ
शुकके इस प्रकार पूछनेपर उस समय कपिशिरोमणि महाबली उदारचेता वानरराज सुग्रीवने उस निशाचरके दूतसे यह स्पष्ट एवं निश्छल बात कही—॥ २२ ॥
न मेऽसि मित्रं न तथानुकम्प्यो न चोपकर्तासि न मे प्रियोऽसि । अरिश्च रामस्य सहानुबन्ध- स्ततोऽसि वालीव वधार्ह वध्यः ॥२३॥
भावार्थ
‘( दूत ! तुम रावणसे इस प्रकार कहना—) वधके योग्य दशानन ! तुम न तो मेरे मित्र हो, न दयाके पात्र हो, न मेरे उपकारी हो और न मेरे प्रिय व्यक्तियोंमेंसे ही कोई हो । भगवान् श्रीरामके शत्रु हो, इस कारण अपने सगे-सम्बन्धियोंसहित तुम वालीकी भाँति ही मेरे लिये वध्य हो ॥ २३ ॥
निहन्म्यहं त्वां ससुतं सबन्धुं सज्ञातिवर्गं रजनीचरेश । लङ्कां च सर्वां महता बलेन सर्वैः करिष्यामि समेत्य भस्म ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘निशाचरराज ! मैं पुत्र, बन्धु और कुटुम्बीजनोंसहित तुम्हारा संहार करूँगा और बड़ी भारी सेनाके साथ आकर समस्त लङ्कापुरीको भस्म कर डालूँगा ॥ २४ ॥
न मोक्ष्यसे रावण राघवस्य सुरैः सहेन्द्रैरपि मूढ गुप्तः । अन्तर्हितः सूर्यपथं गतोऽपि तथैव पातालमनुप्रविष्टः । गिरीशपादाम्बुजसंगतो वा हतोऽसि रामेण सहानुजस्त्वम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘मूर्ख रावण ! यदि इन्द्र आदि समस्त देवता तुम्हारी रक्षा करें तो भी श्रीरघुनाथजीके हाथसे अब तुम जीवित नहीं छूट सकोगे । तुम अन्तर्धान हो जाओ, आकाशमें चले जाओ, पातालमें घुस जाओ अथवा महादेवजीके चरणारविन्दोंका आश्रय लो; फिर भी अपने भाइयोंसहित तुम अवश्य श्रीरामचन्द्रजीके हाथोंसे मारे जाओगे ॥ २५ ॥
तस्य ते त्रिषु लोकेषु न पिशाचं न राक्षसम् । त्रातारं नानुपश्यामि न गन्धर्वं न चासुरम् ॥ २६ ॥ अवधीस्त्वं जरावृद्धं गृध्रराजं जटायुषम् । किं नु ते रामसांनिध्ये सकाशे लक्ष्मणस्य च । हृता सीता विशालाक्षी यां त्वं गृह्य न बुध्यसे ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘तीनों लोकोंमें मुझे कोई भी पिशाच, राक्षस, गन्धर्व या असुर ऐसा नहीं दिखायी देता, जो तुम्हारी रक्षा कर सके ॥ ‘चिरकालके बूढ़े गृध्रराज जटायुको तुमने क्यों मारा ? यदि तुममें बड़ा बल था तो श्रीराम और लक्ष्मणके पाससे तुमने विशाल्लोचना सीताका अपहरण क्यों नहीं किया ? तुम सीताजीको ले जाकर अपने सिरपर आयी हुई विपत्तिको क्यों नहीं समझ रहे हो ? ॥ २७ ॥
महाबलं महात्मानं दुराधर्षं सुरैरपि । न बुध्यसे रघुश्रेष्ठं यस्ते प्राणान् हरिष्यति ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘रघुकुलतिलक श्रीराम महाबली, महात्मा और देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं, किंतु तुम उन्हें अभीतक समझ नहीं सके । ( तुमने छिपकर सीताका हरण किया है, परंतु ) वे ( सामने आकर ) तुम्हारे प्राणोंका अपहरण करेंगे’ ॥ २८ ॥
ततोऽब्रवीद् वालिसुतोऽप्यङ्गदो हरिसत्तमः । नायं दूतो महाराज चारकः प्रतिभाति मे ॥ २९ ॥ तुलितं हि बलं सर्वमनेन तव तिष्ठता । गृह्यतां मागमल्लङ्कामेतद्धि मम रोचते ॥ ३० ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वानरशिरोमणि वालिकुमार अङ्गदने कहा— ‘महाराज ! मुझे तो यह दूत नहीं, कोई गुप्तचर प्रतीत होता है । इसने यहाँ खड़े-खड़े आपकी सारी सेनाका माप-तौल कर लिया है— पूरा-पूरा अंदाजा लगा लिया है । अतः इसे पकड़ लिया जाय, लङ्काको न जाने पाये । मुझे यही ठीक जान पड़ता है’ ॥ २९-३० ॥
ततो राज्ञा समादिष्टाः समुत्पत्य वलीमुखाः । जगृहुश्च बबन्धुश्च विलपन्तमनाथवत् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
फिर तो राजा सुग्रीवके आदेशसे वानरोंने उछलकर उसे पकड़ लिया और बाँध दिया । वह बेचारा अनाथकी भाँति विलाप करता रहा ॥ ३१ ॥
शुकस्तु वानरैश्चण्डैस्तत्र तैः सम्प्रपीडितः । व्याचुक्रोश महात्मानं रामं दशरथात्मजम् । लुप्येते मे बलात् पक्षौ भिद्येते मे तथाक्षिणी ॥ ३२ ॥ यां च रात्रिं मरिष्यामि जाये रात्रिं च यामहम् । एतस्मिन्नन्तरे काले यन्मया ह्यशुभं कृतम् । सर्वं तदुपपद्येथा जह्यां चेद् यदि जीवितम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उन प्रचण्ड वानरोंसे पीड़ित हो शुकने दशरथनन्दन महात्मा श्रीरामको बड़े जोरसे पुकारा और कहा—‘प्रभो ! बलपूर्वक मेरी पाँखें नोची और आँखें फोड़ी जा रही हैं । यदि आज मैंने प्राणोंका त्याग किया तो जिस रातमें मेरा जन्म हुआ था और जिस रातको मैं मरूँगा, जन्म और मरणके इस मध्यवर्ती कालमें, मैंने जो भी पाप किया है, वह सब आपको ही लगेगा’ ॥ ३२-३३ ॥
नाघातयत् तदा रामः श्रुत्वा तत्परिदेवितम् । वानरानब्रवीद् रामो मुच्यतां दूत आगतः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
उस समय उसका वह विलाप सुनकर श्रीरामने उसका वध नहीं होने दिया । उन्होंने वानरोंसे कहा—‘छोड़ दो । यह दूत होकर ही आया था’ ॥ ३४ ॥
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