युद्धकाण्ड, सर्ग 19
राघवेणाभये दत्ते संनतो रावणानुजः । विभीषणो महाप्राज्ञो भूमिं समवलोकयत् ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार श्रीरघुनाथजीके अभय देनेपर विनयशील महाबुद्धिमान् विभीषणने नीचे उतरनेके लिये पृथ्वीकी ओर देखा ॥ १ ॥
खात् पपातावनिं हृष्टो भक्तैरनुचरैः सह । स तु रामस्य धर्मात्मा निपपात विभीषणः ॥ २ ॥ पादयोर्निपपाताथ चतुर्भिः सह राक्षसैः ।
भावार्थ
वे अपने भक्त सेवकोंके साथ हर्षसे भरकर आकाशसे पृथ्वीपर उतर आये । उतरकर चारों राक्षसोंके साथ धर्मात्मा विभीषण श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें गिर पड़े ॥ २½ ॥
अब्रवीच्च तदा वाक्यं रामं प्रति विभीषणः ॥ ३ ॥ धर्मयुक्तं च युक्तं च साम्प्रतं सम्प्रहर्षणम् ।
भावार्थ
उस समय विभीषणने श्रीरामसे धर्मानुकूल, युक्तियुक्त, समयोचित और हर्षवर्द्धक बात कही—॥ ३½ ॥
अनुजो रावणस्याहं तेन चास्म्यवमानितः ॥ ४ ॥ भवन्तं सर्वभूतानां शरण्यं शरणं गतः ।
भावार्थ
‘भगवन् ! मैं रावणका छोटा भाई हूँ । रावणने मेरा अपमान किया है । आप समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं, इसलिये मैंने आपकी शरण ली है ॥ ४½ ॥
परित्यक्ता मया लङ्का मित्राणि च धनानि च ॥ ५ ॥ भवद्गतं हि मे राज्यं जीवितं च सुखानि च ।
भावार्थ
‘अपने सभी मित्र, धन और लङ्कापुरीको मैं छोड़ आया हूँ । अब मेरा राज्य, जीवन और सुख सब आपके ही अधीन है’ ॥ ५½ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा रामो वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥ वचसा सान्त्वयित्वैनं लोचनाभ्यां पिबन्निव ।
भावार्थ
विभीषणके ये वचन सुनकर श्रीरामने मधुर वाणीद्वारा उन्हें सान्त्वना दी और नेत्रोंसे मानो उन्हें पी जायँगे, इसप्रकार प्रेमपूर्वक उनकी ओर देखते हुए कहा—॥ ६½ ॥
आख्याहि मम तत्त्वेन राक्षसानां बलाबलम् ॥ ७ ॥ एवमुक्तं तदा रक्षो रामेणाक्लिष्टकर्मणा । रावणस्य बलं सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘विभीषण ! तुम मुझे ठीक-ठीक राक्षसोंका बलाबल बताओ ।’ अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामके ऐसा कहनेपर राक्षस विभीषणने रावणके सम्पूर्ण बलका परिचय देना आरम्भ किया—॥ ७-८ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां गन्धर्वोरगपक्षिणाम् । राजपुत्र दशग्रीवो वरदानात् स्वयम्भुवः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार ! ब्रह्माजीके वरदानके प्रभावसे दशमुख रावण ( केवल मनुष्यको छोड़कर ) गन्धर्व, नाग और पक्षी आदि सभी प्राणियोंके लिये अवध्य है ॥ ९ ॥
रावणानन्तरो भ्राता मम ज्येष्ठश्च वीर्यवान् । कुम्भकर्णो महातेजाः शक्रप्रतिबलो युधि ॥ १० ॥
भावार्थ
‘रावणसे छोटा और मुझसे बड़ा जो मेरा भाई कुम्भकर्ण है, वह महातेजस्वी और पराक्रमी है । युद्धमें वह इन्द्रके समान बलशाली है ॥ १० ॥
राम सेनापतिस्तस्य प्रहस्तो यदि ते श्रुतः । कैलासे येन समरे मणिभद्रः पराजितः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! रावणके सेनापतिका नाम प्रहस्त है । शायद आपने भी उसका नाम सुना होगा । उसने कैलासपर घटित हुए युद्धमें कुबेरके सेनापति मणिभद्रको भी पराजित कर दिया था ॥ ११ ॥
बद्धगोधाङ्गुलित्राणस्त्ववध्यकवचो युधि । धनुरादाय यस्तिष्ठन्नदृश्यो भवतीन्द्रजित् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘रावणका पुत्र जो इन्द्रजित् है, वह गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने पहनकर अवध्य कवच धारण करके हाथमें धनुष-ले जब युद्धमें खड़ा होता है, उस समय अदृश्य हो जाता है ॥ १२ ॥
संग्रामे सुमहद्व्यूहे तर्पयित्वा हुताशनम् । अन्तर्धानगतः श्रीमानिन्द्रजिद्धन्ति राघव ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! श्रीमान् इन्द्रजित्ने अग्निदेवको तृप्त करके ऐसी शक्ति प्राप्त कर ली है कि वह विशाल व्यूहसे युक्त संग्राममें अदृश्य होकर शत्रुओंपर प्रहार करता है ॥ १३ ॥
महोदरमहापार्श्वौ राक्षसश्चाप्यकम्पनः । अनीकपास्तु तस्यैते लोकपालसमा युधि ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘महोदर, महापार्श्व और अकम्पन—ये तीनों राक्षस रावणके सेनापति हैं और युद्धमें लोकपालोंके समान पराक्रम प्रकट करते हैं ॥ १४ ॥
दशकोटिसहस्राणि रक्षसां कामरूपिणाम् । मांसशोणितभक्ष्याणां लङ्कापुरनिवासिनाम् ॥ १५ ॥ स तैस्तु सहितो राजा लोकपालानयोधयत् । सह देवैस्तु ते भग्ना रावणेन दुरात्मना ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘लङ्कामें रक्त और मांसका भोजन करनेवाले और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ जो दस कोटि सहस्र ( एक खरब ) राक्षस निवास करते हैं, उन्हें साथ लेकर राजा रावणने लोकपालोंसे युद्ध किया था । उस समय देवताओंसहित वे सब लोकपाल दुरात्मा रावणसे पराजित हो भाग खड़े हुए’१५-१६
विभीषणस्य तु वचस्तच्छ्रुत्वा रघुसत्तमः । अन्वीक्ष्य मनसा सर्वमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
विभीषणकी वह बात सुनकर रघुकुलतिलक श्रीरामने मन-ही-मन उस सबपर बारंबार विचार किया और इस प्रकार कहा—॥ १७ ॥
यानि कर्मापदानानि रावणस्य विभीषण । आख्यातानि च तत्त्वेन ह्यवगच्छामि तान्यहम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘विभीषण ! तुमने रावणके युद्धविषयक जिन-जिन पराक्रमोंका वर्णन किया है, उन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ १८ ॥
अहं हत्वा दशग्रीवं सप्रहस्तं सहात्मजम् । राजानं त्वां करिष्यामि सत्यमेतच्छृणोतु मे ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘परंतु सुनो । मैं सच कहता हूँ कि प्रहस्त और पुत्रोंके सहित रावणका वध करके मैं तुम्हें लङ्काका राजा बनाऊँगा ॥ १९ ॥
रसातलं वा प्रविशेत् पातालं वापि रावणः । पितामहसकाशं वा न मे जीवन् विमोक्ष्यते ॥ २० ॥
भावार्थ
‘रावण रसातल या पातालमें प्रवेश कर जाय अथवा पितामह ब्रह्माजीके पास चला जाय तो भी वह अब मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा ॥ २० ॥
अहत्वा रावणं संख्ये सपुत्रजनबान्धवम् । अयोध्यां न प्रवेक्ष्यामि त्रिभिस्तैर्भ्रातृभिः शपे ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘मैं अपने तीनों भाइयोंकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि युद्धमें पुत्र, भृत्यजन और बन्धु-बान्धवोंसहित रावणका वध किये बिना अयोध्यापुरीमें प्रवेश नहीं करूँगा’ ॥ २१ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्य रामस्याक्लिष्टकर्मणः । शिरसाऽऽवन्द्य धर्मात्मा वक्तुमेवं प्रचक्रमे ॥ २२ ॥
भावार्थ
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर धर्मात्मा विभीषणने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २२ ॥
राक्षसानां वधे साह्यं लङ्कायाश्च प्रधर्षणे । करिष्यामि यथाप्राणं प्रवेक्ष्यामि च वाहिनीम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! राक्षसोंके संहारमें और लङ्कापुरीपर आक्रमण करके उसे जीतनेमें मैं आपकी यथाशक्ति सहायता करूँगा तथा प्राणोंकी बाजी लगाकर युद्धके लिये रावणकी सेनामें भी प्रवेश करूँगा’ ॥ २३ ॥
इति ब्रुवाणं रामस्तु परिष्वज्य विभीषणम् । अब्रवील्लक्ष्मणं प्रीतः समुद्राज्जलमानय ॥ २४ ॥ तेन चेमं महाप्राज्ञमभिषिञ्च विभीषणम् । राजानं रक्षसां क्षिप्रं प्रसन्ने मयि मानद ॥ २५ ॥
भावार्थ
विभीषणके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीरामने उन्हें हृदयसे लगा लिया और प्रसन्न होकर लक्ष्मणसे कहा—‘दूसरोंको मान देनेवाले सुमित्रानन्दन ! तुम समुद्रसे जल ले आओ और उसके द्वारा इन परम बुद्धिमान् राक्षसराज विभीषणका लङ्काके राज्यपर शीघ्र ही अभिषेक कर दो । मेरे प्रसन्न होनेपर इन्हें यह लाभ मिलना ही चाहिये’ ॥ २४-२५ ॥
एवमुक्तस्तु सौमित्रिरभ्यषिञ्चद् विभीषणम् । मध्ये वानरमुख्यानां राजानं राजशासनात् ॥ २६ ॥
भावार्थ
उनके ऐसा कहनेपर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने मुख्य-मुख्य वानरोंके बीच महाराज श्रीरामके आदेशसे विभीषणका राक्षसोंके राजाके पदपर अभिषेक कर दिया ॥ २६ ॥
तं प्रसादं तु रामस्य दृष्ट्वा सद्यः प्लवङ्गमाः । प्रचुक्रुशुर्महात्मानं साधुसाध्विति चाब्रुवन् ॥ २७ ॥
भावार्थ
भगवान् श्रीरामका यह तात्कालिक प्रसाद(अनुग्रह)देखकर सब वानर हर्षध्वनि करने और महात्मा श्रीरामको साधुवाद देने लगे ॥ २७ ॥
अब्रवीच्च हनूमांश्च सुग्रीवश्च विभीषणम् । कथं सागरमक्षोभ्यं तराम वरुणालयम् । सैन्यैः परिवृताः सर्वे वानराणां महौजसाम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् हनुमान् और सुग्रीवने विभीषणसे पूछा—‘राक्षसराज ! हम सब लोग इस अक्षोभ्य समुद्रको महाबली वानरोंकी सेनाओंके साथ किस प्रकार पार कर सकेंगे ? ॥ २८ ॥
उपायैरभिगच्छाम यथा नदनदीपतिम् । तराम तरसा सर्वे ससैन्या वरुणालयम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘जिस उपायसे हम सब लोग सेनासहित नदों और नदियोंके स्वामी वरुणालय समुद्रके पार जा सकें, वह बताओ’ ॥२९॥
एवमुक्तस्तु धर्मात्मा प्रत्युवाच विभीषणः । समुद्रं राघवो राजा शरणं गन्तुमर्हति ॥ ३० ॥ खानितः सगरेणायमप्रमेयो महोदधिः । कर्तुमर्हति रामस्य ज्ञातेः कार्यं महोदधिः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
उनके इस प्रकार पूछनेपर धर्मात्मा विभीषणने यों उत्तर दिया—‘रघुवंशी राजा श्रीरामको समुद्रकी शरण लेनी चाहिये ॥ ‘इस अपार महासागरको राजा सगरने खुदवाया था । श्रीरामचन्द्रजी सगरके वंशज हैं । इसलिये समुद्रको इनका काम अवश्य करना चाहिये’ ॥ ३१ ॥
एवं विभीषणेनोक्तो राक्षसेन विपश्चिता । आजगामाथ सुग्रीवो यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
विद्वान् राक्षस विभीषणके ऐसा कहनेपर सुग्रीव उस स्थानपर आये, जहाँ लक्ष्मणसहित श्रीराम विद्यमान थे ॥ ३२ ॥
ततश्चाख्यातुमारेभे विभीषणवचः शुभम् । सुग्रीवो विपुलग्रीवः सागरस्योपवेशनम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
वहाँ विशाल ग्रीवावाले सुग्रीवने समुद्रपर धरना देनेके विषयमें जो विभीषणका शुभ वचन था, उसे कहना आरम्भ किया ॥ ३३ ॥
प्रकृत्या धर्मशीलस्य रामस्यास्याप्यरोचत । सलक्ष्मणं महातेजाः सुग्रीवं च हरीश्वरम् ॥ ३४ ॥ सत्क्रियार्थं क्रियादक्षं स्मितपूर्वमभाषत ।
भावार्थ
भगवान् श्रीराम स्वभावसे ही धर्मशील थे, अतः उन्हें भी विभीषणकी यह बात अच्छी लगी । वे महातेजस्वी रघुनाथजी लक्ष्मणसहित कार्यदक्ष वानरराज सुग्रीवका सत्कार करते हुए उनसे मुसकराकर बोले—॥ ३४½ ॥
विभीषणस्य मन्त्रोऽयं मम लक्ष्मण रोचते ॥ ३५ ॥ सुग्रीवः पण्डितो नित्यं भवान् मन्त्रविचक्षणः । उभाभ्यां सम्प्रधार्यार्थे रोचते यत् तदुच्यताम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! विभीषणकी यह सम्मति मुझे भी अच्छी लगती है; परंतु सुग्रीव राजनीतिके बड़े पण्डित हैं और तुम भी समयोचित सलाह देनेमें सदा ही कुशल हो । इसलिये तुम दोनों प्रस्तुत कार्यपर अच्छी तरह विचार करके जो ठीक जान पड़े, वह बताओ’ ॥ ३५-३६ ॥
एवमुक्तौ ततो वीरावुभौ सुग्रीवलक्ष्मणौ । समुदाचारसंयुक्तमिदं वचनमूचतुः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
भगवान् श्रीरामके ऐसा कहनेपर वे दोनों वीर सुग्रीव और लक्ष्मण उनसे आदरपूर्वक बोले—॥ ३७ ॥
किमर्थं नौ नरव्याघ्र न रोचिष्यति राघव । विभीषणेन यत् तूक्तमस्मिन् काले सुखावहम् ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह रघुनन्दन ! इस समय विभीषणने जो सुखदायक बात कही है, वह हम दोनोंको क्यों नहीं अच्छी लगेगी ? ॥ ३८ ॥
अवदध्वा सागरे सेतुं घोरेऽस्मिन् वरुणालये । लङ्का नासादितुं शक्या सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘इस भयंकर समुद्रमें पुल बाँधे बिना इन्द्रसहित देवता और असुर भी इधरसे लङ्कापुरीमें नहीं पहुँच सकते ॥ ३९ ॥
विभीषणस्य शूरस्य यथार्थं क्रियतां वचः । अलं कालात्ययं कृत्वा सागरोऽयं नियुज्यताम् । यथा सैन्येन गच्छाम पुरीं रावणपालिताम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘इसलिये आप शूरवीर विभीषणके यथार्थ वचनके अनुसार ही कार्य करें । अब अधिक विलम्ब करना ठीक नहीं है । इस समुद्रसे यह अनुरोध किया जाय कि वह हमारी सहायता करे, जिससे हम सेनाके साथ रावणपालित लङ्कापुरीमें पहुँच सकें’ ॥ ४० ॥
एवमुक्तः कुशास्तीर्णे तीरे नदनदीपतेः । संविवेश तदा रामो वेद्यामिव हुताशनः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
उन दोनोंके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी उस समय समुद्रके तटपर कुश बिछाकर उसके ऊपर उसी तरह बैठे, जैसे वेदीपर अग्निदेव प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ४१ ॥
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