युद्धकाण्ड, सर्ग 22
अथोवाच रघुश्रेष्ठः सागरं दारुणं वचः । अद्य त्वां शोषयिष्यामि सपातालं महार्णव ॥ १ ॥
भावार्थ
तब रघुकुलतिलक श्रीरामने समुद्रसे कठोर शब्दोंमें कहा--‘महासागर ! आज मैं पातालसहित तुझे सुखा डालूँगा ॥ १ ॥
शरनिर्दग्धतोयस्य परिशुष्कस्य सागर । मया निहतसत्त्वस्य पांसुरुत्पद्यते महान् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘सागर ! मेरे बाणोंसे तुम्हारी सारी जलराशि दग्ध हो जायगी, तू सूख जायगा और तेरे भीतर रहनेवाले सब जीव नष्ट हो जायँगे । उस दशामें तेरे यहाँ जलके स्थानमें विशाल बालुकाराशि पैदा हो जायगी ॥ २ ॥
मत्कार्मुकविसृष्टेन शरवर्षेण सागर । परं तीरं गमिष्यन्ति पत्त्विरेव प्लवंगमाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘समुद्र ! मेरे धनुषद्वारा की गयी बाण-वर्षासे जब तेरी ऐसी दशा हो जायगी; तब वानरलोग पैदल ही चलकर तेरे उस पार पहुँच जायँगे ॥ ३ ॥
विचिन्वन्नाभिजानासि पौरुषं नापि विक्रमम् । दानवालय संतापं मत्तो नाम गमिष्यसि ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘दानवोंके निवासस्थान ! तू केवल चारों ओरसे बहकर आयी हुई जलराशिका संग्रह करता है । तुझे मेरे बल और पराक्रमका पता नहीं है । किंतु याद रख; ( इस उपेक्षाके कारण ) तुझे मुझसे भारी संताप प्राप्त होगा’ ॥ ४ ॥
ब्राह्मेणास्त्रेण संयोज्य ब्रह्मदण्डनिभं शरम् । संयोज्य धनुषि श्रेष्ठे विचकर्ष महाबलः ॥ ५ ॥
भावार्थ
यों कहकर महाबली श्रीरामने एक ब्रह्मदण्डके समान भयंकर बाणको ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित करके अपने श्रेष्ठ धनुषपर चढ़ाकर खींचा ॥ ५ ॥
तस्मिन् विकृष्टे सहसा राघवेण शरासने । रोदसी सम्पफालेव पर्वताश्च चकम्पिरे ॥ ६ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके द्वारा सहसा उस धनुषके खींचे जाते ही पृथ्वी और आकाश मानो फटने लगे और पर्वत डगमगा उठे ॥ ६ ॥
तमश्च लोकमाचव्रे दिशाश्च न चकाशिरे । प्रतिचुक्षुभिरे चाशु सरांसि सरितस्तथा ॥ ७ ॥
भावार्थ
सारे संसारमें अन्धकार छा गया । किसीको दिशाओंका ज्ञान न रहा । सरिताओं और सरोवरोंमें तत्काल हलचल पैदा हो गयी ॥ ७ ॥
तिर्यक् च सह नक्षत्रैः संगतौ चन्द्रभास्करौ । भास्करांशुभिरादीप्तं तमसा च समावृतम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
चन्द्रमा और सूर्य नक्षत्रोंके साथ तिर्यक्-गतिसे चलने लगे । सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित होनेपर भी आकाशमें अन्धकार छा गया ॥ ८ ॥
प्रचकाशे तदाऽऽकाशमुल्काशतविदीपितम् । अन्तरिक्षाच्च निर्घाता निर्जग्मुरतुलस्वनाः ॥ ९ ॥
भावार्थ
उस समय आकाशमें सैकड़ों उल्काएँ प्रज्वलित होकर उसे प्रकाशित करने लगीं तथा अन्तरिक्षसे अनुपम एवं भारी गड़गड़ाहटके साथ वज्रपात होने लगे ॥ ९ ॥
वपुःप्रकर्षेण वबुर्दिव्यमारुतपङ्क्तयः । बभञ्ज च तदा वृक्षाञ्जलदानुद्रहन्मुहुः ॥ १० ॥ आरुजंश्चैव शैलाग्राग्निशिखराणि बभञ्ज च ।
भावार्थ
परिवह आदि वायुभेदोंका समूह बड़े वेगसे बहने लगा । वह मेघोंकी घटाको उड़ाता हुआ बारंबार वृक्षोंको तोड़ने, बड़े-बड़े पर्वतोंसे टकराने और उनके शिखरोंको खण्डित करके गिराने लगा ॥ १०½ ॥
दिवि च स्म महामेघाः संहताः समहास्वनाः ॥ ११ ॥ मुमुचुर्वैद्युतानग्नींस्ते महाशनयस्तदा । यानि भूतानि दृश्यानि चुक्रुशुश्चाशनेः समम् ॥ १२ ॥ अदृश्यानि च भूतानि मुमुचुर्भैरवस्वनम् ।
भावार्थ
आकाशमें महान् वेगशाली विशाल वज्र भारी गड़गड़ाहटके साथ टकराकर उस समय वैद्युत अग्निकी वर्षा करने लगे । जो प्राणी दिखायी दे रहे थे और जो नहीं दिखायी देते थे, वे सब बिजलीकी कड़कके समान भयंकर शब्द करने लगे ॥ ११-१२½ ॥
शिश्यिरे चाभिभूतानि संत्रस्तान्युद्विजन्ति च ॥ १३ ॥ सम्प्रविव्यथिरे चापि न च पस्पन्दिरे भयात् ।
भावार्थ
उनमेंसे कितने ही अभिभूत होकर धराशायी हो गये । कितने ही भयभीत और उद्विग्न हो उठे । कोई व्यथासे व्याकुल हो गये और कितने ही भयके मारे जडवत् हो गये ॥ १३½ ॥
सह भूतैः सतोयोर्मिः सनागः सहराक्षसः ॥ १४ ॥ सहसाभूत् ततो वेगाद् भीमवेगो महोदधिः । योजनं व्यतिचक्राम वेलामन्यत्र सम्प्लवात् ॥ १५ ॥
भावार्थ
समुद्र अपने भीतर रहनेवाले प्राणियों, तरङ्गों, सर्पों और राक्षसोंसहित सहसा भयानक वेगसे युक्त हो गया और प्रलयकालके बिना ही तीव्रगतिसे अपनी मर्यादा लाँघकर एक-एक योजन आगे बढ़ गया ॥ १४-१५ ॥
तं तथा समतिक्रान्तं नातिचक्राम राघवः । समुद्धतममित्रघ्नो रामो नदनदीपतिम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार नदों और नदियोंके स्वामी उस उद्धत समुद्रके मर्यादा लाँघकर बढ़ जानेपर भी शत्रुसूदन श्रीरामचन्द्रजी अपने स्थानसे पीछे नहीं हटे ॥ १६ ॥
ततो मध्यात् समुद्रस्य सागरः स्वयमुत्थितः । उदयाद्रिमहाशैलान्मेरोरिव दिवाकरः ॥ १७ ॥
भावार्थ
तब समुद्रके बीचसे सागर स्वयं मूर्तिमान् होकर प्रकट हुआ, मानो महाशैल मेरुपर्वतके अङ्गभूत उदयाचलसे सूर्यदेव उदित हुए हों ॥ १७ ॥
पन्नगैः सह दीप्तास्यैः समुद्रः प्रत्यदृश्यत । स्निग्धवैदूर्यसंकाशो जाम्बूनदविभूषणः ॥ १८ ॥ रक्तमाल्याम्बरधरः पद्मपत्रनिभेक्षणः । सर्वपुष्पमयीं दिव्यां शिरसा धारयन् स्रजम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
चमकीले मुखवाले सर्पोंके साथ समुद्रका दर्शन हुआ । उसका वर्ण स्निग्ध वैदूर्यमणिके समान श्याम था । उसने जाम्बूनदनामक सुवर्णके बने हुए आभूषण पहन रक्खे थे ॥ लाल रंगके फूलोंकी माला तथा लाल ही वस्त्र धारण किये थे । उसके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर थे । उसने सिरपर एक दिव्य पुष्पमाला धारण कर रक्खी थी, जो सब प्रकारके फूलोंसे बनायी गयी थी ॥ १९ ॥
जातरूपमयैश्चैव तपनीयविभूषणैः । आत्मजानां च रत्नानां भूषितो भूषणोत्तमैः ॥ २० ॥
भावार्थ
सुवर्ण और तपे हुए काञ्चनके आभूषण उसकी शोभा बढ़ाते थे । वह अपने ही भीतर उत्पन्न हुए रत्नोंके उत्तम आभूषणोंसे विभूषित था ॥ २० ॥
धातुभिर्मण्डितः शैलो विविधैर्हिमवानिव । एकावलीमध्यगतं तरलं पाण्डरप्रभम् ॥ २१ ॥ विपुलेनोरसा बिभ्रत्कौस्तुभस्य सहोदरम् ।
भावार्थ
इसीलिये नाना प्रकारके धातुओंसे अलंकृत हिमवान् पर्वतके समान शोभा पाता था । वह अपने विशाल वक्षःस्थलपर कौस्तुभ मणिके सहोदर ( सदृश ) एक श्वेत प्रभासे युक्त मुख्य रत्न धारण किये हुए था, जो मोतियोंकी इकहरी मालाके मध्यभागमें प्रकाशित हो रहा था ॥ २१½ ॥
आघूर्णिततरङ्गौघः कालिकानिलसंकुलः ॥ २२ ॥ गङ्गासिन्धुप्रधानाभिरापगाभिः समावृतः ।
भावार्थ
चञ्चल तरङ्गें उसे घेरे हुए थीं । मेघमाला और वायुसे वह व्याप्त था तथा गङ्गा और सिन्धु आदि नदियाँ उसे सब ओरसे घेरकर खड़ी थीं ॥ २२½ ॥
उद्वर्तितमहाग्राहः सम्भ्रान्तोरगराक्षसः ॥ २३ ॥ देवतानां सुरूपाभिर्नानारूपाभिरीश्वरः । सागरः समुपक्रम्य पूर्वमामन्त्र्य वीर्यवान् ॥ २४ ॥ अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं राघवं शरपाणिनम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
उसके भीतर बड़े-बड़े ग्राह उद्भ्रान्त हो रहे थे, नाग और राक्षस घबराये हुए थे । देवताओंके समान सुन्दर रूप धारण करके आयी हुई विभिन्न रूपवाली नदियोंके साथ शक्तिशाली नदीपति समुद्रने निकट आकर पहले धनुर्धर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधित किया और फिर हाथ जोड़कर कहा—२३-२५
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च राघव । स्वभावे सौम्य तिष्ठन्ति शाश्वतं मार्गमाश्रिताः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘सौम्य रघुनन्दन ! पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज—ये सर्वदा अपने स्वभावमें स्थित रहते हैं, अपने सनातन मार्गको कभी नहीं छोड़ते—सदा उसीके आश्रित रहते हैं ॥ २६ ॥
तत्स्वभावो ममाप्येष यदगाधोऽहमप्लवः । विकारस्तु भवेद् गाध एतत् ते प्रवदाम्यहम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘मेरा भी यह स्वभाव ही है जो मैं अगाध और अथाह हूँ—कोई मेरे पार नहीं जा सकता । यदि मेरी थाह मिल जाय तो यह विकार—मेरे स्वभावका व्यतिक्रम ही होगा । इसलिये मैं आपसे पार होनेका यह उपाय बताता हूँ ॥ २७ ॥
न कामान्न च लोभाद् वा न भयात् पार्थिवात्मज । ग्राहनक्राकुलजलं स्तम्भयेयं कथंचन ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार ! मैं मगर और नाकेआदिसे भरे हुए अपने जलको किसी कामनासे, लोभसे अथवा भयसे किसी तरह स्तम्भित नहीं होने दूँगा ॥ २८ ॥
विधास्ये येन गन्तासि विषहिष्येऽप्यहं तथा । न ग्राहा विधमिष्यन्ति यावत्सेना तरिष्यति । हरीणां तरणे राम करिष्यामि यथा स्थलम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! मैं ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे आप मेरे पार चले जायँगे, ग्राह वानरोंको कष्ट नहीं देंगे, सारी सेना पार उतर जायगी और मुझे भी खेद नहीं होगा । मैं आसानीसे सब कुछ सह लूँगा । वानरोंके पार जानेके लिये जिस प्रकार पुल बन जाय, वैसा प्रयत्न मैं करूँगा’ ॥ २९ ॥
तमब्रवीत् तदा रामः शृणु मे वरुणालय । अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन् देशे निपात्यताम् ॥३०॥
भावार्थ
तब श्रीरामचन्द्रजीने उससे कहा—‘वरुणालय ! मेरी बात सुनो । मेरा यह विशाल बाण अमोघ है । बताओ, इसे किस स्थानपर छोड़ा जाय’ ॥ ३० ॥
रामस्य वचनं श्रुत्वा तं च दृष्ट्वा महाशरम् । महोदधिर्महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥ ३१ ॥ उत्तरेणावकाशोऽस्ति कश्चित् पुण्यतरो मम । द्रुमकुल्य इति ख्यातो लोके ख्यातो यथा भवान् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर और उस महान् बाणको देखकर महातेजस्वी महासागरने रघुनाथजीसे कहा—॥ ‘प्रभो ! जैसे जगत्में आप सर्वत्र विख्यात एवं पुण्यात्मा हैं, उसी प्रकार मेरे उत्तरकी ओर द्रुमकुल्य नामसे विख्यात एक बड़ा ही पवित्र देश है ॥ ३२ ॥
उग्रदर्शनकर्माणो बहवस्तत्र दस्यवः । आभीरप्रमुखाः पापाः पिबन्ति सलिलं मम ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘वहाँ आभीर आदि जातियोंके बहुत-से मनुष्य निवास करते हैं, जिनके रूप और कर्म बड़े ही भयानक हैं । वे सबके-सब पापी और लुटेरे हैं । वे लोग मेरा जल पीते हैं ॥३३॥
तैर्न तत्स्पर्शनं पापं सहेयं पापकर्मभिः । अमोघः क्रियतां राम अयं तत्र शरोत्तमः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘उन पापाचारियोंका स्पर्श मुझे प्राप्त होता रहता है, इस पापको मैं नहीं सह सकता । श्रीराम ! आप अपने इस उत्तम बाणको वहीं सफल कीजिये’ ॥ ३४ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सागरस्य महात्मनः । मुमोच तं शरं दीप्तं परं सागरदर्शनात् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
महामना समुद्रका यह वचन सुनकर सागरके दिखाये अनुसार उसी देशमें श्रीरामचन्द्रजीने वह अत्यन्त प्रज्वलित बाण छोड़ दिया ॥ ३५ ॥
तेन तन्मरुकान्तारं पृथिव्यां किल विश्रुतम् । निपातितः शरो यत्र वज्राशनिसमप्रभः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
वह वज्र और अशनिके समान तेजस्वी बाण जिस स्थानपर गिरा था, वह स्थान उस बाणके कारण ही पृथ्वीमें दुर्गम मरुभूमिके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३६ ॥
ननाद च तदा तत्र वसुधा शल्यपीडिता । तस्माद् व्रणमुखात् तोयमुत्पपात रसातलात् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
उस बाणसे पीड़ित होकर उस समय वसुधा आर्तनाद कर उठी। उसकी चोटसे जो छेद हुआ, उसमें होकर रसातलका जल ऊपरको उछलने लगा ॥ ३७ ॥
स बभूव तदा कूपो व्रण इत्येव विश्रुतः । सततं चोत्थितं तोयं समुद्रस्येव दृश्यते ॥ ३८ ॥
भावार्थ
वह छिद्र कुएँके समान हो गया और व्रणके नामसे प्रसिद्ध हुआ । उस कुएँसे सदा निकलता हुआ जल समुद्रके जलकी भाँति ही दिखायी देता है ॥ ३८ ॥
अवदारणशब्दश्च दारुणः समपद्यत । तस्मात् तद् बाणपातेन अपः कुक्षिष्वशोषयत् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
उस समय वहाँ भूमिके विदीर्ण होनेका भयंकर शब्द सुनायी पड़ा । उस बाणको गिराकर वहाँके भूतलकी कुक्षिमें ( तालाब-पोखरे आदिमें ) वर्तमान जलको श्रीरामने सुखा दिया ॥ ३९ ॥
विख्यातं त्रिषु लोकेषु मरुकान्तारमेव च । शोषयित्वा तु तं कुक्षिं रामो दशरथात्मजः ॥ ४० ॥ वरं तस्मै ददौ विद्वान् मरवेऽमरविक्रमः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
तबसे वह स्थान तीनों लोकोंमें मरुकान्तारके नामसे ही विख्यात हो गया । जो पहले समुद्रका कुक्षिप्रदेश था, उसे सुखाकर देवोपम पराक्रमी विद्वान् दशरथनन्दन श्रीरामने उस मरुभूमिको वरदान दिया ॥ ४०-४१ ॥
पशव्यश्चाल्परोगश्च फलमूलरसायुतः । बहुस्नेहो बहुक्षीरः सुगन्धिर्विविधौषधिः ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘यह मरुभूमि पशुओंके लिये हितकारी होगी । यहाँ रोग कम होंगे । यह भूमि फल, मूल और रसोंसे सम्पन्न होगी । यहाँ घी आदि चिकने पदार्थ अधिक सुलभ होंगे, दूधकी भी बहुतायत होगी । यहाँ सुगन्ध छायी रहेगी और अनेक प्रकारकी ओषधियाँ उत्पन्न होंगी’ ॥ ४२ ॥
एवमेतैश्च संयुक्तो बहुभिः संयुतो मरुः । रामस्य वरदानाच्च शिवः पन्था बभूव ह ॥ ४३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार भगवान् श्रीरामके वरदानसे वह मरुप्रदेश इस तरहके बहुसंख्यक गुणोंसे सम्पन्न हो सबके लिये मङ्गलकारी मार्ग बन गया ॥ ४३ ॥
तस्मिन् दग्धे तदा कुक्षौ समुद्रः सरितां पतिः । राघवं सर्वशास्त्रज्ञमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४४ ॥
भावार्थ
उस कुक्षिस्थानके दग्ध हो जानेपर सरिताओंके स्वामी समुद्रने सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता श्रीरघुनाथजीसे कहा—॥४४॥
अयं सौम्य नलो नाम तनयो विश्वकर्मणः । पित्रा दत्तवरः श्रीमान् प्रीतिमान् विश्वकर्मणः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! आपकी सेनामें जो यह नल नामक कान्तिमान् वानर है, साक्षात् विश्वकर्माका पुत्र है । इसे इसके पिताने यह वर दिया है कि ‘तुम मेरे ही समान समस्त शिल्पकलामें निपुण होओगे ।’ प्रभो ! आप भी तो इस विश्वके स्रष्टा विश्वकर्मा हैं । इस नलके हृदयमें आपके प्रति बड़ा प्रेम है ॥४५॥
एष सेतुं महोत्साहः करोतु मयि वानरः । तमहं धारयिष्यामि यथा ह्येष पिता तथा ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘यह महान् उत्साही वानर अपने पिताके समान ही शिल्पकर्ममें समर्थ है, अतः यह मेरे ऊपर पुलका निर्माण करे । मैं उस पुलको धारण करूँगा’ ॥ ४६ ॥
एवमुक्त्वोदधिर्नष्टः समुत्थाय नलस्ततः । अब्रवीद् वानरश्रेष्ठो वाक्यं रामं महाबलम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
यों कहकर समुद्र अदृश्य हो गया । तब वानरश्रेष्ठ नल उठकर महाबली भगवान् श्रीरामसे बोला—॥ ४७ ॥
अहं सेतुं करिष्यामि विस्तीर्णे मकरालये । पितुः सामर्थ्यमासाद्य तत्त्वमाह महोदधिः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! मैं पिताकी दी हुई शक्तिको पाकर इस विस्तृत समुद्रपर सेतुका निर्माण करूँगा । महासागरने ठीक कहा है ॥ ४८ ॥
दण्ड एव वरो लोके पुरुषस्येति मे मतिः । धिक् क्षमामकृतज्ञेषु सान्त्वं दानमथापि वा ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘संसारमें पुरुषके लिये अकृतज्ञोंके प्रति दण्डनीतिका प्रयोग ही सबसे बड़ा अर्थसाधक है, ऐसा मेरा विश्वास होता है । वैसे लोगोंके प्रति क्षमा, सान्त्वना और दाननीतिके प्रयोगको धिक्कार है ॥ ४९ ॥
अयं हि सागरो भीमः सेतुकर्मदिदृक्षया । ददौ दण्डभयाद् गाधं राघवाय महोदधिः ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘इस भयानक समुद्रको राजा सगरके पुत्रोंने ही बढ़ाया है । फिर भी इसने कृतज्ञतासे नहीं, दण्डके भयसे ही सेतुकर्म देखनेकी इच्छा मनमें लाकर श्रीरघुनाथजीको अपनी थाह दी है ॥ ५० ॥
मम मातुर्वरो दत्तो मन्दरे विश्वकर्मणा । मया तु सदृशः पुत्रस्तव देवि भविष्यति ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘मन्दराचलपर विश्वकर्माजीने मेरी माताको यह वर दिया था कि ‘देवि ! तुम्हारे गर्भसे मेरे ही समान पुत्र होगा’ ॥५१॥
औरसस्तस्य पुत्रोऽहं सदृशो विश्वकर्मणा । स्मारितोऽस्म्यहमेतेन तत्त्वमाह महोदधिः । न चाप्यहमनुक्तो वः प्रब्रूयामात्मनो गुणान् ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार मैं विश्वकर्माका औरस पुत्र हूँ और शिल्पकर्ममें उन्हींके समान हूँ । इस समुद्रने आज मुझे इन सब बातोंका स्मरण दिला दिया है । महासागरने जो कुछ कहा है, ठीक है । मैं बिना पूछे आपलोगोंसे अपने गुणोंको नहीं बता सकता था, इसीलिये अबतक चुप था ॥ ५२ ॥
समर्थश्चाप्यहं सेतुं कर्तुं वै वरुणालये । तस्मादद्यैव बध्नन्तु सेतुं वानरपुङ्गवाः ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘मैं महासागरपर पुल बाँधनेमें समर्थ हूँ, अतः सब वानर आज ही पुल बाँधनेका कार्य आरम्भ कर दें’ ॥५३॥
ततो विसृष्टा रामेण सर्वतो हरिपुङ्गवाः । उत्पेतुर्महारण्यं हृष्टाः शतसहस्रशः ॥ ५४ ॥
भावार्थ
तब भगवान् श्रीरामके भेजनेसे लाखों बड़े-बड़े वानर हर्ष और उत्साहमें भरकर सब ओर उछलते हुए गये और बड़े-बड़े जंगलोंमें घुस गये ॥ ५४ ॥
ते नगान् नगसंकाशाः शाखामृगगणर्षभाः । बभञ्जुः पादपांस्तत्र प्रचकर्षुश्च सागरम् ॥ ५५ ॥
भावार्थ
वे पर्वतके समान विशालकाय वानरशिरोमणि पर्वत-शिखरों और वृक्षोंको तोड़ देते और उन्हें समुद्रतक खींच लाते थे ॥ ५५ ॥
ते सालैश्चाश्वकर्णैश्च धवैर्वंशैश्च वानराः । कुटजैरर्जुनैस्तालैस्तिलकैस्तिनिशैरपि ॥ ५६ ॥ बिल्वकैः सप्तपर्णैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः । चूतैश्चाशोकवृक्षैश्च सागरं समपूरयन् ॥ ५७ ॥
भावार्थ
वे साल, अश्वकर्ण, धव, बाँस, कुटज, अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छितवन, खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षोंसे समुद्रको पाटने लगे ॥ ५६-५७ ॥
समूलांश्च विमूलांश्च पादपान् हरिसत्तमाः । इन्द्रकेतूनिवोद्यम्य प्रजह्रुर्वानरास्तरून् ॥ ५८ ॥
भावार्थ
वे श्रेष्ठ वानर वहाँके वृक्षोंको जड़से उखाड़ लाते या जड़के ऊपरसे भी तोड़ लाते थे । इन्द्रध्वजके समान ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंको उठाये लिये चले आते थे ॥ ५८ ॥
तालान् दाडिमगुल्मांश्च नारिकेलविभीतकान् । करीरान् बकुलान् निम्बान् समाजह्रुरितस्ततः ॥ ५९ ॥
भावार्थ
ताड़ों, अनारकी झाड़ियों, नारियल और बहेड़ेके वृक्षों, करीर, बकुल तथा नीमको भी इधर-उधरसे तोड़-तोड़कर लाने लगे ॥ ५९ ॥
हस्तिमात्रान् महाकायाः पाषाणांश्च महाबलाः । पर्वतांश्च समुत्पाट्य यन्त्रैः परिवहन्ति च ॥ ६० ॥
भावार्थ
महाकाय महाबली वानर हाथीके समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतोंको उखाड़कर यन्त्रों ( विभिन्न साधनों ) द्वारा समुद्रतटपर ले आते थे ॥ ६० ॥
प्रक्षिप्यमाणैरचलैः सहसा जलमुद्धतम् । समुत्ससर्प चाकाशमवासर्पत् ततः पुनः ॥ ६१ ॥
भावार्थ
शिलाखण्डोंको फेंकनेसे समुद्रका जल सहसा आकाशमें उठ जाता और फिर वहाँसे नीचेको गिर जाता था ॥ ६१ ॥
समुद्रं क्षोभयामासुर्निपतन्तः समन्ततः । सूत्राण्यन्ये प्रगृह्णन्ति ह्यायतं शतयोजनम् ॥ ६२ ॥
भावार्थ
उन वानरोंने सब ओर पत्थर गिराकर समुद्रमें हलचल मचा दी । कुछ दूसरे वानर सौ योजन लंबा सूत पकड़े हुए थे ॥ ६२ ॥
नलश्चक्रे महासेतुं मध्ये नदनदीपतेः । स तदा क्रियते सेतुर्वानरैर्घोरकर्मभिः ॥ ६३ ॥
भावार्थ
नल नदों और नदियोंके स्वामी समुद्रके बीचमें महान् सेतुका निर्माण कर रहे थे । भयंकर कर्म करनेवाले वानरोंने मिल-जुलकर उस समय सेतुनिर्माणका कार्य आरम्भ किया था ॥ ६३ ॥
दण्डानन्ये प्रगृह्णन्ति विचिन्वन्ति तथापरे । वानरैः शतशस्तत्र रामस्याज्ञापुरःसरैः ॥ ६४ ॥ मेघाभैः पर्वताभैश्च तृणैः काष्ठैर्बबन्धिरे । पुष्पिताग्रैश्च तरुभिः सेतुं बध्नन्ति वानराः ॥ ६५ ॥
भावार्थ
कोई नापनेके लिये दण्ड पकड़ते थे तो कोई सामग्री जुटाते थे । श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा शिरोधार्य करके सैकड़ों वानर जो पर्वतों और मेघोंके समान प्रतीत होते थे, वहाँ तिनकों और काष्ठोंद्वारा भिन्न-भिन्न स्थानोंमें पुल बाँध रहे थे । जिनके अग्रभाग फूलोंसे लदे थे, ऐसे वृक्षोंद्वारा भी वे वानर सेतु बाँधते थे ॥ ६४-६५ ॥
पाषाणांश्च गिरिप्रख्यान् गिरीणां शिखराणि च । दृश्यन्ते परिधावन्तो गृह्य दानवसंनिभाः ॥ ६६ ॥ शिलानां क्षिप्यमाणानां शैलानां तत्र पात्यताम् । बभूव तुमुलः शब्दस्तदा तस्मिन् महोदधौ ॥ ६७ ॥
भावार्थ
पर्वतों-जैसी बड़ी-बड़ी चट्टानें और पर्वत-शिखर लेकर सब ओर दौड़ते वानर दानवोंके समान दिखायी देते थे ॥ उस समय उस महासागरमें फेंकी जाती हुई शिलाओं और गिराये जाते हुए पहाड़ोंके गिरनेसे बड़ा भीषण शब्द हो रहा था ॥ ६७ ॥
कृतानि प्रथमेनाह्ना योजनानि चतुर्दश । प्रहृष्टैर्गजसंकाशैस्त्वरमाणैः प्लवङ्गमैः ॥ ६८ ॥
भावार्थ
हाथीके समान विशालकाय वानर बड़े उत्साह और तेजीके साथ काममें लगे हुए थे । पहले दिन उन्होंने चौदह योजन लंबा पुल बाँधा ॥ ६८ ॥
द्वितीयेन तथैवाह्ना योजनानि तु विंशतिः । कृतानि प्लवगैस्तूर्णं भीमकायैर्महाबलैः ॥ ६९ ॥
भावार्थ
फिर दूसरे दिन भयंकर शरीरवाले महाबली वानरोंने तेजीसे काम करके बीस योजन लंबा पुल बाँध दिया ॥ ६९ ॥
अह्ना तृतीयेन तथा योजनानि तु सागरे । त्वरमाणैर्महाकायैरेकविंशतिरेव च ॥ ७० ॥
भावार्थ
तीसरे दिन शीघ्रतापूर्वक काममें जुटे हुए महाकाय कपियोंने समुद्रमें इक्कीस योजन लंबा पुल बाँध दिया ॥७०॥
चतुर्थेन तथा चाह्ना द्वाविंशतिरथापि वा । योजनानि महावेगैः कृतानि त्वरितैस्ततः ॥ ७१ ॥
भावार्थ
चौथे दिन महान् वेगशाली और शीघ्रकारी वानरोंने बाईस योजन लंबा पुल और बाँध दिया ॥ ७१ ॥
पञ्चमेन तथा चाह्ना प्लवगैः क्षिप्रकारिभिः । योजनानि त्रयोविंशत् सुवेलमधिकृत्य वै ॥ ७२ ॥
भावार्थ
तथा पाँचवें दिन शीघ्रता करनेवाले उन वानर वीरोंने सुवेल पर्वतके निकटतक तेईस योजन लंबा पुल बाँधा ॥७२॥
स वानरवरः श्रीमान् विश्वकर्मात्मजो बली । बबन्ध सागरे सेतुं यथा चास्य पिता तथा ॥ ७३ ॥
भावार्थ
इस प्रकार विश्वकर्माके बलवान् पुत्र कान्तिमान् कपिश्रेष्ठ नलने समुद्रमें सौ योजन लंबा पुल तैयार कर दिया । इस कार्यमें वे अपने पिताके समान ही प्रतिभाशाली थे ॥ ७३ ॥
स नलेन कृतः सेतुः सागरे मकरालये । शुशुभे सुभगः श्रीमान् स्वातीपथ इवाम्बरे ॥ ७४ ॥
भावार्थ
मकरालय समुद्रमें नलके द्वारा निर्मित हुआ वह सुन्दर और शोभाशाली सेतु आकाशमें स्वातीपथ ( छायापथ ) के समान सुशोभित होता था ॥ ७४ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । आगम्य गगने तस्थुर्द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ॥ ७५ ॥ दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् । ददृशुर्देवगन्धर्वा नलसेतुं सुदुष्करम् ॥ ७६ ॥
भावार्थ
उस समय देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि उस अद्भुत कार्यको देखनेके लिये आकाशमें आकर खड़े थे ॥ नलके बनाये हुए सौ योजन लंबे और दस योजन चौड़े उस पुलको देवताओं और गन्धर्वोंने देखा, जिसे बनाना बहुत ही कठिन काम था ॥ ७६ ॥
आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवंगमाः । तमचिन्त्यमसह्यं च ह्यद्भुतं लोमहर्षणम् ॥ ७७ ॥ ददृशुः सर्वभूतानि सागरे सेतुबन्धनम् ।
भावार्थ
वानरलोग भी इधर-उधर उछल-कूदकर गर्जना करते हुए उस अचिन्त्य, असह्य, अद्भुत और रोमाञ्चकारी पुलको देख रहे थे । समस्त प्राणियोंने ही समुद्रमें सेतु बाँधनेका वह कार्य देखा ॥ ७७½ ॥
तानि कोटिसहस्राणि वानराणां महौजसाम् ॥ ७८ ॥ बध्नन्तः सागरे सेतुं जग्मुः पारं महोदधेः ।
भावार्थ
इस प्रकार उन सहस्र कोटि ( एक खरब ) महाबली एवं उत्साही वानरोंका दल पुल बाँधते-बाँधते ही समुद्रके उस पार पहुँच गया ॥ ७८½ ॥
विशालः सुकृतः श्रीमान् सुभूमिः सुसमाहितः ॥ ७९ ॥ अशोभत महान् सेतुः सीमन्त इव सागरे ।
भावार्थ
वह पुल बड़ा ही विशाल, सुन्दरतासे बनाया हुआ, शोभासम्पन्न, समतल और सुसम्बद्ध था । वह महान् सेतु सागरमें सीमन्तके समान शोभा पाता था ॥ ७९½ ॥
ततः पारे समुद्रस्य गदापाणिर्विभीषणः ॥ ८० ॥ परेषामभिघातार्थमतिष्ठत् सचिवैः सह ।
भावार्थ
पुल तैयार हो जानेपर अपने सचिवोंके साथ विभीषण गदा हाथमें लेकर समुद्रके दूसरे तटपर खड़े हो गये, जिससे शत्रुपक्षीय राक्षस यदि पुल तोड़नेके लिये आवें तो उन्हें दण्ड दिया जा सके ॥ ८०½ ॥
सुग्रीवस्तु ततः प्राह रामं सत्यपराक्रमम् ॥ ८१ ॥ हनूमन्तं त्वमारोह अङ्गदं त्वथ लक्ष्मणः । अयं हि विपुलो वीर सागरो मकरालयः ॥ ८२ ॥ वैहायसौ युवामेतौ वानरौ धारयिष्यतः ।
भावार्थ
तदनन्तर सुग्रीवने सत्यपराक्रमी श्रीरामसे कहा— ‘वीरवर ! आप हनुमान्के कंधेपर चढ़ जाइये और लक्ष्मण अङ्गदकी पीठपर सवार हो लें; क्योंकि यह मकरालय समुद्र बहुत लंबा-चौड़ा है । ये दोनों वानर आकाश-मार्गसे चलनेवाले हैं । अतः ये ही दोनों आप दोनों भाइयोंको धारण कर सकेंगे’ ॥ ८१-८२½ ॥
अग्रतस्तस्य सैन्यस्य श्रीमान् रामः सलक्ष्मणः ॥ ८३ ॥ जगाम धन्वी धर्मात्मा सुग्रीवेण समन्वितः । अन्ये मध्येन गच्छन्ति पार्श्वतोऽन्ये प्लवंगमाः ॥ ८४ ॥ सलिलं प्रपतन्त्यन्ये मार्गमन्ये प्रपेदिरे। केचिद् वैहायसगताः सुपर्णा इव पुप्लुवुः ॥ ८५ ॥
भावार्थ
इस प्रकार धनुर्धर एवं धर्मात्मा भगवान् श्रीराम लक्ष्मण और सुग्रीवके साथ उस सेनाके आगे-आगे चले ॥ दूसरे वानर सेनाके बीचमें और अगल-बगलमें होकर चलने लगे । कितने ही वानर जलमें कूद पड़ते और तैरते हुए चलते थे । दूसरे पुलका मार्ग पकड़कर जाते थे और कितने ही आकाशमें उछलकर गरुड़के समान उड़ते थे॥८४-८५॥
घोषेण महता घोषं सागरस्य समुच्छ्रितम् । भीममन्तर्दधे भीमा तरन्ती हरिवाहिनी ॥ ८६ ॥
भावार्थ
इस प्रकार पार जाती हुई उस भयंकर वानर-सेनाने अपने महान् घोषसे समुद्रकी बढ़ी हुई भीषण गर्जनाको भी दबा दिया ॥ ८६ ॥
वानराणां हि सा तीर्णा वाहिनी नलसेतुना । तीरे निविविशे राज्ञो बहुमूलफलोदके ॥ ८७ ॥
भावार्थ
धीरे-धीरे वानरोंकी सारी सेना नलके बनाये हुए पुलसे समुद्रके उस पार पहुँच गयी। राजा सुग्रीवने फल, मूल और जलकी अधिकता देख सागरके तटपर ही सेनाका पड़ाव डाला ॥ ८७ ॥
तदद्भुतं राघवकर्म दुष्करं समीक्ष्य देवाः सह सिद्धचारणैः। उपेत्य रामं सहसा महर्षिभि- स्तमभ्यषिञ्चन् सुशुभैर्जलैः पृथक् ॥ ८८ ॥
भावार्थ
भगवान् श्रीरामका वह अद्भुत और दुष्कर कर्म देखकर सिद्ध, चारण और महर्षियोंके साथ देवतालोग उनके पास आये तथा उन्होंने अलग-अलग पवित्र एवं शुभ जलसे उनका अभिषेक किया ॥ ८८ ॥
जयस्व शत्रून् नरदेव मेदिनीं ससागरां पालय शाश्वतीः समाः। इतीव रामं नरदेवसत्कृतं शुभैर्वचोभिर्विविधैरपूजयन् ॥ ८९ ॥
भावार्थ
फिर बोले—‘नरदेव ! तुम शत्रुओंपर विजय प्राप्त करो और समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका सदा पालन करते रहो ।’ इस प्रकार भाँति-भाँतिके मङ्गलसूचक वचनोंद्वारा राजसम्मानित श्रीरामका उन्होंने अभिनन्दन किया ॥ ८९ ॥
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