युद्धकाण्ड, सर्ग 23
निमित्तानि निमित्तज्ञो दृष्ट्वा लक्ष्मणपूर्वजः । सौमित्रिं सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
उत्पातसूचक लक्षणोंके ज्ञाता तथा लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीरामने बहुत-से अपशकुन देखकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणको हृदयसे लगाया और इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
परिगृह्योदकं शीतं वनानि फलवन्ति च । बलौघं संविभज्येमं व्यूह्य तिष्ठेम लक्ष्मण ॥ २ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! जहाँ शीतल जलकी सुविधा हो और फलोंसे भरे हुए जंगल हों, उन स्थानोंका आश्रय लेकर हम अपने सैन्यसमूहको कई भागोंमें बाँट दें और इसे व्यूहबद्ध करके इसकी रक्षाके लिये सदा सावधान रहें ॥ २ ॥
लोकक्षयकरं भीमं भयं पश्याम्युपस्थितम् । प्रवर्हणं प्रवीराणामृक्षवानररक्षसाम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘मैं देखता हूँ समस्त लोकोंका संहार करनेवाला भीषण भय उपस्थित हुआ है, जो रीछों, वानरों और राक्षसोंके प्रमुख वीरोंके विनाशका सूचक है॥ ३ ॥
वाताश्च कलुषा वान्ति कम्पते च वसुंधरा । पर्वताग्राणि वेपन्ते पतन्ति च महीरुहाः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘धूलसे भरी हुई प्रचण्ड वायु चल रही है। धरती काँपती है । पर्वतोंके शिखर हिल रहे हैं और पेड़ गिर रहे हैं ॥ ४ ॥
मेघाः क्रव्यादसंकाशाः परुषाः परुषस्वनाः । क्रूराः क्रूरं प्रवर्षन्ति मिश्रं शोणितबिन्दुभिः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मेघोंकी घटा घिर आयी है, जो मांसभक्षी राक्षसोंके समान दिखायी देती है । वे मेघ देखनेमें तो क्रूर हैं, ही इनकी गर्जना भी बड़ी कठोर है । ये क्रूरतापूर्वक रक्तकी बूँदोंसे मिले हुए जलकी वर्षा करते हैं ॥ ५ ॥
रक्तचन्दनसंकाशा संध्या परमदारुणा । ज्वलतः प्रपतत्येतदादित्यादग्निमण्डलम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘यह संध्या लाल चन्दनके समान कान्ति धारण करके बड़ी भयंकर दिखायी देती है । प्रज्वलित सूर्यसे ये आगकी ज्वालाएँ टूट-टूटकर गिर रही हैं ॥ ६ ॥
दीना दीनस्वराः क्रूराः सर्वतो मृगपक्षिणः । प्रत्यादित्यं विनर्दन्ति जनयन्तो महद्भयम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘क्रूर पशु और पक्षी दीन आकार धारण कर सूर्यकी ओर मुँह करके दीनतापूर्ण स्वरमें चीत्कार करते हुए महान् भय उत्पन्न कर रहे हैं ॥ ७ ॥
रजन्यामप्रकाशस्तु संतापयति चन्द्रमाः । कृष्णरक्तांशुपर्यन्तो लोकक्षय इवोदितः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘रातमें भी चन्द्रमा पूर्णतः प्रकाशित नहीं होते और अपने स्वभावके विपरीत ताप दे रहे हैं । ये काली और लाल किरणोंसे व्याप्त हो इस तरह उदित हुए हैं, मानो जगत्के प्रलयका काल आ पहुँचा हो ॥ ८ ॥
ह्रस्वो रूक्षोऽप्रशस्तश्च परिवेषस्तु लोहितः । आदित्ये विमले नीलं लक्ष्म लक्ष्मण दृश्यते ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! निर्मल सूर्यमण्डलमें नीला चिह्न दिखायी देता है । सूर्यके चारों ओर ऐसा घेरा पड़ा है, जो छोटा, रूखा, अशुभ तथा लाल है ॥ ९ ॥
रजसा महता चापि नक्षत्राणि हतानि च । युगान्तमिव लोकानां पश्य शंसन्ति लक्ष्मण ॥ १० ॥
भावार्थ
‘सुमित्रानन्दन ! देखो ये तारे बड़ी भारी धूलिराशिसे आच्छादित हो हतप्रभ हो गये हैं, अतएव जगत्के भावी संहारकी सूचना दे रहे हैं ॥ १० ॥
काकाः श्येनास्तथा नीचा गृध्राः परिपतन्ति च । शिवाश्चाप्यशुभान् नादान् नदन्ति सुमहाभयान् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘कौए, बाज तथा अधम गीध चारों ओर उड़ रहे हैं और सियारिनें अशुभसूचक महाभयंकर बोली बोल रही हैं ॥ ११ ॥
शैलैः शूलैश्च खड्गैश्च विमुक्तैः कपिराक्षसैः । भविष्यत्यावृता भूमिर्मांसशोणितकर्दमा ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘जान पड़ता है वानरों और राक्षसोंके चलाये हुए शिलाखण्डों, शूलों और तलवारोंसे यह सारी भूमि पट जायगी तथा यहाँ मांस और रक्तकी कीच जम जायगी ॥ १२ ॥
क्षिप्रमद्यैव दुर्धर्षां पुरीं रावणपालिताम् । अभियाम जवेनैव सर्वैर्हरिभिरावृताः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘हमलोग आज ही जितनी जल्दी हो सके, इस रावणपालित दुर्जय नगरी लङ्कापर समस्त वानरोंके साथ वेगपूर्वक धावा बोल दें’ ॥ १३ ॥
इत्येवमुक्त्वा धन्वी स रामः संग्रामधर्षणः । प्रतस्थे पुरतो रामो लङ्कामभिमुखो विभुः ॥ १४ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर संग्रामविजयी भगवान् श्रीराम हाथमें धनुष लिये सबसे आगे लङ्कापुरीकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १४ ॥
सविभीषणसुग्रीवाः सर्वे ते वानरर्षभाः । प्रतस्थिरे विनर्दन्तो धृतानां द्विषतां वधे ॥ १५ ॥
भावार्थ
फिर विभीषण और सुग्रीवके साथ वे सभी श्रेष्ठ वानर गर्जना करते हुए युद्धका ही निश्चय रखनेवाले शत्रुओंका वध करनेके लिये आगे बढ़े ॥ १५ ॥
राघवस्य प्रियार्थं तु सुतरां वीर्यशालिनाम् । हरीणां कर्मचेष्टाभिस्तुतोष रघुनन्दनः ॥ १६ ॥
भावार्थ
वे सब-के-सब रघुनाथजीका प्रिय करना चाहते थे । उन बलशाली वानरोंके कर्मों और चेष्टाओंसे रघुकुलनन्दन श्रीरामको बड़ा संतोष हुआ ॥ १६ ॥
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