उत्तरकाण्ड, सर्ग 7
नारायणगिरिं ते तु गर्जन्तो राक्षसाम्बुदाः । अर्दयन्तोऽस्त्रवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः ॥ १ ॥
भावार्थ
( अगस्त्यजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ) जैसे बादल जलकी वर्षासे किसी पर्वतको आल्पावित करते हैं, उसी प्रकार गर्जना करते हुए वे राक्षसरूपी मेघ अस्त्ररूपी जलकी वर्षासे नारायण-रूपी पर्वतको पीड़ित करने लगे ॥ १ ॥
श्यामावदातस्तैर्विष्णुर्नीलैर्नैक्तंचरोत्तमैः । वृतोऽञ्जनगिरीवार्यं वर्षमाणैः पयोधरैः ॥ २ ॥
भावार्थ
भगवान् विष्णुका श्रीविग्रह उज्ज्वल श्यामवर्णसे सुशोभित था और अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए वे श्रेष्ठ निशाचर नीले रंगके दिखायी देते थे; इसलिये ऐसा जान पड़ता था, मानो अञ्जनगिरिको चारों ओरसे घेरकर मेघ उसपर जलकी धारा बरसा रहे हों ॥ २ ॥
शलभा इव केदारं मशका इव पावकम् । यथामृतघटं दंशा मकरा इव चार्णवम् ॥ ३ ॥ तथा रक्षोधनुर्मुक्ता वज्रानिलमनोजवाः । हरिं विशन्ति स्म शरा लोका इव विपर्यये ॥ ४ ॥
भावार्थ
जैसे टिड्डीदल धान आदिके खेतोंमें, पतिंगे आगमें, डंक मारनेवाली मक्खियाँ मधुसे भरे हुए घड़ेमें और मगर समुद्रमें घुस जाते हैं, उसी प्रकार राक्षसोंके धनुषसे छूटे हुए वज्र, वायु तथा मनके समान वेगवाले बाण भगवान् विष्णुके शरीरमें प्रवेश करके इस प्रकार लीन हो जाते थे, जैसे प्रलयकालमें समस्त लोक उन्हींमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ३-४ ॥
स्यन्दनैः स्यन्दनगता गजैश्च गजमूर्धगाः । अश्वारोहास्तथाश्वैश्च पादाताश्चाम्बरे स्थिताः ॥ ५ ॥
भावार्थ
रथपर बैठे हुए योद्धा रथोंसहित, हाथीसवार हाथियोंके साथ, घुड़सवार घोड़ोंसहित तथा पैदल पाँव-पयादे ही आकाशमें खड़े थे ॥ ५ ॥
राक्षसेन्द्रा गिरिनिभाः शरैः शक्त्यृष्टितोमरैः । निरुच्छ्वासं हरिं चक्रुः प्राणायामा इव द्विजम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
उन राक्षसराजोंके शरीर पर्वतके समान विशाल थे । उन्होंने सब ओरसे शक्ति, ऋष्टि, तोमर और बाणोंकी वर्षा करके भगवान् विष्णुका साँस लेना बंद कर दिया । ठीक उसी तरह, जैसे प्राणायाम द्विजके श्वासको रोक देते हैं ॥ ६ ॥
निशाचरैस्ताड्यमानो मीनैरिव महोदधिः । शार्ङ्गमायम्य दुर्धर्षो राक्षसेभ्योऽसृजच्छरान् ॥ ७ ॥
भावार्थ
जैसे मछली महासागरपर प्रहार करे, उसी तरह वे निशाचर अपने अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा श्रीहरिपर चोट करते थे । उस समय दुर्जय देवता भगवान् विष्णुने अपने शार्ङ्ग-धनुषको खींचकर राक्षसोंपर बाण बरसाना आरम्भ किया ॥ ७ ॥
शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैर्वज्रकल्पैर्मनोजवैः । विचिच्छेद विष्णुर्निशितैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥
भावार्थ
वे बाण धनुषको पूर्णरूपसे खींचकर छोड़े गये थे; अतः वज्रके समान असह्य और मनके समान वेगवान् थे । उन पैने बाणोंद्वारा भगवान् विष्णुने सैकड़ों और हजारों निशाचरोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ८ ॥
विद्राव्य शरवर्षेण वर्षं वायुरिवोत्थितम् । पाञ्चजन्यं महाशङ्खं प्रदध्मौ पुरुषोत्तमः ॥ ९ ॥
भावार्थ
जैसे हवा उमड़ी हुई बदली एवं वर्षाको उड़ा देती है, उसी प्रकार अपनी बाणवर्षासे राक्षसोंको भगाकर पुरुषोत्तम श्रीहरिने अपने पाञ्चजन्य नामक महान् शङ्खको बजाया ॥९॥
सोऽम्बुजो हरिणा ध्मातः सर्वप्राणेन शङ्खराट् । ररास भीमनिर्ह्रादस्त्रैलोक्यं व्यथयन्निव ॥ १० ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण प्राणशक्तिसे श्रीहरिके द्वारा बजाया गया वह जल-जनित शङ्खराज भयंकर आवाजसे तीनों लोकोंको व्यथित करता हुआ-सा गूँजने लगा ॥ १० ॥
शङ्खराजरवः सोऽथ त्रासयामास राक्षसान् । मृगराज इवारण्ये समदानिव कुञ्जरान् ॥ ११ ॥
भावार्थ
जैसे वनमें दहाड़ता हुआ सिंह मतवाले हाथियोंको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार उस शङ्खराजकी ध्वनिने समस्त राक्षसोंको भय और घबराहटमें डाल दिया ॥ ११ ॥
न शेकुरश्वाः संस्थातुं विमदाः कुञ्जराऽभवन् । स्यन्दनेभ्यश्च्युता वीराः शङ्खरावितदुर्बलाः ॥ १२ ॥
भावार्थ
वह शङ्ख-ध्वनि सुनकर शक्ति और साहससे हीन हुए घोड़े युद्धभूमिमें खड़े न रह सके, हाथियोंके मद उतर गये और वीर सैनिक रथोंसे नीचे गिर पड़े ॥ १२ ॥
शार्ङ्गचापविनिर्मुक्ता वज्रतुल्याननाः शराः । विदार्य तानि रक्षांसि सुपुङ्खा विविशुः क्षितिम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
सुन्दर पंखवाले उन बाणोंके मुखभाग वज्रके समान कठोर थे । वे शार्ङ्ग-धनुषसे छूटकर राक्षसोंको विदीर्ण करते हुए पृथ्वीमें घुस जाते थे ॥ १३ ॥
भिद्यमानाः शरैः संख्ये नारायणकरच्युतैः । निपेतू राक्षसा भूमौ शैला वज्रहता इव ॥ १४ ॥
भावार्थ
संग्रामभूमिमें भगवान् विष्णुके हाथसे छूटे हुए उन बाणोंद्वारा छिन्न-भिन्न हुए निशाचर वज्रके मारे हुए पर्वतोंकी भाँति धराशायी होने लगे ॥ १४ ॥
व्रणानि परगात्रेभ्यो विष्णुचक्रकृतानि हि । असृक् क्षरन्ति धाराभिः स्वर्णधारा इवाचलाः ॥ १५ ॥
भावार्थ
श्रीहरिके चक्रके आघातसे शत्रुओंके शरीरोंमें जो घाव हो गये थे, उनसे उसी तरह रक्तकी धारा बह रही थी, मानो पर्वतोंसे गेरुमिश्रित जलका झरना गिर रहा हो ॥ १५ ॥
शङ्खराजरवश्चापि शार्ङ्गचापरवस्तथा । राक्षसानां रवांश्चापि ग्रसते वैष्णवो रवः ॥ १६ ॥
भावार्थ
शङ्खराजकी ध्वनि, शार्ङ्ग-धनुषकी टंकार तथा भगवान् विष्णुकी गर्जना—इन सबके तुमुल नादने राक्षसोंके कोलाहलको दबा दिया ॥ १६ ॥
तेषां शिरोधरान् धूताञ्छरध्वजधनूंषि च । रथान् पताकास्तूणीरांश्चिच्छेद स हरिः शरैः ॥ १७ ॥
भावार्थ
भगवान्ने राक्षसोंके काँपते हुए मस्तकों, बाणों, ध्वजाओं, धनुषों, रथों, पताकाओं और तरकसोंको अपने बाणोंसे काट डाला ॥ १७ ॥
सूर्यादिव कराः घोरा वार्योघा इव सागरात् । पर्वतादिव नागेन्द्रा धारौघा इव चाम्बुदात् ॥ १८ ॥ तथा शार्ङ्गविनिर्मुक्ताः शरा नारायणेरिताः । निर्धावन्तीपवस्तूर्ण शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १९ ॥
भावार्थ
जैसे सूर्यसे भयंकर किरणें, समुद्रसे जलके प्रवाह, पर्वतसे बड़े-बड़े सर्प और मेघसे जलकी धाराएँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार भगवान् नारायणके चलाये और शार्ङ्गधनुषसे छूटे हुए सैकड़ों और हजारों बाण तत्काल इधर-उधर दौड़ने लगे ॥ १८-१९ ॥
शरभेण यथा सिंहाः सिंहेन द्विरदा यथा । द्विरदेन यथा व्याघ्रा व्याघ्रेण द्वीपिनो यथा ॥ २० ॥ द्वीपिनेव यथा श्वानः शुना मार्जारको यथा । मार्जारेण यथा सर्पाः सर्पेण च यथाखवः ॥ २१ ॥ तथा ते राक्षसाः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना । द्रवन्ति द्राविताश्चान्ये शायिताश्च महीतले ॥ २२ ॥
भावार्थ
जैसे शरभसे सिंह, सिंहसे हाथी, हाथीसे बाघ, बाघसे चीते, चीतेसे कुत्ते, कुत्तेसे बिलाव, बिलावसे साँप और साँपसे चूहे डरकर भागते हैं, उसी प्रकार वे सब राक्षस प्रभावशाली भगवान् विष्णुकी मार खाकर भागने लगे । उनके भगाये हुए बहुत-से राक्षस धराशायी हो गये ॥ २०–२२ ॥
राक्षसानां सहस्राणि निहत्य मधुसूदनः । वारिजं पूरयामास तोयदं सुरराडिव ॥ २३ ॥
भावार्थ
सहस्रों राक्षसोंका वध करके भगवान् मधुसूदनने अपने शङ्ख पाञ्चजन्यको उसी तरह गम्भीर ध्वनिसे पूर्ण किया, जैसे देवराज इन्द्र मेघको जलसे भर देते हैं ॥ २३ ॥
नारायणशरत्रस्तं शङ्खनादसुविह्वलम् । ययौ लङ्कामभिमुखं प्रभग्नं राक्षसं बलम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
भगवान् नारायणके बाणोंसे भयभीत और शङ्खनादसे व्याकुल हुई राक्षस-सेना लङ्काकी ओर भाग चली ॥ २४ ॥
प्रभग्ने राक्षसबले नारायणशराहते । सुमाली शरवर्षेण निववार रणे हरिम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
नारायणके सायकोंसे आहत हुई राक्षससेना जब भागने लगी, तब सुमालीने रणभूमिमें बाणोंकी वर्षा करके उन श्रीहरिको आगे बढ़नेसे रोका ॥ २५ ॥
स तु तं छादयामास नीहार इव भास्करम् । राक्षसाः सत्त्वसम्पन्नाः पुनर्धैर्यं समादधुः ॥ २६ ॥
भावार्थ
जैसे कुहरा सूर्यदेवको ढक लेता है, उसी तरह सुमालीने बाणोंसे भगवान् विष्णुको आच्छादित कर दिया । यह देख शक्तिशाली राक्षसोंने पुनः धैर्य धारण किया ॥ २६ ॥
अथ सोऽभ्यपतद् रोषाद् राक्षसो बलदर्पितः । महानादं प्रकुर्वाणो राक्षसाञ्जीवयन्निव ॥ २७ ॥
भावार्थ
उस बलाभिमानी निशाचरने बड़े जोरसे गर्जना करके राक्षसोंमें नूतन जीवनका संचार करते हुए-से रोषपूर्वक आक्रमण किया ॥ २७ ॥
उत्क्षिप्य लम्बाभरणं धुन्वन् करमिव द्विपः । ररास राक्षसो हर्षात् सतडित्तोयदो यथा ॥ २८ ॥
भावार्थ
जैसे हाथी सूँड़को उठाकर हिलाता हो, उसी तरह लटकते हुए आभूषणसे युक्त हाथको ऊपर उठाकर हिलाता हुआ वह राक्षस विद्युत्सहित सजल जलधरके समान बड़े हर्षसे गर्जना करने लगा ॥ २८ ॥
सुमालेर्नर्दतस्तस्य शिरो ज्वलितकुण्डलम् । चिच्छेद यन्तुरश्वाश्च भ्रान्तास्तस्य तु रक्षसः ॥ २९ ॥
भावार्थ
तब भगवान्ने अपने बाणोंद्वारा गर्जते हुए सुमालीके सारथिका जगमगाते हुए कुण्डलोंसे मण्डित मस्तक काट डाला । इससे उस राक्षसके घोड़े बेलगाम होकर चारों ओर चक्कर काटने लगे ॥ २९ ॥
तैरश्वैर्भ्राम्यते भ्रान्तैः सुमाली राक्षसेश्वरः । इन्द्रियाश्वैः परिभ्रान्तैर्धृतिहीनो यथा नरः ॥ ३० ॥
भावार्थ
उन घोड़ोंके चक्कर काटनेसे उनके साथ ही राक्षसराज सुमाली भी चक्कर काटने लगा । ठीक उसी तरह, जैसे अजितेन्द्रिय मनुष्य विषयोंमें भटकनेवाली इन्द्रियोंके साथ-साथ स्वयं भी भटकता फिरता है ॥ ३० ॥
ततो विष्णुं महाबाहुं प्रपतन्तं रणाजिरे । हते सुमालेरश्वैश्च रथे विष्णुरथं प्रति ॥ ३१ ॥ माली चाभ्यद्रवद् युक्तः प्रगृह्य सशरं धनुः ।
भावार्थ
जब घोड़े रणभूमिमें सुमालीके रथको इधर-उधर लेकर भागने लगे, तब माली नामक राक्षसने युद्धके लिये उद्यत हो धनुष लेकर गरुड़की ओर धावा किया । राक्षसोंपर टूटते हुए महाबाहु विष्णुपर आक्रमण किया ॥ ३१½ ॥
मालेर्धनुरुच्युता बाणाः कार्तस्वरविभूषिताः ॥ ३२ ॥ विविशुर्हरिमासाद्य क्रौञ्चं पत्ररथा इव ।
भावार्थ
मालीके धनुषसे छूटे हुए सुवर्णभूषित बाण भगवान् विष्णुके शरीरमें उसी तरह घुसने लगे, जैसे पक्षी क्रौञ्चपर्वतके छिद्रमें प्रवेश करते हैं ॥ ३२½ ॥
अर्द्यमानः शरैः सोऽथ मालिमुक्तैः सहस्रशः ॥ ३३ ॥ चुक्षुभे न रणे विष्णुर्जितेन्द्रिय इवाधिभिः ।
भावार्थ
जैसे जितेन्द्रिय पुरुष मानसिक व्यथाओंसे विचलित नहीं होता, उसी प्रकार रणभूमिमें भगवान् विष्णु मालीके छोड़े हुए सहस्रों बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी क्षुब्ध नहीं हुए ॥ ३३½ ॥
अथ मौर्वीस्वनं श्रुत्वा भगवान् भूतभावनः ॥ ३४ ॥ मालिनं प्रति बाणौघान् ससर्जासिगदाधरः ।
भावार्थ
तदनन्तर खड्ग और गदा धारण करनेवाले भूतभावन भगवान् विष्णुने अपने धनुषकी टङ्कार करके मालीके ऊपर बाण-समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३४½ ॥
ते मालिदेहमासाद्य वज्रविद्युत्प्रभाः शराः ॥ ३५ ॥ पिबन्ति रुधिरं तस्य नागा इव सुधारसम् ।
भावार्थ
वज्र और बिजलीके समान प्रकाशित होनेवाले वे बाण मालीके शरीरमें घुसकर उसका रक्त पीने लगे, मानो सर्प अमृत-रसका पान कर रहे हों ॥ ३५½ ॥
मालिनं विमुखं कृत्वा शङ्खचक्रगदाधरः ॥ ३६ ॥ मालिमौलिं ध्वजं चापं वाजिनश्चाप्यपातयत् ।
भावार्थ
अन्तमें मालीको पीठ दिखानेके लिये विवश करके शङ्ख, चक्र और गदा धारणकरनेवाले भगवान् श्रीहरिने उस राक्षसके मुकुट, ध्वज और धनुषको काटकर घोड़ोंको भी मार गिराया ॥ ३६½ ॥
विरथस्तु गदां गृह्य माली नक्तंचरोत्तमः ॥ ३७ ॥ आपुप्लुवे गदापाणिर्गिर्यग्रादिव केसरी ।
भावार्थ
रथहीन हो जानेपर राक्षसप्रवर माली गदा हाथमें लेकर कूद पड़ा, मानो कोई सिंह पर्वतके शिखरसे छलाँग मारकर नीचे आ गया हो ॥ ३७½ ॥
गदया गरुडेशानमीशानमिव चान्तकः ॥ ३८ ॥ ललाटदेशेऽभ्यहनद् वज्रेणेन्द्रो यथाचलम् ।
भावार्थ
जैसे यमराजने भगवान् शिवपर गदाका और इन्द्रने पर्वतपर वज्रका प्रहार किया हो, उसी तरह मालीने पक्षिराज गरुड़के ललाटमें अपनी गदाद्वारा गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३८½ ॥
गदयाभिहतस्तेन मालिना गरुडो भृशम् ॥ ३९ ॥ रणात् पराङ्मुखं देवं कृतवान् वेदनातुरः ।
भावार्थ
मालीकी गदासे अत्यन्त आहत हुए गरुड़ वेदनासे व्याकुल हो उठे । उन्होंने स्वयं युद्धसे विमुख होकर भगवान विष्णुको भी विमुख-सा कर दिया ॥ ३९½ ॥
पराङ्मुखो कृते देवे मालिना गरुडेन वै ॥ ४० ॥ उद्तिष्ठन्महाञ्शब्दो राक्षसामभिनर्दताम् ।
भावार्थ
मालीने गरुड़के साथ ही जब भगवान् विष्णुको भी युद्धसे विमुख-सा कर दिया, तब वहाँ जोर-जोरसे गर्जते हुए राक्षसोंका महान् शब्द गूँज उठा ॥ ४०½ ॥
रक्षसां रुवतां रावं श्रुत्वा हरिहयानुजः ॥ ४१ ॥ तिर्यगास्थाय संक्रुद्धः पक्षीशे भगवान् हरिः । पराङ्मुखोऽप्युत्ससर्ज मालेश्चक्रं जिघांसया ॥ ४२ ॥
भावार्थ
गर्जते हुए राक्षसोंका वह सिंहनाद सुनकर इन्द्रके छोटे भाई भगवान् विष्णु अत्यन्त कुपित हो पक्षिराजकी पीठपर तिरछे होकर बैठ गये । (इससे वह राक्षस उन्हें दीखने लगा) उस समय पराङ्मुख होनेपर भी श्रीहरिने मालीके वधकी इच्छासे पीछेकी ओर मुड़कर अपना सुदर्शनचक्र चलाया ॥ ४१-४२ ॥
तत् सूर्यमण्डलाभासं स्वभासा भासयन् नभः । कालचक्रनिभं चक्रं मालेः शीर्षमपातयत् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
सूर्यमण्डलके समान उद्दीप्त होनेवाले कालचक्र-सदृश उस चक्रने अपनी प्रभासे आकाशको उद्भासित करते हुए वहाँ मालीके मस्तकको काट गिराया ॥ ४३ ॥
तच्छिरो राक्षसेन्द्रस्य चक्रोत्कृत्तं विभीषणम् । पपात रुधिरोद्गारि पुरा राहुशिरो यथा ॥ ४४ ॥
भावार्थ
चक्रसे कटा हुआ राक्षसराज मालीका वह भयंकर मस्तक पूर्वकालमें कटे हुए राहुके सिरकी भाँति रक्तकी धारा बहाता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ४४ ॥
ततः सुरैः सम्प्रहृष्टैः सर्वप्राणसमीरितः । सिंहनादरवो मुक्तः साधु देवेतिवादिभिः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
इससे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई । वे ‘साधु भगवन् ! साधु !‘ ऐसा कहते हुए सारी शक्ति लगाकर जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ४५ ॥
मालिनं निहतं दृष्ट्वा सुमाली माल्यवानपि । सबलौ शोकसंतप्तौ लङ्कामेव प्रधावितौ ॥ ४६ ॥
भावार्थ
मालीको मारा गया देख सुमाली और माल्यवान् दोनों राक्षस शोकसे व्याकुल हो सेनासहित लङ्काकी ओर ही भागे ॥ ४६ ॥
गरुडस्तु समाश्वस्तः संनिवृत्य यथा पुरा । राक्षसान् द्रावयामास पक्षवातेन कोपितः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें गरुड़की पीड़ा कम हो गयी, वे पुनः सँभलकर लौटे और कुपित हो पूर्ववत् अपने पंखोंकी हवासे राक्षसोंको खदेड़ने लगे ॥ ४७ ॥
चक्रकृत्तास्यकमला गदासंचूर्णितोरसः । लाङ्गलग्लपितग्रीवा मुसलैर्भिन्नमस्तकाः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
कितने ही राक्षसोंके मुखकमल चक्रके प्रहारसे कट गये । गदाओंके आघातसे बहुतोंके वृक्षःस्थल चूर-चूर हो गये । हलके फालसे कितनोंकी गर्दनें उतर गयीं । मुसलोंकी मारसे बहुतोंके मस्तकोंकी धज्जियाँ उड़ गयीं ॥ ४८ ॥
केचिच्चैवासिना छिन्नास्तथान्ये शरताडिताः । निपेतुरम्बरात् तूर्णं राक्षसाः सागराम्भसि ॥ ४९ ॥
भावार्थ
तलवारका हाथ पड़नेसे कितने ही राक्षस टुकड़े-टुकड़े हो गये । बहुतेरे बाणोंसे पीड़ित हो तुरंत ही आकाशसे समुद्रके जलमें गिर पड़े ॥ ४९ ॥
नारायणोऽपीषुवराशनीभि- र्विदारयामास धनुर्विमुक्तैः । नक्तंचरान् धूतविमुक्तकेशान् यथाशनीभिः सतडिन्महाभ्रः ॥ ५० ॥
भावार्थ
भगवान् विष्णु भी अपने धनुषसे छूटे हुए श्रेष्ठ बाणों और अशनियोंद्वारा राक्षसोंको विदीर्ण करने लगे । उस समय उन निशाचरोंके खुले हुए केश हवासे उड़ रहे थे और पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीहरि विद्युन्मालामण्डित महान् मेघके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ५० ॥
भिन्नातपत्रं पतमानशस्त्रं शरैरपध्वस्तविनीतवेषम् । विनिःसृतान्त्रं भयलोलनेत्रं बलं तदुन्मत्ततरं बभूव ॥ ५१ ॥
भावार्थ
राक्षसोंकी वह सारी सेना अत्यन्त उन्मत्त-सी प्रतीत होती थी । बाणोंसे उसके छत्र कट गये थे, अस्त्र-शस्त्र गिर गये थे सौम्य वेष दूर हो गया था, आँतें बाहर निकल आयी थीं और सबके नेत्र भयसे चञ्चल हो रहे थे ॥ ५१ ॥
सिंहार्दितानामिव कुञ्जराणां निशाचराणां सह कुञ्जराणाम् । रवाश्च वेगाश्च समं बभूवुः पुराणसिंहेन विमर्दितानाम् ॥ ५२ ॥ ते वार्यमाणा हरिबाणजालैः स्ववाणजालानि समुत्सृजन्तः । धावन्ति नक्तंचरकालमेघा वायुप्रणुन्ना इव कालमेघाः ॥ ५३ ॥
भावार्थ
जैसे सिंहोंद्वारा पीड़ित हुए हाथियोंके चीत्कार और वेग एक साथ ही प्रकट होते हैं, उसी प्रकार उन पुराणप्रसिद्ध नृसिंहरूपधारी श्रीहरिके द्वारा रौंदे गये उन निशाचररूपी गजराजोंके हाहाकार और वेग साथ-साथ प्रकट हो रहे थे ॥ भगवान् विष्णुके बाणसमूहोंसे आवृत हो अपने सायकोंका परित्याग करके वे निशाचररूपी काले मेघ उसी प्रकार भागे जा रहे थे, जैसे हवाके उड़ाये हुए वर्षाकालीन मेघ आकाशमें भागते देखे जाते हैं ॥ ५३ ॥
चक्रप्रहारैर्विनिकृत्तशीर्षाः संचूर्णिताङ्गाश्च गदाप्रहारैः । असिप्रहारैर्द्विविधाविभिन्नाः पतन्ति शैला इव राक्षसेन्द्राः ॥ ५४ ॥
भावार्थ
चक्रके प्रहारोंसे राक्षसोंके मस्तक कट गये थे, गदाओंकी मारसे उनके शरीर चूर-चूर हो रहे थे तथा तलवारोंके आघातसे उनके दो-दो टुकड़े हो गये थे । इस तरह वे राक्षसराज पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे थे ॥ ५४ ॥
विलम्बमानैर्मणिहारकुण्डलै- र्निशाचरैर्नीलबलाहकोपमैः । निपात्यमानैर्दद्शे निरन्तरं निपात्यमानैरिव नीलपर्वतैः ॥ ५५ ॥
भावार्थ
लटकते हुए मणिमय हारों और कुण्डलोंके साथ गिराये जाते हुए नील मेघ-सदृश उन निशाचरोंकी लाशोंसे वह रणभूमि पट गयी थी । वहाँ धराशायी हुए वे राक्षस नील-पर्वतोंके समान जान पड़ते थे । उनसे वहाँका भूभाग इस तरह आच्छादित हो गया था कि कहीं तिल रखनेकी भी जगह नहीं दिखायी देती थी ॥ ५५ ॥
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