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उत्तरकाण्ड, सर्ग 6

तैर्वध्यमाना देवाश्च ऋषयश्च तपोधनाः। भयार्ताः शरणं जग्मुर्देवदेवं महेश्वरम् ॥ १ ॥

भावार्थ

( महर्षि अगस्त्य कहते हैं—रघुनन्दन ! ) इन राक्षसोंसे पीड़ित होते हुए देवता तथा तपोधन ऋषि भयसे व्याकुल हो देवाधिदेव महादेवजीकी शरणमें गये ॥ १ ॥

जगत्सृष्ट्यन्तकर्तारमजमव्यक्तरूपिणम् । आधारं सर्वलोकानामाराध्यं परमं गुरुम् ॥ २ ॥ ते समेत्य तु कामारिं त्रिपुरारिं त्रिलोचनम्। ऊचुः प्राञ्जलयो देवा भयगद्गदभाषिणः ॥ ३ ॥

भावार्थ

जो जगत्की सृष्टि और संहार करनेवाले, अजन्मा, अव्यक्त रूपधारी, सम्पूर्ण जगत्के आधार, आराध्य देव और परम गुरु हैं, उन कामनाशक, त्रिपुरविनाशक, त्रिनेत्रधारी भगवान् शिवके पास जाकर वे सब देवता हाथ जोड़ भयसे गद्गदवाणीमें बोले—॥ २-३ ॥

सुकेशपुत्रैर्भगवन् पितामहवरोद्धतैः। प्रजाध्यक्ष प्रजाः सर्वा बाध्यन्ते रिपुबाधनैः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘भगवन् ! प्रजानाथ ! ब्रह्माजीके वरदानसे उन्मत्त हुए सुकेशके पुत्र शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले साधनाद्वारा सम्पूर्ण प्रजाको बड़ा कष्ट पहुँचा रहे हैं ॥ ४ ॥

शरण्यान्यशरण्यानि ह्याश्रमाणि कृतानि नः। स्वर्गाच्च देवान् प्रच्याव्य स्वर्गे क्रीडन्ति देववत् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘सबको शरण देने योग्य जो हमारे आश्रम थे, उन्हें उन राक्षसोंने निवासके योग्य नहीं रहने दिया है—उजाड़ डाला है। देवताओंको स्वर्गसे हटाकर वे स्वयं ही वहाँ अधिकार जमाये बैठे हैं और देवताओंकी भाँति स्वर्गमें विहार करते हैं ॥ ५ ॥

अहं विष्णुरहं रुद्रो ब्रह्माहं देवराडहम्। अहं यमश्च वरुणश्चन्द्रोऽहं रविरप्यहम् ॥ ६ ॥ इति माली सुमाली च माल्यवांश्चैव राक्षसाः। बाधन्ते समरोद्धर्षा ये च तेषां पुरःसराः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘माली, सुमाली और माल्यवान्—ये तीनों राक्षस कहते हैं—‘मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही रुद्र हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ तथा मैं ही देवराज इन्द्र, यमराज, वरुण, चन्द्रमा और सूर्य हूँ’ इस प्रकार अहंकार प्रकट करते हुए वे रणदुर्जय निशाचर तथा उनके अग्रगामी सैनिक हमें बड़ा कष्ट दे रहे हैं ॥ ६-७ ॥

तन्नो देव भयार्तानामभयं दातुमर्हसि। अशिवं वपुरास्थाय जहि वै देवकण्टकान् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘देव ! उनके भयसे हम बहुत घबराये हुए हैं, इसलिये आप हमें अभयदान दीजिये तथा रौद्र रूप धारण करके देवताओंके लिये कण्टक बने हुए उन राक्षसोंका संहार कीजिये’ ॥ ८ ॥

इत्युक्तस्तु सुरैः सर्वैः कपर्दी नीललोहितः। सुकेशं प्रति सापेक्षः प्राह देवगणान् प्रभुः ॥ ९ ॥

भावार्थ

समस्त देवताओंके ऐसा कहनेपर नील एवं लोहित वर्णवाले जटाजूटधारी भगवान् शंकर सुकेशके प्रति घनिष्ठता रखनेके कारण उनसे इस प्रकार बोले—॥ ९ ॥

अहं तान् न हनिष्यामि ममावध्या हि तेऽसुराः । किं तु मन्त्रं प्रदास्यामि यो वै तान् निहनिष्यति ॥ १० ॥

भावार्थ

‘देवगण ! मैंने सुकेशके जीवनकी रक्षा की है । वे असुर सुकेशके ही पुत्र हैं; इसलिये मेरे द्वारा मारे जाने योग्य नहीं हैं । अतः मैं तो उनका वध नहीं करूँगा; परंतु तुम्हें एक ऐसे पुरुषके पास जानेकी सलाह दूँगा, जो निश्चय ही उन निशाचरोंका वध करेंगे ॥ १० ॥

एतमेव समुद्योगं पुरस्कृत्य महर्षयः । गच्छध्वं शरणं विष्णुं हनिष्यति स तान् प्रभुः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘देवताओ और महर्षियो ! तुम इसी उद्योगको सामने रखकर तत्काल भगवान् विष्णुकी शरणमें जाओ । वे प्रभु अवश्य उनका नाश करेंगे’ ॥ ११ ॥

ततस्तु जयशब्देन प्रतिनन्द्य महेश्वरम् । विष्णोः समीपमाजग्मुर्निशाचरभयार्दिताः ॥ १२ ॥

भावार्थ

यह सुनकर सब देवता जय-जयकारके द्वारा महेश्वरका अभिनन्दन करके उन निशाचरोंके भयसे पीड़ित हो भगवान् विष्णुके समीप आये ॥ १२ ॥

शङ्खचक्रधरं देवं प्रणम्य बहुमान्य च । ऊचुः सम्भ्रान्तवद् वाक्यं सुकेशतनयान् प्रति ॥ १३ ॥

भावार्थ

शङ्ख, चक्र धारण करनेवाले उन नारायणदेवको नमस्कार करके देवताओंने उनके प्रति बहुत अधिक सम्मानका भाव प्रकट किया और सुकेशके पुत्रोंके विषयमें बड़ी घबराहटके साथ इस प्रकार कहा–॥ १३ ॥

सुकेशतनयैर्देव त्रिभिस्त्रेताग्निसंनिभैः । आक्रम्य वरदानेन स्थानान्यपहृतानि नः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘देव ! सुकेशके तीन पुत्र त्रिविध अग्नियोंके तुल्य तेजस्वी हैं । उन्होंने वरदानके बलसे आक्रमण करके हमारे स्थान छीन लिये हैं ॥ १४ ॥

लङ्का नाम पुरी दुर्गा त्रिकूटशिखरे स्थिता । तत्र स्थिताः प्रबाधन्ते सर्वान् नः क्षणदाचराः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘त्रिकूटपर्वतके शिखरपर जो लङ्का नामवाली दुर्गम नगरी है, वहीं रहकर वे निशाचर हम सभी देवताओंको क्लेश पहुँचाते रहते हैं ॥ १५ ॥

स त्वमस्मद्धितार्थाय जहि तान् मधुसूदन । शरणं त्वां वयं प्राप्ता गतिर्भव सुरेश्वर ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘मधुसूदन ! आप हमारा हित करनेके लिये उन असुरोंका वध करें । देवेश्वर ! हम आपकी शरणमें आये हैं । आप हमारे आश्रयदाता हों ॥ १६ ॥

चक्रकृत्तास्यकमलान् निवेदय यमाय वै । येष्वभयदोऽस्माकं नान्योऽस्ति भवता विना ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘अपने चक्रसे उनका कमलोपम मस्तक काटकर आप यमराजको भेंट कर दीजिये । आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो इस भयके अवसरपर हमें अभय दान दे सके ॥ १७ ॥

राक्षसान् समरे हत्वा सानुबन्धान् मदोद्धतान् । नुद त्वं नो भयं देव नीहारमिव भास्करः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘देव ! वे राक्षस मदसे मतवाले हो रहे हैं । हमें कष्ट देकर हर्षसे फूले नहीं समाते हैं; अतः आप समराङ्गणमें सगे-सम्बन्धियोंसहित उनका वध करके हमारे भयको उसी तरह दूर कर दीजिये, जैसे सूर्यदेव कुहरेको नष्ट कर देते हैं’ ॥ १८ ॥

इत्येवं दैवतैरुक्तो देवदेवो जनार्दनः । अभयं भयदोऽरीणां दत्त्वा देवानुवाच ह ॥ १९ ॥

भावार्थ

देवताओंके ऐसा कहनेपर शत्रुओंको भय देनेवाले देवाधिदेव भगवान् जनार्दन उन्हें अभय दान देकर बोले—॥ १९ ॥

सुकेशं राक्षसं जाने ईशानवरदर्पितम् । तांश्चास्य तनयाञ्जाने येषां ज्येष्ठः स माल्यवान् ॥ २० ॥ तानहं समतिक्रान्तमर्यादान् राक्षसाधमान् । निहनिष्यामि संक्रुद्धः सुरा भवत विज्वराः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘देवताओ ! मैं सुकेश नामक राक्षसको जानता हूँ । वह भगवान् शङ्करका वर पाकर अभिमानसे उन्मत्त हो उठा है । इसके उन पुत्रोंको भी जानता हूँ, जिनमें माल्यवान् सबसे बड़ा है । वे नीच राक्षस धर्मकी मर्यादाका उल्लङ्घन कर रहे हैं, अतः मैं क्रोधपूर्वक उनका विनाश करूँगा । तुमलोग निश्चिन्त हो जाओ’ ॥ २०-२१ ॥

इत्युक्तास्ते सुराः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना । यथावासं ययुर्हृष्टाः प्रशंसन्तो जनार्दनम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

सब कुछ करनेमें समर्थ भगवान् विष्णुके इस प्रकार आश्वासन देनेपर देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ । वे उन जनार्दनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ २२ ॥

विबुधानां समुद्योगं माल्यवांस्तु निशाचरः । श्रुत्वा तौ भ्रातरौ वीराविदं वचनमब्रवीत् ॥ २३ ॥

भावार्थ

देवताओंके इस उद्योगका समाचार सुनकर निशाचर माल्यवान्ने अपने दोनों वीर भाइयोंसे इस प्रकार कहा—२३

अमरा ऋषयश्चैव संगम्य किल शङ्करम् । अस्मद्वधं परीप्सन्त इदं वचनमब्रुवन् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘सुननेमें आया है कि देवता और ऋषि मिलकर हमलोगोंका वध करना चाहते हैं । इसके लिये उन्होंने भगवान् शङ्करके पास जाकर यह बात कही ॥ २४ ॥

सुकेशतनया देव वरदानबलोद्धताः । बाधन्तेऽस्मान् समुद्दृप्ता घोररूपाः पदे पदे ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘देव ! सुकेशके पुत्र आपके वरदानके बलसे उद्दण्ड और अभिमानसे उन्मत्त हो उठे हैं । वे भयंकर राक्षस पग-पगपर हमलोगोंको सता रहे हैं ॥ २५ ॥

राक्षसैरभिभूताः स्मो न शक्ता: स्म प्रजापते । स्वेषु सद्मसु संस्थातुं भयात् तेषां दुरात्मनाम् ॥२६॥

भावार्थ

‘‘प्रजानाथ ! राक्षसोंसे पराजित होकर हम उन दुष्टोंके भयसे अपने घरोंमें नहीं रहने पाते हैं ॥ २६ ॥

तदस्माकं हितार्थाय जहि तांश्च त्रिलोचन । राक्षसान् हुंकृतेनैव दह प्रदहतां वर ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘‘त्रिलोचन ! आप हमारे हितके लिये उन असुरोंका वध कीजिये । दाहकोंमें श्रेष्ठ रुद्रदेव ! आप अपने हुंकारसे ही राक्षसोंको जलाकर भस्म कर दीजिये’ ॥ २७ ॥

इत्येवं त्रिदशैरुक्तो निशम्यान्धकसूदनः । शिरः करं च धुन्वान इदं वचनमब्रवीत् ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘देवताओंके ऐसा कहनेपर अन्धकशत्रु भगवान् शिवने अस्वीकृति सूचित करनेके लिये अपने सिर और हाथको हिलाते हुए इस प्रकार कहा—॥ २८ ॥

अवध्या मम ते देवाः सुकेशतनया रणे । मन्त्रं तु वः प्रदास्यामि यस्तान् वै निहनिष्यति ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘‘देवताओ ! सुकेशके पुत्र रणभूमिमें मेरे हाथसे मारे जाने योग्य नहीं है, परंतु मैं तुम्हें ऐसे पुरुषके पास जानेकी सलाह दूँगा, जो निश्चय ही उन सबका वध कर डालेंगे ॥२९॥

योऽसौ चक्रगदापाणिः पीतवासा जनार्दनः । हरिर्नारायणः श्रीमाञ्शरणं तं प्रपद्यथ ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘‘जिनके हाथमें चक्र और गदा सुशोभित है, जो पीताम्बर धारण करते हैं, जिन्हें जनार्दन और हरि कहते हैं तथा जो श्रीमान् नारायणके नामसे विख्यात हैं, उन्हीं भगवान्की शरणमें तुम सब लोग जाओ’ ॥ ३० ॥

हरादवाप्य ते मन्त्रं कामारिमभिवाद्य च । नारायणालयं प्राप्य तस्मै सर्वं न्यवेदयन् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘भगवान् शङ्करसे यह सलाह पाकर उन कामदाहक महादेवजीको प्रणाम करके देवता नारायणके धाममें जा पहुँचे और वहाँ उन्होंने उनसे सब बातें बतायीं ॥ ३१ ॥

ततो नारायणेनोक्ता देवा इन्द्रपुरोगमाः । सुरारींस्तान् हनिष्यामि सुरा भवत निर्भयाः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘तब उन नारायणदेवने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा— ‘देवगण ! मैं उन देवद्रोहियोंका नाश कर डालूँगा, अतः तुम लोग निर्भय हो जाओ’ ॥ ३२ ॥

देवानां भयभीतानां हरिणा राक्षसर्षभौ । प्रतिज्ञातो वधोऽस्माकं चिन्त्यतां यदिह क्षमम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘राक्षसशिरोमणियो ! इस प्रकार भयभीत देवताओंके समक्ष श्रीहरिने हमें मारनेकी प्रतिज्ञा की है; अतः अब इस विषयमें हमलोगोंके लिये जो उचित कर्तव्य हो, उसका विचार करना चाहिये ॥ ३३ ॥

हिरण्यकशिपोर्मृत्युरन्येषां च सुरद्विषाम् । नमुचिः कालनेमिश्च संह्रादो वीरसत्तमः ॥ ३४ ॥ राधेयो बहुमायी च लोकपालोऽथ धार्मिकः । यमलार्जुनौ च हार्दिक्यः शुम्भश्चैव निशुम्भकः ॥ ३५ ॥ असुरा दानवाश्चैव सत्त्ववन्तो महाबलाः । सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्तेऽपराजिताः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘हिरण्यकशिपु तथा अन्य देवद्रोही दैत्योंकी मृत्यु इन्हीं विष्णुके हाथसे हुई है । नमुचि, कालनेमि, वीरशिरोमणि संह्राद, नाना प्रकारकी माया जाननेवाला राधेय, धर्मनिष्ठ लोकपाल, यमल-अर्जुन, हार्दिक्य, शुम्भ और निशुम्भ आदि महावली शक्तिशाली समस्त असुर और दानव समरभूमिमें भगवान् विष्णुका सामना करके पराजित न हुए हों, ऐसा नहीं सुना जाता ॥ ३४-३६ ॥

सर्वैः क्रतुशतैरिष्टं सर्वे मायाविदस्तथा । सर्वे सर्वास्त्रकुशलाः सर्वे शत्रुभयंकराः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘उन सभी असुरोंने सैकड़ों यज्ञ किये थे । वे सब-के-सब माया जानते थे । सभी सम्पूर्ण अस्त्रोंमें कुशल तथा शत्रुओंके लिये भयंकर थे ॥ ३७ ॥

नारायणेन निहताः शतशोऽथ सहस्रशः । एतज्ज्ञात्वा तु सर्वेषां क्षमं कर्तुमिहार्हथ । दुःखं नारायणं जेतुं यो नो हन्तुमिहेच्छति ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘ऐसे सैकड़ों और हजारों असुरोंको नारायणदेवने मौतके घाट उतार दिया है । इस बातको जानकर हम सबके लिये जो उचित कर्तव्य हो, वही करना चाहिये । जो नारायणदेव हमारा वध करना चाहते हैं, उन्हें जीतना अत्यन्त दुष्कर कार्य है’ ॥ ३८ ॥

ततः सुमाली माली च श्रुत्वा माल्यवतो वचः । ऊचतुर्भ्रातरं ज्येष्ठमश्विनाविव वासवम् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

माल्यवान्की यह बात सुनकर सुमाली और माली अपने उस बड़े भाईसे उसी प्रकार बोले, जैसे दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्रसे वार्तालाप कर रहे हों ॥ ३९ ॥

स्वधीतं दत्तमिष्टं च ऐश्वर्यं परिपालितम् । आयुर्निरामयं प्राप्तं सुधर्मः स्थापितः पथि ॥ ४० ॥

भावार्थ

वे बोले—राक्षसराज ! हमलोगोंने स्वाध्याय, दान और यज्ञ किये हैं । ऐश्वर्यकी रक्षा तथा उसका उपभोग भी किया है । हमें रोग-व्याधिसे रहित आयु प्राप्त हुई है और हमने कर्तव्य-मार्गमें उत्तम धर्मकी स्थापना की है ॥ ४० ॥

देवसागरमक्षोभ्यं शस्त्रैः समवगाह्य च । जिता द्विषो ह्यप्रतिमास्तत्रो मृत्युकृतं भयम् ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘यही नहीं, हमने अपने शस्त्रोंके बलसे देवसेनारूपी अगाध समुद्रमें प्रवेश करके ऐसे-ऐसे शत्रुओंपर विजय पायी है, जो वीरतामें अपना सानी नहीं रखते थे; अतः हमें मृत्युसे कोई भय नहीं है ॥ ४१ ॥

नारायणश्च रुद्रश्च शक्रश्चापि यमस्तथा । अस्माकं प्रमुखे स्थातुं सर्वे बिभ्यति सर्वदा ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘नारायण, रुद्र, इन्द्र तथा यमराज ही क्यों न हों, सभी सदा हमारे सामने खड़े होनेमें डरते हैं ॥ ४२ ॥

विष्णोर्द्वेषस्य नास्त्येव कारणं राक्षसेश्वर । देवानामेव दोषेण विष्णोः प्रचलितं मनः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘राक्षसेश्वर ! विष्णुके मनमें भी हमारे प्रति द्वेषका कोई कारण तो नहीं है । ( क्योंकि हमने उनका कोई अपराध नहीं किया है ) केवल देवताओंके चुगली खानेसे उनका मन हमारी ओरसे फिर गया है ॥ ४३ ॥

तस्मादद्यैव सहिताः सर्वेऽन्योन्यसमावृताः । देवानेव जिघांसामो येभ्यो दोषः समुत्थितः ॥ ४४ ॥ एवं सम्मन्त्र्य बलिनः सर्वसैन्यसमावृताः । उद्योगं घोषयित्वा तु सर्वे नैर्ऋतपुंगवाः ॥ ४५ ॥ युद्धाय निर्ययुः क्रुद्धा जम्भवृत्रादयो यथा ।

भावार्थ

‘इसलिये हम सब लोग एकत्र हो एक दूसरेकी रक्षा करते हुए साथ-साथ चलें और आज ही देवताओंका वध कर डालनेकी चेष्टा करें, जिनके कारण यह उपद्रव खड़ा हुआ है’ ॥ ऐसा निश्चय करके उन सभी महाबली राक्षसपतियोंने युद्धके लिये अपने उद्योगकी घोषणा कर दी और समूची सेना साथ ले जम्भ एवं वृत्र आदिकी भाँति कुपित हो वे युद्धके लिये निकले ॥ ४५½ ॥

इति ते राम सम्मन्त्र्य सर्वोद्योगेन राक्षसाः ॥ ४६ ॥ युद्धाय निर्ययुः सर्वे महाकाया महाबलाः ।

भावार्थ

श्रीराम ! पूर्वोक्त मन्त्रणा करके उन सभी महाबली विशालकाय राक्षसोंने पूरी तैयारी की और युद्धके लिये कूच कर दिया ॥ ४६½ ॥

स्यन्दनैर्वारणैश्चैव हयैश्च करिसंनिभैः ॥ ४७ ॥ खरैर्गोभिरथोष्ट्रैश्च शिशुमारैर्भुजंगमैः । मकरैः कच्छपैर्मीनैर्विहंगैर्गरुडोपमैः ॥ ४८ ॥ सिंहैर्व्याघ्रैर्वराहैश्च सृमरैश्चमरैरपि । त्यक्त्वा लङ्कां गताः सर्वे राक्षसा बलगर्विताः ॥ ४९ ॥ प्रयाता देवलोकाय योद्धुं दैवतशात्रवः । लङ्काविपर्ययं दृष्ट्वा यानि लङ्कालयान्यथ ॥ ५० ॥ भूतानि भयदर्शीनि विमनस्कानि सर्वशः । रथोत्तमैरुह्यमानाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५१ ॥ प्रयाता राक्षसास्तूर्णं देवलोकं प्रयत्नतः । रक्षसामेव मार्गेण दैवतान्यपचक्रमुः ॥ ५२ ॥

भावार्थ

अपने बलका घमंड रखनेवाले वे समस्त देवद्रोही राक्षस रथ, हाथी, हाथी-जैसे घोड़े, गदहे, बैल, ऊँट, शिशुमार, सर्प, मगर, कछुआ, मत्स्य, गरुड़-तुल्य पक्षी, सिंह, बाघ, सूअर, मृग और नीलगाय आदि वाहनोंपर सवार हो लङ्का छोड़कर युद्धके लिये देवलोककी ओर चल दिये ॥ लङ्कामें रहनेवाले जो प्राणी अथवा ग्रामदेवता आदि थे, वे सब अपशकुन आदिके द्वारा लङ्काके भावी विध्वंसको देखकर भयका अनुभव करते हुए मन-ही-मन खिन्न हो उठे ॥ उत्तम रथोंपर बैठे हुए सैकड़ों और हजारों राक्षस तुरत ही प्रयत्नपूर्वक देवलोककी ओर बढ़ने लगे । उस नगरके देवता राक्षसोंके मार्गसे ही पुरी छोड़कर निकल गये ॥५१-५२॥

भौमाश्चैवान्तरिक्षाश्च कालाज्ञप्ता भयावहाः । उत्पाता राक्षसेन्द्राणामभावाय समुत्थिताः ॥ ५३ ॥

भावार्थ

उस समय कालकी प्रेरणासे पृथ्वी और आकाशमें अनेक भयंकर उत्पात प्रकट होने लगे, जो राक्षसोंके विनाशकी सूचना दे रहे थे ॥ ५३ ॥

अस्थीनि मेघा ववृषुरुष्णं शोणितमेव च । वेलां समुद्राश्चोत्क्रान्ताश्चेलुश्चाप्यथ भूधराः ॥ ५४ ॥

भावार्थ

बादल गरम-गरम रक्त और हड्डियोंकी वर्षा करने लगे, समुद्र अपनी सीमाका उल्लङ्घन करके आगे बढ़ गये और पर्वत हिलने लगे ॥ ५४ ॥

अट्टहासान् विमुञ्चन्तो घननादसमस्वनाः । वाश्यन्त्यश्च शिवास्तत्र दारुणं घोरदर्शनाः ॥ ५५ ॥

भावार्थ

मेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले प्राणी विकट अट्टहास करने लगे और भयंकर दिखायी देनेवाली गीदड़ियाँ कठोर आवाजमें चीत्कार करने लगीं ॥ ५५ ॥

सम्पतन्त्यथ भूतानि दृश्यन्ते च यथाक्रमम् । गृध्रचक्रं महच्चात्र प्रज्वालोद्गारिभिर्मुखैः ॥ ५६ ॥ रक्षोगणस्योपरिष्टात् परिभ्रमति कालवत् । कपोता रक्तपादाश्च सारिका विद्रुता ययुः ॥ ५७ ॥ काका वाश्यन्ति तत्रैव बिडाला वै द्विपाद्यः ।

भावार्थ

पृथ्वी आदि भूत क्रमशः गिरते—विलीन होते-से दिखायी देने लगे, गीधोंका विशाल समूह मुखसे आगकी ज्वाला उगलता हुआ राक्षसोंके ऊपर कालके समान मड़राने लगा ॥ कबूतर, तोते और मैने लङ्का छोड़कर भाग चले । कौए वहां काँव-काँव करने लगे । बिल्लियाँ भी वहां गुर्राने लगीं तथा हाथी आदि पशु आर्तनाद करने लगे ॥ ५७½ ॥

उत्पातांस्तान्नादृत्य राक्षसा बलदर्पिताः ॥ ५८ ॥ यान्त्येव न निवर्तन्ते मृत्युपाशावपाशिताः ।

भावार्थ

राक्षस बलके घमंडमें मतवाले हो रहे थे । वे कालके पाशमें बँध चुके थे । इसलिये उन उत्पातोंकी अवहेलना करके युद्धके लिये चलते ही गये, लौटे नहीं ॥ ५८½ ॥

माल्यवांश्च सुमाली च माली च सुमहाबलः ॥ ५९ ॥ पुरःसरा राक्षसानां ज्वलिता इव पावकाः ।

भावार्थ

माल्यवान्, सुमाली और महाबली माली—ये तीनों प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी शरीरसे समस्त राक्षसोंके आगे-आगे चल रहे थे ॥ ५९½ ॥

माल्यवन्तं तु ते सर्वे माल्यवन्तमिवाचलम् ॥ ६० ॥ निशाचरा आश्रयन्ति धातारमिव देवताः ।

भावार्थ

जैसे देवता ब्रह्माजीका आश्रय लेते हैं, उसी प्रकार उन सब निशाचरोंने माल्यवान् पर्वतके समान अविचल माल्यवान्का ही आश्रय ले रक्खा था ॥ ६०½ ॥

तद् बलं राक्षसेन्द्राणां महाभ्रघननादितम् ॥ ६१ ॥ जयेष्सया देवलोकं यथौ मालिवशे स्थितम् ।

भावार्थ

राक्षसोंकी वह सेना महान् मेघोंकी गर्जनाके समान कोलाहल करती हुई विजय पानेकी इच्छासे देवलोककी ओर बढ़ती जा रही थी । उस समय वह सेनापति मालीके नियन्त्रणमें थी ॥ ६१½ ॥

राक्षसानां समुद्योगं तं तु नारायणः प्रभुः ॥ ६२ ॥ देवदूतादुपश्रुत्य चक्रे युद्धे तदा मनः ।

भावार्थ

देवताओंके दूतसे राक्षसोंके उस युद्धविषयक उद्योगकी बात सुनकर भगवान् नारायणने भी युद्ध करनेका विचार किया ॥ ६२½ ॥

स सज्जायुधतूणीरो वैनतेयोपरि स्थितः ॥ ६३ ॥ आसाद्य कवचं दिव्यं सहस्रार्कसमद्युति ।

भावार्थ

वे सहस्रों सूर्योंके समान दीप्तिमान् दिव्य कवच धारण करके बाणोंसे भरा तरकस लिये गरुड़पर सवार हुए ॥ ६३½ ॥

आबद्ध्य शरसम्पूर्णे इषुधी विमले तदा ॥ ६४ ॥ श्रोणिसूत्रं च खड्गं च विमलं कमलेक्षणः ।

भावार्थ

इसके अतिरिक्त भी उन्होंने सायकोंसे पूर्ण दो चमचमाते हुए तूणीर बाँध रक्खे थे । उन कमलनयन श्रीहरिने अपनी कमरमें पट्टी बाँधकर उसमें चमकती हुई तलवार भी लटका ली थी ॥ ६४½ ॥

शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गखड्गांश्चैव वरायुधान् ॥ ६५ ॥ सुपर्णं गिरिसंकाशं वैनतेयमथास्थितः । राक्षसानामभावाय ययौ तूर्णतरं प्रभुः ॥ ६६ ॥

भावार्थ

इस प्रकार शङ्ख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और खड्ग आदि उत्तम आयुधोंको धारण किये सुन्दर पंखवाले पर्वताकार गरुड़पर आरूढ़ हो वे प्रभु उन राक्षसोंका संहार करनेके लिये तुरंत चल दिये ॥ ६५-६६ ॥

सुपर्णपृष्ठे स बभौ श्यामः पीताम्बरो हरिः । काञ्चनस्य गिरेः शृङ्गे सतडित्तोयदो यथा ॥ ६७ ॥

भावार्थ

गरुड़की पीठपर बैठे हुए वे पीताम्बरधारी श्यामसुन्दर श्रीहरि सुवर्णमय मेरुपर्वतके शिखरपर स्थित हुए विद्युत्सहित मेघके समान शोभा पा रहे थे ॥ ६७ ॥

स सिद्धदेवर्षिमहोरगैश्च गन्धर्वयक्षैरुपगीयमानः । समाससादासुरसैन्यशत्रु- श्चक्रासिशार्ङ्गायुधशङ्खपाणिः ॥ ६८ ॥

भावार्थ

उस समय सिद्ध, देवर्षि, बड़े-बड़े नाग, गन्धर्व और यक्ष उनके गुण गा रहे थे । असुरोंकी सेनाके शत्रु वे श्रीहरि हाथोंमें शङ्ख, चक्र, खड्ग और शार्ङ्गधनुष लिये सहसा वहाँ आ पहुँचे ॥ ६८ ॥

सुपर्णपक्षानिलनुन्नपक्षं भ्रमत्पताकं प्रविकीर्णशस्त्रम् । चचाल तद्राक्षसराजसैन्यं चलोपलं नीलमिवाचलाग्रम् ॥ ६९ ॥

भावार्थ

गरुड़के पंखोंकी तीव्र वायुके झोंके खाकर वह सेना क्षुब्ध हो उठी । सैनिकोंके रथोंकी पताकाएँ चक्कर खाने लगीं और सबके हाथोंसे अस्त्र-शस्त्र गिर गये । इस प्रकार राक्षसराज माल्यवान्की समूची सेना काँपने लगी । उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो पर्वतका नील शिखर अपनी शिलाओंको बिखेरता हुआ हिल रहा हो ॥ ६९ ॥

ततः शितैः शोणितमांसरूषितै- र्युगान्तवैश्वानरतुल्यविग्रहैः । निशाचराः सम्परिवार्य माधवं वरायुधैर्निर्बिभिदुः सहस्रशः ॥ ७० ॥

भावार्थ

राक्षसोंके उत्तम अस्त्र-शस्त्र तीखे, रक्त और मांसमें सने हुए तथा प्रलयकालीन अग्निके समान दीप्तिमान् थे । उनके द्वारा वे सहस्रों निशाचर भगवान् लक्ष्मीपतिको चारों ओरसे घेरकर उनपर चोट करने लगे ॥ ७० ॥

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