उत्तरकाण्ड, सर्ग 8
हन्यमाने बले तस्मिन् पद्मनाभेन पृष्ठतः । माल्यवान् संनिवृत्तोऽथ वेलामेत्य इवार्णवः ॥ १ ॥
भावार्थ
( अगस्त्यजी कहते हैं-रघुनन्दन ! ) पद्मनाभ भगवान् विष्णुने जब भागती हुई राक्षसोंकी सेनाको पीछेकी ओरसे मारना आरम्भ किया, तब माल्यवान् लौट पड़ा, मानो महासागर अपनी तटभूमितक जाकर निवृत्त हो गया हो ॥ १ ॥
संरक्तनयनः क्रोधाचलन्मौलिर्निशाचरः । पद्मनाभमिदं प्राह वचनं पुरुषोत्तमम् ॥ २ ॥
भावार्थ
उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे और मुकुट हिल रहा था । उस निशाचरने पुरुषोत्तम भगवान् पद्मनाभसे इस प्रकार कहा—॥ २ ॥
नारायण न जानीषे क्षात्रधर्मं पुरातनम् । अयुद्धमनसो भीतानस्मान् हंसि यथेतरः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘नारायणदेव ! जान पड़ता है पुरातन क्षात्रधर्मको बिल्कुल नहीं जानते हो, तभी तो साधारण मनुष्यकी भाँति तुम जिनका मन युद्धसे विरत हो गया है तथा जो डरकर भागे जा रहे हैं, ऐसे हम राक्षसोंको भी मार रहे हो ॥ ३ ॥
पराङ्मुखवधं पापं यः करोति सुरेश्वर । स हन्ता न गतः स्वर्गं लभते पुण्यकर्मणाम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सुरेश्वर ! जो युद्धसे विमुख हुए सैनिकोंके वधका पाप करता है, वह घातक इस शरीरका त्याग करके परलोकमें जानेपर पुण्यकर्मा पुरुषोंको मिलनेवाले स्वर्गको नहीं पाता है ॥४॥
युद्धश्रद्धाथवा तेऽस्ति शङ्खचक्रगदाधर । अहं स्थितोऽस्मि पश्यामि बलं दर्शय यत् तव ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवता ! यदि तुम्हारे हृदयमें युद्धका हौसला है तो मैं खड़ा हूँ । देखता हूँ, तुममें कितना बल है ? दिखाओ अपना पराक्रम’ ॥ ५ ॥
माल्यवन्तं स्थितं दृष्ट्वा माल्यवन्तमिवाचलम् । उवाच राक्षसेन्द्रं तं देवराजानुजो बली ॥ ६ ॥
भावार्थ
माल्यवान् पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हुए राक्षसराज माल्यवान्को देखकर देवराज इन्द्रके छोटे भाई महाबली भगवान् विष्णुने उससे कहा—॥ ६ ॥
युष्मत्तो भयभीतानां देवानां वै मयाभयम् । राक्षसोत्सादनं दत्तं तदेतदनुपाल्यते ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘देवताओंको तुमलोगोंसे बड़ा भय उपस्थित हुआ है, मैंने राक्षसोंके संहारकी प्रतिज्ञा करके उन्हें अभय दान दिया है; अतः इस रूपमें मेरे द्वारा उस प्रतिज्ञाका ही पालन किया जा रहा है ॥ ७ ॥
प्राणैरपि प्रियं कार्यं देवानां हि सदा मया । सोऽहं वो निहनिष्यामि रसातलगतानपि ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘मुझे अपने प्राण देकर भी सदा ही देवताओंका प्रिय कार्य करना है; इसलिये तुमलोग भागकर रसातलमें चले जाओ तो भी मैं तुम्हारा वध किये बिना नहीं रहूँगा’ ॥ ८ ॥
देवदेवं ब्रुवाणं तं रक्ताम्बुरुहलोचनम् । शक्त्या विभेद संक्रुद्धो राक्षसेन्द्रो भुजान्तरे ॥ ९ ॥
भावार्थ
लाल कमलके समान नेत्रवाले देवाधिदेव भगवान् विष्णु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय अत्यन्त कुपित हुए राक्षसराज माल्यवान्ने अपनी शक्तिके द्वारा प्रहार करके भगवान् विष्णुका वक्षःस्थल विदीर्ण कर दिया ॥ ९ ॥
माल्यवद्भुजनिर्मुक्ता शक्तिर्घण्टाकृतस्वना । हरेरुरसि बभ्राज मेघस्थेव शतह्रदा ॥ १० ॥
भावार्थ
माल्यवान्के हाथसे छूटकर घंटानाद करती हुई वह शक्ति श्रीहरिकी छातीसे जा लगी और मेघके अङ्कमें प्रकाशित होनेवाली बिजलीके समान शोभा पाने लगी ॥ १० ॥
ततस्तामेव चोत्कृष्य शक्तिं शक्तिधरप्रियः । माल्यवन्तं समुद्दिश्य चिक्षेपाम्बुरुहेक्षणः ॥ ११ ॥
भावार्थ
शक्तिधारी कार्तिकेय जिन्हें प्रिय हैं अथवा जो शक्तिधर स्कन्दके प्रियतम हैं, उन भगवान् कमलनयन विष्णुने उसी शक्तिको अपनी छातीसे खींचकर माल्यवान्पर दे मारा ॥११॥
स्कन्दोत्सृष्टेव सा शक्तिर्गोविन्दकरनिःसृता । काङ्क्षन्ती राक्षसं प्रायान्महोल्केवाञ्जनाचलम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
स्कन्दकी छोड़ी हुई शक्तिके समान गोविन्दके हाथसे निकली हुई वह शक्ति उस राक्षसको लक्ष्य करके चली, मानो अञ्जनगिरिपर कोई बड़ी भारी उल्का गिर रही हो ॥ १२ ॥
सा तस्योरसि विस्तीर्णे हारभारावभासिते । आपतद् राक्षसेन्द्रस्य गिरिकूट इवाशनिः ॥ १३ ॥
भावार्थ
हारोंके समूहसे प्रकाशित होनेवाले उस राक्षसराजके विशाल वक्षःस्थलपर वह शक्ति गिरी मानो किसी पर्वतके शिखरपर वज्रपात हुआ हो ॥ १३ ॥
तया भिन्नतनुत्राणः प्राविशद् विपुलं तमः । माल्यवान् पुनराश्वस्तस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ॥ १४ ॥
भावार्थ
उससे माल्यवान्का कवच कट गया तथा वह गहरी मूर्छा-में डूब गया; किंतु थोड़ी ही देरमें पुनः सँभलकर माल्यवान् पर्वतकी भाँति अविचलभावसे खड़ा हो गया ॥ १४ ॥
ततः कालायसं शूलं कण्टकैर्बहुभिश्चितम् । प्रगृह्याभ्यहनद् देवं स्तनयोरन्तरे दृढम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् उसने काले लोहेके बने हुए और बहुसंख्यक काँटोंसे जड़े हुए शूलको हाथमें लेकर भगवान्की छातीमें गहरा आघात किया ॥ १५ ॥
तथैव रणरक्तस्तु मुष्टिना वासवानुजम् । ताडयित्वा धनुर्मात्रमपक्रान्तो निशाचरः ॥ १६ ॥
भावार्थ
इसी प्रकार वह युद्धप्रेमी राक्षस भगवान् विष्णुको मुक्केसे मारकर एक धनुष पीछे हट गया ॥ १६ ॥
ततोऽम्बरे महान्छब्दः साधुसाधिति चोत्थितः । आहत्य राक्षसो विष्णुं गरुडं चाप्यताडयत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
उस समय आकाशमें राक्षसोंका महान् हर्षनाद गूँज उठा—वे एक साथ बोल उठे—‘बहुत अच्छा, बहुत अच्छा’ । भगवान् विष्णुको घूसा मारकर उस राक्षसने गरुड़पर भी प्रहार किया ॥ १७ ॥
वैनतेयस्ततः क्रुद्धः पक्षवातेन राक्षसम् । व्यपोहद् बलवान् वायुः शुष्कपर्णचयं यथा ॥ १८ ॥
भावार्थ
यह देख विनतानन्दन गरुड़ कुपित हो उठे और उन्होंने अपने पंखोंकी हवासे उस राक्षसको उसी तरह उड़ा दिया, जैसे प्रबल आँधी सूखे पत्तोंके ढेरको उड़ा देती है ॥ १८ ॥
द्विजेन्द्रपक्षवातेन द्राविते दह्य पूर्वजम् । सुमाली स्वबलैः सार्धं लङ्कामभिमुखो ययौ ॥ १९ ॥ पक्षवातबलोद्धूतो माल्यवानपि राक्षसः । स्वबलेन समागम्य ययौ लङ्कां हिया वृतः ॥ २० ॥
भावार्थ
अपने बड़े भाईको पक्षिराजके पंखोंकी हवासे उड़ा हुआ देख सुमाली अपने सैनिकोंके साथ लङ्काकी ओर चल दिया ॥ गरुड़के पंखोंकी हवाके बलसे उड़ा हुआ राक्षस माल्यवान् भी लज्जित होकर अपनी सेनासे जा मिला और लङ्काकी ओर चला गया ॥ २० ॥
एवं ते राक्षसा राम हरिणा कमलेक्षण । बहुशः संयुगे भग्ना हतप्रवरनायकाः ॥ २१ ॥ अशक्नुवन्तस्ते विष्णुं प्रतियोद्धुं बलार्दिताः । त्यक्त्वा लङ्कां गता वस्तुं पातालं सहपत्नयः ॥ २२ ॥
भावार्थ
कमलनयन श्रीराम ! इस प्रकार उन राक्षसोंका भगवान् विष्णुके साथ अनेक बार युद्ध हुआ और प्रत्येक संग्राममें प्रधान-प्रधान नायकोंके मारे जानेपर उन सबको भागना पड़ा॥ वे किसी प्रकार भगवान् विष्णुका सामना नहीं कर सके । सदा ही उनके बलसे पीड़ित होते रहे । अतः समस्त निशाचर लङ्का छोड़कर अपनी स्त्रियोंके साथ पातालमें रहनेके लिये चले गये ॥ २२ ॥
सुमालिनं समासाद्य राक्षसं रघुसत्तम । स्थिताः प्रख्यातवीर्यास्ते वंशे सालकटङ्कटे ॥ २३ ॥ ये त्वया निहतास्ते तु पौलस्त्या नाम राक्षसाः । सुमाली माल्यवान् माली ये च तेषां पुरःसराः । सर्वे एते महाभागा रावणाद् बलवत्तराः ॥ २४ ॥
भावार्थ
रघुश्रेष्ठ ! वे विख्यात पराक्रमी निशाचर सालकटङ्कट-वंशमें विद्यमान राक्षस सुमालीका आश्रय लेकर रहने लगे ॥ श्रीराम ! आपने पुलस्त्यवंशके जिन-जिन राक्षसोंका विनाश किया है, उनकी अपेक्षा प्राचीन राक्षसोंका पराक्रम अधिक था । सुमाली, माल्यवान् और माली तथा उनके आगे चलनेवाले योद्धा— ये सभी महाभाग निशाचर रावणसे बढ़कर बलवान् थे ॥ २४ ॥
न चान्यो राक्षसान् हन्ता सुरारीन् देवकण्टकान् । ऋते नारायणं देवं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
देवताओंके लिये कण्टकरूप उन देवद्रोही राक्षसोंका वध शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् नारायणदेवके सिवा दूसरा कोई नहीं कर सकता ॥ २५ ॥
भवान् नारायणो देवश्चतुर्बाहुः सनातनः । राक्षसान् हन्तुमुत्पन्नो ह्यजय्यः प्रभुरव्ययः ॥ २६ ॥
भावार्थ
आप चार भुजाधारी सनातन देव भगवान् नारायण ही हैं । आपको कोई परास्त नहीं कर सकता । आप अविनाशी प्रभु हैं और राक्षसोंका वध करनेके लिये इस लोकमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ २६ ॥
नष्टधर्मव्यवस्थानां काले काले प्रजाकरः । उत्पद्यते दस्युवधे शरणागतवत्सलः ॥ २७ ॥
भावार्थ
आप ही इन प्रजाओंके स्रष्टा हैं और शरणागतोंपर दया रखते हैं । जब-जब धर्मकी व्यवस्थाको नष्ट करनेवाले दस्यु पैदा हो जाते हैं, तब-तब उन दस्युओंका वध करनेके लिये आप समय-समयपर अवतार लेते रहते हैं ॥ २७ ॥
एषा मया तव नराधिप राक्षसाना- मुत्पत्तिरेव कथिता सकला यथावत् । भूयो निबोध रघुसत्तम रावणस्य जन्मप्रभावमतुलं ससुतस्य सर्वम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
नरेश्वर ! इस प्रकार मैंने आपको राक्षसोंकी उत्पत्तिका यह पूरा प्रसंग ठीक-ठीक सुना दिया । रघुवंशशिरोमणे ! अब आप रावण तथा उसके पुत्रोंके जन्म और अनुपम प्रभावका सारा वर्णन सुनिये ॥ २८ ॥
चिरात् सुमाली व्यचरद् रसातलं स राक्षसो विष्णुभयार्दितस्तदा । पुत्रैश्च पौत्रैश्च समन्वितो बली ततस्तु लङ्कामवसद् धनेश्वरः ॥ २९ ॥
भावार्थ
भगवान् विष्णुके भयसे पीड़ित होकर राक्षस सुमाली सुदीर्घ कालतक अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ रसातलमें विचरता रहा । इसी बीचमें धनाध्यक्ष कुबेरने लङ्काको अपना निवासस्थान बनाया ॥ २९ ॥
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