उत्तरकाण्ड, सर्ग 9
कस्यचित् त्वथ कालस्य सुमाली नाम राक्षसः । रसातलान्मर्त्यलोकं सर्वं वै विचचार ह ॥ १ ॥ नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः । कन्यां दुहितरं गृह्य विना पद्मामिव श्रियम् ॥ २ ॥
भावार्थ
कुछ कालके पश्चात् नील मेघके समान श्याम वर्णवाला राक्षस सुमाली तपाये हुए सोनेके कुण्डलोंसे अलंकृत हो अपनी सुन्दरी कन्याको, जो बिना कमलकी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी, साथ ले रसातलसे निकला । और सारे मर्त्यलोकमें विचरने लगा ॥ १-२ ॥
राक्षसेन्द्रः स तु तदा विचरन् वै महीतले । तदापश्यत् स गच्छन्तं पुष्पकेण धनेश्वरम् ॥ ३ ॥ गच्छन्तं पितरं द्रष्टुं पुलस्त्यतनयं विभुम् । तं दृष्ट्वामरसंकाशं गच्छन्तं पावकोपमम् ॥ ४ ॥ रसातलं प्रविष्टः सन्मर्त्यलोकात् सविस्मयः ।
भावार्थ
उस समय भूतलपर विचरते हुए उस राक्षसराजने अग्निके समान तेजस्वी तथा देवतुल्य शोभा धारण करनेवाले धनेश्वर कुबेरको देखा, जो पुष्पक विमानद्वारा अपने पिता पुलस्त्यनन्दन विश्रवाका दर्शन करनेके लिये जा रहे थे । उन्हें देखकर वह अत्यन्त विस्मित हो मर्त्यलोकसे रसातलमें प्रविष्ट हुआ ॥ ३-४½ ॥
इत्येवं चिन्तयामास राक्षसानां महामतिः ॥ ५ ॥ किं कृत्वा श्रेय इत्येवं वर्धेमहि कथं वयम् ।
भावार्थ
सुमाली बड़ा बुद्धिमान् था । वह सोचने लगा, क्या करनेसे हम राक्षसोंका भला होगा ? कैसे हमलोग उन्नति कर सकेंगे ? ॥ ५½ ॥
अथाब्रवीत् सुतां रक्षः कैकसीं नाम नामतः ॥ ६ ॥ पुत्रि प्रदानकालोऽयं यौवनं व्यतिवर्तते । प्रत्याख्यानाच्च भीतैस्त्वं न वरैः प्रतिगृह्यसे ॥ ७ ॥
भावार्थ
ऐसा विचार करके उस राक्षसने अपनी पुत्रीसे, जिसका नाम कैकसी था, कहा—‘बेटी ! अब तुम्हारे विवाहके योग्य समय आ गया है; क्योंकि इस समय तुम्हारी युवावस्था बीत रही है । तुम कहीं इन्कार न कर दो, इसी भयसे श्रेष्ठ वर तुम्हारा वरण नहीं कर रहे हैं ॥ ६–७ ॥
त्वत्कृते च वयं सर्वे यन्त्रिता धर्मबुद्धयः । त्वं हि सर्वगुणोपेता श्रीः साक्षादिव पुत्रिके ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘पुत्री ! तुम्हें विशिष्ट वरकी प्राप्ति हो, इसके लिये हम लोगोंने बहुत प्रयास किया है; क्योंकि कन्यादानके विषयमें हम धर्मबुद्धि रखनेवाले हैं । तुम तो साक्षात् लक्ष्मीके समान सर्वगुणसम्पन्न हो ( अतः तुम्हारा वर भी सर्वथा तुम्हारे योग्य ही होना चाहिये ) ॥ ८ ॥
कन्यापितृत्वं दुःखं हि सर्वेषां मानकाङ्क्षिणाम् । न ज्ञायते च कः कन्यां वरयेदिति कन्यके ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘बेटी ! सम्मानकी इच्छा रखनेवाले सभी लोगोंके लिये कन्याका पिता होना दुःखका ही कारण होता है; क्योंकि यह पता नहीं चलता कि कौन और कैसा पुरुष कन्याका वरण करेगा ! ॥ ९॥
मातुः कुलं पितृकुलं यत्र चैव च दीयते । कुलत्रयं सदा कन्या संशये स्थाप्य तिष्ठति ॥ १० ॥
भावार्थ
‘माताके, पिताके और जहाँ कन्या दी जाती है, उस पतिके कुलको भी कन्या सदा संशयमें डाले रहती है ॥ १० ॥
सा त्वं मुनिवरं श्रेष्ठं प्रजापतिकुलोद्भवम् । भज विश्रवसं पुत्रि पौलस्त्यं वरय स्वयम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘अतः बेटी ! तुम प्रजापतिके कुलमें उत्पन्न, श्रेष्ठ गुणसम्पन्न, पुलस्त्यनन्दन मुनिवर विश्रवाका स्वयं चलकर पतिके रूपमें वरण करो और उनकी सेवामें रहो ॥ ११ ॥
ईदृशास्ते भविष्यन्ति पुत्राः पुत्रि न संशयः । तेजसा भास्करसमो तादृशोऽयं धनेश्वरः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘पुत्री ! ऐसा करनेसे निःसंदेह तुम्हारे पुत्र भी ऐसे ही होंगे, जैसे ये धनेश्वर कुबेर हैं । तुमने तो देखा ही था; वे कैसे अपने तेजसे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहे थे !’ ॥ १२ ॥
सा तु तद् वचनं श्रुत्वा कन्यका पितृगौरवात् । तत्र गत्वा च सा तस्थौ विश्रवा यत्र तप्यते ॥ १३ ॥
भावार्थ
पिताकी यह बात सुनकर उनके गौरवका ख्याल करके कैकसी उस स्थानपर गयी, जहाँ मुनिवर विश्रवा तप करते थे । वहाँ जाकर वह एक जगह खड़ी हो गयी ॥ १३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राम पुलस्त्यतनयो द्विजः । अग्निहोत्रमुपातिष्ठच्चतुर्थ इव पावकः ॥ १४ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! इसी बीचमें पुलस्त्यनन्दन ब्राह्मण विश्रवा सायंकालका अग्निहोत्र करने लगे । वे तेजस्वी मुनि उस समय तीन अग्नियोंके साथ स्वयं भी चतुर्थ अग्निके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥ १४ ॥
अविचिन्त्य तु तां वेलां दारुणां पितृगौरवात् । उपसृत्याग्रतस्तस्य चरणाधोमुखी स्थिता ॥ १५ ॥
भावार्थ
पिताके प्रति गौरवबुद्धि होनेके कारण कैकसीने उस भयंकर वेलाका विचार नहीं किया और निकट जा उनके चरणोंपर दृष्टि लगाये नीचा मुँह किये वह सामने खड़ी हो गयी ॥ १५ ॥
विलिखन्ती मुहुर्भूमिमङ्गुष्ठाग्रेण भामिनी । स तु तां वीक्ष्य सुश्रोणीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् ॥ १६ ॥ अब्रवीत् परमोदारो दीप्यमानां स्वतेजसा ।
भावार्थ
वह भामिनी अपने पैरके अँगूठेसे बारंबार धरतीपर रेखा खींचने लगी । पूर्ण चन्द्रमाके समान मुख तथा सुन्दर कटि-प्रदेशवाली उस सुन्दरीको जो अपने तेजसे उद्दीप्त हो रही थी, देखकर उन परम उदार महर्षिने पूछा—॥ १६½ ॥
भद्रे कस्यासि दुहिता कुतो वा त्वमिहागता ॥ १७ ॥ किं कार्यं कस्य वा हेतोस्तत्त्वतो ब्रूहि शोभने ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘भद्रे ! तुम किसकी कन्या हो, कहाँसे यहाँ आयी हो, मुझसे तुम्हारा क्या काम है अथवा किस उद्देश्यसे यहाँ तुम्हारा आना हुआ है ? शोभने ! ये सब बातें मुझे ठीक-ठीक बताओ’ ॥ १७-१८ ॥
एवमुक्ता तु सा कन्या कृताञ्जलिरथाब्रवीत् । आत्मप्रभावेण मुने ज्ञातुमर्हसि मे मतम् ॥ १९ ॥ किं तु मां विद्धि ब्रह्मर्षे शासनात् पितुरागताम् । कैकसी नाम नाम्नाहं शेषं त्वं ज्ञातुमर्हसि ॥ २० ॥
भावार्थ
विश्रवाके इस प्रकार पूछनेपर उस कन्याने हाथ जोड़कर कहा—‘मुने ! आप अपने ही प्रभावसे मेरे मनोभावको समझ सकते हैं; किंतु ब्रह्मर्षे ! मेरे मुखसे इतना अवश्य जान लें कि मैं अपने पिताकी आज्ञासे आपकी सेवामें आयी हूँ और मेरा नाम कैकसी है । बाकी सब बातें आपको स्वतः जान लेनी चाहिये ( मुझसे न कहलावें )’ ॥ १९-२० ॥
स तु गत्वा मुनिर्ध्यानं वाक्यमेतदुवाच ह । विज्ञातं ते मया भद्रे कारणं यन्मनोगतम् ॥ २१ ॥ सुताभिलाषो मत्तस्ते मत्तमातङ्गगामिनि । दारुणायां तु वेलायां यस्मात् त्वं मामुपस्थिता ॥ २२ ॥ शृणु तस्मात् सुतान् भद्रे यादृशाञ्जनयिष्यसि । दारुणान् दारुणाकारान् दारुणाभिजनप्रियान् ॥ २३ ॥ प्रसविष्यसि सुश्रोणि राक्षसान् क्रूरकर्मणः ।
भावार्थ
यह सुनकर मुनिने थोड़ी देरतक ध्यान लगाया और उसके बाद कहा—‘भद्रे ! तुम्हारे मनका भाव मालूम हुआ । मतवाले गजराजकी भाँति मन्दगतिसे चलनेवाली सुन्दरी ! तुम मुझसे पुत्र प्राप्त करना चाहती हो; परंतु इस दारुण वेलामें मेरे पास आयी हो, इसलिये यह भी सुन लो कि तुम कैसे पुत्रोंको जन्म दोगी । सुश्रोणि ! तुम्हारे पुत्र क्रूर स्वभाववाले और शरीरसे भी भयंकर होंगे तथा उनका क्रूरकर्मा राक्षसोंके साथ ही प्रेम होगा । तुम क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले राक्षसोंको ही पैदा करोगी’ ॥ २१–२३½ ॥
सा तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रणिपत्याब्रवीद् वचः ॥ २४ ॥ भगवन्नीदृशान् पुत्रांस्त्वत्तोऽहं ब्रह्मवादिनः । नेच्छामि सुदुराचारान् प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥
भावार्थ
मुनिका यह वचन सुनकर कैकसी उनके चरणोंपर गिर पड़ी और इस प्रकार बोली—‘भगवन् ! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं । मैं आपसे ऐसे दुराचारी पुत्रोंको पानेकी अभिलाषा नहीं रखती; अतः आप मुझपर कृपा कीजिये’ ॥ २४-२५ ॥
कन्यया त्वेवमुक्तस्तु विश्रवा मुनिपुङ्गवः । उवाच कैकसीं भूयः पूर्णेन्दुरिव रोहिणीम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
उस राक्षसकन्याके इस प्रकार कहनेपर पूर्णचन्द्रमाके समान मुनिवर विश्रवा रोहिणी-जैसी सुन्दरी कैकसीसे फिर बोले–॥ २६ ॥
पश्चिमो यस्तव सुतो भविष्यति शुभानने । मम वंशानुरूपः स धर्मात्मा च न संशयः ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘शुभानने ! तुम्हारा जो सबसे छोटा एवं अन्तिम पुत्र होगा, वह मेरे वंशके अनुरूप धर्मात्मा होगा; इसमें संशय नहीं है’ ॥ २७ ॥
एवमुक्ता तु सा कन्या राम कालेन केनचित् । जनयामास बीभत्सं रक्षोरूपं सुदारुणम् ॥ २८ ॥ दशग्रीवं महादंष्ट्रं नीलाञ्जनचयोपमम् । ताम्रोष्ठं विंशतिभुजं महास्यं दीप्तमूर्धजम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! मुनिके ऐसा कहनेपर कैकसीने कुछ कालके अनन्तर अत्यन्त भयानक और क्रूर स्वभाववाले एक राक्षसको जन्म दिया, जिसके दस मस्तक, बड़ी-बड़ी दाढ़ें, ताँबे-जैसे ओठ, बीस भुजाएँ, विशाल मुख और चमकीले केश थे । उसके शरीरका रंग कोयलेके पहाड़-जैसा काला था ॥ २८-२९ ॥
तस्मिञ्जाते ततस्तस्मिन् सज्वालकवलाः शिवाः । क्रव्यादाश्चापसव्यानि मण्डलानि प्रचक्रमुः ॥ ३० ॥ ववर्ष रुधिरं देवो मेघाश्च खरनिःस्वनाः । प्रबभौ न च सूर्यो वै महोल्काश्चापतन् भुवि ॥ ३१ ॥ चकम्पे जगती चैव ववुर्वाताः सुदारुणाः । अक्षोभ्यः क्षुभितश्चैव समुद्रः सरितां पतिः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
उसके पैदा होते ही मुँहमें अङ्गारोंके कौर लिये गीदड़ियाँ और मांसभक्षी गृध्र आदि पक्षी दायों ओर मण्डलाकार घूमने लगे ॥ इन्द्रदेव रुधिरकी वर्षा करने लगे, मेघ भयंकर स्वरमें गर्जने लगे, सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी, पृथ्वीपर उल्कापात होने लगा, धरती काँप उठी, भयानक आँधी चलने लगी तथा जो किसीके द्वारा क्षुब्ध नहीं किया जा सकता, वह सरिताओंका स्वामी समुद्र विक्षुब्ध हो उठा ॥ ३१-३२ ॥
अथ नामाकरोत् तस्य पितामहसमः पिता । दशग्रीवः प्रसूतोऽयं दशग्रीवो भविष्यति ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उस समय ब्रह्माजीके समान तेजस्वी पिता विश्रवा मुनिने पुत्रका नाम-करण किया—‘यह दस ग्रीवाएँ लेकर उत्पन्न हुआ है, इसलिये ‘दशग्रीव’ नामसे प्रसिद्ध होगा’ ॥३३ ॥
तस्य त्वनन्तरं जातः कुम्भकर्णो महाबलः । प्रमाणाद् यस्य विपुलं प्रमाणं नेह विद्यते ॥ ३४ ॥
भावार्थ
उसके बाद महाबली कुम्भकर्णका जन्म हुआ, जिसके शरीरसे बड़ा शरीर इस जगत्में दूसरे किसीका नहीं है ॥३४॥
ततः शूर्पणखा नाम संजज्ञे विकृतानना । विभीषणश्च धर्मात्मा कैकस्याः पश्चिमः सुतः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
इसके बाद विकराल मुखवाली शूर्पणखा उत्पन्न हुई । तदनन्तर धर्मात्मा विभीषणका जन्म हुआ, जो कैकसीके अन्तिम पुत्र थे ॥ ३५ ॥
तस्मिन् जाते महासत्त्वे पुष्पवर्षं पपात ह । नभःस्थाने दुन्दुभयो देवानां प्राणदस्तथा । वाक्यं चैवान्तरिक्षे च साधु साध्विति तत् तदा ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उस महान् सत्त्वशाली पुत्रका जन्म होनेपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई और आकाशमें देवोंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं । उस समय अन्तरिक्षमें ‘साधु-साधु’ की ध्वनि सुनायी देने लगी ॥ ३६ ॥
तौ तु तत्र महारण्येववृधाते महौजसौ । कुम्भकर्णदशग्रीवौ लोकोद्वेगकरौ तदा ॥ ३७ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्ण और दशग्रीव वे दोनों महाबली राक्षस लोकमें उद्वेग पैदा करनेवाले थे । वे दोनों ही उस विशाल वनमें पालित होने और बढ़ने लगे ॥ ३७ ॥
कुम्भकर्णः प्रमत्तस्तु महर्षीन् धर्मवत्सलान् । त्रैलोक्ये नित्यासंतुष्टो भक्षयन् विचचार ह ॥ ३८ ॥
भावार्थ
कुम्भकर्ण बड़ा ही उन्मत्त निकला । वह भोजनसे कभी तृप्त ही नहीं होता था; अतः तीनों लोकोंमें घूम-घूमकर धर्मात्मा महर्षियोंको खाता फिरता था ॥ ३८ ॥
विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मव्यवस्थितः । स्वाध्यायनियताहार उवास विजितेन्द्रियः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
विभीषण बचपनसे ही धर्मात्मा थे । वे सदा धर्ममें स्थित रहते, स्वाध्याय करते और नियमित आहार करते हुए इन्द्रियोंको अपने काबूमें रखते थे ॥ ३९ ॥
अथ वैश्रवणो देवस्तत्र कालेन केनचित् । आगतः पितरं द्रष्टुं पुष्पकेण धनेश्वरः ॥ ४० ॥
भावार्थ
कुछ काल बीतनेपर धनके स्वामी वैश्रवण पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो अपने पिताका दर्शन करनेके लिये वहाँ आये ॥ ४० ॥
तं दृष्ट्वा कैकसी तत्र ज्वलन्तमिव तेजसा । आगम्य राक्षसी तत्र दशग्रीवमुवाच ह ॥ ४१ ॥
भावार्थ
वे अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे । उन्हें देखकर राक्षस-कन्या कैकसी अपने पुत्र दशग्रीवके पास आयी और इस प्रकार बोली—॥ ४१ ॥
पुत्र वैश्रवणं पश्य भ्रातरं तेजसा वृतम् । भ्रातृभावे समे चापि पश्यात्मानं त्वमीदृशम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘बेटा ! अपने भाई वैश्रवणकी ओर तो देखो । वे कैसे तेजस्वी जान पड़ते हैं ? भाई होनेके नाते तुम भी इन्हींके समान हो । परंतु अपनी अवस्था देखो, कैसी है ? ॥ ४२ ॥
दशग्रीव तथा यत्नं कुरुष्वामितविक्रम । यथा त्वमपि मे पुत्र भवेर्वैश्रवणोपमः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘अमित पराक्रमी दशग्रीव ! मेरे बेटे ! तुम भी ऐसा कोई यत्न करो, जिससे वैश्रवणकी ही भाँति तेज और वैभवसे सम्पन्न हो जाओ’ ॥ ४३ ॥
मातुस्तद् वचनं श्रुत्वा दशग्रीवः प्रतापवान् । अमर्षमतुलं लेभे प्रतिज्ञां चाकरोत् तदा ॥ ४४ ॥
भावार्थ
माताकी यह बात सुनकर प्रतापी दशग्रीवको अनुपम अमर्ष हुआ । उसने तत्काल प्रतिज्ञा की–॥ ४४ ॥
सत्यं ते प्रतिजानामि भ्रातृतुल्योऽधिकोऽपि वा । भविष्याम्योजसा चैव संतापं त्यज हृद्गतम् ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘माँ ! तुम अपने हृदयकी चिन्ता छोड़ो । मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि अपने पराक्रमसे भाई वैश्रवणके समान या उनसे भी बढ़कर हो जाऊँगा’ ॥ ४५ ॥
ततः क्रोधेन तेनैव दशग्रीवः सहानुजः । चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म तपसे धृतमानसः ॥ ४६ ॥ प्राप्स्यामि तपसा काममिति कृत्वाध्यवस्य च । आगच्छदात्मसिद्ध्यर्थं गोकर्णस्याश्रमं शुभम् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
तदनन्तर उसी क्रोधके आवेशमें भाइयोंसहित दशग्रीवने दुष्कर कर्मकी इच्छा मनमें लेकर सोचा—‘मैं तपस्यासे ही अपना मनोरथ पूर्ण कर सकूँगा, ऐसा विचारकर उसने मनमें तपस्याका ही निश्चय किया और अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिये वह गोकर्णके पवित्र आश्रमपर गया ॥ ४६-४७ ॥
स राक्षसस्तत्र सहानुजस्तदा तपश्चचारातुलमुग्रविक्रमः । अतोषयच्चापि पितामहं विभुं ददौ स तुष्टश्च वराञ्जयावहान् ॥ ४८ ॥
भावार्थ
भाइयोंसहित उस भयंकर पराक्रमी राक्षसने अनुपम तपस्या आरम्भ की । उस तपस्याद्वारा उसने भगवान् ब्रह्माजीको संतुष्ट किया और उन्होंने प्रसन्न होकर उसे विजय दिलानेवाले वरदान दिये ॥ ४८ ॥
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