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उत्तरकाण्ड, सर्ग 10

अथाब्रवीन्मुनिं रामः कथं ते भ्रातरो वने । कीदृशं तु तदा ब्रह्मंस्तपस्तेपुर्महाबलाः ॥ १ ॥

भावार्थ

इतनी कथा सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्य मुनिसे पूछा—‘ब्रह्मन् ! उन तीनों महाबली भाइयोंने वनमें किस प्रकार और कैसी तपस्या की ?’ ॥ १ ॥

अगस्त्यस्त्वब्रवीत् तत्र रामं सुप्रीतमानसम् । तांस्तान् धर्मविधींस्तत्र भ्रातरस्ते समाविशन् ॥ २ ॥

भावार्थ

तब अगस्त्यजीने अत्यन्त प्रसन्नचित्तवाले श्रीरामसे कहा—‘रघुनन्दन ! उन तीनों भाइयोंने वहाँ पृथक्-पृथक् धर्मविधियोंका अनुष्ठान किया ॥ २ ॥

कुम्भकर्णस्ततो यत्तो नित्यं धर्मपथे स्थितः । तताप ग्रीष्मकाले तु पञ्चाग्नीन् परितः स्थितः ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘कुम्भकर्ण अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर प्रतिदिन धर्मके मार्गमें स्थित हो गर्मीके दिनोंमें अपने चारों ओर आग जला धूपमें बैठकर पञ्चाग्निका सेवन करने लगा ॥ ३ ॥

मेघाम्बुसिक्तो वर्षासु वीरासनमसेवत । नित्यं च शिशिरे काले जलमध्यप्रतिश्रयः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘फिर वर्षाऋतुमें खुले मैदानमें वीरासनसे बैठकर मेघोंके बरसाये हुए जलसे भीगता रहा और जाड़ेके दिनोंमें प्रतिदिन जलके भीतर रहने लगा ॥ ४ ॥

एवं वर्षसहस्राणि दश तस्यापचक्रमुः । धर्मे प्रयतमानस्य सत्पथे निष्ठितस्य च ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार सन्मार्गमें स्थित हो धर्मके लिये प्रयत्नशील हुए उस कुम्भकर्णके दस हजार वर्ष बीत गये ॥ ५ ॥

विभीषणस्तु धर्मात्मा नित्यं धर्मपरः शुचिः । पञ्चवर्षसहस्राणि पादेनैकेन तस्थिवान् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘विभीषण तो सदासे ही धर्मात्मा थे । वे नित्यधर्मपरायण रहकर शुद्ध आचार-विचारका पालन करते हुए पाँच हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे ॥ ६ ॥

समाप्ते नियमे तस्य ननृतुश्चाप्सरोगणाः । पपात पुष्पवर्षं च तुष्टुवुश्चापि देवताः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘उनका नियम समाप्त होनेपर अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । उनके ऊपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई और देवताओंने उनकी स्तुति की ॥ ७ ॥

पञ्चवर्षसहस्राणि सूर्यं चैवान्ववर्तत । तस्थौ चोर्ध्वशिरोबाहुः स्वाध्याये धृतमानसः ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘तदनन्तर विभीषणने अपनी दोनों बाँहें और मस्तक ऊपर उठाकर स्वाध्यायपरायण हो पाँच हजार वर्षोंतक सूर्यदेवकी आराधना की ॥ ८ ॥

एवं विभीषणस्यापि स्वर्गस्थस्येव नन्दने । दशवर्षसहस्राणि गतानि नियतात्मनः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार मनको वशमें रखनेवाले विभीषणके भी दस हजार वर्ष बड़े सुखसे बीते, मानो वे स्वर्गके नन्दनवनमें निवास करते हों ॥ ९ ॥

दशवर्षसहस्रं तु निराहारो दशाननः । पूर्णे वर्षसहस्रे तु शिरश्चाग्नौ जुहाव सः ॥ १० ॥

भावार्थ

‘दशमुख रावणने दस हजार वर्षोंतक लगातार उपवास किया । प्रत्येक सहस्र वर्षके पूर्ण होनेपर वह अपना एक मस्तक काटकर आगमें होम देता था ॥ १० ॥

एवं वर्षसहस्राणि नव तस्यातिचक्रमुः । शिरांसि नव चाप्यस्य प्रविष्टानि हुताशनम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘इस तरह एक-एक करके उसके नौ हजार वर्ष बीत गये और नौ मस्तक भी अग्निदेवके भेंट हो गये ॥ ११ ॥

अथ वर्षसहस्रे तु दशमे दशमं शिरः । छेत्तुकामे दशग्रीवे प्राप्तस्तत्र पितामहः ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘जब दसवाँ सहस्र पूरा हुआ और दशग्रीव अपना दसवाँ मस्तक काटनेको उद्यत हुआ, इसी समय पितामह ब्रह्माजी वहाँ आ पहुँचे ॥ १२ ॥

पितामहस्तु सुप्रीतः सार्धं देवैरुपस्थितः । तव तावद् दशग्रीव प्रीतोऽस्मीत्यभ्यभाषत ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘पितामह ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न होकर देवताओंके साथ वहाँ पहुँचे थे । उन्होंने आते ही कहा—‘दशग्रीव ! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १३ ॥

शीघ्रं वरय धर्मज्ञ वरो यस्तेऽभिकाङ्क्षितः । कं ते कामं करोम्यद्य न वृथा ते परिश्रमः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘‘धर्मज्ञ ! तुम्हारे मनमें जिस वरको पानेकी इच्छा हो, उसे शीघ्र माँगो । बोलो, आज मैं तुम्हारी किस अभिलाषाको पूर्ण करूँ ? तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं होना चाहिये’ ॥ १४ ॥

अथाब्रवीद् दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । प्रणम्य शिरसा देवं हर्षगद्गदया गिरा ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘यह सुनकर दशग्रीवकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो गयी । उसने मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माको प्रणाम किया और हर्ष-गद्गदवाणीमें कहा—॥ १५ ॥

भगवन् प्राणिनां नित्यं नान्यत्र मरणाद् भयम् । नास्ति मृत्युसमः शत्रुरमरत्वमहं वृणे ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘‘भगवन् ! प्राणियोंके लिये मृत्युके सिवा और किसीका सदा भय नहीं रहता है; अतएव मैं अमर होना चाहता हूँ; क्योंकि मृत्युके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है’ ॥ १६ ॥

एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा दशग्रीवमुवाच ह । नास्ति सर्वामरत्वं ते वरमन्यं वृणीष्व मे ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘उसके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने दशग्रीवसे कहा—‘तुम्हें सर्वथा अमरत्व नहीं मिल सकता; इसलिये दूसरा कोई वर माँगो’ ॥ १७ ॥

एवमुक्ते तदा राम ब्रह्मणा लोककर्तृणा । दशग्रीव उवाचेदं कृताञ्जलिरथाग्रतः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! लोकस्रष्टा ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दशग्रीवने उनके सामने हाथ जोड़कर कहा—॥ १८ ॥

सुपर्णनागयक्षाणां दैत्यदानवरक्षसाम् । अवध्योऽहं प्रजाध्यक्ष देवतानां च शाश्वत ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘‘सनातन प्रजापते ! मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओंके लिये अवध्य हो जाऊँ ॥ १९ ॥

नहि चिन्ता ममान्येषु प्राणिष्वमरपूजित । तृणभूता हि ते मन्ये प्राणिनो मानुषादयः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘‘देवबन्ध पितामह ! अन्य प्राणियोंसे मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है । मनुष्य आदि अन्य जीवोंको तो मैं तिनकेके समान समझता हूँ’ ॥ २० ॥

एवमुक्तस्तु धर्मात्मा दशग्रीवेण रक्षसा । उवाच वचनं देवः सह देवैः पितामहः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘राक्षस दशग्रीवके ऐसा कहनेपर देवताओंसहित भगवान् ब्रह्माजीने कहा—॥ २१ ॥

भविष्यत्येवमेतत् ते वचो राक्षसपुङ्गव । एवमुक्त्वा तु तं राम दशग्रीवं पितामहः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘‘राक्षसप्रवर ! तुम्हारा यह वचन सत्य होगा ।’ श्रीराम ! दशग्रीवसे ऐसा कहकर पितामह फिर बोले—॥ २२ ॥

शृणु चापि वरो भूयः प्रीतस्येह शुभो मम । हुतानि यानि शीर्षाणि पूर्वमग्नौ त्वयानघ ॥ २३ ॥ पुनस्तानि भविष्यन्ति तथैव तव राक्षस । वितरामीह ते सौम्य वरं चान्यं दुरासदम् ॥ २४ ॥ छन्दतस्तव रूपं च मनसा यद् यथेप्सितम् ।

भावार्थ

‘‘निष्पाप राक्षस ! सुनो—मैं प्रसन्न होकर पुनः तुम्हें यह शुभ वर प्रदान करता हूँ—तुमने पहले अग्निमें अपने जिन-जिन मस्तकोंका हवन किया है, वे सब तुम्हारे लिये फिर पूर्ववत् प्रकट हो जायँगे । सौम्य ! इसके सिवा एक और भी दुर्लभ वर मैं तुम्हें यहाँ दे रहा हूँ—तुम अपने मनसे जब जैसा रूप धारण करना चाहोगे, तुम्हारी इच्छाके अनुसार उस समय तुम्हारा वैसा ही रूप हो जायगा’ ॥ २३-२४½ ॥

एवं पितामहोक्तस्य दशग्रीवस्य रक्षसः ॥ २५ ॥ अग्नौ हुतानि शीर्षाणि पुनस्तान्युत्थितानि वै ।

भावार्थ

‘पितामह ब्रह्माके इतना कहते ही राक्षस दशग्रीवके वे मस्तक, जो पहले आगमें होम दिये गये थे, फिर नये रूपमें प्रकट हो गये ॥ २५½ ॥

एवमुक्त्वा तु तं राम दशग्रीवं पितामहः ॥ २६ ॥ विभीषणमथोवाच वाक्यं लोकपितामहः ।

भावार्थ

‘श्रीराम ! दशग्रीवसे पूर्वोक्त बात कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी विभीषणसे बोले—॥ २६½ ॥

विभीषण त्वया वत्स धर्मसंहितबुद्धिना ॥ २७ ॥ परितुष्टोऽस्मि धर्मात्मन् वरं वरय सुव्रत ।

भावार्थ

‘‘बेटा विभीषण ! तुम्हारी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहनेवाली है, अतः मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मात्मन् ! तुम भी अपनी रुचिके अनुसार कोई वर माँगो’ ॥ २७½ ॥

विभीषणस्तु धर्मात्मा वचनं प्राह साञ्जलिः ॥ २८ ॥ वृतः सर्वगुणैर्नित्यं चन्द्रमा रश्मिभिर्यथा । भगवन् कृतकृत्योऽहं यन्मे लोकगुरुः स्वयम् ॥ २९ ॥ प्रीतेन यदि दातव्यो वरो मे शृणु सुव्रत ।

भावार्थ

‘तब किरणमालामण्डित चन्द्रमाकी भाँति सदा समस्त गुणोंसे सम्पन्न धर्मात्मा विभीषणने हाथ जोड़कर कहा— ‘भगवन् ! यदि साक्षात् लोकगुरु आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं कृतार्थ हूँ। मुझे कुछ भी पाना शेष नहीं रहा । उत्तम व्रतको धारण करनेवाले पितामह ! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देना ही चाहते हैं तो सुनिये ॥ २८-२९½ ॥

परमापद्गतस्यापि धर्मे मम मतिर्भवेत् ॥ ३० ॥ अशिक्षितं च ब्रह्मास्त्रं भगवन् प्रतिभातु मे ।

भावार्थ

‘‘भगवन् ! बड़ी-से-बड़ी आपत्तिमें पड़नेपर भी मेरी बुद्धि धर्ममें ही लगी रहे—उससे विचलित न हो और बिना सीखे ही मुझे ब्रह्मास्त्रका ज्ञान हो जाय ॥ ३०½ ॥

या या मे जायते बुद्धिर्येषु येष्वाश्रमेषु च ॥ ३१ ॥ सा सा भवतु धर्मिष्ठा तं तं धर्मं च पालये । एष मे परमोदारो वरः परमको मतः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘‘जिस-जिस आश्रमके विषयमें मेरा जो-जो विचार हो, वह धर्मके अनुकूल ही हो और उस-उस धर्मका मैं पालन करूँ; यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वरदान है ॥ ३१-३२ ॥

नहि धर्माभिरक्तानां लोके किंचन दुर्लभम् । पुनः प्रजापतिः प्रीतो विभीषणमुवाच ह ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘‘क्योंकि जो धर्ममें अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है’ यह सुनकर प्रजापति ब्रह्मा पुनः प्रसन्न हो विभीषणसे बोले—॥ ३३ ॥

धर्मिष्ठस्त्वं यथा वत्स तथा चैतद् भविष्यति । यस्माद् राक्षसयोनौ ते जातस्यामित्रनाशन ॥ ३४ ॥ नाधर्मे जायते बुद्धिरमरत्वं ददामि ते ।

भावार्थ

‘‘वत्स ! तुम धर्ममें स्थित रहनेवाले हो; अतः जो कुछ चाहते हो, वह सब पूर्ण होगा । शत्रुनाशन ! राक्षस-योनिमें उत्पन्न होकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्ममें नहीं लगती है; इसलिये मैं तुम्हें अमरत्व प्रदान करता हूँ’ ॥ ३४½ ॥

इत्युक्त्वा कुम्भकर्णाय वरं दातुमवस्थितम् ॥ ३५ ॥ प्रजापतिं सुराः सर्वे वाक्यं प्राञ्जलयोऽब्रुवन् ।

भावार्थ

‘विभीषणसे ऐसा कहकर जब ब्रह्माजी कुम्भकर्णको वर देनेके लिये उद्यत हुए, तब सब देवता उनसे हाथ जोड़कर बोले—॥ ३५½ ॥

न तावत् कुम्भकर्णाय प्रदातव्यो वरस्त्वया ॥ ३६ ॥ जानीषे हि यथा लोकांस्त्रासयत्येष दुर्मतिः ।

भावार्थ

‘‘प्रभो ! आप कुम्भकर्णको वरदान न दीजिये; क्योंकि आप जानते हैं कि यह दुर्बुद्धि निशाचर किस तरह समस्त लोकोंको त्रास देता है ॥ ३६½ ॥

नन्दनेऽप्सरसः सप्त महेन्द्रानुचरा दश ॥ ३७ ॥ अनेन भक्षिता ब्रह्मन्नृषयो मानुषास्तथा ।

भावार्थ

‘‘ब्रह्मन् ! इसने नन्दनवनकी सात अप्सराओं, देवराज इन्द्रके दस अनुचरों तथा बहुत-से ऋषियों और मनुष्योंको भी खा लिया है ॥ ३७½ ॥

अलब्धवरपूर्वेण यत् कृतं राक्षसेन तु ॥ ३८ ॥ यद्येष वरलब्धः स्याद् भक्षयेद् भुवनत्रयम् ।

भावार्थ

‘‘पहले वर न पानेपर भी इस राक्षसने जब इस प्रकार प्राणियोंके भक्षणका क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, तब यदि इसे वर प्राप्त हो जाय, उस दशामें तो यह तीनों लोकोंको खा जायगा ॥ ३८½ ॥

वरव्याजेन मोहोऽस्मै दीयताममितप्रभ ॥ ३९ ॥ लोकानां स्वस्ति चैवं स्याद् भवेदस्य च सम्मतिः ।

भावार्थ

‘‘अमिततेजस्वी देव ! आप वरके बहाने इसको मोह प्रदान कीजिये । इससे समस्त लोकोंका कल्याण होगा और इसका भी सम्मान हो जायगा’ ॥ ३९½ ॥

एवमुक्तः सुरैर्ब्रह्माचिन्तयत् पद्मसम्भवः ॥ ४० ॥ चिन्तिता चोपतस्थेऽस्य पार्श्वे देवी सरस्वती ।

भावार्थ

‘देवताओंके ऐसा कहनेपर कमलयोनि ब्रह्माजीने सरस्वती-का स्मरण किया । उनके चिन्तन करते ही देवी सरस्वती पास आ गयीं ॥ ४०½ ॥

प्राञ्जलिः सा तु पार्श्वस्था प्राह वाक्यं सरस्वती॥ ४१ ॥ इयमस्म्यागता देव किं कार्यं करवाण्यहम् ।

भावार्थ

उनके पार्श्वभागमें खड़ी हो सरस्वतीने हाथ जोड़कर कहा—‘देव ! यह मैं आ गयी । मेरे लिये क्या आज्ञा है ? मैं कौन-सा कार्य करूँ ?’ ॥ ४१½ ॥

प्रजापतिस्तु तां प्राप्तां प्राह वाक्यं सरस्वतीम् ॥ ४२ ॥ वाणि त्वं राक्षसेन्द्रस्य भव वाग्देवतेप्सिता ।

भावार्थ

‘तब प्रजापतिने वहाँ आयी हुई सरस्वतीदेवीसे कहा— ‘वाणि ! तुम राक्षसराज कुम्भकर्णकी जिह्वापर विराजमान हो देवताओंके अनुकूल वाणीके रूपमें प्रकट होओ’ ॥ ४२½ ॥

तथेत्युक्त्वा प्रविष्टा सा प्रजापतिरथाब्रवीत् ॥ ४३ ॥ कुम्भकर्ण महाबाहो वरं वरय यो मतः ।

भावार्थ

‘तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सरस्वती कुम्भकर्णके मुखमें समा गयीं । इसके बाद प्रजापतिने उस राक्षससे कहा— ‘महाबाहु कुम्भकर्ण ! तुम भी अपने मनके अनुकूल कोई वर माँगो’ ॥ ४३½ ॥

कुम्भकर्णस्तु तद्वाक्यं श्रुत्वा वचनमब्रवीत् ॥ ४४ ॥ स्वप्स्ये वर्षाण्यनेकानि देवदेव ममेप्सितम् । एवमस्त्विति तं चोक्त्वा प्रायाद् ब्रह्मा सुरैःसमम्॥४५॥

भावार्थ

‘उनकी बात सुनकर कुम्भकर्ण बोला—‘देवदेव ! मैं अनेकानेक वर्षोंतक सोता रहूँ । यही मेरी इच्छा है ।’ तब ‘एवमस्तु ( ऐसा ही हो )’ कहकर ब्रह्माजी देवताओंके साथ चले गये ॥ ४४-४५ ॥

देवी सरस्वती चैव राक्षसं तं जहौ पुनः । ब्रह्मणा सह देवेषु गतेषु च नभःस्थलम् ॥ ४६ ॥ विमुक्तोऽसौ सरस्वत्या स्वां संज्ञां च ततो गतः । कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दुःखितः ॥ ४७ ॥

भावार्थ

‘फिर सरस्वतीदेवीने भी उस राक्षसको छोड़ दिया । ब्रह्माजीके साथ देवताओंके आकाशमें चले जानेपर जब सरस्वतीजी उसके ऊपरसे उतर गयीं, तब दुष्टात्मा कुम्भकर्णको चेत हुआ और वह दुखी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगा—॥ ४६-४७ ॥

ईदृशं किमिदं वाक्यं ममाद्य वदनाच्च्युतम् । अहं व्यामोहितो देवैरिति मन्ये तदागतैः ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘अहो ! आज मेरे मुँहसे ऐसी बात क्यों निकल गयी । मैं समझता हूँ, ब्रह्माजीके साथ आये हुए देवताओंने ही उस समय मुझे मोहमें डाल दिया था’ ॥ ४८ ॥

एवं लब्धवराः सर्वे भ्रातरो दीप्ततेजसः । श्लेष्मातकवनं गत्वा तत्र ते न्यवसन् सुखम् ॥ ४९ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार वे तीनों तेजस्वी भ्राता वर पाकर श्लेष्मातक-वन ( लसोड़े के जंगल )में गये और वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे ॥४९॥

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