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उत्तरकाण्ड, सर्ग 11

सुमाली वरलब्धांस्तु ज्ञात्वा चैतान् निशाचरान् । उदतिष्ठद् भयं त्यक्त्वा सानुगः स रसातलात् ॥ १ ॥

भावार्थ

रावण आदि निशाचरोंको वर प्राप्त हुआ है, यह जानकर सुमाली नामक राक्षस अपने अनुचरोंसहित भय छोड़कर रसातलसे निकला ॥ १ ॥

मारीचश्च प्रहस्तश्च विरूपाक्षो महोदरः । उदतिष्ठन् सुसंरब्धाः सचिवास्तस्य रक्षसः ॥ २ ॥

भावार्थ

साथ ही मारीच, प्रहस्त, विरूपाक्ष और महोदर—ये उस राक्षसके चार मन्त्री भी रसातलसे ऊपरको उठे । वे सबके-सब रोषावेशसे भरे हुए थे ॥ २ ॥

सुमाली सचिवैः सार्धं वृतो राक्षसपुङ्गवैः । अभिगम्य दशग्रीवं परिष्वज्येदमब्रवीत् ॥ ३ ॥

भावार्थ

श्रेष्ठ राक्षसोंसे घिरा हुआ सुमाली अपने सचिवोंके साथ दशग्रीवके पास गया और उसे छातीसे लगाकर इस प्रकार बोला—॥ ३ ॥

दिष्ट्या ते वत्स सम्प्राप्तश्चिन्तितोऽयं मनोरथः । यस्त्वं त्रिभुवनश्रेष्ठाल्लब्धवान् वरमुत्तमम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘वत्स ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने त्रिभुवनश्रेष्ठ ब्रह्माजीसे उत्तम वर प्राप्त किया, जिससे तुम्हें यह चिरकालसे चिन्तित मनोरथ उपलब्ध हो गया ॥ ४ ॥

यत्कृते च वयं लङ्कां त्यक्त्वा याता रसातलम् । तद्गतं नो महाबाहो महद्विष्णुकृतं भयम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! जिसके कारण हम सब राक्षस लङ्का छोड़कर रसातलमें चले गये थे, भगवान् विष्णुसे प्राप्त होनेवाला हमारा यह महान् भय दूर हो गया ॥ ५ ॥

असकृत् तद्भयाद् भग्नाः परित्यज्य स्वमालयम् । विद्रुताः सहिताः सर्वे प्रविष्टाः स्म रसातलम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘हम सब लोग बारंबार भगवान् विष्णुके भयसे पीड़ित होनेके कारण अपना घर छोड़ भाग निकले और सब केसब एक साथ ही रसातलमें प्रविष्ट हो गये ॥ ६ ॥

अस्मदीया च लङ्केयं नगरी राक्षसोषिता । निवेशिता तव भ्रात्रा धनाध्यक्षेण धीमता ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘यह लङ्कानगरी जिसमें तुम्हारे बुद्धिमान् भाई धनाध्यक्ष कुबेर निवास करते हैं, हमलोगोंकी है । पहले इसमें राक्षस ही रहा करते थे ॥ ७ ॥

यदि नामात्र शक्यं स्यात् साम्ना दानेन वानघ । तरसा वा महाबाहो प्रत्यानेतुं कृतं भवेत् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘निष्पाप महाबाहो ! यदि साम, दान अथवा बलप्रयोग-के द्वारा भी पुनः लङ्काको वापस लिया जा सके तो हमलोगोंका काम बन जाय ॥ ८ ॥

त्वं च लङ्केश्वरस्तात भविष्यसि न संशयः । त्वया राक्षसवंशोऽयं निमग्नोऽपि समुद्धृतः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘तात ! तुम्हीं लङ्काके स्वामी होओगे, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि तुमने इस राक्षसवंशका जो रसातलमें डूब गया था, उद्धार किया है ॥ ९ ॥

सर्वेषां नः प्रभुश्चैव भविष्यसि महाबल । अथाब्रवीद् दशग्रीवो मातामहमुपस्थितम् ॥ १० ॥ वित्तेशो गुरुरस्माकं नार्हसे वक्तुमीदृशम् । साम्ना हि राक्षसेन्द्रेण प्रत्याख्यातो गरीयसा ॥ ११ ॥ किंचिन्नाह तदा रक्षो ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम् ।

भावार्थ

‘महाबली वीर ! तुम्हीं हम सबके राजा होओगे ।’ यह सुनकर दशग्रीवने पास खड़े हुए अपने मातामहसे कहा— ‘नानाजी ! धनाध्यक्ष कुबेर हमारे बड़े भाई हैं, अतः उनके सम्बन्धमें आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये’ ॥ उस श्रेष्ठ राक्षसराजके द्वारा शान्तभावसे ही ऐसा कोरा उत्तर पाकर सुमाली समझ गया कि रावण क्या करना चाहता है, इसलिये वह राक्षस चुप हो गया । फिर कुछ कहनेका साहस न कर सका ॥ ११½ ॥

कस्यचित् त्वथ कालस्य वसन्तं रावणं ततः ॥ १२ ॥ उक्तवन्तं तथा वाक्यं दशग्रीवं निशाचरः । प्रहस्तः प्रश्रितं वाक्यमिदमाह सकारणम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

तदनन्तर कुछ काल व्यतीत होनेपर अपने स्थानपर निवास करते हुए दशग्रीव रावणसे जो सुमालीको पहले पूर्वोक्त उत्तर दे चुका था, निशाचर प्रहस्तने विनयपूर्वक यह युक्तियुक्त बात कही—॥ १२-१३ ॥

दशग्रीव महाबाहो नार्हसे वक्तुमीदृशम् । सौभ्रात्रं नास्ति शूराणां शृणु चेदं वचो मम ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘महाबाहु दशग्रीव ! आपने अपने नानासे जो कुछ कहा है, वैसा नहीं कहना चाहिये; क्योंकि वीरोंमें इस तरहके भ्रातृभावका निर्वाह होता नहीं देखा जाता । आप मेरी यह बात सुनिये ॥ १४ ॥

अदितिश्च दितिश्चैव भगिन्यौ सहिते हि ते । भार्ये परमरूपिण्यौ कश्यपस्य प्रजापतेः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘अदिति और दिति दोनों सगी बहनें हैं । वे दोनों ही प्रजापति कश्यपकी परम सुन्दरी पत्नियाँ हैं ॥ १५ ॥

अदितिर्जनयामास देवांस्त्रिभुवनेश्वरान् । दितिस्त्वजनयद् दैत्यान् कश्यपस्यात्मसम्भवान् ॥ १६ ॥ दैत्यानां किल धर्मज्ञ पुरेयं सवनार्णवा । सपर्वता मही वीर तेऽभवन् प्रभविष्णवः ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘अदितिने देवताओंको जन्म दिया है, जो इस समय त्रिभुवनके स्वामी हैं और दितिने दैत्योंको उत्पन्न किया है । देवता और दैत्य दोनों ही महर्षि कश्यपके औरस पुत्र हैं ॥ ‘धर्मज्ञ वीर ! पहले पर्वत, वन और समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी दैत्योंके ही अधिकारमें थी; क्योंकि वे बड़े प्रभावशाली थे ॥ १७ ॥

निहत्य तांस्तु समरे विष्णुना प्रभविष्णुना । देवानां वशमानीतं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘किंतु सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने युद्धमें दैत्योंको मारकर त्रिलोकीका यह अक्षय राज्य देवताओंके अधिकारमें दे दिया ॥ १८ ॥

नैतदेको भवानेव करिष्यति विपर्ययम् । सुरासुरैराचरितं तत् कुरुष्व वचो मम ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘इस तरहका विपरीत आचरण केवल आप ही नहीं करेंगे । देवताओं और असुरोंने भी पहले इस नीतिसे काम लिया है; अतः आप मेरी बात मान लें’ ॥ १९ ॥

एवमुक्तो दशग्रीवः प्रहृष्टेनान्तरात्मना । चिन्तयित्वा मुहूर्तं वै बाढमित्येव सोऽब्रवीत् ॥ २० ॥

भावार्थ

प्रहस्तके ऐसा कहनेपर दशग्रीवका चित्त प्रसन्न हो गया । उसने दो घड़ीतक सोच-विचारकर कहा—‘बहुत अच्छा ( तुम जैसा कहते हो, वैसा ही करूँगा )’ ॥ २० ॥

स तु तेनैव हर्षेण तस्मिन्नहनि वीर्यवान् । वनं गतो दशग्रीवः सह तैः क्षणदाचरैः ॥ २१ ॥ त्रिकूटस्थः स तु तदा दशग्रीवो निशाचरः । प्रेषयामास दौत्येन प्रहस्तं वाक्यकोविदम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

तदनन्तर उसी दिन उसी हर्षके साथ पराक्रमी दशग्रीव उन निशाचरोंको साथ ले लङ्काके निकटवर्ती वनमें गया ॥ उस समय त्रिकूट पर्वतपर जाकर निशाचर दशग्रीव ठहर गया और बातचीत करनेमें कुशल प्रहस्तको उसने दूत बनाकर भेजा ॥ २२ ॥

प्रहस्त शीघ्रं गच्छ त्वं ब्रूहि नैर्ऋतपुङ्गवम् । वचसा मम वित्तेशं सामपूर्वमिदं वचः ॥ २३ ॥

भावार्थ

वह बोला—‘प्रहस्त ! तुम शीघ्र जाओ और मेरे कथनानुसार धनके स्वामी राक्षसराज कुबेरसे शान्तिपूर्वक यह बात कहो ॥ २३ ॥

इयं लङ्का पुरी राजन् राक्षसानां महात्मनाम् । त्वया निवेशिता सौम्य नैतद् युक्तं तवानघ ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! यह लङ्कापुरी महामना राक्षसोंकी है, जिसमें आप निवास कर रहे हैं । सौम्य ! निष्पाप यक्षराज ! यह आपके लिये उचित नहीं है ॥ २४ ॥

तद् भवान् यदि नो ह्यद्य दद्यादतुलविक्रम । कृता भवेन्मम प्रीतिर्धर्मश्चैवानुपालितः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘अतुल पराक्रमी धनेश्वर ! यदि आप हमें यह लङ्कापुरी लौटा दें तो इससे हमें बड़ी प्रसन्नता होगी और आपके द्वारा धर्मका पालन हुआ समझा जायगा’ ॥ २५ ॥

स तु गत्वा पुरीं लङ्कां धनदेन सुरक्षिताम् । अब्रवीत् परमोदारं वित्तपालमिदं वचः ॥ २६ ॥

भावार्थ

तब प्रहस्त कुबेरके द्वारा सुरक्षित लङ्कापुरीमें गया और उन वित्तपालसे बड़ी उदारतापूर्ण वाणीमें बोला—॥ २६ ॥

प्रेषितोऽहं तव भ्रात्रा दशग्रीवेण सुव्रत । त्वत्समीपं महाबाहो सर्वशास्त्रभृतां वर ॥ २७ ॥ तच्छ्रूयतां महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । वचनं मम वित्तेश यद् ब्रवीति दशाननः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, सर्वशास्त्रविशारद, महाबाहु, महाप्राज्ञ धनेश्वर ! आपके भाई दशग्रीवने मुझे आपके पास भेजा है । दशमुख रावण आपसे जो कुछ कहना चाहते हैं, वह बता रहा हूँ । आप मेरी बात सुनिये ॥ २७-२८ ॥

इयं किल पुरी रम्या सुमालिप्रमुखैः पुरा । भुक्तपूर्वा विशालाक्ष राक्षसैर्भीमविक्रमैः ॥ २९ ॥ तेन विज्ञाप्यते सोऽयं साम्प्रतं विश्रवात्मज । तदेषा दीयतां तात याचतस्तस्य सामतः ॥ ३० ॥ प्रहस्तादपि संश्रुत्य देवो वैश्रवणो वचः । प्रत्युवाच प्रहस्तं तं वाक्यं वाक्यविदां वरः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘विशाललोचन वैश्रवण ! यह रमणीय लङ्कापुरी पहले भयानक पराक्रमी सुमाली आदि राक्षसोंके अधिकारमें रही है। उन्होंने बहुत समयतक इसका उपभोग किया है । अतः वे दशग्रीव इस समय यह सूचित कर रहे हैं कि ‘यह लङ्का जिनकी वस्तु है, उन्हें लौटा दी जाय ।’ तात ! शान्तिपूर्वक याचना करनेवाले दशग्रीवको आप यह पुरी लौटा दें’ ॥ प्रहस्तके मुखसे यह बात सुनकर वाणीका मर्म समझने-वालोंमें श्रेष्ठ भगवान् वैश्रवणने प्रहस्तको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ३१ ॥

दत्ता ममेयं पित्रा तु लङ्का शून्या निशाचरैः । निवेशिता च मे रक्षो दानमानादिभिर्गुणैः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘राक्षस ! यह लङ्का पहले निशाचरोंसे सूनी थी । उस समय पिताजीने मुझे इसमें रहनेकी आज्ञा दी और मैंने इसमें दान, मान आदि गुणोंद्वारा प्रजाजनोंको बसाया ॥ ३२ ॥

ब्रूहि गच्छ दशग्रीवं पुरी राज्यं च यन्मम । तत्राप्येतन्महाबाहो भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम् ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘दूत ! तुम जाकर दशग्रीवसे कहो— महाबाहो ! यह पुरी तथा यह निष्कण्टक राज्य जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब तुम्हारा भी है । तुम इसका उपभोग करो ॥ ३३ ॥

अविभक्तं त्वया सार्धं राज्यं यच्चापि मे वसु । एवमुक्त्वा धनाध्यक्षो जगाम पितुरन्तिकम् ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘मेरा राज्य तथा सारा धन तुमसे बँटा हुआ नहीं है’ ऐसा कहकर धनाध्यक्ष कुबेर अपने पिता विश्रवा मुनिके पास चले गये ॥ ३४ ॥

अभिवाद्य गुरुं प्राह रावणस्य यदीप्सितम् । एष तात दशग्रीवो दूतं प्रेषितवान् मम ॥ ३५ ॥ दीयतां नगरी लङ्का पूर्वं रक्षोगणोषिता । मयात्र यदनुष्ठेयं तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥ ३६ ॥

भावार्थ

वहाँ पिताको प्रणाम करके उन्होंने रावणकी जो इच्छा थी, उसे इस प्रकार बताया—‘तात ! आज दशग्रीवने मेरे पास दूत भेजा और कहलाया है कि इस लङ्का नगरीमें पहले राक्षस रहा करते थे, अतः इसे राक्षसोंको लौटा दीजिये । सुव्रत ! अब मुझे इस विषयमें क्या करना चाहिये, बतानेकी कृपा करें’ ॥ ३५-३६ ॥

ब्रह्मर्षिस्त्वेवमुक्तोऽसौ विश्रवा मुनिपुङ्गवः । प्राञ्जलिं धनदं प्राह शृणु पुत्र वचो मम ॥ ३७ ॥ दशग्रीवो महाबाहुरुक्तवान् मम संनिधौ । मया निर्भर्त्सितश्चासीद् बहुशोकः सुदुर्मतिः ॥ ३८ ॥ स क्रोधेन मया चोक्तो ध्वंससे च पुनः पुनः ।

भावार्थ

उनके ऐसा कहनेपर ब्रह्मर्षि मुनिवर विश्रवा हाथ जोड़कर खड़े हुए धनद कुबेरसे बोले—‘बेटा ! मेरी बात सुनो॥ ‘महाबाहु दशग्रीवने मेरे निकट भी यह बात कही थी । इसके लिये मैंने उस दुर्बुद्धिको बहुत फटकारा, डाँट बतायी और बारंबार क्रोधपूर्वक कहा—‘अरे ! ऐसा करनेसे तेरा पतन हो जायगा’ किंतु इसका कुछ फल नहीं हुआ ॥३८½॥

श्रेयोऽभियुक्तं धर्म्यं च शृणु पुत्र वचो मम ॥ ३९ ॥ वरप्रदानसम्मूढो मान्यामान्यं सुदुर्मतिः । न वेत्ति मम शापाच्च प्रकृतिं दारुणां गतः ॥ ४० ॥ तस्माद् गच्छ महाबाहो कैलासं धरणीधरम् । निवेशय निवासार्थं त्यक्त्वा लङ्कां सहानुगः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘बेटा ! अब तुम्हीं मेरे धर्मानुकूल एवं कल्याणकारी वचनको ध्यान देकर सुनो । रावणकी बुद्धि बहुत ही खोटी है । वह वर पाकर मदमत्त हो उठा है—विवेक खो बैठा है । मेरे शापके कारण भी उसकी प्रकृति क्रूर हो गयी है ॥ ‘इसलिये महाबाहो ! अब तुम अनुचरोंसहित लङ्का छोड़कर कैलास पर्वतपर चले जाओ और अपने रहनेके लिये वहीं दूसरा नगर बसाओ ॥ ४१ ॥

तत्र मन्दाकिनी रम्या नदीनामुत्तमा नदी । काञ्चनैः सूर्यसंकाशैः पङ्कजैः संवृतोदका ॥ ४२ ॥ कुमुदैरुत्पलैश्चैव अन्यैश्चैव सुगन्धिभिः ।

भावार्थ

‘वहाँ नदियोंमें श्रेष्ठ रमणीय मन्दाकिनी नदी बहती है, जिसका जल सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णमय कमलों, कुमुदों, उत्पलों और दूसरे-दूसरे सुगन्धित कुसुमोंसे आच्छादित है ॥ ४२½ ॥

तत्र देवाः सगन्धर्वाः साप्सरोरगकिंनराः ॥ ४३ ॥ विहारशीलाः सततं रमन्ते सर्वदाश्रिताः । नहि क्षमं तवानेन वैरं धनद रक्षसा ॥ ४४ ॥ जानीषे हि यथानेन लब्धः परमको वरः ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘उस पर्वतपर देवता, गन्धर्व, अप्सरा, नाग और किन्नर आदि दिव्य प्राणी, जिन्हें स्वभावसे ही घूमना-फिरना अधिक प्रिय है, सदा रहते हुए निरन्तर आनन्दका अनुभव करते हैं । धनद ! इस राक्षसके साथ तुम्हारा वैर करना उचित नहीं है । तुम तो जानते ही हो कि इसने ब्रह्माजीसे कैसा उत्कृष्ट वर प्राप्त किया है’ ॥ ४३–४५ ॥

एवमुक्तो गृहीत्वा तु तद्वचः पितृगौरवात् । सदारपुत्रः सामात्यः सवाहनधनो गतः ॥ ४६ ॥

भावार्थ

मुनिके ऐसा कहनेपर कुबेरने पिताका मान रखते हुए उनकी बात मान ली और स्त्री, पुत्र, मन्त्री, वाहन तथा धन साथ लेकर वे लङ्कासे कैलासको चले गये ॥ ४६ ॥

प्रहस्तोऽथ दशग्रीवं गत्वा वचनमब्रवीत् । प्रहृष्टात्मा महात्मानं सहामात्यं सहानुजम् ॥ ४७ ॥

भावार्थ

तदनन्तर प्रहस्त प्रसन्न होकर मन्त्री और भाइयोंके साथ बैठे हुए महामना दशग्रीवके पास जाकर बोला—॥ ४७ ॥

शून्या सा नगरी लङ्का त्यक्त्वैनां धनदो गतः । प्रविश्य तां सहस्राभिः स्वधर्मं तत्र पालय ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘लङ्का नगरी खाली हो गयी । कुबेर उसे छोड़कर चले गये । अब आप हमलोगोंके साथ उसमें प्रवेश करके अपने धर्मका पालन कीजिये’ ॥ ४८ ॥

एवमुक्तो दशग्रीवः प्रहस्तेन महाबलः । विवेश नगरीं लङ्कां भ्रातृभिः सबलानुगैः ॥ ४९ ॥ धनदेन परित्यक्तां सुविभक्तमहापथाम् । आरुरोह स देवारिः स्वर्गं देवाधिपो यथा ॥ ५० ॥ स चाभिषिक्तः क्षणदाचरैस्तदा निवेशयामास पुरीं दशाननः । निकामपूर्णा च बभूव सा पुरी निशाचरैर्नीलबलाहकोपमैः ॥ ५१ ॥

भावार्थ

प्रहस्तके ऐसा कहनेपर महाबली दशग्रीवने अपनी सेना, अनुचर तथा भाइयोंसहित कुबेरद्वारा त्यागी हुई लङ्कापुरीमें प्रवेश किया । उस नगरीमें सुन्दर विभागपूर्वक बड़ी-बड़ी सड़कें बनी थीं । जैसे देवराज इन्द्र स्वर्गके सिंहासनपर आरूढ़ हुए थे, उसी प्रकार देवद्रोही रावणने लङ्कामें पदार्पण किया ॥ उस समय निशाचरोंने दशमुख रावणका राज्याभिषेक किया । फिर रावणने उस पुरीको बसाया । देखते-देखते समूची लङ्कापुरी नील मेघके समान वर्णवाले राक्षसोंसे पूर्णतः भर गयी ॥ ५१ ॥

धनेश्वरस्तत्थ पितृवाक्यगौरवा- न्न्यवेशयच्छशिविमले गिरौ पुरीम् । स्वलंकृतैर्भवनवरैर्विभूषितां पुरंदरः स्वरिव यथामरावतीम् ॥ ५२ ॥

भावार्थ

धनके स्वामी कुबेरने पिताकी आज्ञाको आदर देकर चन्द्रमाके समान निर्मल कान्तिवाले कैलास पर्वतपर शोभाशाली श्रेष्ठ भवनोंसे विभूषित अलकापुरी बसायी, ठीक वैसे ही जैसे देवराज इन्द्रने स्वर्गलोकमें अमरावती पुरी बसायी थी ॥

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