उत्तरकाण्ड, सर्ग 68
यामेव रात्रिं शत्रुघ्नः पर्णशालां समाविशत् । तामेव रात्रिं सीतापि प्रसूता दारकद्वयम् ॥ १ ॥
भावार्थ
जिस रातको शत्रुघ्नने पर्णशालामें प्रवेश किया था, उसी रातमें सीताजीने दो पुत्रोंको जन्म दिया ॥ १ ॥
ततोऽर्धरात्रसमये बालका मुनिदारकाः । वाल्मीकेः प्रियमाचख्युः सीतायाः प्रसवं शुभम् ॥२॥
भावार्थ
तदनन्तर आधीरातके समय कुछ मुनिकुमारोंने वाल्मीकिजीके पास आकर उन्हें सीताजीके प्रसव होनेका शुभ एवं प्रिय समाचार सुनाया—॥ २ ॥
भगवन् रामपत्नी सा प्रसूता दारकद्वयम् । ततो रक्षां महातेजः कुरु भूतविनाशिनीम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नीने दो पुत्रोंको जन्म दिया है; अतः महातेजस्वी महर्षे ! आप उनकी बाल-ग्रहजनित बाधा निवृत्त करनेवाली रक्षा करें’ ॥ ३ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा महर्षिः समुपागमत् । बालचन्द्रप्रतीकाशौ देवपुत्रौ महौजसौ ॥ ४ ॥
भावार्थ
उन कुमारोंकी वह बात सुनकर महर्षि उस स्थानपर गये । सीताके वे दोनों पुत्र बालचन्द्रमाके समान सुन्दर तथा देवकुमारोंके समान महातेजस्वी थे ॥ ४ ॥
जगाम तत्र हृष्टात्मा ददर्श च कुमारकौ । भूतघ्नीं चाकरोत् ताभ्यां रक्षां रक्षोविनाशिनीम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
वाल्मीकिजीने प्रसन्नचित्त होकर सूतिकागारमें प्रवेश किया और उन दोनों कुमारोंको देखा तथा उनके लिये भूतों और राक्षसोंका विनाश करनेवाली रक्षाकी व्यवस्था की ॥ ५ ॥
कुशमुष्टिमुपादाय लवं चैव तु स द्विजः । वाल्मीकिः प्रददौ ताभ्यां रक्षां भूतविनाशिनीम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
ब्रह्मर्षि वाल्मीकिने एक कुशाओंका मुठा और उनके लव लेकर उनके द्वारा उन दोनों बालकोंकी भूत-बाधाका निवारण करनेके लिये रक्षा-विधिका उपदेश दिया—॥ ६ ॥
यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैर्मन्त्रसत्कृतैः । निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥ ७ ॥ यश्चावरो भवेत् ताभ्यां लवेन सुसमाहितः । निर्मार्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘वृद्धा स्त्रियोंको चाहिये कि इन दोनों बालकोंमें जो पहले उत्पन्न हुआ है, उसका मन्त्रोंद्वारा संस्कार किये हुए इन कुशोंसे मार्जन करें । ऐसा करनेपर उस बालकका नाम ‘कुश’ होगा और उनमें जो छोटा है, उसका लवसे मार्जन करें । इससे उसका नाम ‘लव’ होगा ॥ ७-८ ॥
एवं कुशलवौ नाम्ना तावुभौ यमजातकौ । मत्कृताभ्यां च नामभ्यां ख्यातियुक्तौ भविष्यतः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार जुड़वें उत्पन्न हुए ये दोनों बालक क्रमशः कुश और लव नाम धारण करेंगे और मेरे द्वारा निश्चित किये गये इन्हीं नामोंसे भूमण्डलमें विख्यात होंगे’ ॥ ९ ॥
तां रक्षां जगृहुस्तां च मुनिहस्तात् समाहिताः । अकुर्वंश्च ततो रक्षां तयोर्विगतकल्मषाः ॥ १० ॥
भावार्थ
वह सुनकर निष्पाप वृद्धा स्त्रियोंने एकाग्रचित्त हो मुनिके हाथसे रक्षाके साधनभूत उन कुशोंको ले लिया और उनके द्वारा उन दोनों बालकोंका मार्जन एवं संरक्षण किया ॥ १० ॥
तथा तां क्रियमाणां च वृद्धाभिर्गोत्रनाम च । संकीर्तनं च रामस्य सीतायाः प्रसवौ शुभौ ॥ ११ ॥ अर्धरात्रे तु शत्रुघ्नः शुश्राव सुमहत् प्रियम् । पर्णशालां ततो गत्वा मातर्दिष्ट्येति चाब्रवीत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
जब वृद्धा स्त्रियाँ इस प्रकार रक्षा करने लगीं, उस समय आधी रातको श्रीराम और सीताके नाम, गोत्रके उच्चारणकी ध्वनि शत्रुघ्नजीके कानोंमें पड़ी । साथ ही उन्हें सीताके दो सुन्दर पुत्र होनेका संवाद प्राप्त हुआ । तब वे सीताजीकी पर्णशालामें गये और बोले—‘माताजी ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है’ ॥ ११-१२ ॥
तदा तस्य प्रहृष्टस्य शत्रुघ्नस्य महात्मनः । व्यतीता वार्षिकी रात्रिः श्रावणी लघुविक्रमा ॥ १३ ॥ प्रभाते सुमहावीर्यः कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् । मुनिं प्राञ्जलिरामन्त्र्य ययौ पश्चान्मुखः पुनः ॥ १४ ॥
भावार्थ
महात्मा शत्रुघ्न उस समय इतने प्रसन्न थे कि उनकी वह वर्षाकालिक सावनकी रात बात-की-बातमें बीत गयी ॥ सवेरा होनेपर पूर्वाह्णकालका कार्य संध्या-वन्दन आदि करके महापराक्रमी शत्रुघ्न हाथ जोड़ मुनिसे विदा ले पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये ॥ १४ ॥
स गत्वा यमुनातीरं सप्तरात्रोषितः पथि । ऋषीणां पुण्यकीर्तीनामाश्रमे वासमभ्ययात् ॥ १५ ॥
भावार्थ
मार्गमें सात रात बिताकर वे यमुना-तटपर जा पहुँचे और वहाँ पुण्यकीर्ति महर्षियोंके आश्रममें रहने लगे ॥ १५ ॥
स तत्र मुनिभिः सार्धं भार्गवप्रमुखैर्नृपः । कथाभिरभिरूपाभिर्वासं चक्रे महायशाः ॥ १६ ॥ स काञ्चनाद्यैर्मुनिभिः समेते रघुप्रवीरो रजनीं तदानीम् । कथाप्रकारैर्बहुभिर्महात्मा विरामयामास नरेन्द्रसूनुः ॥ १७ ॥
भावार्थ
महायशस्वी राजा शत्रुघ्नने वहाँ च्यवन आदि मुनियोंके साथ सुन्दर कथा-वार्ताद्वारा कालक्षेप करते हुए निवास किया॥ इस प्रकार रघुकुलके प्रमुख वीर महात्मा राजकुमार शत्रुघ्न वहाँ एकत्र हुए च्यवन आदि मुनियोंके साथ नाना प्रकारकी कथाएँ सुनते हुए उन दिनों यमुनातटपर रात बिताने लगे ॥ १७ ॥
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