उत्तरकाण्ड, सर्ग 69
अथ रात्र्यां प्रवृत्तायां शत्रुघ्नो भृगुनन्दनम् । पप्रच्छ च्यवनं विप्रं लवणस्य यथाबलम् ॥ १ ॥ शूलस्य च बलं ब्रह्मन् के च पूर्वं विनाशिताः । अनेन शूलमुख्येन द्वन्द्वयुद्धमुपागताः ॥ २ ॥
भावार्थ
एक दिन रातके समय शत्रुघ्नने भृगुनन्दन ब्रह्मर्षि च्यवनसे पूछा—‘ब्रह्मन् ! लवणासुरमें कितना बल है ? उसके शूलमें कितनी शक्ति है ? उस उत्तम शूलके द्वारा उसने द्वन्द्व-युद्धमें आये हुए किन-किन योद्धाओंका वध किया है ?’ ॥ १-२ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य महात्मनः । प्रत्युवाच महातेजाश्च्यवनो रघुनन्दनम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
महात्मा शत्रुघ्नजीका यह वचन सुनकर महातेजस्वी च्यवनने उन रघुकुलनन्दन राजकुमारसे कहा—॥ ३ ॥
असंख्येयानि कर्माणि यान्यस्य रघुनन्दन । इक्ष्वाकुवंशप्रभवे यद् वृत्तं तच्छृणुष्व मे ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! इस लवणासुरके कर्म असंख्य हैं । उनमेंसे एक ऐसे कर्मका वर्णन किया जाता है, जो इक्ष्वाकुवंशी राजा मान्धाताके ऊपर घटित हुआ था । तुम उसे मेरे मुँहसे सुनो ॥ ४ ॥
अयोध्यायां पुरा राजा युवनाश्वसुतो बली । मांधाता इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘पूर्वकालकी बात है अयोध्यापुरीमें युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता राज्य करते थे । वे बड़े बलवान्, पराक्रमी तथा तीनों लोकोंमें विख्यात थे ॥ ५ ॥
स कृत्वा पृथिवीं कृत्स्नां शासने पृथिवीपतिः । सुरलोकमितो जेतुमुद्योगमकरोन्नृपः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘उन पृथिवीपति नरेशने सारी पृथ्वीको अपने अधिकारमें करके यहाँसे देवलोकपर विजय पानेका उद्योग आरम्भ किया ॥ ६ ॥
इन्द्रस्य च भयं तीव्रं सुराणां च महात्मनाम् । मांधातरि कृतोद्योगे देवलोकजिगीषया ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘राजा मान्धाताने जब देवलोकपर विजय पानेकी इच्छासे उद्योग आरम्भ किया, तब इन्द्र तथा महामनस्वी देवताओंको बड़ा भय हुआ ॥ ७ ॥
अर्धासनेन शक्रस्य राज्यार्धेन च पार्थिवः । वन्द्यमानः सुरगणैः प्रतिज्ञामध्यरोहत ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘‘मैं इन्द्रका आधा सिंहासन और उनका आधा राज्य लेकर भूमण्डलका राजा हो देवताओंसे वन्दित होकर रहूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करके वे स्वर्गलोकपर जा चढ़े ॥ ८ ॥
तस्य पापमभिप्रायं विदित्वा पाकशासनः । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमुवाच युवनाश्वजम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘उनके खोटे अभिप्रायको जानकर पाकशासन इन्द्र उन युवनाश्व पुत्र मान्धाताके पास गये और उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए इस प्रकार बोले—॥ ९ ॥
राजा त्वं मानुषे लोके न तावत् पुरुषर्षभ । अकृत्वा पृथिवीं वश्यां देवराज्यमिहेच्छसि ॥ १० ॥
भावार्थ
‘‘पुरुषप्रवर ! अभी तुम सारे मर्त्यलोकके भी राजा नहीं हो । समूची पृथ्वीको वशमें किये बिना ही देवताओंका राज्य कैसे लेना चाहते हो ॥ १० ॥
यदि वीर समग्रा ते मेदिनी निखिला वशे । देवराज्यं कुरुष्वेह सभृत्यबलवाहनः ॥ ११ ॥
भावार्थ
“वीर ! यदि सारी पृथ्वी तुम्हारे वशमें हो जाय तो तुम सेवकों, सेनाओं और सवारियोंसहित यहाँ देवलोकका राज्य करना’ ॥ ११ ॥
इन्द्रमेवं ब्रुवाणं तं मांधाता वाक्यमब्रवीत् । क मे शक्र प्रतिहतं शासनं पृथिवीतले ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘ऐसी बातें कहते हुए इन्द्रसे मान्धाताने पूछा—‘देवराज ! बताइये तो सही, इस पृथ्वीपर कहाँ मेरे आदेशकी अवहेलना होती है’ ॥ १२ ॥
तमुवाच सहस्राक्षो लवणो नाम राक्षसः । मधुपुत्रो मधुवने न तेऽऽज्ञां कुरुतेऽनघ ॥ १३ ॥ तच्छ्रुत्वा विप्रियं घोरं सहस्राक्षेण भाषितम् । व्रीडितोऽवाङ्मुखो राजा व्याहर्तुं न शशाक ह ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘तब इन्द्रने कहा—‘निष्पाप नरेश ! मधुवनमें मधुका पुत्र लवणासुर रहता है । वह तुम्हारी आज्ञा नहीं मानता’ ॥ ‘इन्द्रकी कही हुई यह घोर अप्रिय बात सुनकर राजा मान्धाताका मुख लज्जासे झुक गया । वे कुछ बोल न सके ॥ १४ ॥
आमन्त्र्य तु सहस्राक्षं प्रायात् किंचिदवाङ्मुखः । पुनरेवागमच्छ्रीमानिमं लोकं नरेश्वरः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वे नरेश इन्द्रसे विदा ले मुँह लटकाये वहाँसे चल दिये और पुनः इस मर्त्यलोकमें ही आ पहुँचे ॥ १५ ॥
स कृत्वा हृदयेऽमर्षं सभृत्यबलवाहनः । आजगाम मधोः पुत्रं वशे कर्तुमरिंदमः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने अपने हृदयमें अमर्ष भर लिया । फिर वे शत्रुदमन मान्धाता मधुके पुत्रको वशमें करनेके लिये सेवक, सेना और सवारियोंसहित उसकी राजधानीके समीप आये ॥ १६ ॥
स काङ्क्षमाणो लवणं युद्धाय पुरुषर्षभः । दूतं सम्प्रेषयामास सकाशं लवणस्य सः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘उन पुरुषप्रवर नरेशने युद्धकी इच्छासे लवणके पास अपना दूत भेजा ॥ १७ ॥
स गत्वा विप्रियाण्याह बहूनि मधुनः सुतम् । वदन्तमेवं तं दूतं भक्षयामास राक्षसः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘दूतने वहाँ जाकर मधुके पुत्रको बहुत-से कटुवचन सुनाये । इस तरह कठोर बातें कहते हुए उस दूतको वह राक्षस तुरंत खा गया ॥ १८ ॥
चिरायमाणे दूते तु राजा क्रोधसमन्वितः । अर्दयामास तद् रक्षः शरवृष्ट्या समन्ततः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जब दूतके लौटनेमें विलम्ब हुआ, तब राजा बड़े क्रुद्ध हुए और बाणोंकी वर्षा करके उस राक्षसको सब ओरसे पीड़ित करने लगे ॥ १९ ॥
ततः प्रहस्य तद् रक्षः शूलं जग्राह पाणिना । वधाय सानुबन्धस्य मुमोचायुधमुत्तमम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘तब लवणासुरने हँसकर हाथसे वह शूल उठाया और सेवकोंसहित राजा मान्धाताका वध करनेके लिये उस उत्तम अस्त्रको उनके ऊपर छोड़ दिया ॥ २० ॥
तच्छूलं दीप्यमानं तु सभृत्यबलवाहनम् । भस्मीकृत्वा नृपं भूयो लवणस्यागमत् करम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘वह चमचमाता हुआ शूल सेवक, सेना और सवारियोंसहित राजा मान्धाताको भस्म करके फिर लवणासुरके हाथमें आ गया ॥ २१ ॥
एवं स राजा सुमहान् हतः सबलवाहनः । शूलस्य तु बलं सौम्य अप्रमेयमनुत्तमम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार सारी सेना और सवारियोंके साथ महाराज मान्धाता मारे गये । सौम्य ! उस शूलकी शक्ति असीम और सबसे बढ़ी-चढ़ी है ॥ २२ ॥
श्वः प्रभाते तु लवणं वधिष्यसि न संशयः । अगृहीतायुधं क्षिप्रं भ्रुवो हि विजयस्तव ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! कल सबेरे जबतक वह राक्षस उस अस्त्रको न ले, तबतक ही शीघ्रता करनेपर तुम निःसंदेह उसका वध कर सकोगे और इस प्रकार निश्चय ही तुम्हारी विजय होगी ॥२३॥
लोकानां स्वस्ति चैवं स्यात् कृते कर्मणि च त्वया । एतत् ते सर्वमाख्यातं लवणस्य दुरात्मनः ॥ २४ ॥ शूलस्य च बलं घोरमप्रमेयं नरर्षभ । विनाशश्चैव मांधातुर्यत्नेनाभूच्च पार्थिव ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे द्वारा यह कार्य सम्पन्न होनेपर समस्त लोकोंका कल्याण होगा । नरश्रेष्ठ ! इस तरह मैंने तुम्हें दुरात्मा लवणका सारा बल बता दिया और उसके शूलकी भी घोर एवं असीम शक्तिका परिचय दे दिया । पृथ्वीनाथ ! इन्द्रके प्रयत्नसे उसी शूलके द्वारा राजा मान्धाताका विनाश हुआ था ॥२४-२५॥
त्वं श्वः प्रभाते लवणं महात्मन् वधिष्यसे नात्र तु संशयो मे । शूलं विना निर्गतमामिषार्थे ध्रुवो जयस्ते भविता नरेन्द्र ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘महात्मन् ! कल सवेरे जब वह शूल लिये बिना ही मांसका संग्रह करनेके लिये निकलेगा, तभी तुम उसका वध कर डालोगे, इसमें संशय नहीं है । नरेन्द्र ! अवश्य तुम्हारी विजय होगी’ ॥ २६ ॥
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