उत्तरकाण्ड, सर्ग 67
प्रस्थाप्य च बलं सर्वं मासमात्रोषितः पथि । एक एवाशु शत्रुघ्नो जगाम त्वरितं तदा ॥ १ ॥
भावार्थ
अपनी सेनाको आगे भेजकर अयोध्यामें एक माह रहनेके पश्चात् शत्रुघ्न अकेले ही वहाँसे मधुवनके मार्गपर प्रस्थित हुए । वे बड़ी तेजीके साथ आगे बढ़ने लगे ॥ १ ॥
द्विरात्रमन्तरे शूर उष्य राघवनन्दनः । वाल्मीकेराश्रमं पुण्यमगच्छद् वासमुत्तमम् ॥ २ ॥
भावार्थ
रघुकुलको आनन्दित करनेवाले शूरवीर शत्रुघ्न रास्तेमें दो रात बिताकर तीसरे दिन महर्षि वाल्मीकिके पवित्र आश्रमपर जा पहुँचे । वह सबसे उत्तम वासस्थान था ॥ २ ॥
सोऽभिवाद्य महात्मानं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् । कृताञ्जलिरथो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ॥ ३ ॥
भावार्थ
वहाँ उन्होंने हाथ जोड़ मुनिश्रेष्ठ महात्मा वाल्मीकिको प्रणाम करके यह बात कही—॥ ३ ॥
भगवन् वस्तुमिच्छामि गुरोः कृत्यादिहागतः । श्वः प्रभाते गमिष्यामि प्रतीचीं वारुणीं दिशम् ॥ ४ ॥ शत्रुघ्नस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य मुनिपुङ्गवः । प्रत्युवाच महात्मानं स्वागतं ते महायशः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! मैं अपने बड़े भाई श्रीरघुनाथजीके कार्यसे इधर आया हूँ । आज रातको यहाँ ठहरना चाहता हूँ और कल सबेरे वरुणदेवद्वारा पालित पश्चिम दिशाको चला जाऊँगा’॥ शत्रुघ्नकी यह बात सुनकर मुनिवर वाल्मीकिने उन महात्माको हँसते हुए उत्तर दिया—‘महायशस्वी वीर ! तुम्हारा स्वागत है ॥ ५ ॥
स्वमाश्रममिदं सौम्य राघवाणां कुलस्य वै । आसनं पाद्यमर्घ्यं च निर्विशङ्कः प्रतीच्छ मे ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! यह आश्रम रघुवंशियोंके लिये अपना ही घर है । तुम निःशङ्क होकर मेरी ओरसे आसन, पाद्य और अर्घ्य स्वीकार करो’ ॥ ६ ॥
प्रतिगृह्य तदा पूजां फलमूलं च भोजनम् । भक्षयामास काकुत्स्थस्तृप्तिं च परमां गतः ॥ ७ ॥
भावार्थ
तब वह सत्कार ग्रहण करके शत्रुघ्नने फल-मूलका भोजन किया । इससे उन्हें बड़ी तृप्ति हुई ॥ ७ ॥
स भुक्त्वा फलमूलं च महर्षिं तमुवाच ह । पूर्वो यज्ञविभूतीयं कस्याश्रमसमीपतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
फल-मूल खाकर वे महर्षिसे बोले—‘मुने ! इस आश्रमके निकट जो यह प्राचीनकालका यज्ञ-वैभव ( यूप आदि उपकरण ) दिखायी देता है, किसका है—किस यजमान नरेशने यहाँ यज्ञ किया था ?’ ॥ ८ ॥
तत् तस्य भाषितं श्रुत्वा वाल्मीकिर्वाक्यमब्रवीत् । शत्रुघ्न शृणु यस्येदं बभूवायतनं पुरा ॥ ९ ॥
भावार्थ
उनका यह प्रश्न सुनकर वाल्मीकिजीने कहा—‘शत्रुघ्न ! पूर्वकालमें जिस यजमान नरेशका यह यज्ञमण्डप रहा है, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ९ ॥
युष्माकं पूर्वको राजा सुदासस्तस्य भूपतेः । पुत्रो वीरसहो नाम वीर्यवानतिधार्मिकः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे पूर्वज राजा सुदास इस भूमण्डलके स्वामी हो गये हैं । उन भूपालके वीरसह ( मित्रसह ) नामक एक पुत्र हुआ, जो बड़ा पराक्रमी और अत्यन्त धर्मात्मा था ॥ १० ॥
स बाल एव सौदासो मृगयामुपचक्रमे । चञ्चूर्यमाणं दद्दशे स शूरो राक्षसद्वयम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘सुदासका वह शूरवीर पुत्र बाल्यावस्थामें ही एक दिन शिकार खेलनेके लिये वनमें गया । वहाँ उसने दो राक्षस देखे, जो सब ओर बारंबार बिचर रहे थे ॥ ११ ॥
शार्दूलरूपिणौ घोरौ मृगान् बहुसहस्रशः । भक्षमाणावसंतुष्टौ पर्याप्तिं नैव जग्मतुः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘वे दोनों घोर राक्षस बाघका रूप धारण करके कई हजार मृगोंको मारकर खा गये । फिर भी संतुष्ट नहीं हुए । उनके पेट नहीं भरे ॥ १२ ॥
स तु तौ राक्षसौ दृष्ट्वा निर्मृगं च वनं कृतम् । क्रोधेन महताविष्टो जघानैकं महेषुणा ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘सौदासने उन दोनों राक्षसोंको देखा । साथ ही उनके द्वारा मृगशून्य किये गये उस वनकी अवस्थापर दृष्टिपात किया । इससे वे महान् क्रोधसे भर गये और उनमेंसे एकको विशाल बाणसे मार डाला ॥ १३ ॥
विनिपात्य तमेकं तु सौदासः पुरुषर्षभः । विज्वरो विगतामर्षों हतं रक्षो ह्यदैक्षत ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘एकको धराशायी करके वे पुरुषप्रवर सौदास निश्चिन्त हो गये । उनका अमर्ष जाता रहा और वे उस मरे हुए राक्षसको देखने लगे ॥ १४ ॥
निरीक्षमाणं तं दृष्ट्वा सहायं तस्य रक्षसः । संतापमकरोद् घोरं सौदासं चेदमब्रवीत् ॥ १५ ॥ यस्मादनपराधं तं सहायं मम जघ्निवान् । तस्मात् तवापि पापिष्ठ प्रदास्यामि प्रतिक्रियाम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘उस राक्षसके मरे हुए साथीको जब सौदास देख रहे थे, उस समय उनकी ओर दृष्टिपात करके उस दूसरे राक्षसने मन-ही-मन घोर संताप किया और सौदाससे इस प्रकार कहा—॥ ‘‘महापापी नरेश ! तूने मेरे निरपराध साथीको मार डाला है, इसलिये मैं तुझसे भी इसका बदला लूँगा’ ॥ १६ ॥
एवमुक्त्वा तु तद् रक्षस्तत्रैवान्तरधीयत । कालपर्याययोगेन राजा मित्रसहोऽभवत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘ऐसा कहकर वह राक्षस वहीं अन्तर्धान हो गया और दीर्घकालके पश्चात् सुदासकुमार मित्रसह अयोध्याके राजा हो गये ॥ १७ ॥
राजापि यजते यज्ञमस्याश्रमसमीपतः । अश्वमेधं महायज्ञं तं वसिष्ठोऽप्यपालयत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘उन्हीं राजा मित्रसहने इस आश्रमके समीप अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान किया । महर्षि वसिष्ठ अपने तपोबलसे उस यज्ञकी रक्षा करते थे ॥ १८ ॥
तत्र यज्ञो महानासीद् बहुवर्षगणायुतः । समृद्धः परया लक्ष्म्या देवयज्ञसमोऽभवत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘उनका वह महान् यज्ञ बहुत वर्षोंतक यहाँ चलता रहा । वह भारी धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न यज्ञ देवताओंके यज्ञकी समानता करता था ॥ १९ ॥
अथावसाने यज्ञस्य पूर्ववैरमनुस्मरन् । वसिष्ठरूपी राजानमिति होवाच राक्षसः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘उस यज्ञकी समाप्ति होनेपर पहलेके वैरका स्मरण करनेवाला वह राक्षस वसिष्ठजीका रूप धारण करके राजाके पास आया और इस प्रकार बोला—॥ २० ॥
अद्य यज्ञावसानान्ते सामिषं भोजनं मम । दीयतामतिशीघ्रं वै नात्र कार्या विचारणा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! आज यज्ञकी समाप्तिका दिन है, अतः आज मुझे तुम शीघ्र ही मांसयुक्त भोजन दो । इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ २१ ॥
तच्छ्रुत्वा व्याहृतं वाक्यं रक्षसा ब्रह्मरूपिणा । सूदान् संस्कारकुशलानुवाच पृथिवीपतिः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘ब्राह्मणरूपधारी राक्षसकी कही हुई बात सुनकर राजाने रसोई बनानेमें कुशल रसोइयोंसे कहा—॥ २२ ॥
हविष्यं सामिषं स्वादु यथा भवति भोजनम् । तथा कुरुत शीघ्रं वै परितुष्येद् यथा गुरुः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘तुमलोग आज शीघ्र ही मांसयुक्त हविष्य तैयार करो और उसे ऐसा बनाओ, जिससे स्वादिष्ट भोजन हो सके तथा मेरे गुरुदेव उससे संतुष्ट हो सकें’ ॥ २३ ॥
शासनात् पार्थिवेन्द्रस्य सूदः सम्भ्रान्तमानसः । तच्च रक्षः पुनस्तत्र सूदवेषमथाकरोत् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘महाराजकी इस आज्ञाको सुनते ही रसोइयेके मनमें बड़ी घबराहट पैदा हो गयी ( वह सोचने लगा, आज गुरुजी अभक्ष्य-भक्षणमें कैसे प्रवृत्त होंगे ) । यह देख फिर उस राक्षसने ही रसोइयेका वेष बना लिया ॥ २४ ॥
स मानुषमथो मांसं पार्थिवाय न्यवेदयत् । इदं स्वादु हविष्यं च सामिषं चान्नमाहृतम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘उसने मनुष्यका मांस लाकर राजाको दे दिया और कहा—‘यह मांसयुक्त अन्न एवं हविष्य लाया हूँ । यह बड़ा ही स्वादिष्ट है’ ॥ २५ ॥
स भोजनं वसिष्ठाय पत्न्या सार्धमुपाहरत् । मदयन्त्या नरश्रेष्ठ सामिषं रक्षसा हृतम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! अपनी पत्नी रानी मदयन्तीके साथ राजा मित्रसहने राक्षसके लाये हुए उस मांसयुक्त भोजनको वसिष्ठजीके सामने रक्खा ॥ २६ ॥
ज्ञात्वा तदामिषं विप्रो मानुषं भाजनं गतम् । क्रोधेन महताविष्टो व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘थालीमें मानव-मांस परोसा गया है, यह जानकर ब्रह्मर्षि वसिष्ठ महान् क्रोधसे भर गये और इस प्रकार बोले—॥२७॥
यस्मात् त्वं भोजनं राजन् ममैतद् दातुमिच्छसि । तस्माद् भोजनमेतत् ते भविष्यति न संशयः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘‘राजन् ! तुम मुझे ऐसा भोजन देना चाहते हो, इसलिये यही तुम्हारा भोजन होगा; इसमें संशय नहीं है ( अर्थात् तुम मनुष्यभक्षी राक्षस हो जाओगे )’ ॥ २८ ॥
ततः क्रुद्धस्तु सौदासस्तोयं जग्राह पाणिना । वसिष्ठं शप्तुमारेभे भार्या चैनमवारयत् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘यह सुनकर सौदासने भी कुपित हो हाथमें जल ले लिया और वसिष्ठ मुनिको शाप देना आरम्भ किया । तबतक उनकी पत्नीने उन्हें रोक दिया ॥ २९ ॥
राजन् प्रभुर्यतोऽस्माकं वसिष्ठो भगवानृषिः । प्रतिशप्तुं न शक्तस्त्वं देवतुल्यं पुरोधसम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘वे बोलीं—‘राजन् ! भगवान् वसिष्ठ मुनि हम सबके स्वामी हैं; अतः आप अपने देवतुल्य पुरोहितको बदलेमें शाप नहीं दे सकते’ ॥ ३० ॥
ततः क्रोधमयं तोयं तेजोबलसमन्वितम् । व्यसर्जयत धर्मात्मा ततः पादौ सिषेच च ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘तब धर्मात्मा राजाने तेज और बलसे सम्पन्न उस क्रोध-मय जलको नीचे डाल दिया । उससे अपने दोनों पैरोंको ही सींच लिया ॥ ३१ ॥
तेनास्य राजस्तौ पादौ तदा कल्माषतां गतौ । तदाप्रभृति राजासौ सौदासः सुमहायशाः ॥ ३२ ॥ कल्माषपादः संवृत्तः ख्यातश्चैव तथा नृपः ।
भावार्थ
ऐसा करनेसे राजाके दोनों पैर तत्काल चितकबरे हो गये । तभीसे महायशस्वी राजा सौदास कल्माषपाद ( चितकबरे पैरवाले ) हो गये और उसी नामसे उनकी ख्याति हुई ॥ ३२½ ॥
स राजा सह पत्न्या वै प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः । पुनर्वसिष्ठं प्रोवाच यदुक्तं ब्रह्मरूपिणा ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर पत्नीसहित राजाने बारंबार प्रणाम करके फिर वसिष्ठसे कहा—‘ब्रह्मर्षे ! आपहीका रूप धारण करके किसीने मुझे ऐसा भोजन देनेके लिये प्रेरित किया था’ ॥ ३३ ॥
तच्छ्रुत्वा पार्थिवेन्द्रस्य रक्षसा विकृतं च तत् । पुनः प्रोवाच राजानं वसिष्ठः पुरुषर्षभम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘राजाधिराज मित्रसहकी वह बात सुनकर और उसे राक्षसकी करतूत जानकर वसिष्ठने पुनः उन नरश्रेष्ठ नरेशसे कहा—॥ ३४ ॥
मया रोषपरीतेन यदिदं व्याहृतं वचः । नैतच्छक्यं वृथा कर्तुं प्रदास्यामि च ते वरम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘‘राजन् ! मैंने रोषसे भरकर जो बात कह दी है, इसे व्यर्थ नहीं किया जा सकता; परंतु इससे छूटनेके लिये मैं तुम्हें एक वर दूँगा ॥ ३५ ॥
कालो द्वादशवर्षाणि शापस्यान्तो भविष्यति । मत् प्रसादाच्च राजेन्द्र अतीतं न स्मरिष्यसि ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘‘राजेन्द्र ! वह वर इस प्रकार है—यह शाप बारह वर्षोंतक रहेगा । उसके बाद इसका अन्त हो जायगा । मेरी कृपासे तुम्हें बीती हुई बातका स्मरण नहीं रहेगा’ ॥ ३६ ॥
एवं स राजा तं शापमुपभुज्यारिसूदनः । प्रतिलेभे पुना राज्यं प्रजाश्चैवान्वपालयत् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार उस शत्रुसूदन राजाने बारह वर्षोंतक उस शापको भोगकर पुनः अपना राज्य पाया और प्रजाजनोंका निरन्तर पालन किया ॥ ३७ ॥
तस्य कल्माषपादस्य यज्ञस्यायतनं शुभम् । आश्रमस्य समीपेऽस्य यन्मां पृच्छसि राघव ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! उन्हीं राजा कल्माषपादके यज्ञका यह सुन्दर स्थान मेरे इस आश्रमके समीप दिखायी देता है, जिसके विषयमें तुम पूछ रहे थे’ ॥ ३८ ॥
तस्य तां पार्थिवेन्द्रस्य कथां श्रुत्वा सुदारुणाम् । विवेश पर्णशालायां महर्षिमभिवाद्य च ॥ ३९ ॥
भावार्थ
महाराज मित्रसहकी उस अत्यन्त दारुण कथाको सुनकर शत्रुघ्नने महर्षिको प्रणाम करके पर्णशालामें प्रवेश किया ॥३९॥
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