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उत्तरकाण्ड, सर्ग 64

तथोक्ते तानृषीन् रामः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः । किमाहारः किमाचारो लवणः क्र च वर्तते ॥ १ ॥

भावार्थ

ऋषियोंके इस प्रकार कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनसे हाथ जोड़कर पूछा—‘लवणासुर क्या खाता है ? उसका आचार-व्यवहार कैसा है—रहने-सहनेका ढंग क्या है ? और वह कहाँ रहता है ?’ ॥ १ ॥

राघवस्य वचः श्रुत्वा ऋषयः सर्व एव ते । ततो निवेदयामासुर्लवणो ववृधे यथा ॥ २ ॥

भावार्थ

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर उन सभी ऋषियोंने जिस तरहके आहार-व्यवहारसे लवणासुर पला था, वह सब कह सुनाया ॥ २ ॥

आहारः सर्वसत्त्वानि विशेषेण च तापसाः । आचारो रौद्रता नित्यं वासो मधुवने तथा ॥ ३ ॥

भावार्थ

वे बोले—‘प्रभो ! उसका आहार तो सभी प्राणी हैं; परंतु विशेषतः वह तपस्वी मुनियोंको खाता है । उसके आचार-व्यवहारमें बड़ी क्रूरता और भयानकता है और वह सदा मधुवनमें निवास करता है ॥ ३ ॥

हत्वा बहुसहस्राणि सिंहव्याघ्रमृगाण्डजान् । मानुषांश्चैव कुरुते नित्यमाहारमाह्निकम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘वह प्रतिदिन कई सहस्र सिंह, व्याघ्र, मृग, पक्षी और मनुष्योंको मारकर खा जाता है ॥ ४ ॥

ततोऽन्तराणि सत्त्वानि खादते स महाबलः । संहारे समनुप्राप्ते व्यादितास्य इवान्तकः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘संहारकाल आनेपर मुँह बाकर खड़े हुए यमराजके समान वह महाबली असुर दूसरे-दूसरे जीवोंको भी खाता रहता है’ ॥ ५ ॥

तच्छ्रुत्वा राघवो वाक्यमुवाच स महामुनीन् । घातयिष्यामि तद् रक्षो व्यपगच्छतु वो भयम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

उनका यह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीने उन महामुनियोंसे कहा—‘महर्षियो ! मैं उस राक्षसको मरवा डालूँगा । आपलोगोंका भय दूर हो जाना चाहिये’ ॥ ६ ॥

प्रतिज्ञाय तथा तेषां मुनीनामुग्रतेजसाम् । स भ्रातॄन् सहितान् सर्वानुवाच रघुनन्दनः ॥ ७ ॥

भावार्थ

इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी मुनियोंके समक्ष प्रतिज्ञा करके रघुकुलनन्दन श्रीरामने वहाँ एकत्र हुए अपने सब भाइयोंसे पूछा—॥ ७ ॥

को हन्ता लवणं वीरः कस्यांशः स विधीयताम् । भरतस्य महाबाहोः शत्रुघ्नस्य च धीमतः ॥ ८ ॥ राघवेणैवमुक्तस्तु भरतो वाक्यमब्रवीत् । अहमेनं वधिष्यामि ममांशः स विधीयताम् ॥ ९ ॥ भरतस्य वचः श्रुत्वा धैर्यशौर्यसमन्वितम् । लक्ष्मणावरजस्तस्थौ हित्वा सौवर्णमासनम् ॥ १० ॥ शत्रुघ्नस्त्वब्रवीद् वाक्यं प्रणिपत्य नराधिपम् । कृतकर्मा महाबाहुर्मध्यमो रघुनन्दन ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘बन्धुओ ! लवणको कौन वीर मारेगा ? उसे किसके हिस्सेमें रक्खा जाय—महाबाहु भरतके या बुद्धिमान् शत्रुघ्नके’॥ रघुनाथजीके इस प्रकार पूछनेपर भरतजी बोले—‘भैया ! मैं इस लवणका वध करूँगा । इसे मेरे हिस्सेमें रक्खा जाय’ ॥ भरतजीके ये धीरता और वीरतापूर्ण शब्द सुनकर शत्रुघ्नजी सोनेका सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये और महाराज श्रीरामको प्रणाम करके बोले—‘रघुनन्दन ! महाबाहु मझले भैया तो बहुत-से कार्य कर चुके हैं ॥ १०-११ ॥

आर्येण हि पुरा शून्या त्वयोध्या परिपालिता । संतापं हृदये कृत्वा आर्यस्यागमनं प्रति ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘पहले जब अयोध्यापुरी आपसे सूनी हो गयी थी, उस समय आपके आगमन-कालतक हृदयमें अत्यन्त संताप लिये इन्होंने अयोध्यापुरीका पालन किया था ॥ १२ ॥

दुःखानि च बहूनीह अनुभूतानि पार्थिव । शयानो दुःखशय्यासु नन्दिग्रामे महायशाः ॥ १३ ॥ फलमूलाशनो भूत्वा जटी चीरधरस्तथा ।

भावार्थ

‘पृथ्वीनाथ ! महायशस्वी भरतने नन्दिग्राममें दुःखद शय्यापर सोते हुए पहले बहुत-से दुःख भोगे हैं । ये फल-मूल खाकर रहते थे और सिरपर जटा बढ़ाये चीर वस्त्र धारण करते थे ॥ १३½ ॥

अनुभूयेदृशं दुःखमेष राघवनन्दनः ॥ १४ ॥ प्रेष्ये मयि स्थिते राजन् न भूयः क्लेशमाप्नुयात् ।

भावार्थ

‘महाराज ! ऐसे-ऐसे दुःख भोगकर ये रघुकुलनन्दन भरत मुझ सेवकके रहते हुए अब फिर अधिक क्लेश न उठावें’ ॥ १४½ ॥

तथा ब्रुवति शत्रुघ्ने राघवः पुनरब्रवीत् ॥ १५ ॥ एवं भवतु काकुत्स्थ क्रियतां मम शासनम् । राज्ये त्वामभिषेक्ष्यामि मधोस्तु नगरे शुभे ॥ १६ ॥

भावार्थ

शत्रुघ्नके ऐसा कहनेपर श्रीरघुनाथजी फिर बोले— ‘काकुत्स्थ ! तुम जैसा कहते हो, वैसा ही हो । तुम्हीं मेरे इस आदेशका पालन करो । मैं तुम्हें मधुके सुन्दर नगरमें राजाके पदपर अभिषिक्त करूँगा ॥ १५-१६ ॥

निवेशय महाबाहो भरतं यद्यवेक्षसे । शूरस्त्वं कृतविद्यश्च समर्थश्च निवेशने ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘महाबाहो ! यदि तुम भरतको क्लेश देना ठीक नहीं समझते तो इनको यहीं रहने दो । तुम शूरवीर हो, अस्त्र-विद्याके ज्ञाता हो तथा तुममें नूतन नगर निर्माण करनेकी शक्ति है ॥ १७ ॥

नगरं यमुनाजुष्टं तथा जनपदाꣳशुभान् । यो हि वंशं समुत्पाट्य पार्थिवस्य निवेशने ॥ १८ ॥ न विधत्ते नृपं तत्र नरकं स हि गच्छति ।

भावार्थ

‘तुम यमुनाजीके तटपर सुन्दर नगर बसा सकते हो और उत्तमोत्तम जनपदोंकी स्थापना कर सकते हो । जो किसी राजाके वंशका उच्छेद करके उसकी राजधानीमें दूसरे राजाको स्थापित नहीं करता, वह नरकमें पड़ता है ॥ १८½ ॥

स त्वं हत्वा मधुसुतं लवणं पापनिश्चयम् ॥ १९ ॥ राज्यं प्रशाधि धर्मेण वाक्यं मे यद्यवेक्षसे । उत्तरं च न वक्तव्यं शूर वाक्यान्तरे मम ॥ २० ॥ बालेन पूर्वजस्याज्ञा कर्तव्या नात्र संशयः । अभिषेकं च काकुत्स्थ प्रतीच्छस्व ममोद्यतम् । वसिष्ठप्रमुखैर्विप्रैर्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘अतः तुम मधुके पुत्र पापात्मा लवणासुरको मारकर धर्मपूर्वक वहाँके राज्यका शासन करो । शूरवीर ! यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो तो मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे चुपचाप स्वीकार करो । बीचमें बात काटकर कोई उत्तर तुम्हें नहीं देना चाहिये । बालकको अवश्य ही अपने बड़ोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये । शत्रुघ्न ! वसिष्ठ आदि मुख्य-मुख्य ब्राह्मण विधि और मन्त्रोच्चारणके साथ तुम्हारा अभिषेक करेंगे । मेरी आज्ञासे प्राप्त हुए इस अभिषेकको तुम स्वीकार करो’ ॥ १९–२१ ॥

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