उत्तरकाण्ड, सर्ग 63
ब्रुवद्भिरेवमृषिभिः काकुत्स्थो वाक्यमब्रवीत् । किं कार्यं ब्रूत मुनयो भयं तावदपैतु वः ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार कहते हुए ऋषियोंसे प्रेरित हो श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘महर्षियो ! बताइये, आपका कौन-सा कार्य मुझे सिद्ध करना है ! आपलोगोंका भय तो अभी दूर हो जाना चाहिये’ ॥ १ ॥
तथा ब्रुवति काकुत्स्थे भार्गवो वाक्यमब्रवीत् । भयानां शृणु यन्मूलं देशस्य च नरेश्वर ॥ २ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर भृगुपुत्र च्यवन बोले—— ‘नरेश्वर ! समूचे देशपर और हमलोगोंपर जो भय प्राप्त हुआ है, उसका मूल कारण क्या है, सुनिये ॥ २ ॥
पूर्वं कृतयुगे राजन् दैतेयः सुमहामतिः । लोलापुत्रोऽभवज्ज्येष्ठो मधुर्नाम महासुरः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! पहले सत्ययुगमें एक बड़ा बुद्धिमान् दैत्य था । वह लोलाका ज्येष्ठ पुत्र था । उस महान् असुरका नाम था मधु ॥ ३ ॥
ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च बुद्ध्या च परिनिष्ठितः । सुरैश्च परमोदारैः प्रीतिस्तस्यातुलाभवत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘वह बड़ा ही ब्राह्मण-भक्त और शरणागतवत्सल था । उसकी बुद्धि सुस्थिर थी । अत्यन्त उदार स्वभाववाले देवताओंके साथ भी उसकी ऐसी गहरी मित्रता थी, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी ॥ ४ ॥
स मधुर्वीर्यसम्पन्नो धर्मे च सुसमाहितः । बहुमानाच्च रुद्रेण दत्तस्तस्याद्भुतो वरः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘मधु बल-विक्रमसे सम्पन्न था और एकाग्रचित्त होकर धर्मके अनुष्ठानमें लगा रहता था । उसने भगवान् शिवकी बड़ी आराधना की थी, जिससे उन्होंने उसे अद्भुत वर प्रदान किया था ॥ ५ ॥
शूलं शूलाद् विनिष्कृष्य महावीर्यं महाप्रभम् । ददौ महात्मा सुप्रीतो वाक्यं चैतदुवाच ह ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘महामना भगवान् शिवने अत्यन्त प्रसन्न हो अपने शूलसे एक चमचमाता हुआ परम शक्तिशाली शूल प्रकट करके उसे मधुको दिया और यह बात कही—॥ ६ ॥
त्वयायमतुलो धर्मो मत्प्रसादकरः कृतः । प्रीत्या परमया युक्तो ददाम्यायुधमुत्तमम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘‘तुमने मुझे प्रसन्न करनेवाला यह बड़ा अनुपम धर्म किया है; अतः मैं अत्यन्त प्रसन्न होकर तुम्हें यह उत्तम आयुध प्रदान करता हूँ ॥ ७ ॥
यावत् सुरैश्च विप्रैश्च न विरुध्येर्महासुर । तावच्छूलं तवेदं स्यादन्यथा नाशमेष्यति ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘‘महान् असुर ! जबतक तुम ब्राह्मणों और देवताओंसे विरोध नहीं करोगे, तभीतक यह शूल तुम्हारे पास रहेगा, अन्यथा अदृश्य हो जायगा ॥ ८ ॥
यश्च त्वामभियुञ्जीत युद्धाय विगतज्वरः । तं शूलो भस्मसात्कृत्वा पुनरेष्यति ते करम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘‘जो पुरुष निःशङ्क होकर तुम्हारे सामने युद्धके लिये आयेगा, उसे भस्म करके यह शूल पुनः तुम्हारे हाथमें लौट आयेगा’ ॥ ९ ॥
एवं रुद्राद् वरं लब्ध्वा भूय एव महासुरः । प्रणिपत्य महादेवं वाक्यमेतदुवाच ह ॥ १० ॥
भावार्थ
‘‘भगवान् रुद्रसे ऐसा वर पाकर वह महान् असुर महादेवजीको प्रणाम करके फिर इस प्रकार बोला—॥ १० ॥
भगवन् मम वंशस्य शूलमेतदनुत्तमम् । भवेत् तु सततं देव सुराणामीश्वरो ह्यसि ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘‘भगवन् ! देवाधिदेव ! आप समस्त देवताओंके स्वामी हैं; अतः आपसे प्रार्थना है कि परम उत्तम शूल मेरे वंशजोंके पास भी सदा रहे’ ॥ ११ ॥
तं ब्रुवाणं मधुं देवः सर्वभूतपतिः शिवः । प्रत्युवाच महादेवो नैतदेवं भविष्यति ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘ऐसी बात कहनेवाले उस मधुसे समस्त प्राणियोंके अधिपति महान् देवता भगवान् शिवने इस प्रकार कहा— ‘ऐसा तो नहीं हो सकता ॥ १२ ॥
मा भूत् ते विफला वाणी मत्प्रसादकृता शुभा । भवतः पुत्रमेकं तु शूलमेतद् भविष्यति ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘‘परंतु मुझे प्रसन्न जानकर तुम्हारे मुखसे जो शुभ वाणी निकली है, वह भी निष्फल न हो; इसलिये मैं वर देता हूँ कि तुम्हारे एक पुत्रके पास यह शूल रहेगा ॥ १३ ॥
यावत् करस्थः शूलोऽयं भविष्यति सुतस्य ते । अवध्यः सर्वभूतानां शूलहस्तो भविष्यति ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘‘यह शूल जबतक तुम्हारे पुत्रके हाथमें मौजूद रहेगा, तबतक वह समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य बना रहेगा’ ॥१४॥
एवं मधुर्वरं लब्ध्वा देवात् सुमहदद्भुतम् । भवनं सोऽसुरश्रेष्ठः कारयामास सुप्रभम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘महादेवजीसे इस प्रकार अत्यन्त अद्भुत वर पाकर असुरश्रेष्ठ मधुने एक सुन्दर भवन तैयार कराया, जो अत्यन्त दीतिमान् था ॥ १५ ॥
तस्य पत्नी महाभागा प्रिया कुम्भीनसीति या । विश्वावसोरपत्यं साप्यनलायां महाप्रभा ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘उसकी प्रिय पत्नी महाभागा कुम्भीनसी थी, जो विश्वावसु-की संतान थी। उसका जन्म अनलाके गर्भसे हुआ था। कुम्भीनसी बड़ी कान्तिमती थी ॥ १६ ॥
तस्याः पुत्रो महावीर्यो लवणो नाम दारुणः । बाल्यात्प्रभृति दुष्टात्मा पापान्येव समाचरत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘उसका पुत्र महापराक्रमी लवण है, जिसका स्वभाव बड़ा भयंकर है। वह दुष्टात्मा बचपनसे ही केवल पापाचारमें प्रवृत्त रहा है ॥ १७ ॥
तं पुत्रं दुर्विनीतं तु दृष्ट्वा क्रोधसमन्वितः । मधुः स शोकमापेदे न चैनं किंचिदब्रवीत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘अपने पुत्रको उद्दण्ड हुआ देख मधु क्रोधसे जलता रहता था। उसे बेटेकी दुष्टता देखकर बड़ा शोक हुआ, तथापि वह इससे कुछ नहीं बोला ॥ १८ ॥
स विहाय इमं लोकं प्रविष्टो वरुणालयम् । शूलं निवेद्य लवणे वरं तस्मै न्यवेदयत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘अन्तमें वह इस देशको छोड़कर समुद्रमें रहनेके लिये चला गया। चलते समय उसने वह शूल लवणको दे दिया और उसे वरदानकी बात भी बता दी ॥ १९ ॥
स प्रभावेण शूलस्य दौरात्म्येनात्मनस्तथा । संतापयति लोकांस्त्रीन् विशेषेण च तापसान् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘अब वह दुष्ट उस शूलके प्रभावसे तथा अपनी दुष्टताके कारण तीनों लोकोंको विशेषतः तपस्वी मुनियोंको बड़ा संताप दे रहा है ॥ २० ॥
एवंप्रभावो लवणः शूलं चैव तथाविधम् । श्रुत्वा प्रमाणं काकुत्स्थ त्वं हि नः परमा गतिः ॥२१॥
भावार्थ
‘उस लवणासुरका ऐसा प्रभाव है और उसके पास वैसा शक्तिशाली शूल भी है। रघुनन्दन ! यह सब सुनकर यथोचित कार्य करनेमें आप ही प्रमाण हैं और आप ही हमारी परम गति हैं ॥ २१ ॥
बहवः पार्थिवा राम भयार्तैर्ऋषिभिः पुरा । अभयं याचिता वीर त्रातारं न च विद्महे ॥ २२ ॥ ते वयं रावणं श्रुत्वा हतं सबलवाहनम् । त्रातारं विद्महे तात नान्यं भुवि नराधिपम् । तत् परित्रातुमिच्छामो लवणाद् भयपीडितान् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! आजसे पहले भयसे पीड़ित हुए ऋषि अनेक राजाओंके पास जा-जाकर अभयकी भिक्षा माँग चुके हैं; परंतु वीर रघुवीर ! अबतक हमें कोई रक्षक नहीं मिला ॥ ‘तात ! हमने सुना है कि आपने सेना और सवारियोंसहित रावणका संहार कर डाला है; इसलिये हम आपहीको अपनी रक्षा करनेमें समर्थ समझते हैं, भूतलपर दूसरे किसी राजाको नहीं । अतः हमारी इच्छा है कि आप भयसे पीड़ित हुए महर्षियोंकी लवणासुरसे रक्षा करें ॥ २३ ॥
इति राम निवेदितं तु ते भयजं कारणमुत्थितं च यत् । विनिवारयितुं भवान् क्षमः कुरु तं काममहीनविक्रम ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘बल-विक्रमसे सम्पन्न श्रीराम ! इस प्रकार हमारे सामने जो भयका कारण उपस्थित हो गया है, वह हमने आपके आगे निवेदन कर दिया । आप इसे दूर करनेमें समर्थ हैं, अतः हमारी यह अभिलाषा पूर्ण करें’ ॥ २४ ॥
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