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उत्तरकाण्ड, सर्ग 65

एवमुक्तस्तु रामेण परां व्रीडामुपागमत् । शत्रुघ्नो वीर्यसम्पन्नो मन्दं मन्दमुवाच ह ॥ १ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर बल-विक्रमसे सम्पन्न शत्रुघ्न बड़े लज्जित हुए और धीरे-धीरे बोले—॥ १ ॥

अधर्मं विद्म काकुत्स्थ अस्मिन्नर्थे नरेश्वर । कथं तिष्ठत्सु ज्येष्ठेषु कनीयानभिषिच्यते ॥ २ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण नरेश्वर ! इस अभिषेकको स्वीकार करनेमें तो मुझे अधर्म जान पड़ता है । भला, बड़े भाइयोंके रहते हुए छोटेका अभिषेक कैसे किया जा सकता है ? ॥२॥

अवश्यं करणीयं च शासनं पुरुषर्षभ । तव चैव महाभाग शासनं दुरतिक्रमम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘तथापि पुरुषप्रवर ! महाभाग ! आपकी आज्ञाका पालन तो मुझे अवश्य करना ही चाहिये । आपका शासन किसीके लिये भी दुर्लङ्घ्य है ॥ ३ ॥

त्वत्तो मया श्रुतं वीर श्रुतिभ्यश्च मया श्रुतम् । नोत्तरं हि मया वाच्यं मध्यमे प्रतिजानति ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘वीर ! मैंने आपसे तथा वेदवाक्योंसे भी यह बात सुनी है । वास्तवमें मञ्झले भैयाके प्रतिज्ञा कर लेनेपर मुझे कुछ नहीं बोलना चाहिये था ॥ ४ ॥

व्याहृतं दुर्वचो घोरं हन्तास्मि लवणं मृधे । तस्यैवं मे दुरुक्तस्य दुर्गतिः पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘मेरे मुँहसे ये बड़े ही अनुचित शब्द निकल गये कि मैं लवणको मारूँगा । पुरुषोत्तम ! उस अनुचित कथनका ही परिणाम है कि मेरी इसप्रकार दुर्गति हो रही है ( मुझे बड़ोंके होते हुए अभिषिक्त होना पड़ता है ) ॥ ५ ॥

उत्तरं नहि वक्तव्यं ज्येष्ठेनाभिहिते पुनः । अधर्मसहितं चैव परलोकविवर्जितम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘बड़े भाईके बोलनेपर मुझे फिर कुछ उत्तर नहीं देना चाहिये था; ( अर्थात् भैया भरतने जब लवणको मारनेका निर्णय कर लिया, तब मुझे उसमें दखल नहीं देना चाहिये था ) परंतु मैंने इस नियमका उल्लङ्घन किया, इसीलिये आपने ऐसा ( राज्याभिषेकविषयक ) आदेश दे दिया । जो स्वीकार कर लेनेपर मेरे लिये अधर्मयुक्त होनेके कारण परलोकके लाभसे भी वञ्चित करनेवाला है । तथापि आपकी आज्ञा मेरे लिये दुर्लङ्घ्य है; अतः मुझे इसको स्वीकार करना ही पड़ेगा ॥ ६ ॥

सोऽहं द्वितीयं काकुत्स्थ न वक्ष्यामीति चोत्तरम् । मा द्वितीयेन दण्डो वै निपतेन्मयि मानद ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! अब आपकी जो आज्ञा हो चुकी, उसके विरुद्ध मैं दूसरा कोई उत्तर नहीं दूँगा । मानद ! कहीं ऐसा न हो कि दूसरा कोई उत्तर देनेपर मुझे इससे भी कठोर दण्ड भोगना पड़े ॥ ७ ॥

कामकारो ह्यहं राजंस्त्वास्मि पुरुषर्षभ । अधर्मं जहि काकुत्स्थ मत्कृते रघुनन्दन ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! पुरुषप्रवर रघुनन्दन ! मैं आपकी इच्छाके अनुसार ही कार्य करूँगा । किंतु इसमें मेरे लिये जो अधर्म प्राप्त होता हो, उसका नाश आप करें’ ॥ ८ ॥

एवमुक्ते तु शूरेण शत्रुघ्नेन महात्मना । उवाच रामः संहृष्टो भरतं लक्ष्मणं तथा ॥ ९ ॥

भावार्थ

शूरवीर महात्मा शत्रुघ्नके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए और भरत तथा लक्ष्मण आदिसे बोले–॥९॥

सम्भारानभिषेकस्य आनयध्वं समाहिताः । अद्यैव पुरुषव्याघ्रमभिषेक्ष्यामि राघवम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘तुम सब लोग बड़ी सावधानीके साथ राज्याभिषेककी सामग्री जुटाकर ले आओ । मैं अभी रघुकुलनन्दन पुरुषसिंह शत्रुघ्नका अभिषेक करूँगा ॥ १० ॥

पुरोधसं च काकुत्स्थ नैगमानृत्विजस्तथा । मन्त्रिणश्चैव तान् सर्वानानयध्वं ममाज्ञया ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! मेरी आज्ञासे पुरोहित, वैदिक विद्वानों, ऋत्विजों तथा समस्त मन्त्रियोंको बुला लाओ’ ॥ ११ ॥

राज्ञः शासनमाज्ञाय तथाकुर्वन्महारथाः । अभिषेकसमारम्भं पुरस्कृत्य पुरोधसम् ॥ १२ ॥ प्रविष्टा राजभवनं राजानो ब्राह्मणास्तथा ।

भावार्थ

महाराजकी आज्ञा पाकर महारथी भरत और लक्ष्मण आदिने वैसा ही किया । वे पुरोहितजीको आगे करके अभिषेककी सामग्री साथ लिये राजभवनमें आये । उनके साथ ही बहुत-से राजा और ब्राह्मण भी वहाँ आ पहुँचे ॥ १२½ ॥

ततोऽभिषेको ववृधे शत्रुघ्नस्य महात्मनः ॥ १३ ॥ सम्प्रहर्षकरः श्रीमान् राघवस्य पुरस्य च ।

भावार्थ

तदनन्तर महात्मा शत्रुघ्नका वैभवशाली अभिषेक आरम्भ हुआ, जो श्रीरघुनाथजी तथा समस्त पुरवासियोंके हर्षको बढ़ानेवाला था ॥ १३½ ॥

अभिषिक्तस्तु काकुत्स्थो बभौ चादित्यसंनिभः ॥ १४ ॥ अभिषिक्तः पुरा स्कन्दः सेन्द्रैरिव दिवौकसैः ।

भावार्थ

जैसे पूर्वकालमें इन्द्र आदि देवताओंने स्कन्दका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक किया था, उसी तरह श्रीराम आदिने वहाँ शत्रुघ्नका राजाके पदपर अभिषेक किया । इस प्रकार अभिषिक्त होकर शत्रुघ्नजी सूर्यके समान सुशोभित हुए १४½

अभिषिक्ते तु शत्रुघ्ने रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ १५ ॥ पौराः प्रमुदिताश्चासन् ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः ।

भावार्थ

क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामके द्वारा जब शत्रुघ्नका राज्याभिषेक हुआ, तब उस नगरके निवासियों और बहुश्रुत ब्राह्मणोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १५½ ॥

कौसल्या च सुमित्रा च मङ्गलं केकयी तथा ॥ १६ ॥ चक्रुस्ता राजभवने याश्चान्या राजयोषितः ।

भावार्थ

इस समय कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी तथा राज्य-भवनकी अन्य राजमहिलाओंने मिलकर मङ्गलकार्य सम्पन्न किया ॥ १६½ ॥

ऋषयश्च महात्मानो यमुनातीरवासिनः ॥ १७ ॥ हतं लवणमाशंसुः शत्रुघ्नस्याभिषेचनात् ।

भावार्थ

शत्रुघ्नजीका राज्याभिषेक होनेसे यमुनातीरनिवासी महात्मा ऋषियोंको यह निश्चय हो गया कि अब लवणासुर मारा गया ॥ १७½ ॥

ततोऽभिषिक्तं शत्रुघ्नमङ्कमारोप्य राघवः । उवाच मधुरां वाणीं तेजस्तस्याभिपूरयन् ॥ १८ ॥

भावार्थ

अभिषेकके पश्चात् शत्रुघ्नको गोदमें बिठाकर श्रीरघुनाथजीने उनका तेज बढ़ाते हुए मधुर वाणीमें कहा—॥१८॥

अयं शरस्त्वमोघस्ते दिव्यः परपुरंजयः । अनेन लवणं सौम्य हन्तासि रघुनन्दन ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! सौम्य शत्रुघ्न ! मैं तुम्हें यह दिव्य अमोघ बाण दे रहा हूँ । तुम इसके द्वारा लवणासुरको अवश्य मार डालोगे ॥ १९ ॥

सृष्टः शरोऽयं काकुत्स्थ यदा शेते महार्णवे । स्वयंभूरजितो दिव्यो यं नापश्यन् सुरासुराः ॥ २० ॥ अदृश्यः सर्वभूतानां तेनायं हि शरोत्तमः । सृष्टः क्रोधाभिभूतेन विनाशार्थं दुरात्मनोः ॥ २१ ॥ मधुकैटभयोर्वीर विघाते सर्वरक्षसाम् । स्रष्टुकामेन लोकांस्त्रींस्तौ चानेन हतौ युधि ॥ २२ ॥ तौ हत्वा जनभोगार्थं कैटभं तु मधुं तथा । अनेन शरमुख्येन ततो लोकांश्चकार सः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! पिछले प्रलयकालमें जब किसीसे भी पराजित न होनेवाले अजन्मा एवं दिव्य रूपधारी भगवान् विष्णु महान् एकार्णवके जलमें शयन करते थे, उस समय उन्हें देवता और असुर कोई नहीं देख पाते थे । वे सम्पूर्ण भूतोंके लिये अदृश्य थे । वीर ! उसी समय उन भगवान् नारायणने ही कुपित हो दुरात्मा मधु और कैटभके विनाश तथा समस्त राक्षसोंके संहारके लिये इस दिव्य, उत्तम एवं अमोघ बाणकी सृष्टि की थी । उस समय वे तीनों लोकोंकी सृष्टि करना चाहते थे और मधु, कैटभ तथा अन्य सब राक्षस उसमें विघ्न उपस्थित कर रहे थे । अतः भगवान्ने इसी बाणसे मधु और कैटभ दोनोंको युद्धमें मारा था । इस मुख्य बाणसे मधु और कैटभ दोनोंको मारकर भगवान्ने जीवोंके कर्मफल-भोगकी सिद्धिके लिये विभिन्न लोकोंकी रचना की ॥ २०–२३ ॥

नायं मया शरः पूर्वं रावणस्य वधार्थिना । मुक्तः शत्रुघ्न भूतानां महान् ह्रासो भवेदिति ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘शत्रुघ्न ! पहले मैंने रावणका वध करनेके लिये भी इस बाणका प्रयोग नहीं किया था; क्योंकि इसके द्वारा बहुत-से प्राणियोंके नष्ट हो जानेकी आशङ्का थी ॥ २४ ॥

यच्च तस्य महच्छूलं त्र्यम्बकेण महात्मना । दत्तं शत्रुविनाशाय मधोरायुधमुत्तमम् ॥ २५ ॥ तत् संनिक्षिप्य भवने पूज्यमानं पुनः पुनः । दिशः सर्वाः समासाद्य प्राप्नोत्याहारमुत्तमम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘लवणके पास जो महात्मा महादेवजीका शत्रुविनाशके लिये दिया हुआ मधुका दिव्य, उत्तम एवं महान् शूल है, उसका वह प्रतिदिन बारंबार पूजन करता है और उसे महलमें ही गुप्तरूपसे रखकर समस्त दिशाओंमें जा-जाकर अपने लिये उत्तम आहारका संग्रह करता है ॥ २५-२६ ॥

यदा तु युद्धमाकाङ्क्षन् कश्चिदेनं समाह्वयेत् । तदा शूलं गृहीत्वा तु भस्म रक्षः करोति हि ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘जब कोई युद्धकी इच्छा रखकर उसे ललकारता है, तब वह राक्षस उस शूलको लेकर अपने विपक्षीको भस्म कर देता है ॥ २७ ॥

स त्वं पुरुषशार्दूल तमायुधविनाकृतम् । अप्रविष्टं पुरं पूर्वं द्वारि तिष्ठ धृतायुधः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘पुरुषसिंह ! जिस समय वह शूल उसके पास न हो और वह नगरमें भी न पहुँच सका हो, उसी समय पहलेसे ही नगरके द्वारपर जाकर अस्त्र-शस्त्र धारण किये उसकी प्रतीक्षामें डटे रहो ॥ २८ ॥

अप्रविष्टं च भवनं युद्धाय पुरुषर्षभ । आह्वयेथा महाबाहो ततो हन्तासि राक्षसम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘महाबाहु पुरुषोत्तम ! यदि उस राक्षसको महलमें घुसने-से पहले ही तुम युद्धके लिये ललकारोगे, तब अवश्य उसका वध कर सकोगे ॥ २९ ॥

अन्यथा क्रियमाणे तु ह्यवध्यः स भविष्यति । यदि त्वेवं कृतं वीर विनाशमुपयास्यति ॥ ३० ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं शूलस्य च विपर्ययः । श्रीमतः शितिकण्ठस्य कृत्यं हि दुरतिक्रमम् ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘ऐसा न करनेपर वह अवध्य हो जायगा । वीर ! यदि तुमने ऐसा किया तो उस राक्षसका विनाश होकर ही रहेगा ॥ ‘इस प्रकार मैंने तुम्हें उस शूलसे बचनेका उपाय तथा अन्य सब आवश्यक बातें बता दीं; क्योंकि श्रीमान् भगवान् नीलकण्ठके विधानको पलटना बड़ा कठिन काम है’ ॥ ३१ ॥

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