उत्तरकाण्ड, सर्ग 26
स तु तत्र दशग्रीवः सह सैन्येन वीर्यवान् । अस्तं प्राप्ते दिनकरे निवासं समरोचयत् ॥ १ ॥
भावार्थ
जब सूर्य अस्ताचलको चले गये, तब पराक्रमी दशग्रीवने अपनी सेनाके साथ कैलासपर ही रातमें ठहर जाना ठीक समझा ॥ १ ॥
उदिते विमले चन्द्रे तुल्यपर्वतवर्चसि । प्रसुप्तं सुमहद् सैन्यं नानाप्रहरणायुधम् ॥ २ ॥
भावार्थ
( उसने वहीं छावनी डाल दी ) फिर, कैलासके ही समान श्वेत कान्तिवाले निर्मल चन्द्रदेवका उदय हुआ और नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित निशाचरोंकी वह विशाल सेना गाढ़ निद्रामें निमग्न हो गयी ॥ २ ॥
रावणस्तु महावीर्यो निषण्णः शैलमूर्धनि । स ददर्श गुणांस्तत्र चन्द्रपादपशोभितान् ॥ ३ ॥
भावार्थ
परंतु महापराक्रमी रावण उस पर्वतके शिखरपर चुपचाप बैठकर चन्द्रमाकी चाँदनीसे सुशोभित होनेवाले उस पर्वतके विभिन्न स्थानोंकी ( जो सम्पूर्ण कामभोगके उपयुक्त थे ) नैसर्गिक छटा निहारने लगा ॥ ३ ॥
कर्णिकारवनैर्दीप्तैः कदम्बबकुलैस्तथा । पद्मिनीभिश्च फुल्लाभिर्मन्दाकिन्या जलैरपि ॥ ४ ॥ चम्पकाशोकपुंनागमन्दारतरुभिस्तथा । चूतपाटललोध्रैश्च प्रियङ्ग्वर्जुनकेतकैः ॥ ५ ॥ तगरैर्नारिकेलैश्च प्रियालपनसैस्तथा । एतैरन्यैश्च तरुभिरुद्भासितवनान्तरे ॥ ६ ॥
भावार्थ
कहीं कनेरके दीप्तिमान् कानन शोभा पाते थे, कहीं कदम्ब और बकुल ( मौलसिरी ) वृक्षोंके समूह अपनी रमणीयता बिखेर रहे थे, कहीं मन्दाकिनीके जलसे भरी हुई और प्रफुल्ल कमलोंसे अलंकृत पुष्करिणियाँ शोभा दे रही थीं, कहीं चम्पा, अशोक, पुंनाग ( नागकेसर ), मन्दार, आम, पाड़र, लोध, प्रियङ्गु, अर्जुन, केतक, तगर, नारियल, प्रियाल और पनस आदि वृक्ष अपने पुष्प आदिकी शोभासे उस पर्वत-शिखरके वन्यप्रान्तको उद्भासित कर रहे थे ॥ ४—६ ॥
किंनरा मदनेनार्ता रक्ता मधुरकण्ठिनः । समं सम्प्रजगुर्यत्र मनस्तुष्टिविवर्धनम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
मधुर कण्ठवाले कामार्त किंनर अपनी कामिनियोंके साथ वहाँ रागयुक्त गीत गा रहे थे, जो कानोंमें पड़कर मनका आनन्द-वर्धन करते थे ॥ ७ ॥
विद्याधरा मदक्षीबा मदरक्तान्तलोचनाः । योषिद्भिः सह संक्रान्ताश्चिक्रीडुर्जहृषुश्च वै ॥ ८ ॥
भावार्थ
जिनके नेत्र-प्रान्त मदसे कुछ लाल हो गये थे, वे मदमत्त विद्याधर युवतियोंके साथ क्रीडा करते और हर्षमग्न होते थे ॥ ८ ॥
घण्टानामिव संनादः शुश्रुवे मधुरस्वनः । अप्सरोगणसङ्घानां गायतां धनदालये ॥ ९ ॥
भावार्थ
वहाँसे कुबेरके भवनमें गाती हुई अप्सराओंके गीतकी मधुर ध्वनि घण्टानादके समान सुनायी पड़ती थी ॥ ९ ॥
पुष्पवर्षाणि मुञ्चन्तो नगाः पवनताडिताः । शैलं तं वासयन्तीव मधुमाधवगन्धिनः ॥ १० ॥
भावार्थ
वसन्त ऋतुके सभी पुष्पोंकी गन्धसे युक्त वृक्ष हवाके थपेड़े खाकर फूलोंकी वर्षा करते हुए उस समूचे पर्वतको सुवासित-सा कर रहे थे ॥ १० ॥
मधुपुष्परजःपृक्तं गन्धमादाय पुष्कलम् । प्रववौ वर्धयन् कामं रावणस्य सुखोऽनिलः ॥ ११ ॥
भावार्थ
विविध कुसुमोंके मधुर मकरन्द तथा परागसे मिश्रित प्रचुर सुगन्ध लेकर मन्द-मन्द बहती हुई सुखद वायु रावणकी काम-वासनाको बढ़ा रही थी ॥ ११ ॥
गेयात् पुष्पसमृद्ध्या च शैत्याद् वायोर्गिरेर्गुणात् । प्रवृत्तायां रजन्यां च चन्द्रस्योदयनेन च ॥ १२ ॥ रावणः स महावीर्यः कामस्य वशमागतः । विनिःश्वस्य विनिःश्वस्य शशिनं समवैक्षत ॥ १३ ॥
भावार्थ
सङ्गीतकी मीठी तान, भाँति-भाँतिके पुष्पोंकी समृद्धि, शीतल वायुका स्पर्श, पर्वतके ( रमणीयता आदि ) आकर्षक गुण; रजनीकी मधुवेला और चन्द्रमाका उदय—उद्दीपनके इन सभी उपकरणोंके कारण वह महापराक्रमी रावण कामके अधीन हो गया और बारंबार लंबी साँस खींचकर चन्द्रमाकी ओर देखने लगा ॥ १२-१३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र दिव्याभरणभूषिता । सर्वाप्सरोवरा रम्भा पूर्णचन्द्रनिभानना ॥ १४ ॥
भावार्थ
इसी बीचमें समस्त अप्सराओंमें श्रेष्ठ सुन्दरी, पूर्ण-चन्द्रमुखी रम्भा दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो उस मार्गसे आ निकली ॥ १४ ॥
दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गी मन्दारकृतमूर्धजा । दिव्योत्सवकृतारम्भा दिव्यपुष्पविभूषिता ॥ १५ ॥
भावार्थ
उसके अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप लगा था और केशपाशमें पारिजातके पुष्प गुँथे हुए थे । दिव्य पुष्पोंसे अपना शृङ्गार करके वह प्रिय-समागमरूप दिव्य उत्सवके लिये जा रही थी ॥ १५ ॥
चक्षुर्मनोहरं पीनं मेखलादामभूषितम् । समुद्वहन्ती जघनं रतिप्राभृतमुत्तमम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
मनोहर नेत्र तथा काञ्चीकी लड़ियोंसे विभूषित पीन जघन-स्थलको वह रतिके उत्तम उपहारके रूपमें धारण किये हुए थी ॥ १६ ॥
कृतैर्विशेषकैरार्द्रैः षडर्तुकुसुमोद्भवैः । बभावन्यतमेव श्रीः कान्तिश्रीद्युतिकीर्तिभिः ॥ १७ ॥
भावार्थ
उसके कपोल आदिपर हरिचन्दनसे चित्र-रचना की गयी थी । वह छहों ऋतुओंमें होनेवाले नूतन पुष्पोंके आर्द्र हारोंसे विभूषित थी और अपनी अलौकिक कान्ति, शोभा, द्युति एवं कीर्तिसे युक्त हो उस समय दूसरी लक्ष्मीके समान जान पड़ती थी ॥ १७ ॥
नीलं सतोयमेघाभं वस्त्रं समवगुण्ठिता । यस्या वक्त्रं शशिनिभं भ्रुवौ चापनिभे शुभे ॥ १८ ॥
भावार्थ
उसका मुख चन्द्रमाके समान मनोहर था और दोनों सुन्दर भौंहें कमान सी दिखायी देती थीं । वह सजल जलधरके समान नील रंगकी साड़ीसे अपने अङ्गोंको ढके हुए थी ॥ १८ ॥
ऊरू करिकराकारौ करौ पल्लवकोमलौ । सैन्यमध्येन गच्छन्ती रावणेनोपलक्षिता ॥ १९ ॥
भावार्थ
उसकी जाँघोंका चढ़ाव-उतार हाथीकी सूँड़के समान था । दोनों हाथ ऐसे कोमल थे, मानो ( देहरूपी रसालकी डालके ) नये-नये पल्लव हों । वह सेनाके बीचसे होकर जा रही थी, अतः रावणने उसे देख लिया ॥ १९ ॥
तां समुत्थाय गच्छन्तीं कामबाणवशं गतः । करे गृहीत्वा लज्जन्तीं स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ २० ॥
भावार्थ
देखते ही वह कामदेवके बाणोंका शिकार हो गया और खड़ा होकर उसने अन्यत्र जाती हुई रम्भाका हाथ पकड़ लिया । बेचारी अबला लाजसे गड़ गयी; परंतु वह निशाचर मुसकराता हुआ उससे बोला—॥ २० ॥
क्व गच्छसि वरारोहे कां सिद्धिं भजसे स्वयम् । कस्याभ्युदयकालोऽयं यस्त्वां समुपभोक्ष्यते ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘वरारोहे ! कहाँ जा रही हो ? किसकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये स्वयं चल पड़ी हो ? किसके भाग्योदयका समय आया है, जो तुम्हारा उपभोग करेगा ? ॥ २१ ॥
त्वदाननरसस्याद्य पद्मोत्पलसुगन्धिनः । सुधामृतरसस्येव कोऽद्य तृप्तिं गमिष्यति ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘कमल और उत्पलकी सुगन्ध धारण करनेवाले तुम्हारे इस मनोहर मुखारविन्दका रस अमृतका भी अमृत है । आज इस अमृत-रसका आस्वादन करके कौन तृप्त होगा ? ॥ २२ ॥
स्वर्णकुम्भनिभौ पीनौ शुभौ भीरु निरन्तरौ । कस्योरःस्थलसंस्पर्शं दास्यतस्ते कुचाविमौ ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘भीरु ! परस्पर सटे हुए तुम्हारे ये सुवर्णमय कलशोंके सदृश सुन्दर पीन उरोज किसके वक्षःस्थलोंको अपना स्पर्श प्रदान करेंगे ? ॥ २३ ॥
सुवर्णचक्रप्रतिमं स्वर्णदामचितं पृथु । अध्यारोक्ष्यति कस्तेऽद्य जघनं स्वर्गरूपिणम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘सोनेकी लड़ियोंसे विभूषित तथा सुवर्णमय चक्रके समान विपुल विस्तारसे युक्त तुम्हारे पीन जघनस्थलपर जो मूर्तिमान् स्वर्ग-सा जान पड़ता है, आज कौन आरोहण करेगा ? ॥२४॥
मद्विशिष्टः पुमान् कोऽद्य शक्रो विष्णुरथाश्विनौ । मामतीत्य हि यच्च त्वं यासि भीरु न शोभनम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘इन्द्र, उपेन्द्र अथवा अश्विनीकुमार ही क्यों न हों, इस समय कौन पुरुष मुझसे बढ़कर है ? भीरु ! तुम मुझे छोड़कर अन्यत्र जा रही हो, यह अच्छा नहीं है ॥ २५ ॥
विश्रम त्वं पृथुश्रोणि शिलातलमिदं शुभम् । त्रैलोक्ये यः प्रभुश्चैव मदन्यो नैव विद्यते ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘स्थूल नितम्बवाली सुन्दरी ! यह सुन्दर शिला है, इसपर बैठकर विश्राम करो । इस त्रिभुवनका जो स्वामी है, वह मुझसे भिन्न नहीं है—मैं ही सम्पूर्ण लोकोंका अधिपति हूँ ॥२६॥
तदेवं प्राञ्जलिः प्रह्वो याचते त्वां दशाननः । भर्तुर्भर्ता विधाता च त्रैलोक्यस्य भजस्व माम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘तीनों लोकोंके स्वामीका भी स्वामी तथा विधाता यह दशमुख रावण आज इस प्रकार विनीतभावसे हाथ जोड़कर तुमसे याचना करता है। सुन्दरी ! मुझे स्वीकार करो’ ॥२७॥
एवमुक्ताब्रवीद् रम्भा वेपमाना कृताञ्जलिः । प्रसीद नार्हसे वक्तुमीदृशं त्वं हि मे गुरुः ॥ २८ ॥
भावार्थ
रावणके ऐसा कहनेपर रम्भा काँप उठी और हाथ जोड़ कर बोली—‘प्रभो ! प्रसन्न होइये—मुझपर कृपा कीजिये । आपको ऐसी बात मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये; क्योंकि आप मेरे गुरुजन हैं—पिताके तुल्य हैं ॥ २८ ॥
अन्येभ्योऽपि त्वया रक्ष्या प्राप्नुयां धर्षणं यदि । तद्धर्मतः स्नुषा तेऽहं तत्त्वमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २९ ॥ अथाब्रवीद् दशग्रीवश्चरणाधोमुखीं स्थिताम् । रोमहर्षमनुप्राप्तां दृष्टमात्रेण तां तदा ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘यदि दूसरे कोई पुरुष मेरा तिरस्कार करनेपर उतारू हों तो उनसे भी आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये । मैं धर्मतः आपकी पुत्रवधू हूँ—यह आपसे सच्ची बात बता रही हूँ’ ॥ रम्भा अपने चरणोंकी ओर देखती हुई नीचे मुँह किये खड़ी थी । रावणकी दृष्टि पड़नेमात्रसे भयके कारण उसके रोंगटे खड़े हो गये थे । उस समय उससे रावणने कहा—॥३०॥
सुतस्य यदि मे भार्या ततस्त्वं हि स्नुषा भवेः । बाढमित्येव सा रम्भा प्राह रावणमुत्तरम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘रम्भे ! यदि यह सिद्ध हो जाय कि तुम मेरे बेटेकी बहू हो, तभी मेरी पुत्र-वधू हो सकती हो, अन्यथा नहीं ।’ तब रम्भाने ‘बहुत अच्छा’ कहकर रावणको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ३१ ॥
धर्मतस्ते सुतस्याहं भार्या राक्षसपुङ्गव । पुत्रः प्रियतरः प्राणैर्भ्रातुर्वैश्रवणस्य ते ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘राक्षसशिरोमणे ! धर्मके अनुसार मैं आपके पुत्रकी ही भार्या हूँ । आपके बड़े भाई कुबेरके पुत्र मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं ॥ ३२ ॥
विख्यातस्त्रिषु लोकेषु नलकूबर इत्ययम् । धर्मतो यो भवेद् विप्रः क्षत्रियो वीर्यतो भवेत् ॥ ३३ ॥ क्रोधाद् यश्च भवेदग्निः क्षान्त्या च वसुधासमः । तस्यास्मि कृतसंकेता लोकपालसुतस्य वै ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘वे तीनों लोकोंमें ‘नलकूबर’ नामसे विख्यात हैं तथा धर्मानुष्ठानकी दृष्टिसे ब्राह्मण और पराक्रमकी दृष्टिसे क्षत्रिय हैं ॥ ‘वे क्रोधमें अग्नि और क्षमामें पृथ्वीके समान हैं । उन्हीं लोकपालकुमार प्रियतम नलकूबरको आज मैंने मिलनेके लिये संकेत दिया है ॥ ३४ ॥
तमुद्दिश्य तु मे सर्वं विभूषणमिदं कृतम् । यथा तस्य हि नान्यस्य भावो मां प्रति तिष्ठति ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘यह सारा शृङ्गार मैंने उन्हींके लिये धारण किया है; जैसे उनका मेरे प्रति अनुराग है, उसी प्रकार मेरा भी उन्हींके प्रति प्रगाढ़ प्रेम है, दूसरे किसीके प्रति नहीं ॥ ३५ ॥
तेन सत्येन मां राजन् मोक्तुमर्हस्यरिंदम । स हि तिष्ठति धर्मात्मा मां प्रतीक्ष्य समुत्सुकः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंका दमन करनेवाले राक्षसराज ! इस सत्यको दृष्टिमें रखकर आप इस समय मुझे छोड़ दीजिये; वे मेरे धर्मात्मा प्रियतम उत्सुक होकर मेरी प्रतीक्षा करते होंगे ॥३६॥
तत्र विघ्नं तु तस्येह कर्तुं नार्हसि मुञ्च माम् । सद्भिराचरितं मार्गं गच्छ राक्षसपुङ्गव ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘उनकी सेवाके इस कार्यमें आपको यहाँ विघ्न नहीं डालना चाहिये । मुझे छोड़ दीजिये । राक्षसराज ! आप सत्पुरुषोंद्वारा आचरित धर्मके मार्गपर चलिये ॥ ३७ ॥
माननीयो मम त्वं हि पालनीया तथास्मि ते । एवमुक्तो दशग्रीवः प्रत्युवाच विनीतवत् ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘आप मेरे माननीय गुरुजन हैं, अतः आपको मेरी रक्षा करनी चाहिये ।’ यह सुनकर दशग्रीवने उसे नम्रतापूर्वक उत्तर दिया—॥ ३८ ॥
स्नुषासि यद्वोचस्त्वमेकपत्नीष्वयं क्रमः । देवलोकस्थितिरियं सुराणां शाश्वती मता ॥ ३९ ॥ पतिरप्सरसां नास्ति न चैकस्त्रीपरिग्रहः । एवमुक्त्वा स तां रक्षो निवेश्य च शिलातले ॥ ४० ॥ कामभोगाभिसंरक्तो मैथुनायोपचक्रमे ।
भावार्थ
‘रम्भे ! तुम अपनेको जो मेरी पुत्रवधू बता रही हो, वह ठीक नहीं जान पड़ता । यह नाता-रिश्ता उन स्त्रियोंके लिये लागू होता है, जो किसी एक पुरुषकी पत्नी हों । तुम्हारे देवलोककी तो स्थिति ही दूसरी है । वहाँ सदासे यही नियम चला आ रहा है कि अप्सराओंका कोई पति नहीं होता । वहाँ कोई एक स्त्रीके साथ विवाह करके नहीं रहता है’ ॥ ऐसा कहकर उस राक्षसने रम्भाको बलपूर्वक शिलापर बैठा लिया और कामभोगमें आसक्त हो उसके साथ समागम किया ॥ ४०½ ॥
सा विमुक्ता ततो रम्भा भ्रष्टमाल्यविभूषणा ॥ ४१ ॥ गजेन्द्राक्रीडमथिता नदीवाकुलतां गता । लुलिताकुलकेशान्ता करवेपितपल्लवा ॥ ४२ ॥ पवनेनावधूतेव लता कुसुमशालिनी ।
भावार्थ
उसके पुष्पहार टूटकर गिर गये, सारे आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये । उपभोगके बाद रावणने रम्भाको छोड़ दिया । उसकी दशा उस नदीके समान हो गयी जिसे किसी गजराजने क्रीडा करके मथ डाला हो; वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी ॥ वेणी-बन्ध टूट जानेसे उसके खुले हुए केश हवामें उड़ने लगे—उसका शृङ्गार बिगड़ गया । कर-पल्लव काँपने लगे । वह ऐसी लगती थी—मानो फूलोंसे सुशोभित होनेवाली किसी लताको हवाने झकझोर दिया हो ॥ ४२½ ॥
सा वेपमाना लज्जन्ती भीता करकृताञ्जलिः ॥ ४३ ॥ नलकूबरमासाद्य पादयोर्निपपात ह ।
भावार्थ
लज्जा और भयसे काँपती हुई वह नलकूबरके पास गयी और हाथ जोड़कर उनके पैरोंपर गिर पड़ी ॥ ४३½ ॥
तदवस्थां च तां दृष्ट्वा महात्मा नलकूबरः ॥ ४४ ॥ अब्रवीत् किमिदं भद्रे पादयोः पतितासि मे ।
भावार्थ
रम्भाको इस अवस्थामें देखकर महामना नलकूबरने पूछा—‘भद्रे ! क्या बात है ? तुम इस तरह मेरे पैरोंपर क्यों पड़ गयीं ?’ ॥ ४४½ ॥
सा वै निःश्वसमाना तु वेपमाना कृताञ्जलिः ॥ ४५ ॥ तस्मै सर्वं यथातत्त्वमाख्यातुमुपचक्रमे ।
भावार्थ
वह थर-थर काँप रही थी । उसने लंबी साँस खींचकर हाथ जोड़ लिये और जो कुछ हुआ था, वह सब ठीक-ठीक बताना आरम्भ किया ॥—४५½ ॥
एष देव दशग्रीवः प्राप्तो गन्तुं त्रिविष्टपम् ॥ ४६ ॥ तेन सैन्यसहायेन निशेयं परिणामिता ।
भावार्थ
‘देव ! यह दशमुख रावण स्वर्गलोकपर आक्रमण करनेके लिये आया है । इसके साथ बहुत बड़ी सेना है । उसने आजकी रातमें यहाँ डेरा डाला है ॥ ४६½ ॥
आयान्ती तेन दृष्टास्मि त्वत्सकाशमरिंदम ॥ ४७ ॥ गृहीता तेन पृष्टास्मि कस्य त्वमिति रक्षसा ।
भावार्थ
‘शत्रुदमन वीर ! मैं आपके पास आ रही थी, किंतु उस राक्षसने मुझे देख लिया और मेरा हाथ पकड़ लिया । फिर पूछा—‘तुम किसकी स्त्री हो ?’ ॥ ४७½ ॥
मया तु सर्वं यत् सत्यं तस्मै सर्वं निवेदितम् ॥ ४८ ॥ काममोहाभिभूतात्मा नाश्रौषीत् तद् वचो मम ।
भावार्थ
‘मैंने उसे सब कुछ सच-सच बता दिया, किंतु उसका हृदय कामजनित मोहसे आक्रान्त था, इसलिये मेरी वह बात नहीं सुनी ॥ ४८½ ॥
याच्यमानो मया देव स्नुषा तेऽहमिति प्रभो ॥ ४९ ॥ तत् सर्वं पृष्ठतः कृत्वा बलात् तेनास्मि धर्षिता ।
भावार्थ
‘देव ! मैं बारंबार प्रार्थना करती ही रह गयी कि प्रभो ! मैं आपकी पुत्रवधू हूँ, मुझे छोड़ दीजिये; किंतु उसने मेरी सारी बातें अनसुनी कर दीं और बलपूर्वक मेरे साथ अत्याचार किया ॥ ४९½ ॥
एवं त्वमपराधं मे क्षन्तुमर्हसि सुव्रत ॥ ५० ॥ नहि तुल्यं बलं सौम्य स्त्रियाश्च पुरुषस्य हि ।
भावार्थ
‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले प्रियतम ! इस बेबसीकी दशामें मुझसे जो अपराध बन गया है, उसे आप क्षमा करें । सौम्य ! नारी अबला होती है, उसमें पुरुषके बराबर शारीरिक बल नहीं होता है ( इसीलिये उस दुष्टसे अपनी रक्षा मैं नहीं कर सकी )’ ॥ ५०½ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु संक्रुद्धस्तदा वैश्रवणात्मजः ॥ ५१ ॥ धर्षणां तां परां श्रुत्वा ध्यानं सम्प्रविवेश ह ।
भावार्थ
यह सुनकर वैश्रवणकुमार नलकूबरको बड़ा क्रोध हुआ । रम्भापर किये गये उस महान् अत्याचारको सुनकर उन्होंने ध्यान लगाया ॥ ५१½ ॥
तस्य तत् कर्म विज्ञाय तदा वैश्रवणात्मजः ॥ ५२ ॥ मुहूर्तात् क्रोधताम्राक्षस्तोयं जग्राह पाणिना ।
भावार्थ
उस समय दो ही घड़ीमें रावणकी उस करतूतको जानकर वैश्रवणपुत्र नलकूबरके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और उन्होंने अपने हाथमें जल लिया ॥ ५२½ ॥
गृहीत्वा सलिलं सर्वमुपस्पृश्य यथाविधि ॥ ५३ ॥ उत्ससर्ज तदा शापं राक्षसेन्द्राय दारुणम् ।
भावार्थ
जल लेकर पहले विधिपूर्वक आचमन करके नेत्र आदि सारी इन्द्रियोंका स्पर्श करनेके अनन्तर उन्होंने राक्षसराजको बड़ा भयंकर शाप दिया ॥ ५३½ ॥
अकामा तेन यस्मात् त्वं बलाद् भद्रे प्रधर्षिता ॥ ५४ ॥ तस्मात् स युवतीमन्यां नाकामामुपयास्यति ।
भावार्थ
वे बोले—‘भद्रे ! तुम्हारी इच्छा न रहनेपर भी रावणने तुमपर बलपूर्वक अत्याचार किया है । अतः वह आजसे दूसरी किसी ऐसी युवतीसे समागम नहीं कर सकेगा जो उसे चाहती न हो ॥ ५४½ ॥
यदा ह्यकामां कामार्तो धर्षयिष्यति योषितम् ॥ ५५ ॥ मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा ।
भावार्थ
‘यदि वह कामपीड़ित होकर उसे न चाहनेवाली युवती-पर बलात्कार करेगा तो तत्काल उसके मस्तकके सात टुकड़े हो जायँगे’ ॥ ५५½ ॥
तस्मिन्नुदाहृते शापे ज्वलिताग्निसमप्रभे ॥ ५६ ॥ देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिश्च खाच्च्युता ।
भावार्थ
नलकूबरके मुखसे प्रज्वलित अग्निके समान दग्ध कर देनेवाले इस शापके निकलते ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ५६½ ॥
पितामहमुखाश्चैव सर्वे देवाः प्रहर्षिताः ॥ ५७ ॥ ज्ञात्वा लोकगतिं सर्वां तस्य मृत्युं च रक्षसः । ऋषयः पितरश्चैव प्रीतिमापुरनुत्तमाम् ॥ ५८ ॥
भावार्थ
ब्रह्मा आदि सभी देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ । रावणके द्वारा की गयी लोककी सारी दुर्दशाको और उस राक्षसकी मृत्युको भी जानकर ऋषियों तथा पितरोंको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ ५७-५८ ॥
श्रुत्वा तु स दशग्रीवस्तं शापं रोमहर्षणम् । नारीषु मैथुनीभावं नाकामास्वभ्यरोचयत् ॥ ५९ ॥
भावार्थ
उस रोमाञ्चकारी शापको सुनकर दशग्रीवने अपनेको न चाहनेवाली स्त्रियोंके साथ बलात्कार करना छोड़ दिया ॥ ५९ ॥
तेन नीताः स्त्रियः प्रीतिमापुः सर्वाः पतिव्रताः । नलकूबरनिर्मुक्तं शापं श्रुत्वा मनःप्रियम् ॥ ६० ॥
भावार्थ
वह जिन-जिन पतिव्रता स्त्रियोंको हरकर ले गया था, उन सबके मनको नलकूबरका दिया वह शाप बड़ा प्रिय लगा । उसे सुनकर वे सब-की-सब बहुत प्रसन्न हुईं ॥ ६० ॥
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