उत्तरकाण्ड, सर्ग 25
स तु दत्त्वा दशग्रीवो बलं घोरं खरस्य तत् । भगिनीं स समाश्वास्य हृष्टः स्वस्थतरोऽभवत् ॥ १ ॥
भावार्थ
खरको राक्षसोंकी भयङ्कर सेना देकर और बहिनको धीरज बँधाकर रावण बहुत ही प्रसन्न और स्वस्थचित्त हो गया॥१॥
ततो निकुम्भिला नाम लङ्कोपवनमुत्तमम् । तद् राक्षसेन्द्रो बलवान् प्रविवेश सहानुगः ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर बलवान् राक्षसराज रावण लङ्काके निकुम्भिला नामक उत्तम उपवनमें गया । उसके साथ बहुत-से सेवक भी थे ॥ २॥
ततो यूपशताकीर्णं सौम्यचैत्योपशोभितम् । ददर्श विष्ठितं यज्ञं श्रिया सम्प्रज्वलन्निव ॥ ३ ॥
भावार्थ
रावण अपनी शोभा एवं तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहा था । उसने निकुम्भिलामें पहुँचकर देखा, एक यज्ञ हो रहा है, जो सैकड़ों यूपोंसे व्याप्त और सुन्दर देवालयों-से सुशोभित है ॥ ३॥
ततः कृष्णाजिनधरं कमण्डलुशिखाध्वजम् । ददर्श स सुतं तत्र मेघनादं भयावहम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
फिर वहाँ उसने अपने पुत्र मेघनादको देखा, जो काला मृगचर्म पहने हुए तथा कमण्डलु, शिखा और ध्वज धारण किये बड़ा भयङ्कर जान पड़ता था ॥ ४ ॥
तं समासाद्य लङ्केशः परिष्वज्याथ बाहुभिः । अब्रवीत् किमिदं वत्स वर्तसे ब्रूहि तत्त्वतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
उसके पास पहुँचकर लङ्केश्वरने अपनी भुजाओंद्वारा उसका आलिङ्गन किया और पूछा—‘बेटा ! यह क्या कर रहे हो ? ठीक-ठीक बताओ’ ॥ ५ ॥
उशना त्वब्रवीत् तत्र यज्ञसम्पत्समृद्धये । रावणं राक्षसश्रेष्ठं द्विजश्रेष्ठो महातपाः ॥ ६ ॥
भावार्थ
(मेघनाद यज्ञके नियमानुसार मौन रहा) उस समय पुरोहित महातपस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने, जो यज्ञ-सम्पत्तिकी समृद्धिके लिये वहाँ आये थे, राक्षसशिरोमणि रावणसे कहा—॥६॥
अहमाख्यामि ते राजञ्श्रूयतां सर्वमेव तत् । यज्ञास्ते सप्त पुत्रेण प्राप्तास्ते बहुविस्तराः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! मैं सब बातें बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनिये—आपके पुत्रने बड़े विस्तारके साथ सात यज्ञोंका अनुष्ठान किया है ॥ ७ ॥
अग्निष्टोमोऽश्वमेधश्च यज्ञो बहुसुवर्णकः । राजसूयस्तथा यज्ञो गोमेधो वैष्णवस्तथा ॥ ८ ॥ माहेश्वरे प्रवृत्ते तु यज्ञे पुम्भिः सुदुर्लभे । वरांस्ते लब्धवान् पुत्रः साक्षात् पशुपतेरिह ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘अग्निष्टोम, अश्वमेध, बहुसुवर्णक, राजसूय, गोमेध तथा वैष्णव—ये छः यज्ञ पूर्ण करके जब इसने सातवाँ माहेश्वर यज्ञ, जिसका अनुष्ठान दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है, आरम्भ किया, तब आपके इस पुत्रको साक्षात् भगवान् पशुपतिसे बहुत-से वर प्राप्त हुए ॥ ८-९ ॥
कामगं स्यन्दनं दिव्यमन्तरिक्षचरं ध्रुवम् । मायां च तामसीं नाम यया सम्पद्यते तमः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘साथ ही इच्छानुसार चलनेवाला एक दिव्य आकाशचारी रथ भी प्राप्त हुआ है, इसके सिवा तामसी नामकी माया उत्पन्न हुई है, जिससे अन्धकार उत्पन्न किया जाता है ॥१०॥
एतया किल संग्रामे मायया राक्षसेश्वर । प्रयुक्तया गतिः शक्या नहि ज्ञातुं सुरासुरैः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘राक्षसेश्वर ! संग्राममें इस मायाका प्रयोग करनेपर देवता और असुरोंको भी प्रयोग करनेवाले पुरुषकी गतिविधिका पता नहीं लग सकता ॥ ११ ॥
अक्षयाविषुधी बाणैश्चापं चापि सुदुर्जयम् । अस्त्रं च बलवद् राजञ्छत्रुविध्वंसनं रणे ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! बाणोंसे भरे हुए दो अक्षय तरकस, अटूट धनुष तथा रणभूमिमें शत्रुका विध्वंस करनेवाला प्रबल अस्त्र– इन सबकी प्राप्ति हुई है ॥ १२ ॥
एतान् सर्वान् वराँल्लब्ध्वा पुत्रस्तेऽयं दशानन । अद्य यज्ञसमाप्तौ च त्वां दिदृक्षन् स्थितो ह्यहम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘दशानन ! तुम्हारा यह पुत्र इन सभी मनोवाञ्छित वरोंको पाकर आज यज्ञकी समाप्तिके दिन तुम्हारे दर्शनकी इच्छासे यहाँ खड़ा है’ ॥ १३ ॥
ततोऽब्रवीद् दशग्रीवो न शोभनमिदं कृतम् । पूजिताः शत्रवो यस्माद् द्रव्यैरिन्द्रपुरोगमाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
यह सुनकर दशग्रीवने कहा—‘बेटा ! तुमने यह अच्छा नहीं किया है; क्योंकि इस यज्ञसम्बन्धी द्रव्योंद्वारा मेरे शत्रुभूत इन्द्र आदि देवताओंका पूजन हुआ है ॥ १४ ॥
पहीदानीं कृतं यद्धि सुकृतं तन्न संशयः । आगच्छ सौम्य गच्छामः स्वमेव भवनं प्रति ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘अस्तु, जो कर दिया, सो अच्छा ही किया; इसमें संशय नहीं है । सौम्य ! अब आओ, चलो । हमलोग अपने घरको चलें’ ॥ १५ ॥
ततो गत्वा दशग्रीवः सपुत्रः सविभीषणः । स्त्रियोऽवतारयामास सर्वास्ता बाष्पगद्गदाः ॥ १६ ॥
भावार्थ
तदनन्तर दशग्रीवने अपने पुत्र और विभीषणके साथ जाकर पुष्पक विमानसे उन सब स्त्रियोंको उतारा, जिन्हें हरकर ले आया था । वे अब भी आँसू बहाती हुई गद्गदकण्ठसे विलाप कर रही थीं ॥ १६ ॥
लक्षिण्यो रत्नभूताश्च देवदानवरक्षसाम् । तस्य तासु मतिं ज्ञात्वा धर्मात्मा वाक्यमब्रवीत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
वे उत्तम लक्षणोंसे सुशोभित होती थीं और देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंके घरकी रत्न थीं । उनमें रावणकी आसक्ति जानकर धर्मात्मा विभीषणने कहा—॥ १७ ॥
ईदृशैस्त्वं समाचारैर्यशोऽर्थकुलनाशनैः । धर्षणं प्राणिनां ज्ञात्वा स्वमतेन विचेष्टसे ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! ये आचरण यश, धन और कुलका नाश करनेवाले हैं । इनके द्वारा जो प्राणियोंको पीड़ा दी जाती है, उससे बड़ा पाप होता है । इस बातको जानते हुए भी आप सदाचारका उल्लङ्घन करके स्वेच्छाचारमें प्रवृत्त हो रहे हैं ॥ १८ ॥
ज्ञातीस्तान् धर्षयित्वेमास्त्वयाऽऽनीता वराङ्गनाः । त्वामतिक्रम्य मधुना राजन् कुम्भीनसी हृता ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! इन बेचारी अबलाओंके बन्धु-बान्धवोंको मार· कर आप इन्हें हर लाये हैं और इधर आपका उल्लङ्घन करके— आपके सिरपर लात रखकर मधुने मौसेरी बहिन कुम्भीनसीका अपहरण कर लिया’ ॥ १९ ॥
रावणस्त्वब्रवीद् वाक्यं नावगच्छामि किं त्विदम् । कोऽयं यस्तु त्वयाऽऽख्यातो मधुरित्येव नामतः ॥२०॥
भावार्थ
रावण बोला—‘मैं नहीं समझता कि तुम क्या कह रहे हो । जिसका नाम तुमने मधु बताया है, वह कौन है ?’॥२०॥
विभीषणस्तु संक्रुद्धो भ्रातरं वाक्यमब्रवीत् । श्रूयतामस्य पापस्य कर्मणः फलमागतम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
तब विभीषणने अत्यन्त कुपित होकर भाई रावणसे कहा— ‘सुनिये, आपके इस पापकर्मका फल हमें बहिनके अपहरणके रूपमें प्राप्त हुआ है ॥ २१ ॥
मातामहस्य योऽस्माकं ज्येष्ठो भ्राता सुमालिनः । माल्यवानिति विख्यातो वृद्धः प्राज्ञो निशाचरः ॥ २२ ॥ पिता ज्येष्ठो जनन्या नो ह्यस्माकं चार्यकोऽभवत् । तस्य कुम्भीनसी नाम दुहितुर्दुहिताभवत् ॥ २३ ॥ मातृष्वसुरथास्माकं सा च कन्यानलोद्भवा । भवत्यस्माकमेवैषा भ्रातृणां धर्मतः स्वसा ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘हमारे नाना सुमालीके जो बड़े भाई माल्यवान् नामसे विख्यात, बुद्धिमान् और बड़े-बूढ़े निशाचर हैं, वे हमारी माता कैकसीके ताऊ हैं । इसी नाते वे हमलोगोंके भी बड़े नाना हैं । उनकी पुत्री अनला हमारी मौसी हैं । उन्हींकी पुत्री कुम्भीनसी है। हमारी मौसी अनलाकी बेटी होनेसे ही यह कुम्भीनसी हम सब भाइयोंकी धर्मतः बहिन होती है ॥ २२–२४ ॥
सा हृता मधुना राजन् राक्षसेन बलीयसा । यज्ञप्रवृत्ते पुत्रे तु मयि चान्तर्जलोषिते ॥ २५ ॥ कुम्भकर्णो महाराज निद्रामनुभवत्यथ । निहत्य राक्षसश्रेष्ठानमात्यानिह सम्मतान् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! आपका पुत्र मेघनाद जब यज्ञमें तत्पर हो गया, मैं तपस्याके लिये पानीके भीतर रहने लगा और महाराज ! भैया कुम्भकर्ण भी जब नींदका आनन्द लेने लगे, उस समय महाबली राक्षस मधुने यहाँ आकर हमारे आदरणीय मन्त्रियोंको, जो राक्षसोंमें श्रेष्ठ थे, मार डाला और कुम्भीनसीका अपहरण कर लिया ॥ २५-२६ ॥
धर्षयित्वा हृता सा तु गुप्ताप्यन्तःपुरे तव । श्रुत्वापि तन्महाराज क्षान्तमेव हतो न सः ॥ २७ ॥ यस्मादवश्यं दातव्या कन्या भर्त्रे हि भ्रातृभिः ।
भावार्थ
‘महाराज ! यद्यपि कुम्भीनसी अन्तःपुरमें भलीभाँति सुरक्षित थी तो भी उसने आक्रमण करके बलपूर्वक उसका अपहरण किया । पीछे इस घटनाको सुनकर भी हमलोगोंने क्षमा ही की । मधुका वध नहीं किया; क्योंकि जब कन्या विवाहके योग्य हो जाय तो उसे किसी योग्य पतिके हाथमें सौंप देना ही उचित है । हम भाइयोंको अवश्य यह कार्य पहले कर देना चाहिये था ॥ २७½ ॥
तदेतत् कर्मणो ह्यस्य फलं पापस्य दुर्मतेः ॥ २८ ॥ अस्मिन्नेवाभिसम्प्राप्तं लोके विदितमस्तु ते ।
भावार्थ
‘हमारे यहाँसे जो बलपूर्वक कन्याका अपहरण हुआ है, यह आपकी इस दूषित बुद्धि एवं पापकर्मका फल है, जो आपको इसी लोकमें प्राप्त हो गया । यह बात आपको भलीभाँति विदित हो जानी चाहिये’ ॥ २८½ ॥
विभीषणवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रः स रावणः ॥ २९ ॥ दौरात्म्येनात्मनोद्भूतस्तप्ताम्भा इव सागरः । ततोऽब्रवीद् दशग्रीवः क्रुद्धः संरक्तलोचनः ॥ ३० ॥
भावार्थ
विभीषणकी यह बात सुनकर राक्षसराज रावण अपनी की हुई दुष्टतासे पीड़ित हो तपे हुए जलवाले समुद्रके समान संतप्त हो उठा । वह रोषसे जलने लगा और उसके नेत्र लाल हो गये । वह बोला—॥ २९-३० ॥
कल्प्यतां मे रथः शीघ्रं शूराः सज्जीभवन्तु नः । भ्राता मे कुम्भकर्णश्च ये च मुख्या निशाचराः ॥ ३१ ॥ वाहनान्यधिरोहन्तु नानाप्रहरणायुधाः । अद्य तं समरे हत्वा मधुं रावणनिर्भयम् ॥ ३२ ॥ सुरलोकं गमिष्यामि युद्धाकाङ्क्षी सुहृद्वृतः ।
भावार्थ
‘मेरा रथ शीघ्र ही जोतकर आवश्यक सामग्रीसे सुसज्जित कर दिया जाय । मेरे शूरवीर सैनिक रणयात्राके लिये तैयार हो जायँ । भाई कुम्भकर्ण तथा अन्य मुख्य-मुख्य निशाचर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो सवारियोंपर बैठें । आज रावणका भय न माननेवाले मधुका समराङ्गणमें वध करके मित्रोंको साथ लिये युद्धकी इच्छासे देवलोककी यात्रा करूँगा’ ॥ ३१-३२½ ॥
अक्षौहिणीसहस्राणि चत्वार्यभ्यायाणि रक्षसाम् ॥ ३३ ॥ नानाप्रहरणान्याशु निर्ययुर्युद्धकाङ्क्षिणाम् ।
भावार्थ
रावणकी आज्ञासे युद्धमें उत्साह रखनेवाले श्रेष्ठ राक्षसोंकी चार हजार अक्षौहिणी सेना नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये शीघ्र लङ्कासे बाहर निकली ॥ ३३½ ॥
इन्द्रजित् त्वग्रतः सैन्यात् सैनिकान् परिगृह्य च॥३४॥ जगाम रावणो मध्ये कुम्भकर्णश्च पृष्ठतः ।
भावार्थ
मेघनाद समस्त सैनिकोंको साथ लेकर सेनाके आगे-आगे चला । रावण बीचमें था और कुम्भकर्ण पीछे-पीछे चलने लगा ॥ ३४½ ॥
विभीषणश्च धर्मात्मा लङ्कायां धर्ममाचरन् ॥ ३५ ॥ शेषाः सर्वे महाभागा ययुर्मधुपुरं प्रति ।
भावार्थ
विभीषण धर्मात्मा थे । इसलिये वे लङ्कामें ही रहकर धर्मका आचरण करने लगे । शेष सभी महाभाग निशाचर मधुपुरकी ओर चल दिये ॥ ३५½ ॥
खरैरुष्ट्रैर्हयैर्दीप्तैः शिशुमारैर्महोरगैः ॥ ३६ ॥ राक्षसाः प्रययुः सर्वे कृत्वाऽऽकाशं निरन्तरम् ।
भावार्थ
गदहे, ऊँट, घोड़े, शिशुमार (सूँस) और बड़े-बड़े नाग आदि दीप्तिमान् वाहनोंपर आरूढ़ हो सब राक्षस आकाशको अवकाशरहित करते हुए चले ॥ ३६½ ॥
दैत्याश्च शतशस्तत्र कृतवैराश्च दैवतैः ॥ ३७ ॥ रावणं प्रेक्ष्य गच्छन्तमन्वगच्छन् हि पृष्ठतः ।
भावार्थ
रावणको देवलोकपर आक्रमण करते देख सैकड़ों दैत्य भी उसके पीछे-पीछे चले, जिनका देवताओंके साथ वैर बँध गया था ॥ ३७½ ॥
स तु गत्वा मधुपुरं प्रविश्य च दशाननः ॥ ३८ ॥ न ददर्श मधुं तत्र भगिनीं तत्र दृष्टवान् ।
भावार्थ
मधुपुरमें पहुँचकर दशमुख रावणने वहाँ कुम्भीनसीको तो देखा, किंतु मधुका दर्शन उसे नहीं हुआ ॥ ३८½ ॥
सा च प्रह्वाञ्जलिर्भूत्वा शिरसा चरणौ गता ॥ ३९ ॥ तस्य राक्षसराजस्य त्रस्ता कुम्भीनसी तदा ।
भावार्थ
उस समय कुम्भीनसीने भयभीत हो हाथ जोड़कर राक्षसराजके चरणोंपर मस्तक रख दिया ॥ ३९½ ॥
तां समुत्थापयामास न भेतव्यमिति ब्रुवन् ॥ ४० ॥ रावणो राक्षसश्रेष्ठः किं चापि करवाणि ते ।
भावार्थ
तब राक्षसप्रवर रावणने कहा—‘डरो मत’; फिर उसने कुम्भीनसीको उठाया और कहा—‘मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ ?’ ॥ ४०½ ॥
साब्रवीद् यदि मे राजन् प्रसन्नस्त्वं महाभुज ॥ ४१ ॥ भर्तारं न ममेहाद्य हन्तुमर्हसि मानद् । नहीदृशं भयं किंचित् कुलस्त्रीणामिहोच्यते ॥ ४२ ॥ भयानामपि सर्वेषां वैधव्यं व्यसनं महत् ।
भावार्थ
वह बोली—‘दूसरोंको मान देनेवाले राक्षसराज ! महाबाहो ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो आज यहाँ मेरे पतिका वध न कीजिये; क्योंकि कुलवधुओंके लिये वैधव्यके समान दूसरा कोई भय नहीं बताया जाता है। वैधव्य ही नारीके लिये सबसे बड़ा भय और सबसे महान् संकट है॥४१-४२½॥
सत्यवाग् भव राजेन्द्र मामवेक्षस्व याचतीम् ॥ ४३ ॥ त्वयाप्युक्तं महाराज न भेतव्यमिति स्वयम् ।
भावार्थ
‘राजेन्द्र ! आप सत्यवादी हों—अपनी बात सची करें । मैं आपसे पतिके जीवनकी भीख माँगती हूँ, आप मुझ दुखिया बहिनकी ओर देखिये, मुझपर कृपा कीजिये । महाराज ! आपने स्वयं भी मुझे आश्वासन देते हुए कहा था कि ‘डरो मत ।’ अतः अपनी उसी बातकी लाज रखिये’ ॥ ४३½ ॥
रावणस्त्वब्रवीद्धृष्टः स्वसारं तत्र संस्थिताम् ॥ ४४ ॥ क चासौ तव भर्ता वै मम शीघ्रं निवेद्यताम् । सह तेन गमिष्यामि सुरलोकं जयाय हि ॥ ४५ ॥
भावार्थ
यह सुनकर रावण प्रसन्न हो गया । वह वहाँ खड़ी हुई अपनी बहिनसे बोला—‘तुम्हारे पति कहाँ हैं ? उन्हें शीघ्र मुझे सौंप दो । मैं उन्हें साथ लेकर देवलोकपर विजयके लिये जाऊँगा ॥ ४४-४५ ॥
तव कारुण्यसौहार्दान्निवृत्तोऽस्मि मधोर्वधात् । इत्युक्ता सा समुत्थाप्य प्रसुप्तं तं निशाचरम् ॥ ४६ ॥ अब्रवीत् सम्प्रहृष्टेव राक्षसी सा पतिं वचः ।
भावार्थ
‘तुम्हारे प्रति करुणा और सौहार्दके कारण मैंने मधुके वधका विचार छोड़ दिया है ।’ रावणके ऐसा कहनेपर राक्षस-कन्या कुम्भीनसी अत्यन्त प्रसन्न-सी होकर अपने सोये हुए पतिके पास गयी और उस निशाचरको उठाकर बोली—४६½
एष प्राप्तो दशग्रीवो मम भ्राता महाबलः ॥ ४७ ॥ सुरलोकजयाकाङ्क्षी साहाय्ये त्वां वृणोति च । तदस्य त्वं सहायार्थं सबन्धुर्गच्छ राक्षस ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘राक्षसप्रवर ! ये मेरे भाई महाबली दशग्रीव पधारे हैं और देवलोकपर विजय पानेकी इच्छा लेकर वहाँ जा रहे हैं। इस कार्यके लिये ये आपको भी सहायक बनाना चाहते हैं; अतः आप अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ इनकी सहायताके लिये जाइये ॥ ४७-४८ ॥
स्निग्धस्य भजमानस्य युक्तमर्थाय कल्पितुम् । तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा तथेत्याह मधुर्वचः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘मेरे नाते आपपर इनका स्नेह है, आपको जामाता मानकर ये आपके प्रति अनुराग रखते हैं; अतः आपको इनके कार्यकी सिद्धिके लिये अवश्य सहायता करनी चाहिये ।’ पत्नीकी यह बात सुनकर मधुने ‘तथास्तु’ कहकर सहायता देना स्वीकार कर लिया ॥ ४९ ॥
ददर्श राक्षसश्रेष्ठं यथान्यायमुपेत्य सः । पूजयामास धर्मेण रावणं राक्षसाधिपम् ॥ ५० ॥
भावार्थ
फिर वह न्यायोचित रीतिसे निकट जाकर निशाचर-शिरोमणि राक्षसराज रावणसे मिला । मिलकर उसने धर्मके अनुसार उसका स्वागत-सत्कार किया ॥ ५० ॥
प्राप्य पूजां दशग्रीवो मधुवेश्मनि वीर्यवान् । तत्र चैकां निशामुष्य गमनायोपचक्रमे ॥ ५१ ॥
भावार्थ
मधुके भवनमें यथोचित आदर-सत्कार पाकर पराक्रमी दशग्रीव वहाँ एक रात रहा, फिर सबेरे उठकर वहाँसे जानेको उद्यत हुआ ॥ ५१ ॥
ततः कैलासमासाद्य शैलं वैश्रवणालयम् । राक्षसेन्द्रो महेन्द्राभः सेनामुपनिवेशयत् ॥ ५२ ॥
भावार्थ
मधुपुरसे यात्रा करके महेन्द्रके तुल्य पराक्रमी राक्षसराज रावण सायंकालतक कुबेरके निवास-स्थान कैलास पर्वतपर जा पहुँचा । वहाँ उसने अपनी सेनाका पड़ाव डालनेका विचार किया ॥ ५२ ॥
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